समकालीन जनमत
जनमत

पंचायत: एपिसोडिक शो से गंभीर ड्रामा तक

महेश सिंह


भारतीय सिनेमा के विशाल परिदृश्य में अक्सर अपराध, हिंसा और ग्लैमर वाली फिल्मों का ही बोलबाला रहा है, लेकिन अमेज़ॅन प्राइम वीडियो पर रिलीज ‘पंचायत’ वेब सीरीज ने बड़ी सादगी से इसमें अपनी जगह बनाई है। इसने किसी ताज़ी हवा के झोंके की तरह दर्शकों के अंतस को उद्वेलित करने में सफलता हासिल की है। द वायरल फीवर (TVF) द्वारा निर्मित यह सीरीज महज एक सीरीज नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक घटना है। शहरी और ग्रामीण, दोनों तरह के दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाने वाली यह वेब सीरीज वाकई कमाल की है। इसकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि एक अच्छी कहानी को सफल होने के लिए बड़े बजट या सनसनीखेज ड्रामा की ज़रूरत नहीं होती। ‘पंचायत’ की कहानी उत्तर प्रदेश के एक काल्पनिक गाँव फुलेरा पर केंद्रित है। नायक अभिषेक त्रिपाठी (जितेंद्र कुमार) एक इंजीनियरिंग स्नातक है, जिसे बेहतर नौकरी न मिलने के कारण मजबूरी में ग्राम पंचायत सचिव का पद स्वीकार करना पड़ता है। शहर की चकाचौंध और बड़े सपनों का आदी अभिषेक खुद को एक ऐसी दुनिया में पाता है जहाँ जीवन की गति धीमी है, अजीब चुनौतियां हैं और लोग सरल लेकिन जटिल हैं। शुरुआत में उसका एकमात्र लक्ष्य किसी भी तरह कॉमन एडमिशन टेस्ट (CAT) पास करके इस गाँव से निकलना होता है, लेकिन धीरे-धीरे फुलेरा की मिट्टी और लोग उसके जीवन का हिस्सा बनते चले जाते हैं।

‘पंचायत’ की कहानी कहने की शैली समय के साथ विकसित होती है। यह हल्के-फुल्के, एपिसोडिक शो से शुरू होकर एक जटिल और गंभीर ड्रामा में बदल जाती है। कहानी का यह बदलाव सीधे तौर पर इसके किरदारों की यात्रा को दर्शाता है। अभिषेक त्रिपाठी का फुलेरा में आगमन निराशा और सांस्कृतिक झटकों से भरा हुआ है। उसे एक बंद पंचायत कार्यालय, गायब चाबियाँ और रहने के लिए एक जीर्ण-शीर्ण कमरा मिलता है, जो उसके शहरी आराम के बिल्कुल विपरीत है। उसका शुरुआती अनुभव उस मछली के जैसा है जो लहरों के साथ बाहर तो आ जाती है लेकिन वापस पानी के साथ नहीं जा पाती। कहानी की यह क्लासिकल शुरुआत सीरीज़ में हास्य और संघर्ष की नींव रखती है। पहले सीज़न में, सीरीज़ मुख्य रूप से एपिसोडिक है, जहाँ प्रत्येक एपिसोड एक नई, आत्मनिर्भर समस्या पर केंद्रित है, जैसे ‘भुतहा पेड़’ पर सौर ऊर्जा से चलने वाली लाइट लगाने का विवाद या अभिषेक की ‘चक्के वाली कुर्सी’ से पैदा हुए अहंकार का टकराव। कहानी की यह संरचना अभिषेक की तत्कालीन मानसिकता को दर्शाती है; उसके लिए, फुलेरा में हर दिन एक नई बाधा है जिसे उसे अपने अंतिम लक्ष्य, यानी गाँव से भागने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए पार करना है।

सीज़न 2 और 3 में, कथा संरचना धीरे-धीरे अधिक धारावाहिक होने लगती है। अब बड़े और लंबे समय तक चलने वाले कथा चाप उभरते हैं- जैसे प्रधान जी की बेटी रिंकी के साथ अभिषेक का अनकहा रोमांस और भूषण (दुर्गेश कुमार) और स्थानीय विधायक (पंकज झा) के साथ बढ़ता राजनीतिक संघर्ष। प्रहलाद के बेटे की शहादत जैसी घटनाएँ कहानी को एक गंभीर और भावनात्मक मोड़ देती हैं, जिसका प्रभाव कई एपिसोड तक महसूस किया जाता है। यह बदलाव अभिषेक के भावनात्मक बदलाव का प्रतीक है। वह अब केवल एक बाहरी व्यक्ति नहीं है, बल्कि गाँव के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने का हिस्सा बन चुका है। सीज़न 4 तक आते-आते, सीरीज़ लगभग पूरी तरह से एक राजनीतिक ड्रामा में बदल जाती है, जिसका पूरा ध्यान पंचायत चुनाव पर केंद्रित होता है। इस बदलाव ने दर्शकों के बीच एक बहस छेड़ दी, क्योंकि कई लोगों को लगा कि सीरीज़ ने अपनी शुरुआती ‘छोटे पैमाने की कहानियों’ और हल्के-फुल्के आकर्षण को खो दिया है, जो दर्शकों को एक तरह का ‘सुकून’ प्रदान करती थी।

‘पंचायत’ की आत्मा इसके पात्रों में बसती है, जो केवल ग्रामीण रूढ़िवादिता के प्रतीक नहीं, बल्कि बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। अभिषेक त्रिपाठी का चरित्र दर्शकों के लिए फुलेरा की दुनिया में प्रवेश करने का एक माध्यम है। एक तरह से वह इस कहानी का सूत्रधार है। उसकी यात्रा एक निराश और कुछ हद तक अहंकारी शहरी युवक के रूप में शुरू होती है। धीरे-धीरे एक ऐसे व्यक्ति के रूप में विकसित होता है जो फुलेरा की समस्याओं को अपना मानने लगता है और उसके लोगों के लिए लड़ने को तैयार हो जाता है। उसका परिवर्तन अहंकार से सहानुभूति की ओर की एक आंतरिक यात्रा है। प्रधान-गुट शक्ति, दुःख और वफादारी का एक जटिल मिश्रण प्रस्तुत करता है। बृज भूषण दुबे (रघुबीर यादव) और मंजू देवी (नीना गुप्ता) की जोड़ी ‘प्रधान-पति’ वाली उत्तर भारतीय सरकारी संस्कृति का एक सूक्ष्म चित्रण है, जहाँ महिला-आरक्षित सीट पर पुरुष प्रॉक्सी के रूप में शासन करते हैं। बृज भूषण सत्ता के भूखे लेकिन वफादार हैं, जबकि मंजू देवी एक अनिच्छुक प्रधान से एक सक्रिय और सक्षम नेता के रूप में उभरती हैं। फैसल मलिक द्वारा निभाया गया प्रहलाद पांडे का चरित्र सीरीज़ के भावनात्मक केंद्र के रूप में उभरता है, खासकर अपने सैनिक बेटे की शहादत के बाद। सीज़न 3 उनके दुःख, शराब की लत और गहरे अकेलेपन के साथ उनके संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ चित्रित करता है। इससे पता चलता है कि तमाम गांवों में कैसे व्यक्तिगत त्रासदी एक पूरे समुदाय या गांव की त्रासदी बनती रही है। वहीं, चंदन रॉय द्वारा अभिनीत विकास का चरित्र फुलेरा की मासूमियत और वफादारी का प्रतीक है, जो कहानी को न सिर्फ भावनात्मक रूप से प्रस्तुत करता है बल्कि दर्शकों को दिल से मुस्कुराने का मौका प्रदान करता है। विपक्ष के रूप में, भूषण, जिसे ‘बनराकस’ के नाम से भी जाना जाता है, और उसकी पत्नी क्रांति देवी (सुनीता राजवार) केवल खलनायक नहीं हैं। वे एक आवश्यक लोकतांत्रिक विपक्ष के रूप में कार्य करते हैं। जबकि उनके तरीके अक्सर जोड़-तोड़ वाले होते हैं, उनकी शिकायतें अक्सर वैध होती हैं, जैसे प्रधान जी का पक्षपातपूर्ण रवैया और गाँव की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी आदि। उनकी उपस्थिति यह सुनिश्चित करती है कि सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह ठहराया जाए। सीज़न 4 में भूषण की चुनावी जीत इसी विचार की पुष्टि है। इस तरह अपनी हल्की-फुल्की कॉमेडी की आड़ में, ‘पंचायत’ समकालीन भारत के कई महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर सूक्ष्मता से टिप्पणी करता है। यह भारत की पंचायती राज व्यवस्था का एक यथार्थवादी चित्र प्रस्तुत करता है, जो महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ के आदर्श और 73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा स्थापित व्यवस्था की जमीनी हकीकत के फासले को उजागर करता है। यह वेब सीरीज बड़ी सूक्ष्मता और गंभीरता से दिखाता है कि कैसे नौकरशाही की लालफीताशाही, स्थानीय राजनीति और संसाधनों की कमी अक्सर अच्छी योजनाओं और नीतियों को भी प्रभावी ढंग से लागू होने से रोकती है। सीरीज़ की सबसे बड़ी खूबियों में से एक पुरुषत्व का सूक्ष्म और प्रगतिशील चित्रण है। यह दिखाता है कि कैसे एक पितृसत्तात्मक समाज में भी ‘जेंटल मैस्कुलिनिटी’ (सौम्य पुरुषत्व) मौजूद हो सकती है। प्रधान जी, अभिषेक, प्रहलाद और विकास, कोई भी विषाक्त मर्दानगी के रूढ़िवादी साँचे में फिट नहीं बैठता। वे अपनी कमजोरियों को स्वीकार करते हैं और एक-दूसरे का भावनात्मक रूप से समर्थन करते हैं। प्रहलाद का दुःख और उसके मित्रों द्वारा उसे दिया गया मौन समर्थन ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ की घिसी-पिटी धारणा को पूरी तरह से खारिज कर देता है।

सीरीज़ का मूल आधार शहरी और ग्रामीण भारत के बीच का टकराव और संवाद है। यह फुलेरा के बहाने भारतीय गाँवों को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है, जहाँ चुनौतियाँ और समुदाय की भावना एक साथ मौजूद हैं और जहाँ आधुनिकता और परंपरा सह-अस्तित्व में हैं। हालाँकि, कुछ आलोचकों का तर्क है कि यह चित्रण अभी भी एक शहरी दृष्टिकोण से फ़िल्टर किया गया है और कुछ ग्रामीण वास्तविकताओं को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है, जैसे कि एक पंचायत सचिव को मिलने वाला वास्तविक सम्मान और रिंकी का सचिव से पानी की टंकी पर मेल-मिलाप। ‘यथार्थवाद’ के अपने दावों के बावजूद, ‘पंचायत’ की सबसे महत्वपूर्ण आलोचना इसके जातिगत चित्रण को लेकर हुई है। सीरीज़ के लगभग सभी मुख्य किरदार- त्रिपाठी, दुबे, पांडे ब्राह्मण हैं, जो इसे एक ‘सवर्ण-केंद्रित’ कथा बनाता है। इसके विपरीत, हाशिए पर पड़े दलित पात्रों, जैसे विनोद और जगमोहन को गरीब, असहाय और अक्सर अनैतिक गतिविधियों में शामिल दिखाया गया है। इतना ही नहीं उनकी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए भी एक ‘सवर्ण उद्धारकर्ता’ वाली रूढ़िगत धारणा को स्थापित करने का प्रयास दिखाई देता है। इस तरह ग्रामीण भारत की उस कटु सच्चाई अर्थात ‘जाति’ वाले पहलू को या तो नज़रअंदाज़ कर दिया गया है या उसे बहुत ही सतही ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार, यह वेब सीरीज अनजाने में इस बात का प्रतिबिंब बन जाता है कि शहरी भारत ग्रामीण भारत को कैसे देखना चाहता है। यह इसकी सबसे बड़ी व्यावसायिक ताकत भी है और शायद इसकी सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक विफलता भी।

‘पंचायत’ की सफलता केवल इसकी कहानी पर ही नहीं, बल्कि इसके उत्कृष्ट कलात्मक निष्पादन पर भी निर्भर करती है। ऐसा लगता है कि निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा और लेखक चंदन कुमार ने स्पष्ट रूप से ‘मालगुडी डेज़’ से प्रेरणा ली है। मालगुडी डेज में भी यथार्थवाद, भरोसेमंद पात्रों और एक धीमी गति वाली कथा पर ध्यान केंद्रित किया गया है। चंदन कुमार के संवादों के सूक्ष्म हास्य और स्थानीय बोली के सटीक उपयोग के लिए व्यापक रूप से प्रशंसा की जानी चाहिए। सिनेमैटोग्राफर अमिताभ सिंह का कैमरा फुलेरा के देहाती आकर्षण को खूबसूरती से कैद करता है, जिससे वह वास्तविक और जीवंत लगता है। संगीतकार अनुराग सैकिया का संगीत इतना प्रभावशाली है जो भावनाओं को सूक्ष्मता से रेखांकित करने का काम करता है। यही कारण है कि ‘पंचायत’ को इसके कलाकारों के समूह के शानदार और स्वाभाविक प्रदर्शन के लिए सार्वभौमिक प्रशंसा मिली है। जितेंद्र कुमार, रघुबीर यादव, नीना गुप्ता, फैसल मलिक और चंदन रॉय ने अपने-अपने किरदार को इतनी प्रामाणिकता के साथ जिया किया है कि वे फुलेरा के वास्तविक निवासी लगते हैं।

निष्कर्षतः ‘पंचायत’ ने एक एपिसोडिक कॉमेडी से एक गंभीर, धारावाहिक ड्रामा तक का लंबा सफर तय किया है। सम्भव है आगे भी इसकी यात्रा जारी रहेगी। इसने जिस सादगी से जटिल और मानवीय पात्रों के माध्यम से ग्रामीण भारत का चित्र प्रस्तुत किया है वह ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसमें पितृसत्ता और पुरुषत्व जैसे मुद्दों पर एक प्रगतिशील दृष्टिकोण तो है, लेकिन साथ ही, जाति जैसी महत्वपूर्ण सामाजिक सच्चाई को ढंग से संबोधित न करना इस प्रगतिशीलता को सन्देह के घेरे में लाता है। इन तमाम सीमाओं के बावजूद, ‘पंचायत’ की विरासत निर्विवाद है। इस वेब सीरीज ने यह साबित किया है कि भारत में निहित, चरित्र-चालित और धीमी गति वाली कहानियों के लिए एक विशाल और समर्पित दर्शक वर्ग मौजूद है। अपने आप मे यह भारतीय OTT प्लेटफार्म के लिए एक नए मानदंड की स्थापना है। अंततः ‘पंचायत’ सिर्फ फुलेरा की कहानी नहीं है बल्कि भारत के हर उस गाँव की कहानी है जो अक्सर बड़े शहरों की चकाचौंध में खो जाता है।

(लेखक महेश सिंह एक चर्चित कहानीकार हैं, जो वर्तमान में झारखंड के गिरिडीह में एक कालेज में शिक्षक हैं।)

संपर्क : 9489246095

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion