अनिल प्रभा कुमार के हिन्दी उपन्यास ‘ सितारों में सूराख़ ’ के उर्दू तर्जुमे की भूमिका का हिन्दी अनुवाद
आफ़ताब अहमद
प्रिय पाठको, हिन्दी की लेखिका अनिल प्रभा कुमार के उपन्यास ‘सितारों में सूराख़’ का मेरा उर्दू अनुवाद 2023 में मुंबई से प्रकाशित हुआ। मुझे उम्मीद थी कि इसे प्रकाशित होते ही, और ख़ास तौर पर मेरी भूमिका पढ़ने के बाद, उर्दू पाठक काम काज छोड़कर, इसे ख़रीदने किताब की दुकान की तरफ़ दौड़ पड़ेंगे—साथ ही दूसरे पाठक साथियों को आवाज़ लगाते जाएँगे, कि ‘चलते हो तो चमन को चलिए, कहते हैं कि बहाराँ है।’ लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उपन्यास पढ़कर मेरे मन के सीप में भावों, अनुभूतियों और विचारों के रंगबिरंगे मोती बने थे, उन्हें पिरोकर प्रस्तावना की जो लड़ी बनाई थी, उर्दू पाठकों में उसका कोई ख़रीदार न निकला।
अतः उर्दू प्रस्तावना को हिन्दी में परिवर्तित करने का विचार आया। हिन्दी में संभवतः ‘सितारों में सूराख़’ के विषय में बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन उर्दू में मेरी नज़र से कुछ नहीं गुज़रा। मेरे अनुवाद के बाद भी। ख़याल आया कि हिन्दी पाठकों में गुणग्राहियों की कमी नहीं, तो क्यों न इसका हिन्दी अनुवाद उनकी ख़िदमत में पेश किया जाए। वैसे भी, उपन्यास के संबंध में अपने “गहन” और अमूल्य विचारों से हिन्दी पाठकों को वंचित रखना अन्याय होता। अतः यह लेख दरअसल ‘सितारों में सूराख़’ के मेरे हिन्दी तर्जुमे का तआरुफ़ अर्थात परिचय अर्थात प्रस्तावना है। या यूँ कह सकते हैं कि यह लेख ‘सितारों में सूराख़’ के मेरे उर्दू तर्जुमे की प्रस्तावना का हिन्दी अनुवाद है।
अनिल प्रभा कुमार से मेरी पहली मुलाक़ात कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में एक कहानी सेमिनार में, शायद 2012 में हुई थी। उससे पहले मैंने अनिल जी का नाम नहीं सुना था। उनकी कहानियों का पहला संग्रह प्रकाशित हो चुका था—यह बात मुझे बाद में पता चली। यह ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि उस सेमिनार में उनकी कहानी सुनकर मैं स्तब्ध रह गया था। कहानी के ख़त्म होते-होते, एक घनी ख़ामोशी ने मुझे घेर लिया था। जी चाहता था कोई मुझसे बात न करे। बेहद संवेदनशील और कसी हुई कहानी थी। एक-एक शब्द के पीछे सोच-विचार की जगमगाती लकीरें, और कहानी कहते-कहते किसी घने लम्हे में कोई ऐसा वाक्य गिरा देना, जैसे दिल की तलैया में किसी ने कंकर फेंक दिया हो, जिसकी तरंगों का दायरा फैलता ही चला जाए। उनकी कहानियों के बीच ख़ामोशियाँ बोलती हुई महसूस होती थीं—भावनाओं में हलचल पैदा करती हुई। उस कहानी ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने अपने शाश्वत आलस्य को थोड़ी देर के लिए परे धकेलकर ‘अच्छी कहानी क्या होती है?’ के विषय पर एक लेख लिख डाला। फिर तो अक्सर उनसे हिन्दी भाषा और कहानी संबंधित सेमिनारों में मुलाक़ात होने लगी। दोस्ती का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ, और बड़ी बहन का स्नेह भी मिला। उसके बाद उनकी हर कहानी मैंने बड़े शौक़ से पढ़ी और उन पर उनसे अच्छी ख़ासी बातचीत भी हुई।
एक बात बिल्कुल साफ़ है कि अनिल प्रभा कुमार बेहद सावधान कहानीकार हैं। वे बहुत सोच-समझकर, रुक-रुककर लिखती हैं। जब तक कहानी से पूरी तरह संतुष्ट न हो जाएँ, वे उसे प्रकाशित नहीं करातीं—चाहे उसे मंज़र-ए-आम पर आने में कितना ही समय क्यों न लग जाए। यही वजह है कि पिछले चौदह वर्षों में उनकी कहानियों के सिर्फ़ तीन संग्रह प्रकाशित हुए हैं। फिर भी उन्होंने हिंदी लेखकों में अपनी अलग पहचान बना ली है। उनकी कहानियाँ भारत की लगभग सभी प्रमुख हिंदी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, और हिंदी पाठक उनकी अगली कहानियों के इंतज़ार में रहते हैं।
‘सितारों में सूराख़’ अनिल प्रभा कुमार का पहला उपन्यास है। यह हिंदी और उर्दू या शायद किसी भी दक्षिण एशियाई भाषा में बिल्कुल अनोखी और अद्वितीय कृति है। इसे मुझे कई बार पढ़ने का अवसर मिला। इसकी पहली प्रूफ़रीडिंग मैंने भीगी आँखों से की। उपन्यास में ऐसा डूब गया कि ग़लतियाँ पकड़ने का होश ही नहीं रहा। प्रूफ़रीडिंग असल में दूसरी बार पढ़ने से शुरू हुई। इस बार भी आँखें भीगती रहीं। अनुवाद के दौरान भी यही कैफ़ियत रही।
विषयवस्तु की दृष्टि से इस उपन्यास को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है। इसका केंद्रीय विषय है अमेरिका में गन-कल्चर व मास-शूटिंग, और उसके भयावह परिणाम। अमेरिका में आए दिन मास-शूटिंग की ख़बरें आती रहती हैं। कभी किसी स्कूल में बच्चों पर अंधाधुंध गोलियाँ चला दी जाती हैं, कभी किसी सिनेमा हॉल में, या किसी और सार्वजनिक जगह पर। कोई साल ऐसे हादसों से ख़ाली नहीं जाता। देश में थोड़ी देर के लिए हाहाकार मचता है और फिर अगली गोलीबारी तक शांति छा जाती है। बहुत बड़ी संख्या में महिलाएँ और पुरुष हथियार-विरोधी आंदोलनों के ज़रिये शस्त्र-लाइसेंसों और उससे संबंधित क़ानूनों में सख़्ती लाने की आवाज़ उठाते रहे हैं, लेकिन लगता है कि हथियार रखने के अधिकार के समर्थकों और गन कंपनियों के हितों के सामने ये आवाज़ें बार-बार कमज़ोर पड़ जाती हैं। नतीजतन अमेरिका में आसानी से हथियार उपलब्ध हैं और मास-शूटिंग का सिलसिला जारी है। गोलीबारी की इन घटनाओं से ज़्यादातर महिलाएँ और बच्चे प्रभावित होते हैं।
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उपन्यास के मुख्य पात्र हैं भारतीय मूल की जसलीन (जैस्सी), उसके पति जय और उनकी युवा बेटी चिन्मया (चिन्नी)। चिन्नी का दोस्त समर, समर की अम्मी आयशा और समर के अब्बू जावेद ख़ान भी अहम पात्र हैं। ये पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी हैं। जय एक मीडिया संस्थान में काम करते हैं। न्यूयॉर्क के सबवे स्टेशन में एक व्यक्ति जय की कनपटी पर रिवॉल्वर रखकर उन्हें लूट लेता है। जय भय, शक और बेयक़ीनी से तीव्र मानसिक उधेड़बुन में मुब्तला हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनके भय का इलाज रिवॉल्वर है। रिवॉल्वर ही उनकी और उनके परिवार की हिफ़ाज़त कर सकता है। दूसरी तरफ़ चिन्नी के स्कूल में मास-शूटिंग होती है। बहुत से बच्चे मारे जाते हैं और बहुत से घायल होते हैं। चिन्नी के साथी भी। गोली का शिकार होने वालों में चिन्नी भी हो सकती थी। यह विचार जैस्सी के दिल में हलचल मचा देता है। और शुरू होता है उसकी अपनी अस्मिता और अस्तित्व की तलाश का सिलसिला।
जैस्सी एक हथियार विरोधी संगठन की सक्रिय कार्यकर्ता बन जाती है। फिर संगठन के तहत आंदोलन की ज़िम्मेदारियों का दौर— गन-कल्चर के बारे में शोध और अध्ययन, ढीले गन क़ानूनों और हथियार रखने की आज़ादी और मास-शूटिंग के कारण होने वाली मौतों के आँकड़े, गन-कल्चर और पितृसत्तात्मक मानसिकता में संबंध, महिलाओं और ख़ासतौर पर माताओं और बच्चों पर गन-कल्चर का प्रभाव, मीटिंग्स, भाषण, जनसंपर्क, जलूस और रैलियों की तैयारी और अंत में एक विशाल रैली।
अनिल प्रभा कुमार ने बहुत शोध करके और अत्यंत संवेदनशील शैली में यह उपन्यास लिखा है। हत्या के तात्कालिक प्रभाव और उसका बाहरी रूप तो सब को दिखता है, लेकिन लेखिका ने गहरी खोज और अध्ययन के ज़रिये इसके पीछे छिपी बातों पर रोशनी डाली है—हथियारों की आसान उपलब्धि, मास-शूटिंग और उसके विभिन्न कारण, आपसी झगड़ों में हत्याओं व आत्महत्याओं में हथियारों की आसान उपलब्धि की भूमिका, शस्त्र-विरोधी आंदोलनों और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले विभिन्न संगठनों के आपसी संबंध, गन-कल्चर को जीवित रखने के पीछे हथियार कंपनियों की शक्ति और प्रभाव, हथियार रखने के पक्ष में दी जाने वाली दलीलें और तर्क, हथियार-विरोधी और हथियार-समर्थक जुलूस व रैलियाँ, किसी आंदोलन या जुलूस के पीछे की सोच, शोध, अध्ययन, योजना, संपर्क, आंदोलनों का नेतृत्व करने वाली महिलाओं के संघर्ष, उनकी क़ुर्बानियाँ, तैयारियाँ और जोश—वग़ैरह। कुल मिलाकर, अनिल जी ने गागर में सागर भर दिया है।
उपन्यास के ये तत्व जो शोध और अध्ययन का तक़ाज़ा करते हैं, जिनका हक़ अनिल प्रभा कुमार ने बख़ूबी अदा किया है। लेकिन उनके सुलझे हुए, संतुलित और कौशल पूर्ण लेखन की तारीफ़ किए बिना रहा नहीं जाता। उन्होंने इन जानकारियों को बोझिल नहीं होने दिया। वे इन कच्चे मालों से एक ऐसी कहानी रचती हैं जो हमें सिर्फ़ जानकारी नहीं देती, बल्कि हमारी भावनाओं और संवेदनाओं को गहराई तक छूती है। पढ़ते समय कहीं रुकावट या बोझिल पन का एहसास नहीं होता। उपन्यास बेहद रवानी के साथ आगे बहता जाता है। दरअसल यह एक ही बार में पढ़ा जाने वाला उपन्यास है।
हिंदी आलोचक दिनेश श्रीनेत ने बहुत मुनासिब बात कही है:
“अनिल प्रभा लंबे समय से अमेरिका में हैं, इसलिए अमेरिकी रहन-सहन से जुड़े छोटे-छोटे ब्योरों से उपन्यास काफ़ी वास्तविक और जीवंत हो उठा है। हालाँकि उनका नैरेशन बाहरी दुनिया से ज़्यादा भीतरी दुनिया की हलचलों को पकड़ता है। वर्णन की शैली में एक क़िस्म की स्थिरता है। बाहरी दुनिया को दिखाते-दिखाते वे भीतर की तरफ़ लौट जाती हैं।”
मुख्य विषय के अलावा यह उपन्यास कई और विषयों को भी छूता है। हालाँकि गन-कल्चर और मास-शूटिंग मूल रूप से अमेरिकी समाज की समस्या है, लेकिन जैसा कि ऊपर ज़िक्र हुआ है, उसकी प्रस्तुति जिन पात्रों के माध्यम से हुई है, उनमें सबसे प्रमुख पात्र भारतीय मूल के हैं, और दो-तीन पाकिस्तानी पात्र भी हैं। केंद्रीय विषय से जुड़े जो उप-विषय हैं, मेरे विचार में वे रचनात्मक दृष्टि से बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं।
मुख्य पात्रों की सोचों, भावनाओं, पूर्वाग्रहों, संघर्षों और मानसिक उलझनों के ताने-बाने से बुनकर इस उपन्यास का केंद्रीय विषय तैयार किया गया है। पितृसत्तात्मक मानसिकता, वैवाहिक रिश्ते की असमानता और जटिलता, जसलीन का एक स्त्री के रूप में अपने अस्तित्व और पहचान की तलाश, किशोरावस्था की दहलीज़ पर खड़े चिन्नी और समर की दोस्ती, आकांक्षाएँ, मासूमियत, और अंखुआता प्रेम। भारतीय मूल के माता-पिता की अमेरिका में पलने-बढ़ने वाली युवा पीढ़ी की सोच और मूल्यों में अंतर और टकराव और उसका दर्द, अमेरिका में वर्षों रहने के बाद भी भारतीय प्रवासियों का यहाँ के कल्चर से सतही जुड़ाव और अपने दिल में छोटे-छोटे भारत को संजोये रखना, भारत विभाजन की कड़वी यादें, सात समुंदर पार इस दूर-देश अमेरिका में भारतीय और पाकिस्तानी संस्कृतियों की समानताएँ और उनसे उपजने वाली आत्मीयता, निकटता, दोस्ती, और सामंजस्य, अमेरिकी समाज में अति-भौतिकता, बाहरी चमक-दमक, अपार शक्ति और चकाचौंध के पीछे यहाँ के लोगों की टूटन और अकेलापन, और नस्लवाद। मीडिया संस्थानों और उसमें काम करने वालों की हिंसा की ख़बरों के प्रति संवेदन हीनता, हिंसा को भी केवल आर्थिक लाभ की नज़र से देखना। वग़ैरह। कुल मिलाकर गागर में सागर! ये सब इस रचना के वो सशक्त, जीवंत और संवेदनशील तत्व हैं जिनके कारण यह उपन्यास ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। यही वो विशेषताएँ हैं जिन्होंने ख़ास तौर पर मुझे इसका अनुवाद करने के लिए प्रेरित किया।
उपन्यास में इन तत्वों को समझने के लिए लेखिका को किसी विशेष शोध या अध्ययन की ज़रूरत नहीं थी। जिन रंग-बिरंगे सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने से ये पात्र बुने गए हैं, लेखिका उनसे अच्छी तरह परिचित हैं। उसी ताने-बाने से उनका व्यक्तित्व भी बुना हुआ है। इसलिए ये पात्र सीधे दिल को छूते हैं। इन पात्रों के आपसी रिश्ते, रोज़मर्रा की भावनाएँ और संवेदनाएँ, उपन्यास में उप-विषय अर्थात मुख्य विषय के सहायक के रूप में होते हुए भी, बेहद शक्तिशाली व प्रभावकारी हैं।
विषयों की विविधता को देखते हुए यह आशंका होना स्वाभाविक है कि इतने बड़े महासागर को गागर में कैसे भरा जा सकता है। यहीं पर लेखिका की रचनात्मक कुशलता का क़ायल होना पड़ता है। इस संक्षिप्त उपन्यास में अनिल प्रभा कुमार ने एक ऐसा संसार क़ैद किया है जो हिन्दी-उर्दू पाठकों के लिए शायद बिल्कुल नया और अद्वितीय हो। उपन्यास का कथानक सादा और ग़ैर-जटिल है। कहानी संतुलित और सहज गति से अपनी मंज़िल की ओर बढ़ती है। इसकी भाषा सरल, सादी, प्रवाहपूर्ण और सहज है और रोज़मर्रा की हिंदी है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि इसकी भाषा “हिन्दुस्तानी” है। लेकिन यह सरलता, सादगी और सहजता, मेहनत और साधना से अर्जित की गई है। हालाँकि कभी-कभी अभिव्यक्ति काव्यात्मकता का परिधान धारण कर लेती है, और भाषा सामान्य स्तर से ऊपर उठ जाती है। उपन्यास को पढ़ने में किसी रुकावट का एहसास नहीं होता। जानकारी बोझ नहीं लगती। शैली अत्यंत सधी हुई है! उनकी कहानियों की शैली की भी यही विशेषता है। लेखिका को एक बात में विशेष दक्षता हासिल है। वे अपनी रचना के किसी घने क्षण की संभावना को पहचानकर ऐसा वाक्य कह जाती हैं कि वह एक मुहावरे या कहावत की तरह वज़नदार और असरदार हो जाता है। ऐसे वाक्य उपन्यास में जगह-जगह मिलेंगे— उनकी कहानियों में भी।
उपन्यास हाथ में उठाने के बाद ख़त्म किए बिना रखने का मन नहीं होता। अंदाज़-ए-बयान इतना संवेदनशील, प्रभावी और करुणामय है कि उपन्यास के आरंभ में ही आँखें भीगनी शुरू होती हैं तो अंत तक सूख नहीं पातीं।
अनुवाद मुकम्मल होने पर सबसे पहले अनिल प्रभा कुमार जी का हार्दिक आभार, जिन्होंने मुझे अनुवाद की अनुमति दी और जब-जब आवश्यकता पड़ी, समय देकर अनेक बातों की स्पष्टता की। शादाब साहब का धन्यवाद कि उन्होंने इसके प्रकाशन का दायित्व लिया। दोस्तों का आभार, जो मेरी हर बात को अनुवाद की ओर मोड़ देने की आदत को हँसते-ख़ुशी सहन कर लेते हैं। अपनी पत्नी शमा, बेटियों अशा और शोआ और अपने सभी छोटे-बड़ों तथा मित्रों की ख़ुशी, सेहत और शांतिपूर्ण, ज़िंदगी की कामना करता हूँ। आमीन!
( डॉक्टर आफ़ताब अहमद , सीनियर लेक्चरर, हिंदी-उर्दू भाषा, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क )

