कविता

अभिनव निरंजन की कविताएँ एक घर्षण हैं जिसके ताप से कवि अपने समय का बुख़ार नापता है

निरंजन श्रोत्रिय


युवा कवि अभिनव निरंजन अपनी कविताओं में रूपकों, स्थितियों एवं दृश्यों का विभेदन कर उसमें से कविता अर्जित करते हैं। उनके लिए ये सब काव्य उपादान हैं जिनमें कला की अपरिमित संभावनाएँ छुपी हुई हैं। उन्हें अपने समय की सीमाओं के साथ उसकी जटिलताओं का भी पूरा भान है।
नैरेशन के इस दौर में उनकी कविता कब एक गहरे अर्थ में व्यंजित हो जाती है, पता ही नहीं चलता। पहली कविता ‘वैधानिक चेतावनी’ को ही लें।
इसमें एक अस्वीकरण (डिस्क्लेमर) है। यह वह प्रचलित स्थिति है जो दरअसल एक किस्म की सत्ता के चलते रूढ़ि हो चुकी है।
अभिनव निरंजन इस स्थिति को अपने अभीष्ट पर आरोपित करते हैं और फिर एक गहरे कटाक्ष के रूप में उसे काव्य की चरम स्थिति में लाते हैं। डिस्क्लेमर के अक्षरशः पालन करने पर यदि कविता की जगह घास और चाँद ही दीखते हैं तो कविता अपने क्लाईमेक्स से उलट कर ‘डिस्क्लेमर’ से ही सवाल करती नज़र आती है।
‘प्रजातंत्र’ एक छोटी कविता है जिसमें लोकतंत्र की आकस्मिकता को लक्ष्य किया गया है। जाहिर है, हमारे यहाँ लोकतंत्र की अवधारण और उसका विकास एक बहुत सोची-समझी नीति के अंतर्गत न होकर एक ‘कैजुअल’ किस्म की व्यवस्था है। यह आकस्मिक स्थिति अब हमारा अवांछित लेकिन अनिवार्य बोझ है।
अभिनव बहुत संक्षेप में, सहज भाव से इस वेदना को व्यक्त करते हैं। ‘उचित दूरी बनाए रखें’ किसी ट्रक के पीछे लिखा निर्देश भर नहीं है। वह एक अनुभव है जो कविता में आकर उन तमाम स्थितियों को अनावृत करता है जो हमसे एक मीठी और सुविधाजनक दूरी बनाए हुए हैं। यह दूरी हमें एक भ्रांत लोक में विचरण् कराने के लिए बाध्य है। उसमें झांकना या उसे नज़दीक से छूना उसकी असलियत को जानना है। वह ट्रक हो या फिर मनुष्य इस दूरी की अनिवार्यता को जानता है। ‘सपने में बैल’ एक राजनीतिक चेतना सम्पन्न महत्वपूर्ण कविता है जिसमें हमारे समय के जीनियस लेखकों एवं दो ध्रुवों पर स्थित दृश्यावलियों का सामजंस्य है।
सामंजस्य तो क्या यह एक घर्षण है जिसके ताप से कवि अपने समय का बुखार नापता है। दक्षिणपंथ, पूंजीवाद और समाजवाद के घालमेल से उत्पन्न धुँधलका समूची कविता में महसूसा जा सकता है।
इस कविता में भाषा का गठन एवं रवानगी देखने काबिल है। ‘सांस्कृतिक शुद्धिकरण’ कथित आर्यरक्त, वंशानुगत शुद्धता और मानव मात्र के विभेदों पर एक तंज़ है। यह विभेद और घृणा दरअसल शोषकतंत्र का वह हथियार है जो सदियों से बरकरार है। युवा कवि छोटे-छोटे मारक पदों के माध्यम से समूची वर्ण व्यवस्था और इस तरह शोषण तंत्र पर सुलगते सवाल उठाता है-
‘देखो डरो नहीं/ इसमें जातीय द्वेष वाली कोई बात नहीं/ वो बस इस देश के सांस्कृतिक इतिहास को दोषमुक्त करना/ चाहते हैं/ उन्हें शुद्धि से लगाव है।’
‘निर्मल वर्मा के प्रति’ एक अलग तरह की कविता है जिसमें युवा कवि ने अपने प्रिय कथाकार की समूची सृजनयात्रा को अपनी तरह से परिभाषित किया है-
‘सन्नाटा काफी लम्बा/ जो बीच-बीच में टूट कर/ आवाज़ों के लिए जगह बनाता है।’
वे निर्मलजी के गद्य-संसार में अलगाव और प्रेम को घुलते देखते हैं, कहानी के अंदर कविता को बुनते देखते हैं।
‘सांत्वना’ कविता में कृत्रिमता के विरूद्ध प्रकृति की आदिमता का संघर्ष है। हम यह जानते हैं कि मिट्टी से उपजे आदिम स्वाद के लिए टनों उर्वरकों और कृत्रिम संसाधनों की दरकार नहीं। प्रकृति का स्वभाव ही है कि  वह किसी भी संभावना में फूट पड़ती है। कविता के क्लाईमेक्स में आकाश और धरती के बीच झूमती फसल और उसे देखने की किसानी आस इसे एक सौंधी आदिम गंध प्रदान करती है।
‘रिट्रीट’ अपनी स्मृतियों में झूलने और उससे मुक्त होने का आव्हान है। कवि का मानना है कि नाॅस्टैल्जिया अपने अतीत से संभोग की क्रिया ही नहीं अपनी नियति से पलायन भी है।
‘चाह’ एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण कविता है जिसमें मिट्टी का भुरभुरापन, जीवन की प्रत्याशा और बारिश की आकांक्षा है। कवि इस जिजीविषा को न्यूनतम और अधिकतम मानता है। ‘सहारे’ कविता में रात का सन्नाटा है, अकेलापन है और रेडियो पर बजता गीत है।
यहाँ रेखांकित करने योग्य यह है कि यहाँ मनुष्य के अकेलेपन को केवल गीत नहीं बल्कि दूसरे छोर पर उसे बजाने वाला कोई मनुष्य दूर कर रहा है। तमाम यांत्रिकताओं से छनकर भरोसा अंततः मनुष्य पर ही टिकता है।
‘पतंग’ अदम्य आकांक्षाओं और जिजीविषा की कविता है। अभिलाषाएँ पतंगों की तरह खुले आसमान में उड़ना चाहती हैं। इन इच्छाओं को प्रतीकात्मक रूप से युवा कवि विभिन्न दृश्य-बंधों के माध्यम से प्रस्तुत करता है।
‘विस्थापन’ कविता में शहरीकरण का दर्द है। प्रवासी कामगारों के दर्द को बयां करती यह कविता ऐसी अर्थव्यवस्था पर तीखे सवाल करती है।
‘ज़ख्म ताज़ा रहें’ शृंखला की तीनों कविताओं में मिथकीय पात्रों, स्थितियों और हमारे समय के मूर्धन्य सर्जकांे के माध्यम से अपने समय-समाज को चीन्हने की पुरजोर कोशिश है। दरअसल इन कविताओं में फैंटेसी के जरिये कवि ने प्रतिशोध, हिंसा और घृणा का माहौल रच कर उसी से जूझना चाहा है।
अंतिम कविता में वर्णाश्रमी कथित परम्पराएँ हैं जिनके खिलाफ कवि का युद्ध जारी है जो अस्तित्ववादी दार्शनिक सार्त्र के नाटक ‘नो एक्ज़िट’ पर समाप्त होता है जहाँ नरक के किसी कक्ष में तीन शापित आत्माएँ कैद हैं। युवा कवि अभिनव निरंजन विभिन्न रूपकों, मिथकों, स्थितियों और सर्जकों के माध्यम से अपने समय को तलाशने का जोखिम उठाने वाले संभावनाशील कवि हैं जो बगैर किसी डिस्क्लेमर के अपनी कविता को पाना चाहते हैं।
अभिनव निरंजन की कविताएँ
1. वैधानिक चेतावनी
इस कविता के लिखने के दौरान
कोई पशु आहत नहीं किया गया
एक भी पेड़ नहीं काटा गया
तम्बाकू सेवन से होने वाले नुकसान
हर पन्ने पर वाटरमार्क में दर्ज़ हैं
रति-क्रिया केवल ग्राफिक चित्रण द्वारा दिखाया है
कोई प्रश्न नहीं पूछे गए
किसी प्रतिमा का खंडन नहीं किया गया
किसी ऐतिहासिक चरित्र का कोई हनन नहीं
राष्ट्र और राजनेता का भरपूर गुणगान है
अदालत की अवमानना की कोई मंशा नहीं
आर्थिक या सामाजिक नीतियों की कोई आलोचना नहीं
सरकार की खि़लाफ़त का तो सवाल ही नहीं
अब आप हमसे ये ना पूछें कि
कविता की जगह यहाँ केवल घास
और चाँद ही उगते क्यूँ दिख रहे हैं?
  2. प्रजातंत्र
खड़ा था कहीं, यूँ ही
कोई अचानक आया और कहकर गया
‘साहब इसका ध्यान रखिए ज़रा, मैं बस अभी आया’
एक बच्चे को हाथ में थमाया और गुम हो गया
अब मैं क्या करूँ इस बच्चे का
इसे यहाँ छोड़ नहीं सकता
साथ घर भी नहीं ले जा सकता
यह बच्चा मेरे कांधे से टंगा प्रजातंत्र है…।
3. उचित दूरी बनाए रखें
बहुत नज़दीक से चाँद केवल मिट्टी है
और सूरज है खौलता लावा
हीरा केवल कोयला, कोयला केवल जीवावशेष
बहुत नज़दीक से जुगनू है कीट
बहुत नज़दीक से इन्द्रधनुष है ही नहीं
बहुत नज़दीक से आदमी केवल कोशिका तंत्र
आदमी की गंध माने पसीने की बू
बहुत नज़दीक से रिश्तों की गर्माहट
बनती है निजता का अतिक्रमण
दोस्ती हो जाती है परजीवी
करूणा बनती है दया
क्षमा भी बनती है दंभ
बहुत नज़दीक से ईश्वर लगता है भयावह
राज्य के नज़दीक आए धर्म
एक साधू बन जाता है अभिनेता, दूसरा कैपिटलिस्ट
एक पूरी कौम बन जाती है आरोपी, अभियुक्त या गवाह
जंगल के बहुत करीब आए शहर
जनजाति पर लगती है आंतरिक सुरक्षा की मुहर
नागरिक के बहुत नज़दीक आए राष्ट्र
ध्वज बनती है सूली
एक छात्र बताया जाता है देशद्रोही, दूसरा आत्महंता
राष्ट्रप्रेम के बहुत नज़दीक रहती है बगावत
राष्ट्रभक्ति के नज़दीक गुलामी
वर्षों लम्बी सड़कें नापी है इन ट्रकों ने
छानी है धूल, सोखी घृणा और तिरस्कार
अपना अनुभव है जो सचेत करता है
‘कृपया उचित दूरी बनाए रखें’।
4. सपने में बैल
सपने में सब कुछ होने लगता है गड्डमड्ड
मेरा झंडा बदलने लगता है रंग
केसरिया से हरा, फिर लाल, फिर नीला
नीला, बर्फ़ में जम गई लाश की तरह
मैं देखता हूँ सपने में बैल
बैल पर बैठा काफ्का
नाचत है बार में नशे में धुत्त
और दूसरे विश्वयुद्ध की यातना पर
कविता सुनाता है रिल्के
पेरिस में दिखती है बनारस की गलियाँ
उड़ती चीलों की चोंच में हरी घास के तिनके
बैल दिखता है निरीह, गाय उन्मत्त
सौदा लेकर आते गाँधी बाबा से
बदहवास भागते टकराई
अठारह सौ सत्तावन के ग़दर से बचकर निकली एक लड़की
बाबा का नून बिखरा राजपथ पर, गाॅगल्स के टुकड़े हुए चार
एक हौली-सी आवाज़ में कहा लड़की ने-साॅरी
और गुम हो गई कनाॅट प्लेस के एक चमचमाते माॅल में
कान से रेडियो सटाए ग़ालिब ने हँसकर कहा
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे
‘यहाँ पोस्टर चिपकाना मना है’ वाला पोस्टर लिए
कबीर भटकता रहा दरबदर
परेशान कि इसे चिपकाए कहाँ
और अंत में पहुँचता है संसद भवन
हाँ, बस यही जगह है उचित
यहाँ सचमुच कोई पोस्टर अब तनकर चिपक नहीं पाता
ना समाजवाद का, ना धर्मनिरपेक्षता का, ना लोकशाही का
ना इसका, ना उसका
सब पड़ जाते हैं ढीले, बन जाता है झोल
सपने का हैंग-ओवर ही होगा
कि देखता हूँ कुछ वैसा ही जब खुलती है आँख
एक समाजवादी धर्मनिरपेक्ष देश
जहाँ सत्ता के बाएँ बाजू पर संघी टैटू
दाहिने पर पूँजीवादी फ्रेंडशिप बैंड
एक न्यायपालिका जो पूरी तरह से अंधी भी नहीं
बस थोड़ी-सी भैंगी
जिस रफ्तार से एक कीमती कार
फुटपाथ पर नींद में डूबे मजदूरों की छाती करती है पार
उसकी दोगुनी रफ्तार से उसका चालक
अदालत में होता है बरी
देशभक्ति के एक बड़े-से हौदे में जब
सारा राष्ट्र छपाक छपाक की जलक्रीड़ा कर रहा है
मैं अपने हाथ में एक ऐसी सूखी कविता लिए खड़ा हूँ
जो बारिश में भी भीगती नहीं।
5. सांस्कृतिक शुद्धिकरण
घबराओ मत
वो इतिहास बदलना नहीं चाहते
बस थोड़ा सुधार करेंगे इसमें
किस बात का खौफ़ है तुम्हें?
कि वो तुम्हारे बाप दादाओं की कब्र उधेड़ेंगे?
करने दो
मुर्दे हैं वो
मुर्दों के जबड़े खोलकर देख लेने दो
देख लेने दो उन्हें
कौन-सा दाँत इसी ज़मीन से उपजा था
कौन-सा दाँत ईरान यूनान की भूमि से आया
मसूढ़ों का पैटर्न दक्कनी है या मंगोली!
खून की जाँच कैसे करेंगे?
खून तो जमकर सूखकर गायब हो चुका!
ये परेशानी है उनकी
जिनसे तुम खौफ़ खाते हो….
हाँ हो सकता है
वो तुम्हारे खून का नमूना निकालें थोड़ा
और तुम्हें लेबोरेट्री तक जाने की ज़हमत उठानी पड़े
अपने मल का सैंपल भी देना पड़े
देखो ज़्यादा डरना मत
ऐसे में सिट्ठी फँस जाती है कई बार
फिर उन्हें उँगलियाँ डालकर न निकालनी पड़े
इसमें उन्हें खीज हो सकती है नाहक
क्या है?
मल मत्र है, रोज त्यागते हो
थोड़ा उन्हें भी दे देना, सैंपल की खातिर!
देखो डरो नहीं
इसमें जातीय द्वेष वाली कोई बात नहीं
वो बस इस देश के सांस्कृतिक इतिहास को
दोषमुक्त करना चाहते हैं
उन्हें शुद्धि से लगाव है
अब ऐसा है तो है
हुलसने से क्या होगा!
देखो ऐसा करो
अपनी धमनियों को काट डालो दाँतों से
एक-दूसरे की सहायता करो इसमें
और झोंक डालो नसों में चुल्लू भर गंगाजल
फिर उनके फरिश्तों को भी कोई दोष न मिलेगा
तुम्हारे खून और मल के नमूनों में
बची रहेगा अस्मिता पुरखों की
मिलेगी तुम्हें जान की अमान
देखो डरो नहीं!
6. निर्मल वर्मा के प्रति
उनके यहाँ आलोक अक्सर फीका
और मृत्यु हमेशा छोटी होती है
सन्नाटा काफी लम्बा
जो बीच-बीच में टूटकर
आवाज़ों के लिए जगह बनाता है
बदलते मौसमों और महीनों बरक्स
यहाँ पीड़ा का यूनिक शेड उभरता है
इंसानी ज़िन्दगी में यहाँ वहाँ
ईश्वर अपना अस्तित्व टटोलता है
कहीं टेक भर ज़मीन मिलती है
कहीं से उसे निराश लौटना पड़ता है
गुनगुने पानी में नमक की तरह
अलगाव और आसक्ति घुलती रहती है
यहाँ ऐ तिलिस्मनुमा दुनिया है
कहानी के अन्दर कविता बुनती रहती है।
7. सांत्वना
उपाय क्या है मेरे पास सिवाय इसके
कि अपनी जिव्हा की नोक पर
बसंत की हवा को चखूँ और कहूँ
कि मौसमों का नाश अब भी संभव नहीं
चाहे ठूँस दो धरती के कोने-कोने में
फुँफकारते हुए कारखाने
उँडेल दो मिट्टी के अंदर
बोरी के बोरी खाद
चाहे झोंक दो नदियों में
टनों टन गटर का पानी
और उपलाने दो समंदर में फेन की तरह
मरी हुई मछलियाँ
कि बाकी फिर रह जाएगी
पके नीम में मिठास
आम की टहनियों पर बौर
पत्थरों को फोड़कर निकलते जंगली फूल
गीली मिट्टी से सिर उठाते केंचुए
और रह जाएगी किसान की आँखों में आस
‘अबकी झमाट धान होगा।’
8. रिट्रीट
आधी चाय, पूरी सिगरेट पीने के बाद
आज सुबह सवेरे खयाल आया-
ज़रा आज तक के अपने बीते जीवन पर नज़र डालूँ
शुरू से आखिर
क्या क्या किया/ भोगा/ देखा…सारे अनुभव
क्या क्या रह गया/ किया नहीं/ छूटा… सारे मलाल
फिर सोचा रहने दूँ
नाॅस्टैल्जिया अपने अतीत से संभोग की क्रिया है
मुर्दा क्षणों, घटनाओं, स्थलों को
नोचने-खसोटने की सनक
अपने पुराने समय में लौटने की बेकार होड़
एक प्रकार से मौत से भागने की चेष्टा
रिट्रीट फ्राॅम प्रेजेंट एंड फ्यूचर!
9. चाह
जीवन कैसा हो
जुते हुए खेत की मिट्टी
जैसा हल्का
हल्का और स्थिर
बीज को आतुर
और बरखा का निवेदन लिए
–ऐसा ही हो, बस!
10. सहारे
देर रात दूर से आती
रेडियो की आवाज़ के सहारे तैरती
किसी पुराने गाने की धुन
इसकी मधुरता की जकड़न
रात को उदास होने से रोकती है
असीम सन्नाटे में किसी के होने का आभास
अकेला नहीं हूँ का भरोसा
गीत के सहारे नहीं
उस रेडियो के
जिसे कोई तो बजा रहा होगा
इतनी रात गए…..।
11. पतंग
मुकम्मल सफ़र के पतंग
कटकर या फटकर ही ज़मीन पर वापस आते हैं
साबूत लौटकर वापस आनेवाली पतंगों ने
अपना जीवन पूरा जिया नहीं
कहते हैं पतंग सबसेे पहले किसी खिलदंड ने नहीं
एक दार्शनिक ने बनाया
जितनी संस्कृतियाँ उतनी मान्यताएँ
जितने देश प्रदेश
पतंगों की उतनी सजावट, रंग और विभिन्नताएँ
जब एक बच्चा उचककर आसमान की ओर
खुली बाँहों से धकेलता है पतंग को
एक बार उसे देखता है ऐसे
जैसे इतनी करीब से देख रहा हो आखरी बार
करता है अलविदा
कहता है अलविदा
कहता है हवाओं से -इसका ख़याल रखना
अकेले अपने माँझे की बदौलत
ज़्यादा देर टिकेगी नहीं इसकी उड़ान
इसे तुम्हारे बहाव के सहारे भी चाहिए होंगे
कमानियों को जो लचकाता है फिर एक बार
इसकी मज़बूती नहीं देख रहा होता
दरअसल पुचकारता है
ठीक छोड़ने से पहले, एक आखरी बार
कन्नी बाँधने से पेंच लड़ाने तक
समानांतर भागीदारी है दोनों छोर पर
आसमान में अकेले पतंग ही ख़तरे से नहीं जूझती
जानता है पतंगबाज़
बिना मंुडेर वाली छत पर पतंग उड़ाना होशियारी नहीं
लेकिन पतंगबाज कहता है अपनी पतंग से
मैं तुम्हारे ख़तरे में बराबर का हूँ साझी
वैसे बच्चा अभी बैठा है गुमसुम
आज बारिश का दिन है
आज पतंगें नहीं उड़ेंगी।
12. विस्थापन
उन्हें इंतज़ार रहता है दशहरे और दिवाली का
पर त्योहार के लिए नहीं
त्योहार मनाने जैसा मनाना तो
उन्होंने जाने कब का छोड़ दिया
इंतज़ार है तो बस इसलिए कि बेटे ने कहा है-
‘कोशिश करेगा दशहरे में आने की
नहीं तो दिवाली में जरूर आएगा’
किसी साल वह आ भी जाता है, कभी नहीं भी
ऐसा नहीं कि वह आना नहीं चाहता
यह किस सामाजिक संरचना में आकार ले लिया
किसकी परिकल्पना थी ऐसी अर्थव्यवस्था
कब और किस तरह
रोज़गार, जीवनयपन और ज़िंदगी के ऐसे अलग खाने बन गए
नाभिनाल पर किस विस्फोट ने ऐसा बिखराव पैदा किया
कि विस्थापितों की इतनी बड़ी एक सभ्यता पनप गई
कैसी नियति है कि बिना किसी अंधड़ के पत्ते रहे हैं बिखर
ये किसने जड़ों में इतनी हवा भर दी….।
13. ज़ख्म ताजा रहें
                            1/
ना मेरे पास ठंडक देने वाला बनफूल तेल है
ना मर्दाना ताकत प्रदान करने वाली कोई यूनानी दवा
मलहम मेरा, ज़ख्म को ज़िन्दा रखता है
ताकि खून का क्लाॅट बनता रहे
औ’ ज़ख्म अपने आप भरे, धीरे-धीरे…
आप कहेंगे ये कैसी अनर्गल बातें करता है?
बैद है कि कसाई
आप धीरज धरें, आपा न खोएँ
बैद या कसाई- दोनों में से कोई नहीं हूँ मैं
मैं हूँ एक अदद अभागा इंसान
जिसे छोड़ रखा है एक श्मशान की रखवाली के लिए
ठीक वैसे ही, जैसे बर्बरीक का सर काट कर रख दिया था
पर्वत पर
महाभारत की निगरानी करने को
अब आप फिर भयभीत न हों
यह कोई मुर्दा मनुष्यों का श्मशान नहीं
वहाँ तो राज होता है डोम राजाओं का
यह है सांस्कृतिक श्मशान
और रखवाली का उत्तरदायित्व लादा गया मुझ पर
आपको जो विचित्र आवाज़ें सुनाई देती हैं यदा-कदा
यह कोई हनुमान चालीसा नहीं पढ़ रहा मैं
ना कोई श्लोक गीता का
बस बुदबुदाता रहता हूँ आधी नींद, आधी मूर्छा में
बर्बरीक भी तो कभी पलकें झपकाता होगा निष्क्रिय
पड़े-पड़े अठारह दिन!
                     ————–
                           2/
जिस आदि-वृक्ष के तले बैठा हूँ मैं सहमकर
ऊपर उसी घनी बरगद की जटाओें में अटका है
मुक्तिबोधी चाँद का मुँह टेढ़ा
और जब रात अँधेरे का बलगम थूक रहा होता है
इसी की जड़ों के कहीं आसपास कुहकुहाती है
कुतिया कानी नागार्जुन की
दूर कहीं बनैले झाड़ के परे
आधा पालतू आधा जंगली-सा दिखने वाला एक जानवर
चबाता है हड्डियाँ दधीची की,हौले हौले
कव्वे बैठे हैं चुप्प
कलेजा करता है हाँय-हाँय
पर मैं भी हूँ बराबर सतर्क और तैयार
यह जो हाथ में मेरे है भोथर-सा दिखने वाला हथियार
जिस पर हैं पूरे इक्कीस गहरे निशान
दरअसल फरसा है परशुराम का
मुझे शिव के वरदान से नहीं मिला
उठाया इसे यहीं किसी अधजली चिता से
शायद पड़ा हो द्वापर से ही यहीं…
च्मकाने को इसे, कभी चिता की राख से मांजता हूँ
कभी पत्थर घिसता हूँ
तो कभी अघोरियों के छोड़े गए सफेद खोपड़ियों पर रगड़ता हूँ
पर ना तो निशान जाते हैं
या पत्थर अहिल्या बनती है
और ना खोपड़ी से मुझे बचा ले जाने वाला कोई जिन्न ही
निकलता है…।
                      ——————-
                        3/
यहाँ और कोई नहीं आता
एक बारी अश्वत्थामा आए थे
गले लगाया और कहा ‘सखा’
जाते-जाते मुझे बतला गए-
यहाँ किसी पुरातन अवशेष पर खुदा है
मेरे यहाँ से बच निकलने का उपाय
किन्तु लिपि मोहनजोदड़ो की लगती है
मैं हर शिला पर अपनी आँखें फोड़ता हूँ
इस उम्मीद में कि शायद व्याकरण हाथ लग जाए
किन्तु होता वहीं है जो आपको पता है
फिर मैं लाचारी में बेकार बैठे
उलजुलूल कविताएँ गढ़ता हूँ…
निद्रा में भी मनस्थिति कुछ भिन्न नहीं
यह क्या भयावह स्वप्न था
(मैंने सपने मंे गुरू द्रोण का दुःस्वप्न देखा)
मैंने देखा एकलव्य का अँगूठा फिर पनप रहा था
गिरगिट की पूँछ की भांति
हथियार कोई दिव्य उठाया आचार्य ने
लपके जैसे काट वहीं गिरा दें
बिना किसी युद्ध-घोषणा के
आखिर गुरू-दक्षिणा दुबारा तो माँगी नहीं जा सकती
फिर क्या करें इस उगते अवांछनीय उद्दण्ड माँस के लोथड़े का
देखो, कैसे सुदर्शन की भांति बेख़ौफ़ बढ़ता चला आता है
ये लो सार्त्र, ये रहा तुम्हारा ‘नो एक्ज़िट’
क्या होना है अब हश्र मेरा।
(कवि अभिनव निरंजन, जन्मः 1 मार्च 1977, मुँगेर (बिहार)। शिक्षाः भौतिक शास्त्र में स्नातक एवं ग्रामीण प्रबंध में स्नातकोत्तर। सृजनः एक कविता-संग्रह ‘भयक्षेत्र में उतरते हुए’। सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
सम्प्रतिः कम्युनिकेशन क्षेत्र मेें कार्यरत।
सम्पर्कः 201 ए वसुंधरा अपार्टमेंट, सैक्टर 21 सी , फरीदाबाद- 121 001 (हरियाणा)
मोबाइलः 96502 23928
ई-मेल:[email protected]
टिप्पणीकार निरंजन श्रोत्रिय ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ से सम्मानित प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक , निबंधकार और कहानीकार हैं. साहित्य संस्कृति की मासिक पत्रिका  ‘समावर्तन ‘ के संपादक . युवा कविता के पाँच संचयनों  ‘युवा द्वादश’ का संपादन  और वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, आरौन, मध्यप्रदेश में प्राचार्य हैं. संपर्क: [email protected])

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