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इक्कीस अगस्त, अपनी पुरखिनों को याद करने का दिन

इक्कीस अगस्त की तारीख़ उर्दू अदब की तारीख़ में एक असाधारण संयोग लेकर आती है। इसी दिन, 21 अगस्त 1911 को इस्मत चुग़ताई का जन्म हुआ और इसी दिन, 21 अगस्त 2007 को क़ुर्रतुलऐन हैदर का इंतेक़ाल। एक तरफ़ इस्मत चुग़ताई हैं, जिन्होंने मध्यवर्गीय मुस्लिम घर की बंद दुनिया में जाकर वहाँ की औरतों की इच्छाओं, बेचैनियों, असमानताओं और विद्रोह को अपनी कहानियों का मौज़ू बनाया, दूसरी तरफ़ क़ुर्रतुलऐन हैदर हैं, जिन्होंने तारीख़ की लंबी धारा में भारतीय उपमहाद्वीप के समाज, संस्कृति, विभाजन, विस्थापन और बदलती हुई मुस्लिम दुनिया को देखा।

इक्कीस अगस्त सिर्फ़ दो महान लेखिकाओं को याद करने की तारीख़ नहीं है। यह तारीख़ हमें उस लंबी सामाजी तारीख़ की तरफ़ देखने का मौक़ा देती है जिसमें मुस्लिम समाज की औरतें घर की सीमाओं से निकलकर पाठक, शिक्षिका, डॉक्टर, पत्रकार, लेखिका, सामाजी कार्यकर्ता और सार्वजनिक बुद्धिजीवी बनीं। और यह भी पूछने का मौक़ा देती है कि जिस समाज में उन्नीसवीं सदी के आख़िर और बीसवीं सदी के शुरुआत में औरतों की तालीम और सार्वजनिक भागीदारी को लेकर इतने महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दिए, उसी समाज में आज़ादी के बाद मुस्लिम औरतों की सार्वजनिक आवाज़ अपेक्षाकृत कम क्यों दिखाई देने लगी। इस सवाल का आसान जवाब यह है कि मुस्लिम समाज में औरतों के प्रति नकारात्मक नज़रिया था, इस्लाम औरतों की आज़ादी के ख़िलाफ़ है और इसी वजह से मुस्लिम औरतें सार्वजनिक ज़िन्दगी से पीछे रहीं। लेकिन तारीख़ इस आसान जवाब को क़ुबूल नहीं करती। अगर मुस्लिम समाज के भीतर औरतों के लिए सिर्फ़ दमन और निषेध ही होता, तो उन्नीसवीं सदी के आख़िर से लेकर बीसवीं सदी के मध्य तक रुकैया सख़ावत हुसैन, रशीद जहाँ, इस्मत चुग़ताई, रज़िया सज्जाद ज़हीर और आगे चलकर क़ुर्रतुलऐन हैदर जैसी इतनी अलग-अलग और इतनी प्रभावशाली आवाज़ें पैदा ही कैसे होतीं ?

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय मुस्लिम समाज एक गहरे बदलाओ से गुजर रहा था। 1857 के बाद सत्ता-संबंध बदल चुके थे। अंग्रेज़ी शिक्षा, आधुनिक नौकरियाँ, नए शहर, प्रिंटिंग प्रेस, अख़बार, पत्रिकाएँ और एक नया शिक्षित मध्यवर्ग आकार ले रहा था। सर सैयद अहमद ख़ाँ का अलीगढ़ आंदोलन मुख्यतः अशराफ़ मर्द की तालीम तक महदूद था, लेकिन आधुनिक शिक्षा के सवाल ने धीरे-धीरे यह सवाल भी खड़ा किया कि अगर समाज को बदलना है तो उसकी आधी आबादी को तालीम से बाहर रखकर यह काम कैसे होगा। यहीं से मुस्लिम औरतों की तालीम का सवाल सामाजी सुधार के एक बड़े सवाल में बदलने लगा। इस बदलाओ को समझने के लिए 1898 की एक किताब का उल्लेख बहुत ज़रूरी है, मुमताज़ अली की किताब हुक़ूक़-उन्निस्वाँ। मुमताज़ अली का तर्क था कि इस्लाम ने औरतों को जो अधिकारों दिये हैं, सामाजी रिवाजों और पुरुष-प्रधान व्याख्याओं ने उन्हें उनसे छीन लिया है। इस किताब की विशेषता यह थी कि औरतों के हुक़ूक की दलील किसी बाहरी पश्चिमी विचार के सहारे नहीं, बल्कि इस्लामी मज़हबी रवायत के भीतर से पेश की जा रही थी। मुमताज़ अली देवबंद से तालीम हासिल कर चुके थे। इस तरह महिला अधिकार का सवाल मुस्लिम समाज के बाहर से थोपा हुआ सवाल नहीं था, वह मुस्लिम मज़हबी और सामाजी चिंतन के भीतर भी उठ रहा था। हुक़ूक़-उन्निस्वाँ की कहानी अपने आप में उस वक़्त के तनाव की कहानी है। मुमताज़ अली ने पांडुलिपि सर सैयद अहमद ख़ाँ को दिखाई थी और सर सैयद की प्रतिक्रिया बहुत तीखी थी, कहा जाता है कि उन्होंने उस पाण्डुलिपि को फाड़कर फेंक दिया था। बाद में मुमताज़ अली ने इसे प्रकाशित कराया।

इसी माहौल में 1898 में तहज़ीब-उन-निस्वाँ जैसी पत्रिका सामने आती है। मुमताज़ अली और उनकी पत्नी मुहम्मदी बेगम की शुरू की गई इस पत्रिका ने औरतों को सिर्फ़ पाठक नहीं माना, बल्कि उन्हें लिखने और अपने तजुर्बे पर विचार करने का मौक़ा दिया। इसके बाद 1904 में शेख अब्दुल्ला ख़ातून जैसी पत्रिका सामने लाते हैं और 1908 में राशिदुल ख़ैरी की इस्मत प्रकाशित हुई। इन पत्रिकाओं ने औरतों की तालीम, शादी, घरेलू ज़िन्दगी, पर्दा, बच्चों की परवरिश और सामाजी सुधार को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनाया। यह बदलाओ देखने में छोटा लग सकता है, लेकिन दर-हक़ीक़त यह बहुत बड़ा बदलाओ था। घर में रहने वाली औरत, जो अब तक परिवार की निजी दुनिया का हिस्सा मानी जाती थी, पहली बार एक सार्वजनिक पाठक-वर्ग का हिस्सा बन रही थी। वह पत्रिका पढ़ रही थी, चिट्ठी लिख रही थी, अपनी दिक़्क़तें लिखकर भेज रही थी, लेख लिख रही थी और दूसरे शहरों में बैठी औरतों के तजुर्बे पढ़ रही थी। इस तरह प्रिंट संस्कृति ने चारदीवारी के भीतर रहने वाली औरतों के बीच एक ऐसा संवाद पैदा किया जो भौगोलिक सीमाओं से बाहर था।

औरतों की तालीम के लिए संस्थाएँ भी बनने लगीं। अलीगढ़ में शेख अब्दुल्ला ने 1906 में लड़कियों के लिए स्कूल शुरू किया। शुरुआती दौर में सिर्फ़ पाँच छात्राएँ थीं और एक अध्यापिका। आगे चलकर यह संस्था बढ़ी और छात्रावास की व्यवस्था बनी, बाद में यही रवायत अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय तक पहुँची। इसमें भोपाल की सुल्तान जहाँ बेगम की माली मदद की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। लखनऊ में 1912 में सैयद करामत हुसैन ने मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल स्थापित किया। वहाँ भी शुरुआती छात्राओं की संख्या बहुत कम थी। लेकिन स्कूल के साथ छात्रावास जैसी व्यवस्था ने उस सामाजी दिक्कत को हल करने की कोशिश की जिसमें परिवार लड़कियों को घर से दूर भेजने को तैयार नहीं थे। आगे चलकर यही संस्था करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स कॉलेज की शक्ल में विकसित हुई।

बंगाल में रुकैया सख़ावत हुसैन का काम और भी उल्लेखनीय था। उन्होंने 1911 में कलकत्ता में सख़ावत मेमोरियल गर्ल्स स्कूल शुरू किया। शुरुआत में सिर्फ़ आठ छात्राएँ थीं। लेकिन उस छोटे-से स्कूल ने यह साबित किया कि मुस्लिम लड़कियों के लिए जदीद तालीम का सवाल सिर्फ़ बहस का मौज़ू नहीं, संस्थागत रूप से संभव भी है। रुकैया के लिए तालीम का मतलब सिर्फ़ पढ़ना-लिखना नहीं था, तालीम औरत को अपनी दुनिया को समझने और बदलने की ताक़त पैदा करने का ज़रिया थी। वो सिर्फ़ सुधार की बात नहीं करती बल्कि वो बराहेरास्त पितृसत्ता से टकराती हैं और उसके मुकम्मल विनाश का सपना देखती हैं. उनकी कहानी सुल्ताना का ख्वाब से उनकी वैचारिकी को समझा जा सकता है. इस तरह बीसवीं सदी की शुरुआत तक एक पूरा सामाजी आधार तैयार हो चुका था, औरतों की पत्रिकाएँ थीं, औरत पाठक थीं, लड़कियों के स्कूल थे, शिक्षित मुस्लिम मध्यवर्ग बन रहा था और सामाजी सुधार के सवाल पर बहस चल रही थी।

इसी जमीन पर आगे चलकर रशीद जहाँ जैसी डॉक्टर और लेखिका सामने आती हैं। रशीद जहाँ को इस तारीख़ में ख़ास तौर से याद करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने मुस्लिम औरतों की ज़िन्दगी को सिर्फ़ सुधार का मौज़ू नहीं बनाया, बल्कि उसे अदब का मौज़ू बनाया। अंगारे (1932) में उनकी भागीदारी ने उर्दू अदब और मुस्लिम समाज दोनों में तीखी बहस पैदा की। उन्होंने घरेलू ज़िन्दगी, औरत के शरीर, शादी और लैंगिक असमानता जैसे सवालों को ऐसी भाषा में उठाया जो उस वक़्त के लिए असाधारण तौर से निर्भीक थी। बाद में तरक़्क़ी पसंद तहरीक ने ऐसी आवाज़ों को व्यापक वैचारिक आधार दिया।

इसी परंपरा से इस्मत चुग़ताई आती हैं। इस्मत का जन्म 21 अगस्त 1915 को बदायूँ में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ में तालीम हासिल की और आगे लखनऊ के इसाबेला थोबर्न कॉलेज से स्नातक किया। वे आगे चलकर तरक़्क़ी पसंद तहरीक का हिस्सा बनी। इस्मत का महत्व इस बात में नहीं है कि उन्होंने सिर्फ़ मुस्लिम औरतों के बारे में लिखा। उनका महत्व इस बात में है कि उन्होंने मुस्लिम मध्यवर्गीय घर की उस दुनिया को अदब के केंद्र में ला दिया जिसे अक्सर अदब में पर्दे के पीछे छोड़ दिया जाता था। उनके यहाँ औरत सिर्फ़ बीवी, माँ, बहन या बेटी नहीं है। वह इच्छा रखती है, गुस्सा करती है, ईर्ष्या करती है, सवाल करती है, अपने बदन और ज़िन्दगी के बारे में सोचती है और अपने सामाजी अस्तित्व को लेकर बेचैन होती है।

इस्मत ने घर की चारदीवारी को अदब की चारदीवारी बनने नहीं दिया। मुस्लिम औरतों की तारीख़ को अक्सर इस तरह पेश किया जाता है मानो पर्दा एक ऐसी पूर्ण दीवार था जिसके पीछे औरत बिल्कुल निष्क्रिय और बेआवाज़ थी और आधुनिकता ने आकर उसे उस दीवार से बाहर निकाला। लेकिन तारीख़ इससे ज़्यादा जटिल है। पर्दा निश्चित रूप से औरतों की आवाजाही, तालीम और सार्वजनिक भागीदारी पर पाबंदी लगाता था। लेकिन पर्दे के भीतर भी औरतों ने अपनी दुनिया, अपनी भाषा, अपनी आपसी बातचीत और अपने सांस्कृतिक हस्तक्षेप के रास्ते बनाए थे। इसलिए बदलाव एक झटके में नहीं आया। पहले सवाल उठा कि पर्दे में रहते हुए लड़की को पढ़ाया कैसे जाए? फिर सवाल उठा कि पढ़ी हुई लड़की लिखेगी कैसे? फिर ये कि वह समाज के बारे में अपनी राय क्यों नहीं रख सकती? और धीरे-धीरे सवाल बदलता गया और यहाँ तक पहुंचा कि अगर वह सोच सकती है, लिख सकती है और समाज को समझ सकती है तो उसकी ज़िन्दगी की सीमाएँ कोई और क्यों तय करेगा? इस्मत की लेखनी इसी बदलाओ के एक निर्णायक चरण की आवाज़ है।

क़ुर्रतुलऐन हैदर तक पहुँचते-पहुँचते यह प्रक्रिया और आगे जा चुकी थी। क़ुर्रतुलऐन ऐसे घर में पैदा हुईं जहाँ लेखन और बौद्धिकता पहले से मौजूद थी। उनकी माँ नज़र सज्जाद हैदर खुद लेखिका थीं और वालिद सज्जाद हैदर यल्दिरिम भी उर्दू अदब की महत्वपूर्ण शख़्सियत थे। यानी क़ुर्रतुलऐन के लिए वह स्थिति पहले ही बदल चुकी थी जिसमें लड़की को तालीम दिलाना अपने आप में असाधारण घटना हो। उनके लिए अदब घर की दुनिया का हिस्सा था। उन्होंने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू किया और आगे चलकर उर्दू उपन्यास को एक नया तारीखी और बौद्धिक विस्तार दिया। अगर इस्मत की निगाह ज़्यादातर घरेलू ज़िन्दगी की तत्काल वास्तविकता पर है तो क़ुर्रतुलऐन की निगाह सदियों की तारीखी स्मृति पर। लेकिन दोनों के यहाँ एक साझा बात है कि औरत को तारीख़ से बाहर नहीं रखा जा सकता।

क़ुर्रतुलऐन की आग का दरिया इसी मायने में सिर्फ़ बटवारे का उपन्यास नहीं है। वह भारतीय उपमहाद्वीप की लंबी तारीखी यात्रा को देखता है। चौथी सदी ईसा पूर्व से जदीद भारत-पाकिस्तान तक जाती हुई यह रचना तारीख़, तहज़ीब, पहचान और विस्थापन को एक साथ देखने की कोशिश करती है। भारत सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी उनके इंतेक़ाल के मौके पर ख़ास तौर से इस रचना की इसी तारीखी विस्तार को रेखांकित किया था।

आज जब कोई यह कहता है कि मुस्लिम समाज में औरतों की सार्वजनिक उपस्थिति कम इसलिए हुई क्योंकि इस्लाम और मुस्लिम समाज स्वभावतः औरत-विरोधी हैं, तो वह इस पूरी तारीख़ के बीच से तालीम, प्रिंट संस्कृति, औरतों के संगठनों, तरक़्क़ी पसंद तहरीक, क़ौमी सियासत, बटवारा और आज़ादी के बाद की हिंदुत्व सियासत को हटा देता है। आज़ादी के बाद हालात दर-हक़ीक़त बदल गए थे। बटवारे ने भारतीय मुसलमानों को एक नए अल्पसंख्यक संदर्भ में ला खड़ा किया। मुस्लिम पहचान अब सिर्फ़ तहज़ीबी या मज़हबी पहचान नहीं रही, वह तेजी से सियासी पहचान भी बन गई। इसके साथ व्यक्तिगत कानून, मज़हबी पहचान और सामुदायिक प्रतिनिधित्व के सवाल जुड़ते गए। धीरे-धीरे एक ऐसी स्थिति बनी जिसमें मुस्लिम समाज के भीतर सुधार की भाषा कई बार सामुदायिक असुरक्षा की भाषा से टकराने लगी। व्यक्तिगत कानून में सुधार का सवाल सिर्फ़ औरतों के हुक़ूक का सवाल नहीं रहा, वह मुस्लिम पहचान की रक्षा के सवाल से भी जोड़ दिया गया।

1970 के दशक में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की स्थापना और बाद के दशकों में व्यक्तिगत कानून पर बहस ने इस तनाव को और स्पष्ट किया। फिर 1985 का शाह बानो मामला आया। यहाँ मुस्लिम औरत की अपनी समस्या, भरण-पोषण और न्याय राष्ट्रीय सियासत में एक बड़े सामुदायिक विवाद में बदल गई। एक तरफ़ मुस्लिम क्लर्जी का एक हिस्सा इसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून पर हमला मान रहा था, दूसरी तरफ़ हिंदुत्व की सियासत मुस्लिम समाज की कथित पिछड़ेपन का प्रमाण खोज रही थी। इस पूरी बहस में सबसे विडंबनापूर्ण बात यह थी कि जिस औरत के अधिकार की बात हो रही थी, उसकी अपनी आवाज़ दोनों सियासी ध्रुवों के बीच दब गई थी। यहाँ हमें इस बात को समझना होगा कि मुस्लिम औरतों की सार्वजनिक दृश्यता का कम होना सिर्फ़ मुस्लिम समाज की आंतरिक पितृसत्ता का मामला नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र में अल्पसंख्यक पहचान, मुस्लिम विरोधी सियासत, वर्गीय पिछड़ापन, तालीम, रोज़गार और महिला अधिकार के आपस में टकराते हुए सवालों से भी जुड़ा हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि मुस्लिम समाज के भीतर पितृसत्ता नहीं थी या आज नहीं है। बिल्कुल है, लेकिन इन बाधाओं को सिर्फ़ इस्लाम के नाम पर समझना उतना ही गलत है जितना यह मान लेना कि मज़हब का कोई प्रभाव ही नहीं है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुस्लिम औरतों की आवाज़ दर-हक़ीक़त कभी ख़त्म नहीं हुई। उन्होंने अपने सवाल उठाने के नए तरीके खोजे। कभी मज़हबी किताबों की नई व्याख्या के ज़रिए, कभी संविधान के अधिकारों के आधार पर, कभी महिला आंदोलनों के ज़रिये और कभी अदब और पत्रकारिता के जरिए। यानी क़ुर्रतुलऐन और इस्मत चुग़ताई की परंपरा ख़त्म नहीं हुई बल्कि उसने अपनी शक्ल बदली। आज जब मुस्लिम औरत को कभी सिर्फ़ ‘पीड़ित’ और कभी सिर्फ़ ‘समुदाय की इज़्ज़त’ की शक्ल में पेश किया जाता है, तब इस्मत चुग़ताई और क़ुर्रतुलऐन हैदर को साथ याद करना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि दोनों हमें बताती हैं कि मुस्लिम औरत को किसी एक खाँचे में बंद करके नहीं समझा जा सकता। दोनों मिलकर यह बताती हैं कि मुस्लिम औरत की आज़ादी का मतलब सिर्फ़ पर्दा हटाना नहीं है और न ही सिर्फ़ जदीद तालीम हासिल कर लेना है। मुक्ति का असली मतलब है कि अपनी ज़िन्दगी की व्याख्या ख़ुद करने का अधिकार।

इसीलिए 21 अगस्त को इस्मत चुग़ताई का जन्मदिन और क़ुर्रतुलऐन हैदर की पुण्यतिथि एक साथ पड़ना महज़ एक साहित्यिक संयोग नहीं लगता। यह तारीख़ एक पूरी तारीखी सफ़र को सामने रखती है, उस सफ़र को जिसमें हुक़ूक़-उन्निस्वाँ से लेकर तहज़ीब-उन-निस्वाँ, ख़ातून और इस्मत जैसी पत्रिकाओं तक, अलीगढ़, लखनऊ और कलकत्ता के लड़कियों के स्कूलों से लेकर रशीद जहाँ और तरक़्क़ी पसंद तहरीक तक और वहाँ से इस्मत चुग़ताई और क़ुर्रतुलऐन हैदर तक मुस्लिम औरतों की आवाज़ लगातार अपना विस्तार करती रही।

लेकिन मुस्लिम औरतों ने इन दरवाज़ों को कभी पूरी तरह बंद होने भी नहीं दिया। क्योंकि हर दौर में कोई रशीद जहाँ लिखती रही, कोई इस्मत चुग़ताई सवाल करती रही और कोई क़ुर्रतुलऐन हैदर तारीख़ की लंबी नदी की लहरों से टकराती रही। और शायद 21 अगस्त की सबसे बड़ी सार्थकता यही है कि यह हमें दो महान लेखिकाओं को याद करने के साथ-साथ उस सवाल की भी याद दिलाता है कि मुस्लिम औरत के बारे में कौन बोल रहा है, और उसकी अपनी आवाज़ कहाँ है ?

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