( गौतम भाटिया का यह लेख सबसे पहले अंग्रेजी में 21 मई 2025 को constitutional law and philosophy में प्रकाशित हुआ है। समकालीन जनमत के पाठकों के लिए हिन्दी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है। मूल अग्रेजी लेख को इस लिंक https//indconlawphil.wordpress.com पर पढ़ सकते हैं। )
गौतम भाटिया
अली खाँ महमूदाबाद बनाम हरियाणा राज्य मामले में उच्च्तम न्यायालय का आदेश बहुत कुछ कहता है। यह आदेश ऑपरेशन सिन्दूर पर आधारित एक फेसबुक पोस्ट को लेकर उनके विरुद्ध दायर की गयी प्राथमिकी को स्थगित किये जाने का महमूदाबाद का निवेदन निरस्त करता है। महमूदाबाद को अन्तरिम जमानत इसलिये देता है कि वह (अपने ही विरुद्ध) जाँच में ‘ सहयोग कर सकें ’। यह आदेश उनकी फेसबुक पोस्ट की अग्रिम जाँच हेतु पुलिस अधिकारियों के एक विशेष जाँच-दल (एस0आई0टी0) के गठन हेतु निर्देशित करता है। यह आदेश हालिया भारत-पाकिस्तान टकराव को लेकर अपनी कोई राय व्यक्त करने से महमूदाबाद को रोकता है। यह आदेश महमूदाबाद का पासपोर्ट जब्त कर लेता है।
ऐसी आशा करना स्वाभाविक है कि इस प्रकार के दूरगामी आदेश के समर्थन में – जो अनुच्छेद 19 के दो अधिकारों (अभिव्यक्ति एवं आवागमन की स्वतंत्रता) – पर रोक लगाता है, उतने ही मजबूत कारण भी हों। न्यायालय से इस स्पष्टीकरण की भी उम्मीद करना स्वाभाविक है कि ऐसी फेसबुक पोस्ट, जिसमें भारतीय सेना की भरपूर प्रशंसा करते हुये बहुत आहिस्ता से यह कहा गया है कि जबतक मुसलमानों के विरुद्ध हिंसा जारी रहती है तबतक सेना की एक मुस्लिम महिला अधिकारी द्वारा संवाददाता सम्मेलन को सम्बोधित करना केवल प्रदर्शन की वस्तु रह जायेगा, पर इस प्रकार का नाटकीय आदेश क्यों किया गया। इसमें कुछ भी ढूँढना बेकार है। अपने दो पृष्ठ के आदेश में उच्चतम न्यायालय महमूदाबाद के विरुद्ध न तो आरोपों की पड़ताल करता है और न इस बात का भी संज्ञान लेता है कि क्या सीधे-सीधे पढ़ने में इस फेसबुक पोस्ट में वे अपराध दिखाई देते हैं जिनके लिये उन्हें आरोपित किया गया है (और जेल में बन्द किया गया है)।
बजाय इसके, प्रतीत होता है कि यह काम एस0आई0टी0 का है। न्यायालय का कहना है कि वह ‘‘इस पोस्ट में प्रयुक्त पदबन्धों की जटिलता और इन दो ऑनलाइन पोस्टों में प्रयुक्त भावों को को समग्र रूप से समझने ’’ के लिये इस एस0आई0टी0 का गठन किया जा रहा है। तो क्या हम यह देखने जा रहे हैं कि महमूदाबाद की पोस्ट को समग्र रूप से समझने के लिये पूरी तन्मयता से अपने काम में संलग्न तीन गंभीर पुलिस अधिकारी एक डेस्क पर बैठे हैं, उनके एक हाथ में महमूदाबाद की फेसबुक पोस्ट की रंगीन प्रति है और दूसरे में स्टैनली फिश की किताब ‘ हाउ टु राइट ए सेन्टेन्स ; एंड हाउ टु रीड वन ’’ है ? यदि ऐसा ही है तो, अर्थ का अनर्थ देखने के लिये तैयार रहिये। शायद न्यायालय को इस तिकड़ी में किसी साहित्यिक आलोचक को भी शामिल कर लेना चाहिये था। सम्भवतः यदि न्यायालय में कोई विनोदी भाव भी होता तो उसके जेह्न में आस्कर वाइल्ड के मुकदमे के दौरान टेरी ईग्लेटाॅन की वह पुनर्परिकल्पना अवश्य आ जाती जहाँ ईग्लेटाॅन की महान कलाकारी माँग की गयी थी कि, ‘‘मुझे अपने बचाव के लिये किसी वकील की नहीं वरन तांत्रिक की आवश्यकता है और मेरी न्यायपीठ में मेरे साथी- मसलन कवि, मतिभ्रष्ट, आवारा और प्रतिभासम्पन्न लोग- होने चाहिये और वह इस प्रकार के एस0आई0टी0 के गठन की चुटकी लेता, हाँ यह जरूर है कि पुलिस अधिकारी तो होते ही।
तो, इस आदेश की विधिक तर्कसंगतता के अभाव में यह समझने के लिये कि न्यायालय के मस्तिष्क में क्या चल रहा था, हमें इस मामले मे की गयी मौखिक कार्यवाही के अनौपचारिक अभिलेखों का भी जायज़ा लेना चाहिये। इन अनौपचारिक अभिलेखों के अवलोकन से हमें ज्ञात होता है कि महमूदाबाद की पोस्ट ‘‘डाॅग व्हिसिल’’ जैसी है। अब डाॅग व्हिसिल में ये तीन चीजें होनी चाहियेः पहला, एक सीटी, दूसरा, ऐसे कुत्तों का एक समूह जो सीटी के उनकी श्रवण-क्षमता के भीतर आवाज करने पर सुन लें और तीसरा, वे अ-कुत्ते जो सीटी की आवाज न सुन सकें। और यदि महमूदाबाद की पोस्ट वास्तव में डाॅग व्हिसिल थी (और इसीलिये कानून का उल्लंधन थी) तो यह न्यायालय के हक में ही होगा कि वह हमें बताये कि इसका कौन सा हिस्सा सीटी बजाने जैसा था, वे कौन से कुत्ते हैं जिनका ध्यान यह सीटी खींचना चाहती थी और कौन से वे अ-कुत्ते हैं जो इसे सुन नहीं पाते। लेकिन न्यायालय ऐसा कुछ नहीं करती और इसीलिये हम अँधेरे में हैं। इसके अलावा अनौपचारिक अभिलेखों के अनुसार न्यायालय का मानना है कि ‘‘ इस प्रकार कोई भाषा का जानकार विश्लेषक मस्तिष्क का व्यक्ति ही……..प्रयुक्त शब्दों, वाम को उत्तर की ओर, दक्षिण को लक्षित करेगा……..कुछ शब्द द्विअर्थी हैं……’’
तो ‘‘दक्षिण की ओर’’ कौन है जिसे निशाना बनाया जा रहा है और कौन से शब्द ‘‘द्विअर्थी’’ हैं? माना जाता है कि एस0आई0टी0 हमें यह बतायेगी। परन्तु इस स्थिति में हमें पूरी विनम्रता से कहना चाहिये कि यदि इस प्रकार की अविश्वसनीय रूप से संवेदी डाॅग व्हिसिल पोस्ट करने में महमूदाबाद ने अपने विश्लेषणात्मक मस्तिष्क का प्रयोग किया जिसके लिये हमें तीन ऐसे पुलिस अधिकारियों की आवश्यकता पड़ गयी जो हमें यह बतायेंगे कि यह व्हिसिल कहाँ है और वे कुत्ते कौन हैं, तो यह एकदम स्पष्ट है कि वास्तव में यह डाॅग व्हिसिल बहुत ही भयानक है। सम्भ्वतः आप भी अक्षमता के आधार पर इस मामले को पूर्ण-विराम दे सकें।
अनौपचारिक मौखिक अभिलेखों पर लाख सिर मारने पर भी कोई समाधान नहीं मिल पा रहा है, फिर भी इस प्रक्रिया से बाहर निकल कर यदि सोचें तो एक निष्कर्ष यह भी निकाला जा सकता है कि हम देखें कि महमूदाबाद के वकीलों ने उनका पक्ष कैसे प्रस्तुत किया, क्योंकि- प्रतीत होता है कि- न्यायालय उनके प्रस्तुतीकरण से सहमत नहीं थी। महमूदाबाद के वकीलों का तर्क था कि यह फेसबुक पोस्ट अनालंकृत देशभक्ति के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैः और कुछ होने से पहले यह एक देशभक्ति-पूर्ण कथन है और इसीलिये दंडनीय नहीं है। इस बात को समझने के पर्याप्त कारण हैं कि क्यों महमूदाबाद के वकीलों को अपना पक्ष इसी प्रकार रखना चाहिये था, परन्तु एक प्रेक्षक के तौर पर हम इन्हीं दबावों के अन्तर्गत काम नहीं करते। इसीलिये इस दलील की सीमाओं का परीक्षण करना महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या संविधान में ‘ अ-देशभक्तिपूर्ण कथन ’ का निषेध किया गया है ? इसके लिये हमें संवैधानिक-मूलपाठ पर एक नज़र डालनी होगीः विशेषतः अनुच्छेद 19(2) पर। इससे यह तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि इस मामले मे हमारा दृष्टिकोण चाहे कुछ भी हो, संविधान में ‘अ-देशभक्तिपूर्ण कथन’ का निषेध कहीं नहीं किया गया है।
इसके दो कारण हैं और दोनों महत्वपूर्ण हैं। पहला, शब्द ‘देशभक्त’ बेहद व्यक्तिपरक है, और यह विधिक मानकों पर किसी भी तरह संवेदनशील नहीं है- और इसके लिये किसी को जेल में डाल दिये जाने के लिये पर्याप्त कारण तो कतई नहीं है। ‘ सच्चे ’ और ‘ झूठे ’ देशभक्त में फ़र्क़ करने के लिये सैमुएल जाॅन्सन की मशहूर पंक्तियाँ, ‘‘ पैट्रियाटिज़्म इज़ द लास्ट रिफ्यूज़ ऑफ़ द स्काउन्ड्रेल ’’ उनका अपना प्रयास है और इस मामले में ये पंक्तियाँ विधिवत समीचीन हैं। परन्तु दूसरा, देशभक्ति (और राष्ट्रवाद) की अवधारणा एक लम्बे समय से विवादास्पद रही है। ई0एम0 फाॅस्र्टर की ये पंक्तियाँ मशहूर हैं, ‘‘ मुझे ध्येय के विचार से ही नफ़रत है, और यदि मुझे अपने देश से और दोस्त से विश्वासघात करने में से किसी एक का चुनाव करना हो तो मैं उम्मीद करता हूँ कि मुझमें अपने देश से विश्वासघात का चुनाव करने की हिम्मत होनी चाहिये।’’ उन्हें पता था कि यह दृष्टिकोण स्वच्छन्द प्रकृति का है, इसलिये उन्होंने इसे इस तरह स्पष्ट कियाः ‘‘ इस प्रकार का चुनाव आधुनिक अध्येता की निन्दा का बायस हो सकता है, और हो सकता है कि उसका देशभक्ति से लबरेज़ हाथ तुरंत टेलीफोन तक पहुँच जाय और वह पुलिस को काल लगा दे। यद्यपि इससे दान्ते को कोई ताज्जुब न होता। दान्ते ब्रूटस और कैशियस दोनों को नर्क के सबसे निचले चक्र में रखते हैं क्योंकि उन्होंने अपने देश, रोम के बजाय अपने दोस्त जूलियस सीज़र के साथ विश्वासघात किया था।’’ सबसे हाल में महान सर्बाे-क्रोयशियन लेखक दुब्रावका यूग्रेसिक, जिन्हें राष्ट्रीयता के युद्ध की विभीषिकाओं का व्यक्तिगत अनुभव था, ने अपने संस्मरण में देशभक्ति की अवधारणा की सीधे-सीधे आलोचना की है।
सवाल यह नहीं है कि हम फाॅस्र्टर या यूग्रेसिक से सहमत हैं या नहीं, बल्कि तथ्य यह है कि संविधान में पूरी समझदारी के साथ ‘अ-देशभक्तिपूर्ण कथन ’ को गैरकानूनी नहीं माना गया हैः इसने और इसके निर्माताओं ने इस बात को मान्यता दी है कि प्रश्नगत अवधारणा अस्तित्वहीन है और इसके अपराधीकरण का प्रयास करना व्यर्थ है। मेरा मानना है कि यह विन्दु बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कभी-कभी किसी मामले में एक अच्छी विधिक व्यूहरचना अन्य सभी मामलों में संवैधानिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं को संकुचित कर सकती है। इस प्रकार महमूदाबाद की देशभक्ति सुनिश्चित करने की इच्छा के साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि संविधान कहीं भी देशभक्ति पर जोर नहीं देता; इसका दखल सिर्फ वहीं होता है जहाँ किसी कथन से हिंसा को उकसावा मिलता है या आमजन में अव्यवस्था फैलती है, और इसके पहले नहीं।
इसलिये पूरे सम्मान के साथ मेरा निवेदन है कि उच्चतम न्यायालय का आदेश विधिक रूप से पूरी तरह सही न हो। एस0आई0टी0 के गठन के कारण अस्पष्ट हैं। प्रतिबन्ध लगाने का आदेश इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से परे है। पासपोर्ट का जब्त किया जाना कुछ ज्यादे ही हो गया लगता है। इसी बीच यह भी पता चला है कि महमूदाबाद का लैपटाॅप भी जब्त कर लिया गया है और इसीलिये यह आशा की जाती है कि न्यायालय का आदेश कहीं प्राथमिकी के दायरे से बाहर जाकर मनमाना पुलिसिया जाँच का बायस न बन जाय।

