समकालीन जनमत
स्मृति

अतीत के दर्पण में वर्तमान को देखने वाला इतिहासकार    

 प्राचीन इतिहास के बड़े इतिहासविद् प्रोफेसर डी.एन.झा का 5 फरवरी  को निधन हो गया। अब  वे हमारे बीच नहीं रहे। मगर अनका चिंतन और उनकी बेशकिमती किताबें हमारे बीच हैं और रहेंगी। प्रोफेसर झा के गुजर जाने के बाद बहुत भावुक करने वाला संस्मरण डॉ. रतनलाल की ओर से आया। संस्मरण से पता चला कि प्रोफेसर झा वंचित समाज से आने वाले विद्यार्थियों के प्रति आत्मीय थे। और उनके भविष्य को लेकर फिक्रमंद रहा करते थे साथ ही उनकी सहायता के लिए तत्पर भी। विदित है कि प्रो. झा मिथकों पर गहन चिंतन करने वाले और उनकी हवा निकालने वाले विचारक थे, परंतु यह संस्मरण कुछ अलग था। इसमें शिष्य द्वारा गुरू को बहुत आदर के साथ याद किया गया था। हम लोग, जो कभी प्रो. झा से नहीं मिले, जो सिर्फ उनकी किताबों और आलेखों तक महदूद थे, उनके लिए यह संस्मरण अध्यापकीय पेशे में ईमानदार रहने के लिए प्रेरित करने वाला था (है)।

प्रोफेसर झा के कई साक्षात्कार यू-टयूब और बीबीसी हिंदी  पर उपलब्ध हैं। अगस्त 2018 को रूपा झा द्वारा उनका एक साक्षात्कार लिया गया। रूपा झा भारतीय भाषा (बीबीसी) की संपादक हैं। यह साक्षात्कार अपने-आप में बेजोड़ है। साक्षात्कार में गाय से लेकर राम मंदिर तक के तमाम पहलुओं पर बहुत ठहराव के साथ बातचीत की गई है। साक्षात्कार के माध्यम से ही इन पंक्तियों का लेखक प्रो. झा के लेखन की ओर आकर्षित हुआ। कोशिश थी कि दिल्ली जाने पर उनसे मुलाकात जरूर की जाएगी। मगर हर हसरतें कहां मुमकिन हो पाती हैं।

प्रोफेसर झा का जन्म सन 1940 में हुआ था। प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता से सन 1959 में स्नातक (इतिहास में प्रतिष्ठा) करने के बाद आगे के अध्ययन के लिए वे पटना आ गए। पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने इतिहास में एम.ए. और वहीं से पीएच.डी. किया। पीएच.डी. उन्होंने प्रोफेसर आर.एस शर्मा के निदेशन में किया। शोध कार्य पूर्ण हो जाने के बाद वे वहीं (पटना वि.वि. में) कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय आ गए। दिल्ली आने के बाद उन्होंने एक योद्धा की तरह शोधपरक लेखन किया। तीन दशक तक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने के साथ – साथ वे कुछ अत्यंत महत्तवपूर्ण पुस्तकों का लेखन किया, जिनमें शामिल हैं – एशिएंट इंडिया: इन हिस्टोरिकल आउटलाइन (Ancient India: In Historical Outline -1997), द मिथ ऑफ होली काऊ (The Myth of the Holy Cow -2001), रि-थिंकिंग ऑफ हिंदू आइडेंटी (Rethinking Hindu Identity) और अर्ली इंडिया: कंसाइज हिस्ट्री (Early India: A Concise History -2004)। इतिहास की ये पुस्तकें लोगों को उद्वेलित करने वाली सिद्ध हुईं। और खास तबके के द्वारा इन किताबों का बहुत विरोध भी किया गया।

प्रोफेसर झा निरंतर चिंतन और लेखन करते रहे। उनके अंतिम दिनों की किताब प्राचीन भारत में मदिरा और मदिरासेवी समाज (संपादित) थी। यह किताब खानपान के इतिहास के बहाने मिथकों को तोड़ती है। मिथकों से उनकी टकराहट पुरानी थी। भारत की आस्था मिथकजीवी है। कोई तरक्कीपसंद चिंतक मिथकों से टकराए बिना नहीं रह सकता। जब उन्होंने अध्यापन और लेखन को शुरू किया, तब भारत कई तरह के उथल-पुथल से गुजर रहा था। मिथकों को इतिहास की तरह पेश किया जा रहा था। कई तरह के बेहद भयावह अभिकथन (Narration) गढ़े जा रहे थे। आज जिस तरह का समाज इस देश में दिखाई पड़ रहा है, उसके निर्माण का समय यही था। इन कथनों का प्रभाव संविंधान की छत्रछाया में पनपने वाले भारत पर पड़ा। चूंकि वे तत्कालीन समस्याओं की तह में जाने वाले इतिहासकार थे ;  इसीलिए उनकी किताबें समकालीन विमर्शों और समस्याओं के उत्स की खोज करती पाई जाती हैं। इन इस अर्थ में वे सच्चाई की तलाश और ऐतिहासिक तथ्यों की वास्तविक व्याख्याओं की ओर बढ़ते नज़र आते हैं। तथ्यों की सही व्याख्या करने में वे किसी झिझक या प्रतिरोध की पहरवाह नहीं करते। निश्चित रूप से वे जोखिम उठाने वाले इतिहासकार थे, जो वर्तमान को अतीत के दर्पण में देख लेते थे।

ऊपर की पंक्तियों में जिक्र किया गया कि प्रोफेसर झा के शुरूआती लेखन का दौर तमाम प्रकार के उतार-चढ़ाव का समय था, जिसका प्रभाव समाज और ज्ञान की संस्कृति पर भी पड़ रहा था। इतिहास लेखन में राजनीतिक मुकाबलेबाजी शुरू हो चुकी थी। दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी इतिहासकार इतिहास को राजनीतिक आकांक्षा की पूर्ति के साधन के रूप में देख रहे थे। मान्यताओं और आख्यानों को इतिहास के रूप में प्रकट किया जाने लगा था। अभिकथनों का इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडे के रूप में होने लगा था। गाय हिंदुत्व का आदर्श और प्रतीक बनती जा रही थी। समाज में यह धारणा बनती जा रही थी कि प्राचीन आर्यो में गाय एक पवित्र पशु थी। इसलिए आज भी इसका सम्मान (और रक्षा) करना हर हिंदू पावन कर्तव्य है। यह स्थापित होता जा रहा था कि इसके मांस का सेवन करने वाला समाज हिदुओं का विरोधी समाज है। जाहिराना तौर पर इस कथन से एक खास तबके को निशाने पर लिया जा रहा था। आस्था और हिंसा के गुणनफल से हिंदुत्व की राजनीति ने प्राणशक्ति अर्जित की। चीजों को देखने की नज़र बदलती जा रही थी।

ऐसे समय में प्रो. झा ने ‘ द मिथ ऑफ होली काऊ’ जैसी पुस्तक का लेखन किया। ‘द मिथ ऑफ होली काऊ’ ने गाय की पवित्रता और उसके मांस के भक्षण का इतिहास प्रस्तुत किया। इस पुस्तक के माध्यम से प्रो. झा ने श्रग्वेद का संदर्भ लेते हुए दिखाया कि प्राचीन आर्य कबीलों में पशु बलि आम बात थी। बलि चढ़ने वाले तमाम पशुओं में गाय भी थी। बलि का गौमांस उनके बीच प्रसाद के रूप में वितरित हुआ करता था। किताब का विरोध संभावित था, जो हुआ भी। पुस्तक का प्रथम संस्करण सन 2001 आया और प्रबल विरोध के चलते पुस्तक केंद्रों से इसे जब्त करना पड़ा। अंतत: सन 2004 में एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन ने पुस्तक को प्रकाशित किया।

 ‘द मिथ ऑफ होली काऊ’ जैसी इतिहास की पुस्तकें दो तरह से महत्वपूर्ण हुआ करती हैं – पहला ऐसी पुस्तकें इतिहासकार के पवित्र समर्पण (अपने अनुशासन के प्रति) की गवाही देती हैं और दूसरा यह कि वह (इतिहासकार) अपने देश की बहुलतावादी संस्कृति के प्रति कितना फिक्रमंद है। एक अध्येता के रूप में प्रो.झा ने अतीत और वर्तमान की खूब आवाजाही की। और सरलीकृत इतिहास वाचन के खतरे को उजागर किया।

प्रोफेसर डी.एन. झा नागरिकबोध के इतिहासकार थे। उन्होंने प्राचीन भारत के आर्थिक और सामाजिक इतिहास पर महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके द्वारा प्राचीन भारत के अध्ययन से समतामूलक समाज के निर्माण लायक विपुल सामग्री को प्रस्तुत किया गया। इसके साथ उन्होंने धर्मनिरपेक्ष इतिहास लेखन की प्रविधि से भी परिचित कराया। यही कारण है कि वे इतिहास के परिसर के बाहर के लोगों द्वारा भी पढ़े और सराहे गए। दुश्मनों की दुनियॉ में उनके दोस्त भी कम न थे।

प्रो.झा ने प्राचीन भारत के राजस्व और समाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों पर ठोस अनुसंधान कार्य किया। निश्चित ही उनके अनुसंधान कार्यों में विस्तार की तुलना में गहराई अधिक है। यही कारण है विरोधियों को भी उनके निष्कर्षों के सामने मौन धारण करना पड़ जाता है। गंभीर अध्येता और पंथनिरपेक्ष इतिहासकार होने के कारण उनकी किताबों का दूसरी भाषाओं में अनुवाद हुआ। ये किताबें बहुत ज्यादा पढ़ी भी गईं। विद्यार्थियों और इतिहास के शौक़ीन लोगों के लिए वे ‘जनता के इतिहासकार’ के रूप में जाने जाते हैं।

प्रोफेसर डी.एन.झा अब हमारे बीच नहीं हैं। उनका जाना एक सच्चे इतिहासकार का जाना है। वे सरलीकृत अभिकथनों से टकराने और मिथकों की हवा निकालने वाले इतिहासकार थे। विगत दो-ढाई दशक से वे हिंदुओं की ‘सनातन सहनशीलता’ और उनकी ‘सर्वसमावेशी पहचान’ से लगातार मुठभेड़ करते रहे। निश्चित ही वे एक ऐसे इतिहासकार थे, जिन्होंने इतिहास लेखन को पंथनिरपेक्ष बनाया।

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