Friday, July 1, 2022
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एक बड़े बदलाव के मुहाने पर पंजाब

लगता है पंजाब की सत्ता, पंजाब की अर्थव्यवस्था, वहाँ की राजनीति पर लंबे समय से कब्जा जमाई ताकतों को पंजाब की जनता का यह नया मूड पसंद नहीं आया है. पंजाब के लोग आज भी जिस नए बदलाव की ओर देख रहे रहे हैं, ये ताकतें पंजाब को वापस उससे भी ज्यादा अंधेरी सुरंग की ओर धकेलना चाहती हैं. दिल्ली में भाजपा के नक्शेकदम पर चलने वाली पंजाब की नई आप सरकार के सत्ता में आने के बाद पंजाब में घट रही एक के बाद एक घटनाएं पंजाब की राजनीति के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.
29 अप्रैल को पटियाला में संघ परिवार ने सांप्रदायिक दंगा प्रायोजित कराया. 13 मई को मोहाली में पंजाब पुलिस के खुफिया मुख्यालय पर राकेट प्रोपेल्ड ग्रेनेड हमला हुआ. 30 मई को मानसा में कांग्रेस उम्मीदवार रहे पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की जघन्य हत्या हो गई, 30 मई को ही लुधियाना में भाकपा माले लिबरेशन के कार्यालय पर हमला कर उसका सीसीटीवी कैमरा भी तोड़ दिया गया. यह घटनाएं बता रही हैं कि राज्य को अस्थिरता, साम्प्रदायिक हिंसा, संगठित अपराध और ड्रग्स की ओर धकेलने की साजिशें बड़े पैमाने पर रची जा रही हैं. राजनीतिज्ञ और माफिया गठजोड़ ने पंजाब में जीवन इतना असुरक्षित बना दिया है कि अकाल तख्त के जत्थेदार को अपील करनी पड़ रही है कि अपनी सुरक्षा के लिए लोग लाइसेंसी हथियार रखें. मगर भगवंत मान सरकार फिलहाल इन सब के आगे बेबस नजर आ रही है।
दूसरी तरफ राज्य में दलित उत्पीड़न की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. खबरों के अनुसार 24 मार्च को संगरूर में एक दलित महिला को थाने में बंद कर निर्वस्त्र कर उसका उत्पीड़न किया गया. मानसा जिले के उद्दत भगतसिंह गाँव में दलित बिट्टा सिंह को पेड़ से बांध कर पीटना जैसी कुछ दलित उत्पीड़न की घटनाएं घटी हैं. पंजाब में एक तरफ सिख-गैर सिख, जट्ट-दलित विभाजन की राजनीति पर सवार होकर और दूसरी तरफ बढ़ती हिंसा व राष्ट्रीय सुरक्षा का हल्ला मचा कर भाजपा-आरएसएस अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने पर जुटी है. नवी नवेली आप सरकार के स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला को खुद उनके मुख्यमंत्री ने भ्रष्ट बताकर न सिर्फ मंत्रीपद से बाहर किया है, बल्कि जेल में भी डाल दिया है. आखिर इस बात का जवाब तो मुख्यमंत्री भगवंत मान को देना ही होगा कि जो भ्रष्ट विधायक उनकी सरकार से बाहर कर दिया गया है, वह अगले पाँच वर्षों तक मानसा विधानसभा की जनता का प्रतिनिधि क्यों बना रहेगा?
पंजाब आज एक बड़े राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है. हाल में सम्पन्न विधानसभा चुनावों में पंजाब के लोगों ने इसकी ओर इशारा कर दिया है. पंजाब के लोगों ने पंजाब की परंपरागत राजनीति और परम्परागत राजनीतिक पार्टियों को नकार कर इस बार एक ऐसे दल को सरकार में बिठाया है, जिसका पंजाब के लोगों के संघर्ष से दूर का भी रिस्ता नहीं है. यह तो होना ही था.
पंजाब एक कृषि प्रधान राज्य है. उसकी आर्थिक रीढ़ अब भी खेती ही है. इस लिहाज से पंजाब की राजनीति में किसान जत्थेबंदियों का बड़ा दखल होना चाहिए था. पर कई वर्षों से पंजाब में किसान जत्थेबंदियों के संयुक्त रूप से चलने वाले सभी आंदोलन राज्य में किसी राजनीतिक बदलाव के लिए नहीं, बल्कि किसानों को कुछ राहत दिलाने और अपनी जत्थेबंदियों की मोलभाव की ताकत बढ़ाने के लिए होते रहे हैं. इसी लिए पंजाब की सत्ताधारी पार्टियों और यहाँ की राजनीति को नियंत्रित करने वाली ताकतों को इन आंदोलनों और आंदोलन करने वाली किसान जत्थेबंदियों से कोई खास दिक्कत नहीं होती है.
उदाहरण के लिए आप पंजाब में कार्यरत किसानों की सबसे बड़ी जत्थेबंदी बीकेयू उगराहां की राजनीतिक-कार्यनीतिक दिशा को देखें! देश भर में इस संगठन की छवि एक लड़ाकू और रेडिकल कम्युनिस्ट की है. यह स्वतंत्र रूप से राज्य में लाखों किसानों-महिलाओं की गोलबंदी और लंबे मोर्चे लगाने में माहिर है. यह संगठन खुद को एक क्रांतिकारी संगठन मानते हुए चुनावी प्रक्रिया से दूर रहने की बात करता है. पर जब भी पंजाब में चुनाव आते हैं, इस संगठन के लोग सत्ता की लहर पर चढ़ी राजनीतिक पार्टी का झंडा उठा कर उसके प्रचार में जुट जाते हैं. जब अकालियों की लहर थी तब ये अकालियों के साथ थे, जब कांग्रेस की लहर थी तब ये कांग्रेस के लिए प्रचार किए, इस चुनाव में आम आदमी पार्टी की लहर थी तो ये आम आदमी पार्टी के प्रचार में जुटे थे.
इस चुनाव में पंजाब के गांवों में बीकेयू उगराहां के समर्थकों के घरों पर एक झंडा आम आदमी पार्टी का और एक झंडा बीकेयू उगराहां का आज भी खुली आँखों से देखा जा सकता है. इस तरह चाहे यह संगठन कितना भी विशाल व लड़ाकू हो, पंजाब में सरकार बनवाने में यह अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सरकार के साथ एक अघोषित संबंध में बंधा रहता है. इसी लिए चाहे उनके आंदोलन कितने भी बड़े हों, उससे सरकार को कोई भी दिक्कत नहीं होती है. बल्कि चुनावों में अपनी पार्टी के पक्ष में उस संगठन को प्रभावित करने के लिए ये सत्ताधारी पार्टियां अपने ग्रामीण सामाजिक आधार को उस यूनियन में योजनाबद्ध रूप से शामिल भी कराती हैं.
यही हाल खुद को क्रांतिकारी कम्युनिस्ट बताने वाले उन तमाम संगठनों व वाम पार्टियों की भी है, जो चुनाव के समय अप्रभावी बायकाट या नोटा का नारा देकर या तटस्थता का राग अलाप कर अपने सामाजिक आधार को सत्ताधारी दलों के लिए खुले मैदान में छोड़ देते हैं. इनमें एक हिस्सा ऐसे संगठनों का भी है, जो चुनावों में कम वोट पाने के कारण खुद पर से भरोसा खो चुके हैं. उन्हें लगता है कि वे अपनी पहचान छुपा कर या किसी अन्य सत्ता के दावेदार के सहारे ही आगे बढ़ पाएंगे. ऐसे सभी संगठन सत्ता या सत्ताधारी ताकतों के लिए वर्तमान या भविष्य की कोई चुनौती नहीं होते हैं. सत्ता और सत्ताधारी दल वैकल्पिक राजनीति की उन्हीं धाराओं को अपने लिए चुनौती मानते हैं, जो या तो चुनावी राजनीति के मैदान में उन्हें चुनौती दे रहे हों या हथियाबन्द लड़ाई में उतरे हों.
इस चुनाव में ठीक यही हुआ. दो वर्ष पूर्व से पंजाब में चल रहे ऐतिहासिक किसान आंदोलन, ग्रामीण मजदूरों का आंदोलन और माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के खिलाफ गरीब महिलाओं का आंदोलन, इन तीनों संयुक्त आंदोलनों ने पंजाब में बदलाव का जो वातावरण तैयार किया था, उसकी फसल काटने के लिए इस आंदोलन की कोर ताकतें तैयार ही नहीं थी. बलबीर सिंह राजोवाल के नेतृत्व में किसान आंदोलन से जो विकल्प बनाने की कोशिशें हुई, उसे सफल नहीं होना था. क्योंकि इन आंदोलनों की कोर ताकतें पंजाब में कार्यरत कम्युनिस्ट संगठन ही थे, जो चुनावी विकल्प के निर्माण की दिशा से काफी दूर अपनी पुरानी ऊपर लिखित स्थितियों में ही खड़े थे. ऐसे में जब पंजाब ने बदलाव का मन बना ही लिया था, तो पंजाबियों के सामने परम्परागत राजनीतिक दलों के नकार के बाद आम आदमी पार्टी के अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं था. और उन्होंने नई स्थितियों में वही निर्णय लिया.
पर आप की सरकार पंजाब में इस बदलाव  की आकांक्षा का संक्रमण काल है. पीछे से भाजपा के खतरनाक फासिस्ट पंजों की आहट सुनाई दे रही है. भाजपा-आरएसएस का पंजाब में बढ़ना सिखों के एक हिस्से में धार्मिक असुरक्षा को बढ़ा रहा है जो फिर से खालिस्तान की मांग का आधार बनेगा. क्योंकि आरएसएस सिख, बौद्ध, जैन धर्मों को अपने हिंदुत्व का अंग बताकर हिंदू धर्म में ही समाहित करना चाहता है. अब पंजाब की वामपंथी ताकतों के सामने यह चुनौती है कि वे आप सरकार के खिलाफ पंजाब में स्वाभाविक राजनीतिक विकल्प बनने की तरफ मजबूत कदम बढ़ाएं तथा गुरु नानक देव, गदरी बाबाओं और भगतसिंह की इस क्रांतिकारी धरती में फासिस्ट भाजपा के प्रवेश के सभी रास्ते बंद कर दें.
पंजाब और पंजाबियों का मिजाज अगर किसी राजनीतिक धारा के सबसे करीब है, तो मैं कह सकता हूँ वह धारा सिर्फ और सिर्फ कम्युनिस्ट धारा ही है. गुरु नानक देव जी ने जो सबसे बड़ी सीख अपने अनुयायियों को दी, वह बिना किसी भेदभाव के मानवता की सेवा करना और दमनकारी सत्ता के खिलाफ सीना तान कर खड़ा होना है. क्या कम्युनिस्ट इससे कुछ अलग करते हैं? नहीं! कम्युनिस्ट भी पूरी दुनिया में शोषित उत्पीड़ित जनता के पक्ष में दमनकारी सत्ताओं के खिलाफ सीना तान कर लड़ते हैं. गुरु नानक देव ने जिस सामूहिक लंगर की व्यवस्था को स्थापित किया, कम्युनिस्टों का कम्यून सिस्टम उसका और विकसित रूप है. दसवें गुरु गोविंद सिंह के शिष्य बंदा बहादुर ने गुरु के आदेश पर जिस पहले किसान राज्य की स्थापना की, उसमें जमीन पर काम करने वाले किसानों को जमीन का मालिकाना हक दिया गया. आजादी के लिए कुर्बानी देने वाले ज्यादातर गदरी बाबा और शहीदे आजम भगत सिंह पंजाब के थे और कम्युनिस्ट बने. आजादी की लड़ाई के साथ ही राजशाही और जागीरदारी के खिलाफ कम्युनिस्टों के नेतृत्व में पेप्सू का ऐतिहासिक मुजारा किसान आंदोलन चला. अभी हाल में दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने वाले कारपोरेट विरोधी ऐतिहासिक किसान आंदोलन में भी पंजाब की अगुआ भूमिका यहां कम्युनिस्ट आंदोलन की उर्बरा जमीन की ओर इशारा करते हैं.
खालिस्तानी आंदोलन के बाद पंजाब में कम्युनिस्ट आंदोलन के भविष्य को लेकर कुछ निराशावादी लोग सवाल उठाते रहते हैं. खालिस्तानी आंदोलन के दौरान सीपीएम और सीपीआई का दमनकारी सरकार के साथ खड़ा होने से कम्युनिस्टों की हुई बदनामी को वे उसका कारण बताते हैं. पर ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि उस दौर में जब पंजाब खाड़कूओं के हमले और पुलिस-सेना के दमन के कारण एक बूचड़खाने में तब्दील किया जा रहा था, जब खाड़कूओं के दमन के नाम पर उनके परिवारों, गांव के आम नौजवानों, महिलाओं पर दमन ढाया जा रहा था, तब नक्सली लहर के क्रांतिकारी कम्युनिस्टों ने ही पीड़ित पंजाबी जनता के साथ खड़े होने का साहस दिखाया था. 90 का वह दौर मुझे याद है, जब पंजाब के गांवों में सेना, पुलिस और खाड़कुओं के भय से कोई भी राजनीतिक पार्टी और उनके नेता जाने का साहस नहीं करते थे. उस दौर में भी खाड़कुओं की गोली और सेना, पुलिस के भारी दमन के बीच यही नक्सली लहर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पंजाब के गांवों, शहरों में सीना ताने जनता के साथ खड़े रहे. उन्होंने शहादतें दी, दमन झेला, जेलों में रहे, पर दमनकारी सत्ता का विरोध करते हुए, खालिस्तानियों से असहमति जताकर गदरी बाबाओं, शहीद भगत सिंह की परंपरा को पंजाब में आगे बढ़ाया.
प्रख्यात नाटकार और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट गुरुशरण सिंह, क्रांतिकारी कवि अवतार सिंह पाश उस दौर के वे प्रतिनिधि नक्सली लहर के कम्युनिस्ट थे, जिन्होंने अपने नाटक, गीत, कविता से लोगों को जगाया और संघर्ष की मशाल जलाए रखी. नक्सली लहर से जन्मी पार्टी भाकपा माले लिबरेशन के संस्थापकों में से एक प्रमुख कामरेड हाकिम सिंह समाऊं जैसे बहादुर नेता ने थानों से निर्दोष बुजुर्गों, महिलाओं, नौजवान, नवयुवतियों को पुलिस दमन से छुड़ाने की बहादुराना लड़ाइयों का नेतृत्व किया और भारी पुलिस दमन झेला. अवतार सिंह पाश सहित दर्जनों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता खाड़कूओं की गोली का शिकार बन शहादत प्राप्त किये और सैकड़ों उनकी हिट लिस्ट में रहे. ऐसे निराशावादी लोगों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ब्लू स्टार ऑपरेशन और 1984 के दिल्ली सिख कत्लेआम के न धुलने वाले दाग के बावजूद वही कांग्रेस पंजाब की सत्ता में पुनर्वापसी करती रही. यह इस बात को साबित करता है कि पंजाब का मुख्य मिजाज अलगाववादी धारा नहीं बल्कि राष्ट्र की मुख्य धारा में अगुआ भूमिका निभाना है. राष्ट्र की मुख्य धारा में पंजाब की यह अगुआ भूमिका सभी सिख गुरुओं के बाद गदरी बाबाओं, शहीदे आजम भगतसिंह, शहीद उधमसिंह के बलिदान से लेकर वर्तमान कारपोरेट विरोधी किसान आंदोलन में पंजाब के ही किसानों के सर्वाधिक बलिदान तक जारी है.
कश्मीर में संविधान की धारा 370 तथा 35A और राज्य के दर्जे को खत्म कर देश के संघीय ढांचे पर हमले का मुखर विरोध हो, देश भर में सीएए और एनआरसी विरोधी आंदोलनों में सड़क पर उतरी देश की लाखों मुस्लिम महिलाओं का साथ हो, भीमा कोरे गाँव और उत्तर पूर्वी दिल्ली के दंगों में साजिशन फँसाये गए नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, छात्र- वाम- जनवादी कार्यकर्ताओं की रिहाई का सवाल हो, म्यांम्यार की सेना से अपनी जान और इज्जत बचाकर शरण मांग रहे भूखे प्यासे रोहिंग्या मुसलमानों से सहानुभूति हो, कम्युनिस्टों, पंजाब के लोगों और अकाल तख्त ने लगभग एक ही स्थिति ग्रहण की. देश के संशाधनों को चंद कारपोरेट कम्पनियों को लुटाने का जमीनी प्रतिरोध भी किसानों द्वारा पंजाब की ही धरती से हुआ. आज जब देश के मीडिया का बड़ा हिस्सा देश व जनता के सवालों को छुपाता हुआ सत्ता की चाकरी में लगा है, तब जो चंद अखबार या मीडिया चैनल देश व जनता के सवालों को जगह दे रहे हैं, उसमें पंजाब के मीडिया का भी एक अच्छा हिस्सा है. पंजाब के बौद्धिक जगत की इसमें बड़ी भूमिका रही है. ऐसे और भी दर्जनों उदाहरण हैं, जो यह बताते हैं कि पंजाब और पंजाबियत का स्वभाव कम्युनिस्टों के ज्यादा करीब है और राष्ट्र और लोक धर्म निभाने में देश के किसी भी हिस्से से पंजाब ज्यादा आगे है. इस लिए पंजाब को चाहे कितनी भी अंधेरी सुरंग में धकेलने की कोशिश हो, पंजाब ने बड़े बदलाव का मन बना लिया है. पंजाब की राजनीति को अब वाम दिशा की जरूरत है. पंजाब में कार्यरत वामपंथी कतारें इसका संकल्प लें. इसी रास्ते पंजाब बचेगा और देश भी.
पुरुषोत्तम शर्मा
लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव हैं
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