Wednesday, August 17, 2022
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जनसुनवाई में बिहार में 20 आरटीआई कार्यकर्ता की हत्याओं की जांच के लिए न्यायिक आयोग की मांग

पटना। आरटीआई कार्यकर्ताओं की मौत के विषय पर अपनी तरह का पहली जनसुनवाई का आयोजन आज पटना में किया गया। जन सुनवाई की अध्यक्षता प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय (एमकेएसएस), विनीता देशमुख (वरिष्ठ पत्रकार) और अमिताभ कुमार दास (पूर्व आईपीएस) की जूरी ने की।

जनसुनवाई का आयोजन सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई), सफर, जन जागरण शक्ति संगठन, भोजन का अधिकार अभियान, बिहार और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया।

पिछले दस वर्षों में 20 से अधिक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याएं बिहार में एक बहुत ही परेशान करने वाली प्रवृत्ति है। यह तुरंत बंद होना चाहिए। जिन लोगों की हत्या की गई है, वे सार्वजनिक कारणों से लड़ रहे थे और सार्वजनिक वितरण प्रणाली, नरेगा, आंगनबाडी केंद्रों, अवैध रूप से संचालित क्लीनिकों आदि के कामकाज में पारदर्शिता लाने की कोशिश कर रहे थे। अधिकांश आरटीआई अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को उजागर कर रहे थे। आरटीआई कार्यकर्ताओं को डराना-धमकाना तुरंत बंद होना चाहिए।

जनसुनवाई में आए आरटीआई कार्यकर्ताओं के परिजनों ने अपनों को याद कर न्याय दिलाने के लिए सरकार से जवाबदेही का गंभीर सवाल पूछा। परिजनों ने बताया कि पुलिस भी जांच में अपराधियों की मदद कर रही है और मामले को कमजोर करने की पूरी कोशिश कर रही है।अक्सर वे परिवार के सदस्यों और गवाहों को अपना बयान बदलने और जान से मारने की गंभीर धमकी देते हैं। ऐसे में आरटीआई व्हिसलब्लोअर्स के परिवार वाले अब भी खौफ के साए में जी रहे हैं।

पीड़ित परिवार के सदस्यों दने ये भी बताया कि अपराधियों द्वारा कई बार मौत की धमकियों का सामना करने के बाद भी,  आरटीआई कार्यकर्ताओं ने सूचना का पीछा करना और भ्रष्टाचार को उजागर करना बंद नहीं किया था। उन्होंने यह भी कहा कि, यह प्रयास आरटीआई अधिनियम को मारने के लिए जानबूझकर किये जा रहे है जिससे लोग इन हत्याओं से डर कर जानकारी मांगना बंद कर दें।

जनसुनवई में वकील भी मौजूद रहे और पीड़ित परिवार के सभी सदस्यों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने का आश्वासन दिया।

शाम रजक (राजद), शकील अहमद खान (कांग्रेस), गणेश सिंह-सीपीआई (एम), संदीप सौरभ सीपीआई (एमएल), अरुण सिंह- एसयूसीआई, मनोज झा (राजद) जैसे विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता राजनीतिक दल वाले सत्र का हिस्सा थे। उन्होंने संघर्षरत परिवारों को मदद करने का वादा किया और साथ ही आर.टी. आई से जुड़े मुद्दे को बड़े पैमाने पे उठाने का संकल्प किया.

राज्य सूचना आयोग के सूचना आयुक्त त्रिपुरारी शरण ने जान सुनवाई में हिस्सा लिया और अपने स्तर से मदद करने की पेशकश की.

आरटीआई व्हिसलब्लोअर के परिवार के सदस्यों, जूरी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने जनसुनवाई में मांग की कि जिन आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है, उन्हें मानवाधिकार रक्षकों का दर्जा दिया जाय।  एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन हत्या के मामलों की जांच निष्पक्ष और समयबद्ध तरीके से हो।राज्य सरकार को उपरोक्त एजेंसियों को इन सभी मामलों की जांच समयबध तरीके से भीतर पूरी करने का निर्देश देना चाहिए।

राज्य सरकार को भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों की सुरक्षा के लिए एक कानून अपनाना चाहिए। यह राज्य स्तरीय ‘व्हिसल ब्लोअर’ संरक्षण कानून का रूप ले सकता है। संसद ने 2014 में ऐसा कानून पारित किया था, लेकिन आज तक भारत सरकार इस कानून को लागू करने में विफल रही है।

यह भी मांग की गई कि आरटीआई कार्यकर्ताओं की धमकियों, हमलों या हत्याओं के सभी मामलों में, राज्य सूचना आयोग को संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरणों को तुरंत सभी आरटीआई और जवाबों का खुलासा करने और व्यापक प्रचार करने का निर्देश देना चाहिए। माांगी गई जानकारी को इस प्रकार से व्यापक प्रचार करने से भविष्य में हमलों में रोक लगाई जा सकती है क्योंकि अपराधियों को यह संदेश मिलता है कि मामलों को दबाने के बजाय, कोई भी हमला उस मामले को और भी अधिक सार्वजनिक बना देगा।

 मारे गए लोगों द्वारा मांगी जा रही अधिकांश जानकारी ऐसी थी कि इसे किसी भी मामले में आरटीआई अधिनियम की धारा 4 के तहत सक्रिय रूप से प्रदान किया जाना चाहिए था। बिहार एसआईसी को सार्वजनिक प्राधिकरणों द्वारा स्व–प्रकटीकरण की लगातार निगरानी और अंकेक्षण करना चाहिए।

 राजस्थान सरकार द्वारा विकसित जन सूचना पोर्टल और कर्नाटक सरकार द्वारा निर्मित ‘माहिती कंजा’ की तर्ज पर आरटीआई अधिनियम की धारा 4 को लागू करने के लिए बिहार सरकार को सूचना के स्व–प्रकटीकरण के लिए सिंगल विंडो पोर्टल विकसित करना चाहिए।

आरटीआई कार्यकर्ताओं के हमलों या हत्याओं के सभी मामलों में, जिन विभागों से वे सूचना मांग रहे थे, उन सभी योजनाओं और वित्तीय मामलों का विशेष ऑडिट किया जाना चाहिए। इसकी निगरानी राज्य सामाजिक अंकेक्षण इकाई (सोशल ऑडिट यूनिट, SAU) द्वारा की जानी चाहिए।

आरटीआई कार्यकर्ताओं का राज्य नेटवर्क स्थापित किया जाए और आवेदनों की स्थिति, अपील और मांगी जा रही जानकारी के प्रभाव की समीक्षा के लिए समय-समय पर बैठक की जानी चाहिए।

जन सुनवाई में निखिल डे, आशीष रंजन, कपिल अग्रवाल, अनिंदिता अधिकारी, रक्षिता स्वामी, महेंद्र यादव, शिव प्रकाश राय, रुपेश, अमृता जोहरी, अंजलि भरद्वाज, मणिलाल, ग़ालिब, इंजीनीर विनय शर्मा, पुरुषोत्तम, अधिवक्ता दीपक, कुमार शानू, शहीद कमाल, गोपाल कृष्णा, विद्याकर झा सहित एक सौ से अधिक आर.टी.आई कार्यकर्ता इस कार्यक्रम में भाग लिए।

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