भारत के पूर्व मुख्य-न्यायाधीश संजीव खन्ना ने इस विधेयक की समीक्षा से सम्बन्धित संसदीय-समिति को अपने विचारों से अवगत कराया : उनका कहना है कि चुनाव-आयोग को विधान-सभा चुनावों को स्थगित किये जाने का अधिकार दिये जाने सम्बन्धी धारा के कारण केन्द्र द्वारा राज्य-सरकारों के अधिग्रहण की आशंका बढ़ जायेगीः चार पूर्व मुख्य-न्यायाधीशों ने भी विधिक अस्थिरता को लेकर आगाह किया है, अब इसके बाद संसदीय-समिति अर्थशास्त्रियों से भी मिलेगी
सोभना के0 नायर
भारत के पूर्व मुख्य-न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मंगलवार को एक संयुक्त संसदीय-समिति को सम्बोधित करते हुये कहा कि लोक-सभा और राज्यों की विधान-सभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाने के लिये प्रस्तावित विधेयक चुनाव-आयोग को ‘‘निरंकुश विशेषाधिकार’’ प्रदान करता है।
भाजपा-सांसद पी0पी0 चैधरी के नेतृत्व में गठित समिति, संविधान (129 वाँ संशोधन) विधेयक 2024 जिसे सामान्य भाषा में ‘एक देश एक चुनाव’ विधेयक भी कहा जा रहा है, की समीक्षा कर रही है। न्यायमूर्ति खन्ना इस मुद्दे को रेखांकित करने वाले भारत के पाँचवें मुख्य-न्यायाधीश हैं। चार मुख्य-न्यायाधीश- न्यायमूर्ति यू0यू0 ललित, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति जगदीश सिंह केहर और न्यायमूर्ति डी0वाई0 चन्द्रचूड़ पहले ही इस प्रस्तावित विधेयक के विभिन्न विधिक-दोषों की ओर संकेत कर चुके हैं।
इस समिति की तीन घंटे तक चली बैठक में इसके सदस्यों ने विधेयक के समस्त विधिक पहलुओं पर न्यायमूर्ति खन्ना के साथ चर्चा की। संविधान (129 वाँ संशोधन) विधेयक 2024 में संविधान में धारा 82ए एवं अनुच्छेद 83 और 172 में उपबंध जोड़ा जाना प्रस्तावित है।
चुनाव आयोग द्वारा किसी राज्य के चुनाव को टाले जाने का परिणाम होगा अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति-शासन लागू करना, या दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य-सरकार का अधिग्रहण करना। यह संविधान की संघीय-परिकल्पना के विपरीत होगा और विधिक-प्रश्न खड़ा करेगा।
इस प्रकरण में न्यायमूर्ति खन्ना का कथन है कि प्रस्तावित धारा 82ए का उपबंध 5 चुनाव आयोग को इस बात का ‘‘अबाध अधिकार’’ देता है कि वह तय कर सके कि लोकसभा चुनावों के साथ-साथ किसी विधान-सभा का चुनाव कब नहीं कराया जा सकता। उन्होंने यह बात लिखित रूप में बतायी और मंगलवार की बैठक में इसे स्पष्ट भी किया कि ‘‘यह उपबंध मनमाना तौर पर लागू किये जाने और संविधान के अनुच्छेद 14 के प्रावधानों के उल्लंघन किये जाने का एवं इस प्रकार संविधान की मूलभूत अवधारणा को ठेस पहुँचाये जाने का सवाल हमेशा खड़ा करेगा।’’
उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि यह उपबंध चुनाव आयोग और सरकार को भी संविधान के अनुच्छेद 356 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का अतिक्रमण करने की छूट दे देगा। न्यायमूर्ति खन्ना ने टिप्पणी की कि, ‘‘चुनाव आयोग द्वारा किसी राज्य के चुनाव को टाले जाने का परिणाम होगा अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रपति-शासन लागू करना, या दूसरे शब्दों में कहें तो राज्य-सरकार का अधिग्रहण करना। यह संविधान की संघीय-परिकल्पना के विपरीत होगा और विधिक-प्रश्न खड़ा करेगा।’’
न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि यह विधेयक, विभिन्न राज्यों और लोकसभा के चुनावों के चुनाव-चक्र में व्यवधान के चलते अपने मूलभूत उद्देश्य- नीतिगत-पक्षाघात के अवसर को कम करना, को आहत करता है। वह सदस्यों के प्रश्नों का समाधान कर रहे थे। सूत्रों के अनुसार उनका तर्क यह था कि राज्य-विधानसभाओं को उनका कार्यकाल समाप्त होने के पहले ही यदि भंग कर दिया गया तो वहाँ चुनावों के पहले आदर्श आचार-संहिता लागू हो जायेगी और उससे इस विधेयक का उद्देश्य ही आहत हो जायेगा।
इस समिति के मुखिया चैधरी जी ने ‘द हिन्दू’ को बताया कि अब यह समिति प्रस्तावित विधेयक के आर्थिक प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिये अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक करेगी। सरकार का मानना है कि इस विधेयक से चुनाव के खर्चों में कमी आयेगी।
‘द हिन्दू’ दिनांक 20 अगस्त 2025 से साभार
अनुवादः दिनेश अस्थान
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