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कश्मीरी पंडितों का पलायन नहीं विस्थापन हुआ है : अशोक कुमार पांडेय

गोरखपुर जर्नलिस्ट्स एसोसियेशन के सभागार में पुस्तक ‘कश्मीर और कश्मीरी’ पंडित ’ का लोकार्पण एवं संवाद

गोरखपुर। कश्मीर से कश्मीरी पंडितों का पलायन नहीं विस्थापन हुआ है. इसके कई कारण थे और इन कारणों को हिन्दू-मुसलमान के नजरिये से नहीं देखा जा सकता. कश्मीर की समस्या के लिए सभी स्टेक होल्डर जिम्मेदार हैं. किसी एक को जिम्मेदार बता कर कभी भी ठोस समाधान की ओर नहीं जाया जा सकता है.

यह बातें कवि-लेखक अशोक कुमार पांडेय ने 16 फरवरी को गोरखपुर जर्नलिस्ट्स एसोसियेशन के सभागार में अपनी पुस्तक ‘कश्मीर और कश्मीरी’ पंडित ’ के लोकार्पण व संवाद कार्यक्रम में कहीं. अशोक कुमार पाण्डेय की कश्मीर विषयक यह दूसरी पुस्तक है जिसके प्रकाशन के एक महीने भीतर ही तीसरा संस्करण प्रेस में है . गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र रहे सुप्रसिद्ध लेखक अशोक कुमार पांडेय की पिछली पुस्तक ‘ कश्मीरनामा ’ लगातार दो वर्षों से हिंदी की बेस्ट सेलर रही है.

अपने तरह के इस अनोखे कार्यक्रम का आयोजन संवाद और विमर्श केंद्रित संस्था ‘आयाम ’ ने किया था.

लगभग एक घंटे के अपने वक्तव्य में श्री पाण्डेय ने कश्मीर और कश्मीरी पंडित को लेकर उसके ऐतिहासिक संदर्भ में विस्तार से चर्चा की. उन्होंने कश्मीरी पंडित शब्द को एक बड़ा मुद्दा बताया और इसे इलाकाई पहचान यानि कश्मीरियत के व्यापक अर्थ में समझाया. अपनी अलग पहचान के लिए कश्मीरी पंडितों ने यह नाम मुगलिया दरबार से स्वयं के अनुरोध पर अर्जित किया था.

उन्होंने बताया कि इलाकाई पहचान को लेकर 1940 के दशक में कश्मीर में कश्मीरियत शब्द काफी लोकप्रिय हुआ. कश्मीरियत का मतलब इलाकाई पहचान है न कि धार्मिक. उन्होंने बताया कि कश्मीर का मसला हिंदू पहचान, मुस्लिम पहचान और इलाकाई पहचान, इन तीन पहचानों के बीच का है। इन्हीं तीन पहचानों के बीच जो आपस के संघर्ष हैं ,उनसे ही कश्मीर का पूरा आधुनिक इतिहास बनता है.

उन्होंने कहा कि अगर हम इतिहास बनने की प्रक्रिया को नहीं समझेंगे तो हम कभी नहीं समझ पाएंगे कि 1947 में वास्तव में क्या हुआ था ? हम कभी नहीं समझ पाएंगे कि शेख अब्दुल्ला कश्मीरी स्वायत्तता क्यों चाहते थे ? हम अनाडियों की तरह सवाल करेंगे कि जब यूपी, बिहार या एमपी के लोग स्वायत्तता नहीं चाहते थे तो ये कमबख्त कश्मीरी ही आखिर स्वायत्तता क्यों चाहते थे ? कश्मीरी स्वायत्तता का मस्ला इतना सरल और एक रेखीय नहीं है.

कश्मीर में धर्मों के आगमन और प्रभाव के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वहां जो भी धर्म गया वह अपने-अपने तरीके से बदल गया. उन्होंने बताया कि बौद्ध धर्म यहां सबसे पहले आया. आमतौर पर इस्लाम के साथ तलवार की चर्चा होती है लेकिन इस्लाम यहां पहले आया और तलवार बाद में. उन्होंने कहा कि सुल्तान सिकंदर के समय में भयानक अत्याचार और धर्म परिवर्तन के मामले सामने आते हैं लेकिन उसी के बेटे जैनुलाबदीन और ललितादित्य के शासनकाल पर किसी भी तरह के नकारात्मक आरोप नहीं लगते.

पुस्तक के लेखक ने कश्मीरी पंडितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर विस्तार से चर्चा की कि कैसे पढ़े-लिखे और फारसी भाषा के अच्छे जानकार होने के कारण कश्मीरी पंडित दरबारी शासन-सत्ता के करीबी और ओहदेदार रहे. जैनुलाबदीन से मुगल शासन के दौर तक इनकी स्थिति काफी मजबूत हो गई. अफगान, सिख और डोगरा शासन के सांमती व्यवस्था में राजस्व वसूली के सरकारी ओहदों पर कश्मीरी पंडितों का पूरा कब्जा हो गया. इस तरह दरबारी शासन सत्ता के हितों के अनुकूल किसानों से कर वसूलने के काम में कश्मीरी पंडित बहुसंख्यक गरीब मुस्लिम आबादी की नजर में सबसे नजदीकी शोषक और दुश्मन दिखने लगे.

उन्होंने कहा कि 1947 के बाद शिक्षा के प्रसार से मुस्लिमों के बीच भी पढ़ा-लिखा तबका पैदा हुआ. नतीजतन सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी को लेकर अंसतोष और बढ़ा. उस समय कश्मीर को लेकर दिल्ली का नजरिया और तमाम राजनीतिक गलतियों के कारण कश्मीर में साम्प्रदायिक ताकतों को बढ़ावा मिला. जमाते इस्लामी जैसी कम्यूनल ताकतों ने एंटी इंडिया जैसे मूवमेंट को हवा दिया और कश्मीरी पंडित घोर अन्याय व अत्याचार के शिकार हुए.

उन्होंने कश्मीरी पंडितों के पलायन के सवाल पर कहा कि कश्मीरी पंड़ितों का पलायन नहीं, विस्थापन हुआ था जिसके तीन कारण थे- पहला ए़ंटी इंडिया मूवमेंट जिसमें कश्मीरी पंडितों को इंडिया का प्रतिनिधि माना गया. दूसरा उनको पर्याप्त सुरक्षा न दे पाना और तीसरा कश्मीर पापुलेशन में मुसलमानों के एक हिस्से का कम्यूनल हो जाना.

इस लम्बे वक्तव्य के पश्चात उपस्थित श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि अगर कश्मीर समस्या के लिए जिम्मेदारी ही तय करनी है तो इसके लिए सबसे पहले अंग्रेजी हुकूमत जिम्मेदार है. दूसरा नंबर डोगरा शासन का है. आजादी के बाद जितनी भी सरकारें सत्ता में रहीं वे भी कश्मीर समस्या के लिए जिम्मेदार हैं.

अध्यक्षता कर रहे गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. चितरंजन मिश्र ने कहा कि किसी को जबरन या दबाव से साथ नहीं लिया जा सकता. हिन्दुस्तान को समन्वयवादी शक्तियों से ही चलाया जा सकता है.

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए प्रो डा.गौर हरि बेहरा ने कहा कि अशोक कुमार ने अपनी इस किताब में कश्मीर के प्रति बायनरीज को तोड़ने का काम किया है.

कार्यक्रम का संचालन ‘आयाम ‘ के संयोजक देवेन्द्र आर्य ने किया। कार्यक्रम में डा. अज़ीज़ अहमद, गोरखपुर नगर के विधायक डा. राधा मोहन दास अग्रवाल, राज्य सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही, कथाकार मदनमोहन, रंगकर्मी राजेश वर्मा, डा. वेदप्रकाश पाण्डेय, सिद्धार्थ नगर से पत्रकार नज़ीर मलिक, शायर सरवत जमाल, कामिल खां, सरदार जसपाल सिंह, मनोहर लाल खट्टर, पटना से लेखक एक्टिविस्ट राम जी राय, लखनऊ से कवि कौशल किशोर, डा.ओ .पी.वर्मा, पत्रकार शिवहर्ष द्विवेदी, जबलपुर से दैनिक भास्कर के सम्पादक अजीत सिंह, आजमगढ़ से प्रज्ञा सिंह, देवरिया से चतुरानन ओझा, डा. विद्या चरण, ‘पतहर’ के सम्पादक विभूति नारायण ओझा, कवि सुरेश चंद, संजय आर्य, पत्रकार मनोज सिंह, डा. अनुपम मिश्र, प्रबोध सिन्हा एवं शहर के तमाम गणमान्य लोगों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही.

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