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डॉ उषा राय की किताब “ कविताएं बदलाव की : सौंदर्य और वैचारिकी ” का लोकार्पण

लखनऊ। शीरोज हैंग आउट, हजरतगंज में , 19 अगस्त को कवि-कथाकार डॉ उषा राय की हाल में प्रकाशित आलोचनात्मक कृति “कविताएं बदलाव की : सौंदर्य और वैचारिकी” का लोकार्पण एवं परिचर्चा का आयोजन हुआ। यह किताब हाल में न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है। इसमें गोरख पाण्डेय, सारा सगुफ्ता, शोभा सिंह अनिता भारती, अजय सिंह, सुभाष राय, भगवान स्वरूप कटियार, भाषा सिंह, नेहा नेरूका, विमल किशोर और हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं पर आलेख के साथ ‘कविता के वर्तमान और वर्तमान की कविता’ पर नरेश सक्सेना से बातचीत शामिल है।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉक्टर अवंतिका सिंह ने सभी साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि आज की शाम केवल किताब पर बातचीत करने का नहीं बल्कि उन कविताओं से मिलने का है जो हमें हमारे समय से मिलाती हैं।

परिचर्चा की शुरुआत कहानीकार और जसम लखनऊ के सचिव फरजाना महदी ने की। उन्होंने शोभा सिंह, अनिता भारती, भाषा सिंह और हरे प्रकाश उपाध्याय की कविताओं के माध्यम से अपनी बात रखी और कहा कि उषा राय जी आज के दौर के कवियों की कविताओं के तेवर, चिंता और चिंतन से रूबरू कराती हैं। इसके साथ ही उन्होंने अपनी असहमतियां भी दर्ज की जैसे दंगों पर लिखी कविताओं का मूल्यांकन करते हुए सियासी विचारधारा तथा सत्ता संरक्षित सांप्रदायिकता को नहीं देखा गया। इसके पीछे की राजनीति पर विचार जरूरी है। फरजाना महदी का कहना था कि क्रूरता के लिए मोहम्मद गजनवी और कट्टरता के लिए तालिबानीकरण की ही उपमा बार-बार क्यों दी जाती है। इससे नफरत को बढ़ावा मिलता है। इसी प्रकार से बलात्कारों के बारे में भी सरलीकरण नहीं किया जाना चाहिए।

युवा आलोचक आशीष सिंह ने अपनी बात रखते हुए कहा कि उषा राय ने अपने मित्रों के कविता संग्रहों पर ही समीक्षाएं लिखी हैं। कविताओं पर विचार करते समय यह देखना जरूरी है कि उनमें कितनी कविताएं हैं। साथ ही यह भी कहा कि आलोचना में उदारता का पहलू नहीं होना चाहिए। मित्रों पर भी कठोरता से बात की जानी चाहिए, जबकि उषा राय ने काफी नरमी बरती है। अजय सिंह की कविताओं में प्रयुक्त हुए शब्दों पर आपत्ति की। हम रामचन्द्र शुक्ल को प्रश्नांकित करें तो नरेश सक्सेना या अन्य के प्रति भी उदार नहीं क्रिटिकल हों। उषा राय का गद्य बहुत सुंदर है। उन्हें कहानी लिखते रहना चाहिए ।

कवि-आलोचक व जलेस के राष्ट्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह ने उषा राय को बधाई देते हुए कहा कि कविता में सौंदर्य के बदलाव का आह्वान प्रेमचंद ने 1936 में ही किया था। उषा राय ने प्रतिरोध की जमीन पर खड़े होकर प्रतिरोध को महत्व देती हुई कविताओं के संग्रह का चयन किया है और उस पर लिखा है। इसके लिए वह बधाई की पात्र हैं। उन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के ‘कविता क्या है’ निबंध की इस बात को कोट किया कि आगे कविता की आवश्यकता बढ़ेगी लेकिन कविता लिखना कठिन होता जाएगा।

कवि व जसम के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने डॉ उषा राय को इस किताब के लिए बधाई देते हुए कहा कि वर्चस्व की मूल प्रकृति तथा इसके विरुद्ध समता, स्वतंत्रता और बेहतर दुनिया का संघर्ष ही बदलाव के मूल कारक हैं। यह नई चेतना, नया सौंदर्य बोध तथा नए विचार के स्रोत हैं। उषा राय की किताब का यह त्रिकोण है । इनके लिए विचार कविता के लिए मशाल है। वे अक्क महादेवी के माध्यम से भक्ति आंदोलन तथा गोरख पांडे की कविताओं पर विचार करते हुए 1970 के दशक के जनवादी आंदोलन को केंद्र में रखती हैं। किताब में आज के दौर के ऐसे कवियों पर विचार है जो कविता में आततायियों की पहचान करते हैं और उनके विरुद्ध प्रतिरोध रचते हैं। कला या मित्र भाव के नाम पर उनके महत्व को कम नहीं किया जाना चाहिए।

जन बुद्धिजीवी व एक्टिविस्ट वंदना मिश्रा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हुस्न के मेयार बदलने होंगे। सौंदर्य बोध बदलता रहता है। स्त्री विमर्श पर बात करते हुए वह कहती हैं कि स्त्री विमर्श थेरी गाथाओं से शुरू होता है जिन शब्दों को प्रयोग करते हुए हम हिचकिचाते हैं, गांव की औरतें उसे आसानी से कह जाती हैं। सवाल शब्दों का नहीं सवाल भावनाओं का है।

इस मौके पर भगवान स्वरूप कटियार, शैलेश पंडित, सईदा सायरा, मंदाकिनी राय, शालिनी सिंह आदि साहित्यकारों ने भी अपने विचार व्यक्त किए तथा किताब को जरूरी बताते हुए डॉ उषा राय को बधाई दी। अंत में उषा राय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त करते और फरजाना महदी और आशीष सिंह के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि समय- समय पर ये समीक्षाएं लिखी गयीं, कुछ समीक्षाएं और साक्षात्कार मूलत: ‘लमही’ पत्रिका के लिए लिखी गयीं थीं। यह कहना जरूरी है कि जब रूप रेखा वर्मा से हिम्मत, वंदना मिश्र से हौसला और कात्यायनी से जीतने की तलब की प्रेरणा एवं मित्र साथियों का सहयोग मिला तब इस किताब ने आकार ले लिया।

 प्रलेस, लखनऊ की सचिव इरा श्रीवास्तव ने सभी अतिथियों का आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापन किया। इस जीवंत कार्यक्रम में प्रो रमेश दीक्षित, विमल किशोर, सुहेल वहीद, अलका पाण्डेय, अरविन्द शर्मा, धनंजय शुक्ला, अंशुल राय, प्रतीक्षा चौहान आदि अनेक साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

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