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जनमत

कोरोना और ईद-उल-फ़ित्र के बीच प्रवासी मज़दूर

आरफ़ा अनीस


पूरी दुनिया इस वक़्त कोरोना नामक वैश्विक महामारी की चपेट में है। सीमित संसाधनों और ग़लत राजनीतिक नीतियों के बीच भारत में अब तक कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या जहाँ 130,000 के ऊपर पहुँच चुकी है, वहीँ इससे मरने वालों की संख्या 3800 पार कर चुकी है। मुल्क़ के अंदर हर रोज़, हर क़िस्म के ज़रिए से ग़रीब मज़दूरों की तसवीरें देखी जा सकती हैं, जहाँ वो लोग सैंकड़ों किलोमीटर अपने परिवारों और सामानों के साथ अपने गाँव की तरफ़ कूच करते नज़र आएं |

ये मज़दूर भूखे-प्यासे, नंगे पाँव पैदल चलने पर मजबूर हैं| इनमे से कईयों को अपनी ज़िंदगियाँ गंवानी पड़ी| ‘द वायर’ के अनुसार भारत में क़रीब 383 लोग लॉक-डाउन की वजह से मारे गए रिपोर्ट किए गए हैं, न की कोरोना के कारण|

दूसरे देशों से अलग भारत में कोरोना होने की वजह को मज़हबी ठहराया गया और उसका ज़िम्मा तबलीगी जमात पर पूरी तरह लाद दिया गया। मज़दूर तो काफ़ी मुश्किलों को पार कर अपने गाँव पहुँच रहे हैं, लेकिन इस तरह के अवैज्ञानिक अफ़वाह ज़रूर बड़ी आसानी से भारतीय मीडिया ने गाँव-गाँव पहुंचा दिया है।

इसी महामारी के दौरान ऐसी कई मिसालें देखने को मिलीं, जहाँ लॉक-डाउन की शुरुआत से ही और रमज़ान के दौरान भी मुसलमान समुदाय उन प्रवासी मज़दूरों की मदद के लिए आगे दिखा जो अनियोजित लॉक-डाउन का शिकार हुए|

लिंडा नेवमई, भाजपा की आदिवासी विंग की राष्ट्रीय कार्यकारी सदस्य हैदराबाद राज्य के मुख्यमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और अन्य अधिकारीयों को टैग करते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर एक मेसेज लिखती हैं, जिसमे वो हैदराबाद में फँसी एक भूखी मणिपुरी लड़की की मदद की मांग करती हैं | हैदराबाद की ख़ालिदा परवीन जो की बुर्खा पहनने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने लिंडा के मेसेज का सबसे पहले जवाब दिया और उस ज़रूरतमंद लड़की को खाने-पीने का सामान मुहैया करवाया |

ख़ालिदा के हिसाब से हिन्दू-मुस्लिम पत्ता राजनीतिज्ञों के लिए है, कार्यकर्ताओं का काम इंसान को इंसान की तरह देखना है, न की धर्म और ज़ात की चादर में लपेट कर| ख़ालिदा ने अपनी सोसाइटी के हवाले से इस महामारी के दौरान हजारों मज़दूरों के खाने- पीने, सूखे राशन, मास्क और रहने का इंतज़ाम करवाया| दिन के हिसाब से क़रीब 200 ग़रीब मज़दूरों के खाने का इंतज़ाम कर रही हैं ।

हर रात हैदराबाद के कुछ दाख़िले जैसे अरामघर चौक, मेडचल और मेहदीपटनम में ख़ालिदा कुछ स्वयंसेवकों के साथ मिलकर मज़दूरों को राहत का सामान देने के लिए तैयार खड़ी रहती हैं|
माली मुश्क़िलात के बावजूद मुस्लिम समुदाय या तो अपनी ज़ाती गुंजाइश के हिसाब से या फिर सामाजिक और ख़ैराती तंज़ीमों के ज़रिए से ग़रीब मज़दूरों की मदद के लिए सामने आए।

देश के कई हिस्सों में ऐसे ही कई मुस्लिम संगठनों ने लॉक-डाउन की शुरुआत से ही राहत-मुहीम चलाई, जिसमे उन्होंने भरपूर धन राशि की फ़ूड किट ग़रीबों और दूसरे कस्बों/ गाँवों के फँसे हुए मज़दूरों में बांटी, बिना धर्म-ज़ात का ख़्याल किए हुए। इसी तरह कई संगठन हर रोज़ कई ग़रीब मज़दूरों को तीन वक़्त का खाना खिला रहे हैं।

 

मुस्लिम समुदाय के क़रीब 10000 छात्र स्वयंसेवकों ने बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश के क़रीब 100,000 छात्रों और मज़दूरों की मदद की। कुछ 1000 हेल्पलाइन नंबर भी 24 राज्यों में चलाए ताकि ज़रूरतमंदों की मदद की जा सके|
आम बाशिंदों ने ट्विटर पर #EidAtHome और #EidForMigants जैसे ट्रेंड्स चला कर ये अहद किया की इस बार वो ईद की ख़रीदारी न कर के मुहताज लोगों की मदद करेंगे। इसी नक़्शे पर चलते हुए कई अल्पसंख्यकों के संगठन यात्रा करने वाले श्रमिकों को खाना, दवाइयां और सैनिटरी नैपकिन मुहैया कराने के लिए 24 घंटे का हेल्प-डेस्क लगाये हुए हैं, तो दूसरी तरफ़ पत्रकार राणा अय्यूब ने मदद के लिए रक़म जुटाकर क़रीब 25,000 परिवारों तक ज़रूरी सामान देने के साथ-साथ हजारों मजदूरों के लिए हिफाज़त से गाँव जाने का इंतज़ाम भी किया।

उत्तर प्रदेश में मुसलमान समुदाय के लोग, ‘कृपया ठहरें, खाना खाएं, पानी पिएं’ जैसे बैनर ले कर बस अड्डे, रास्तों और सार्वजनिक जगहों पर अपने गाँव जा रहे मुसाफ़िरों, जिनमे ख़ास तौर पर मज़दूर वर्ग के लोग थे, को खाना और ज़रुरत का सामान बाँटते सोशल मीडिया के ज़रिए से देखे गए।

इसी तर्ज़ पर उत्तर भारत के बिहार राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में भी मुस्लिम समाज द्वारा चलाए जा रहे संगठन
क्षेत्रीय ग़रीबों-मज़दूरों और दूसरे ज़रूरतमंदों तक राशन पहुंचाते देखे गए|

आज भारत गवाह है की किस तरह नागरिकता-संशोधन कानून में बदलाव कर, मॉब-लिंचिंग, मुस्लिम विच-हंटिंग, लव-जिहाद, कोरोना-जिहाद, और हाल ही में हुए दिल्ली-दंगे, जैसी तमाम कोशिशें केंद्र में बैठी भाजपा सरकार और सरकारी मीडिया कर रही है, ताकि मुस्लिम समाज को भारत जैसे लोकतंत्र में दोयम दर्ज़े पर स्थापित कर हिन्दू-राष्ट्र का निर्माण किया जा सके।

ऐसे में यही समुदाय रमज़ान जैसे पाक़ महीने के दौरान, ख़ुद भूख-प्यासे रह कर पुरजोर कोशिश कर रहै हैं कि हमारे देश के निर्माता जो की हमारे मज़दूर-किसान हैं, और जो लोग इस महामारी के कारण ग़ुरबत में जीने को मजबूर है, उन तक हर क़िस्म से मदद पहुंचाई जा सके।

मुस्लिम उलेमाओं ने इस दफ़ा घर पर ही ईद मनाने की अपील करते हुए, लोगों को हिदायत दी कि लोग आपस में न तो गले मिलें, न हाथ मिलाएं और न ही मस्जिदों में नमाज़ पढ़ने जाएं|
ऐसे माहौल में इस साल ईद मुबारक तो नहीं हो सकती, पर फिर भी, सभी देश-वासियों को ईद की मुबारक़बाद !

 

(आरफ़ा अनीस ने जामिया और DU की छात्रा रही हैं और इस समय वे  डॉ. बी. आर. अम्बेडकर विश्विद्यालय दिल्ली के स्कूल ऑफ़ डेवलपमेंट स्टडीज़ से ‘भारतीय राजनीति में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व’ विषय पर पी.एच.डी कर रही हैं। दिल्ली के छात्र आंदोलनों में लगातार सक्रिय रही हैं ।)

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