‘लेखक से मिलिए’ अभियान के अंतर्गत जन संस्कृति मंच, आज़मगढ़ इकाई 17 अगस्त 2025 को प्रतिष्ठित लेखक पंकज गौतम के घर पहुंची।
पंकज गौतम आज़मगढ़ शहर के जोधी का पुरा मोहल्ले में रहते हैं। जसम की टीम का स्वागत पंकज गौतम के बेटे अजय गौतम ने किया। पंकज गौतम ने मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया हुआ था। कुछ देर के बाद वे आये और जसम के सदस्यों से मुखातिब हुए।
इसके बाद एक छोटा सा सम्मान करते हुए बातचीत की शुरुआत हुई। जयप्रकाश नारायण ने पंकज गौतम को शाॅल ओढ़ाकर सम्मानित किया। इसके बाद बातचीत की शुरुआत समकालीन जनमत के सम्पादक के के पाण्डेय ने किया।
के के पाण्डेय ने कहा कि पंकज गौतम जब आज़मगढ़ में आये, उस समय मैं इलाहाबाद में पढ़ने के दौरान छात्र संगठन ‘पीएसओ’ और नाट्य टीम ‘दस्ता’ से जुड़ चुका था। आज़मगढ़ का साहित्यिक परिदृश्य सेठाश्रयी कवि सम्मेलन तक सीमित था। वाम धारा के साहित्यकार आज़मगढ़ शहर में आ गये थे लेकिन यहाँ के साहित्यिक माहौल में उनका निर्णायक दखल नहीं था। उसी दौरान सफदर हाशमी की हत्या हुई। दो दिन तैयारी कर काली पट्टी बांधकर इस हत्या के विरोध में मार्च निकला और नुक्कड़ नाटक किया गया। मारवाड़ी धर्मशाला में एक सेमिनार किया गया, जिसकी सदारत कैफ़ी आज़मी ने किया। बाद में मारवाड़ी धर्मशाला में प्रेमचंद पर एक सेमिनार हुआ। यहीं से आज़मगढ़ में साहित्य का माहौल बदला। यही समय है जब पंकज गौतम स्थाई रूप से शहर में रहने लगे। साहित्य के इस परिदृश्य को बदलने में पंकज गौतम की भूमिका मुख्य रही। हिन्दी गजल की आलोचना को भी पंकज गौतम ने महत्व प्रदान किया।

इसके बाद बातचीत का रुख पंकज गौतम की तरफ मोड़ा गया। आज़मगढ़ शहर में आने और वाम साहित्यिक माहौल बनाने के सवाल पर उन्होंने बात शुरू की।
उन्होंने बताया कि शिव कुमार ‘पराग’ 1984 में आज़मगढ़ आ गये थे। मैं उससे कुछ पहले आ गया था। यूनियन बैंक में एक संगोष्ठी थी, उसी में उनसे मुलाकात हुई। इसके बाद हम लोगों की टीम बन गयी। हर साहित्यिक कार्यक्रमों में हम साथ ही जाते थे। वे दस-बारह साल रहे आज़मगढ़ में। इसके बाद उनका ट्रान्सफर मऊ हो गया। मऊ जाकर वे अकेले पड़ गये और उनकी सक्रियता भी सीमित हो गयी। लेकिन आज़मगढ़ में रहने के दौरान हम लोगों ने खूब साहित्यिक गतिविधियों को संचालित किया, उसमें हस्तक्षेप किया।
हम लोगों के बारे में कहा जाने लगा कि ये लोग अव्यवस्था फैलाते हैं, व्यवधान डालते हैं। अच्छा, मेरा एक सम्पर्क गोरखपुर से भी बना रहा। देवेन्द्र आर्य वहाँ थे, उनसे भी हमारी अच्छी मित्रता थी।
इसी पर गोरखपुर और वाम धारा से जुड़ाव को लेकर सवाल किया गया, जिसके जवाब में पंकज गौतम ने बताया कि गोरखपुर विश्वविद्यालय से 1975 में एम.ए, हिन्दी के दौरान वामपंथी धारा के सम्पर्क में आये। हिन्दी के मेरे अध्यापकों में परमानंद श्रीवास्तव, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, रामचंद्र तिवारी, देवर्षि धनाढ्य मेरे अध्यापक थे। लेकिन, इनमें से किसी का प्रभाव मेरे ऊपर नहीं था।
इतिहास में वहाँ लाल बहादुर वर्मा उसी दौरान अध्यापक थे। उनसे मैं प्रभावित था। उनकी गतिविधियों से एक अलग तरह की अनुभूति होती थी। वामपंथ की तरफ वैचारिक झुकाव उन्हीं के चलते हुआ। उन्होंने बताया कि आम लोगों के प्रति जो लाभप्रद और प्रीतिकर राजनीति थी, उसके लिए हम लोग काम करते थे।
यह बात उन्होंने राजनीति से सम्बद्धता के बारे में पूछे गये सवाल के जवाब में कहा।

उस समय के साहित्यिक माहौल के बारे में पूछे जाने पर पंकज गौतम बोले, कि उस समय सूंड़ फैजाबादी छाये थे। बिना उनके पब्लिक के लिए कुछ नहीं होता था। लोग जो सुनना चाहते थे, उसी को वे पूरा करते थे। एक तरह से पाॅपुलर डिमांड को ध्यान में रखकर साहित्य रचते थे। इसमें साहित्य को नयी दिशा देने के तत्व नहीं थे। सूंड़ फैजाबादी हम लोगों के लिए कहते थे कि यह लोग सिर्फ विध्वंस करते हैं। जबकि बात दूसरी थी, हम लोग साहित्य को प्रगतिशील जनवादी दिशा देना चाहते थे, जो वे पसंद नहीं करते थे। प्रगतिशील लेखक संघ जो उस समय था, उसमें बहुत से लोग ऐसे भी थे जो परम्परागत मूल्यों के पक्षधर थे। हम लोग नये मूल्य चाहते थे। 1990 तक साहित्य में यह केन्द्रित होने लगा। 1990 तक इसमें हम लोगों ने फर्क पैदा किया।
दुर्गा सिंह ने सवाल किया कि प्रगतिशील लेखक संघ में रहते हुए असहज नहीं हुए, क्योंकि आपने जिक्र किया कि उसमें परम्परागत मूल्यों के पक्षधर भी थे?
इस पर पंकज गौतम ने कहा, कि बहुत बार असहज स्थिति होती थी। मेरी बहस होती थी। परमानंद श्रीवास्तव मेरे गुरू थे, लेकिन संगठन में उनसे वैचारिक मतभेद को मैं खुलकर जाहिर करता था।
रचनात्मक विधा की बजाय आलोचना की विधा में लिखने को लेकर किये गये सवाल पर उन्होंने कहा, कि बी. ए के दौरान ही लेख लिखने लगे थे। जनसत्ता का साहित्यिक पृष्ठ उस समय मायने रखता था। उसमें लेख छपे। लोगों ने पसंद किया। इससे आलोचना लिखने में विश्वास पैदा हुआ। प्रशंसा से आलोचना विधा में ही आगे बढ़ गया। एक और बात है, आलोचना से जुड़ कर नये और पुराने दोनों तरह के रचनाकारों से सम्पर्क होता है। आलोचक का विवेक स्पष्ट और साफ होना चाहिए। आलोचक वह होता है, जो रचनाकार के बारे में लिखता तो है, लेकिन वह खुद को भी व्यक्त करता है।
इसी बीच के के ने सवाल किया, कि नक्सलबाड़ी के किसान विद्रोह के बाद साहित्य में बदलाव का स्वर बढ़ा। इसी में शम्भुनाथ सिंह नवगीत लेकर आये। 1987 में वे आज़मगढ़ भी आये थे, उनके नवगीतों को आप किस तरह देखते हैं?
इस पर पंकज गौतम ने कहा, कि शम्भुनाथ सिंह से हम लोग मिलते थे। उनके नवगीतों ने हिन्दी की लिरिकल पोयट्री को नयी जमीन दी। हम लोग बनारस जाते तो उनसे जरूर मिलते। 1975 में दुष्यंत कुमार के हिन्दी गजलों का संग्रह ‘साये में धूप’ आया। शम्भुनाथ सिंह के नवगीतों और दुष्यंत कुमार की गजलों ने हिन्दी लिरिकल पोयट्री को जो मुकाम दिया, उसने हम जैसे वाम वैचारिकी के लोगों को आकर्षित किया। इसी प्रक्रिया में मैं लिरिकल पोयट्री से जुड़ा और वह मुझसे जुड़ी। लिरिकल पोयट्री का एक गुण होता है, कि वह ज्यादा आसानी से याद हो जाती है, छन्दमुक्त कविता के साथ ऐसा नहीं है। पहले मेरा झुकाव गीत-गजल की तरफ नहीं था, लेकिन एक गजल संग्रह की आलोचना की, जिसे हिन्दी जगत ने सराहा। उस पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली।
फिर गोरखपुर में एक बिल्डिंग है ‘शब्दार्थ’। इसमें दो दिन की गोष्ठी हुई। अशोक बाजपेयी, नामवर सिंह आदि थे उसमें। मुझे पन्द्रह मिनट बोलने के लिए मिला था, मैं बोला पैंतालीस मिनट तक। मैंने रघुवीर सहाय की कविता और पराग की गजल की तुलना करते हुए वक्तव्य दिया। कुछ को नागवार गुजरा तो कुछ ने सराहा भी। इस तरह गजल के आलोचक के रूप में जानने लगे लोग।

जमुना प्रजापति ने पूछा कि तब लेखकों पर सत्ता का दबाव होता था? इस उन्होंने कहा, कि कम होता था, आज की तरह नहीं था, कि देशद्रोह का मुकदमा हो जाय। और, उस समय लेखक भी प्रतिबद्ध होता था, वह सत्ता के दबाव के आगे झुकता नहीं था।
के के पाण्डेय ने पुनः बातचीत को गजल की तरफ मोड़ते हुए पूछा कि हिन्दी में उर्दू की जमीन पर गजल होती है, हालांकि हिन्दी गजल ने अपना नया फाॅर्म भी लिया। लेकिन माना जाता है, कि हिन्दी की वही गजल अच्छी है, जो उर्दू गजल की जमीन या उसके फाॅर्म में लिखी गयी है। नक्सलबाड़ी के बाद नवगीतों ने जगह बनायी। लेकिन क्या वजह है कि साहित्य में इस पूरी विधा को वह जगह नहीं मिली जो उर्दू में गजल को मिली?
इस पर पंकज गौतम ने कहा कि गजल लिरिकल है, इसलिए उसका प्रभाव जल्दी पड़ता है। लेकिन, यह है कि वह कितनी देर तक रहता है, उस पर ध्यान देना चाहिए। दुष्यंत कुमार ने बहुत साफ गजलें लिखी हैं। उनकी गजलों पर महबूबा का असर मुख्य नहीं। उनकी एक पंक्ति कि तुम किसी रेल सी गुजरती हो, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ, को लोग आजकल महबूबा के सन्दर्भ से याद करते हैं, लेकिन उसमें राजसत्ता है, इन्दिरा गाँधी हैं। आपातकाल की छाया है वहां।
इस पर के के पाण्डेय ने कहा कि अवामी शायरी को उर्दू वाले नहीं अपनाते, इसीलिए नजीर और वामिक को उर्दू के लोग नहीं अपनाते। हिन्दी गजलों में भी उसी का असर रहा।
जयप्रकाश नारायण ने पंकज गौतम से अपनी पहली मुलाकात के बारे में बताते हुए कहा कि बाबरी विध्वंस के बाद भगत सिंह और लोहिया पर एक कार्यक्रम आज़मगढ़ में हुआ। उसी में पहली बार पंकज जी से मुलाकात हुई। इसके बाद अक्सर किसी कार्यक्रम में और साहित्यिक गोष्ठियों में मुलाकात होने लगी। सब्जी मण्डी स्थित बाल भारती स्कूल में एक कार्यक्रम हुआ उसमें पंकज जी से घनिष्ठता बढ़ी। फिर ऐसे कार्यक्रम में हम लोग साथ ही जाने लगे। मेरा साहित्य से परिचय इसी दौरान बढ़ा। साहित्य के प्रति एक समझ बनी। साथ जाने से हम लोगों की एक अलग से पहचान बनने लगी। लोग ध्यान देने लगे।
जयप्रकाश नारायण ने पंकज गौतम के साहित्यिक यात्रा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सुरक्षित जीवन छोड़ कर कोई अगर जनधर्मी साहित्य-संस्कृति के लिए संघर्षरत है, तो यह एक बड़ी बात है। पंकज गौतम का संघर्ष ऐसा ही था। वह मामूली नहीं है।
फिर उन्होंने अपने क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट राजनीतिक कार्यकर्ता जीवन को याद करते हुए कहा कि उन कठिन दिनों में पंकज जी का निवास मेरा ठिकाना होता था।
फिर उन्होंने पंकज गौतम से प्रश्न किया कि आज जो फासीवाद का हमला देश पर है, उसमें क्या वे कोई उम्मीद देखते हैं?
इस पर पंकज गौतम ने कहा कि हाँ, बिलकुल उम्मीद है। दरअसल फासीवाद का खतरा जब बढ़ने लगा हमारे देश में, उस समय हमने उससे लड़ना छोड़ दिया। आरएसएस के हिन्दूवादी विचार से सतत संघर्ष छोड़ दिया। हम आपस में लड़ने लगे। आज फासीवाद ज्यादा विकट रूप में है, लेकिन अगर हम इकट्ठे होकर लड़ेंगे तो फासीवाद को हराया जा सकता है।
इसके बाद हरिश्चंद्र यादव ने लाल बहादुर वर्मा के पंकज जी पर प्रभाव पर कहा, कि लाल बहादुर वर्मा इतिहास बोध पत्रिका निकालते थे। वह पत्रिका मार्क्सवादी विचार की महत्वपूर्ण पत्रिका थी। मार्क्सवाद को आम लोगों तक पहुंचाने में उसकी एक भूमिका थी। यह जानकर अच्छा लगा कि पंकज जी के मार्क्सवाद के गुरू लाल बहादुर वर्मा रहे हैं।
इसके बाद कहानीकार हेमन्त कुमार ने पंकज गौतम से अपनी मुलाकातों का जिक्र करते हुए बताया कि जब वे बीएससी एजी कर रहे थे, तो डाॅ राम प्रकाश निर्मोही ने काॅलेज पत्रिका सम्पादित करने के लिए कहा। वह पत्रिका नहीं निकल सकी। फिर एक कहानी ‘स्टे ऑर्डर’ लिखी। वह कहानी लेकर निर्मोही जी के पास गया, तो उन्होंने कहा कि बनवारी लाल जालान हैं, वे आज अखबार के सम्पादक हैं। उनके पास चले जाइए। बनवारी लाल जालान ने पंकज गौतम के पास भेजा।
पंकज जी का निवास खोजते हुए खत्री टोला पहुँचे। वहाँ पूछा तो सभी लोग उनको जानते थे। मैं प्रभावित हुआ। लेकिन उस दिन उनसे मुलाकात नहीं हुई। अगले दिन फिर मैं गया। उस दिन मुलाकात हो गयी। उन्हें ‘स्टे आर्डर’ कहानी दिया, जिसे उन्होंने ‘सबके दावेदार’ में छाप दिया। लेकिन उन्होंने कहा, कि कन्टेन्ट ठीक है, लेकिन कहानी की भाषा पर काम करना होगा। फिर मैंने एक कहानी लिखी ‘कलजिभनी’। यह कहानी लेकर गया तो पंकज जी ने कहा, कि इसे फिर से लिखिए। मैं फिर लिखकर ले गया तो उन्होंने फिर वही बात की तो मैंने पूछा कि कैसे लिखूं। आप कुछ बताइये। पंकज जी ने उस कहानी को खुद लिखा और मुझे दिया। मैं लेकर पढ़ा तो लगा कि हाँ, यह कहानी तो अब अच्छी बन गयी है। फिर वह कहानी पंकज जी ने ली और फाड़ दी। बोले कि अब खुद लिखकर लाइए। इस तरह चार बार उस कहानी को लिखा और तब जाकर वह कहानी ‘सबके दावेदार’ में छपी।
इस तरह पंकज जी ने मेरे साहित्यिक जीवन को गढ़ा। पंकज जी ने ही मुझे जन संस्कृति मंच के सम्मेलन में आज़मगढ़ से प्रतिनिधि बना कर भेजा। पंकज गौतम के यहाँ ही 1993 में के के पाण्डेय से पहली बार परिचय हुआ।
‘सबके दावेदार’ पत्रिका के बारे में पूछने पर पंकज गौतम ने बताया कि पहले यह 1989 में ‘दावेदार’ नाम से प्रकाशित हुई। 1990 में वह ‘सबके दावेदार’ नाम से पंजीकृत हुई। 2020 तक यह पत्रिका निकली। इसके कुल नब्बे अंक निकले।
यह पूछे जाने पर कि अगर आपको फिर से जीवन जीने के लिए कहा जाय तो आप किस तरह का जीवन जीना चाहेंगे? इस पर उन्होंने कहा कि दोबारा जीवन जीने के लिए मिले तो मैं यही जीवन जिउँगा। मैं लेखन ही करूंगा। मैं लेखन के लिए ही बना हूँ।
पंकज गौतम से बातचीत करते हुए दो घण्टे से ऊपर हो गये थे। उनको लगातार बैठे रहने में दिक्कत भी हो रही थी। पंकज गौतम के पुत्र अजय और पवन से इस आग्रह के साथ कि उनकी गजलों की आलोचना पर पुस्तक को तैयार कर छपने में दिया जाय, बातचीत को पूरा किया गया। इस बातचीत में जयप्रकाश नारायण, के के पाण्डेय, कल्पनाथ यादव, जगदम्बा दूबे, दुर्गा सिंह, हरिश्चंद्र यादव, हेमन्त कुमार, जमुना प्रजापति आदि शामिल रहे।
पंकज गौतम: एक परिचय
वास्तविक नाम- नन्हकू मिश्र (पंकज गौतम नाम लाल बहादुर वर्मा ने दिया)
जन्म- 1955
माता- बलवन्ता देवी
पिता- अमृत मिश्र
पत्नी- मुन्नी गौतम
सन्तान- मंजू(बेटी),
पवन, अजय, अनिल, सुनील(बेटे)

