लखनऊ। प्रसिद्ध कथाकार तथा ‘पहल’ के संपादक ज्ञानरंजन की स्मृति में 10 जनवरी को बलराज साहनी सभागार, कैसरबाग मेंआयोजित श्रद्धांजलि सभा में लखनऊ के साहित्यकारों व उनके संगठनों की ओर से श्रद्धांजलि दी गई तथा उनके अप्रतिम योगदान को याद किया गया।
ज्ञानरंजन का निधन बीते 7 जनवरी को जबलपुर में हुआ। वे सठोत्तरी पीढ़ी के कथाकार के रूप में ख्यात रहे हैं। घंटा, बहिर्गमन, पिता, फेंस के इधर और उधर, संबंध, अनुभव जैसी कालजई कहानियों की रचना की। उन्होंने ‘पहल’ पत्रिका का संपादन किया। साहित्यिक पत्रकारिता में उनका ऐतिहासिक योगदान है। लघु पत्रिका आंदोलन के दौरान 1973 में इसका प्रकाशन शुरू हुआ था। जहां अनेक पत्रिकाएं बंद हो गईं। लेकिन पहला का सफर 47 वर्षों तक जारी रहा। इसके कुल 125 अंक प्रकाशित हुए।

श्रद्धांजलि सभा में जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष कौशल किशोर ने ज्ञानरंजन को स्मरण करते हुए कहा कि वे सक्रियतावादी लेखक रहे हैं। उनकी भूमिका एक एक्टिविस्ट की है। वे सठोत्तरी पीढ़ी के अग्रणी कथाकार रहे हैं। कहानियों में आजादी के बाद के समाजिक यथार्थ को आधार बनाया तथा पारंपरिक कथा लेखन से अलग कहानी को नई भाषा दी। यहां यथार्थ को देखने की आधुनिक और प्रगतिशील दृष्टि मिलती है। अपने साहित्यिक जीवन के दूसरे चरण में उन्होंने ‘पहल’ पत्रिका के द्वारा प्रगतिशील आंदोलन को आगे बढ़ाया। यह पत्रिका उनके कथा लेखन का वैचारिक और सांस्कृतिक विस्तार है। साहित्य-समाज में उनकी केंद्रीय उपस्थिति रही है और आज जब वे नहीं है फिर भी उनकी उपस्थिति महसूस की जाएगी।
जनवादी लेखक संघ के महासचिव नलिन रंजन ने कहा कि ज्ञानरंजन हिंदी साहित्य के विशिष्ट कथाकार और सफल संपादक के रूप में हमेशा याद किए जाएँगे। अपने दौर के कहानीकारों में वे सबसे अलग और विशिष्ट थे। ‘घंटा’, ‘बहिर्गमन’ और ‘पिता’ जैसी उनकी कहानियों ने उन्हें अमर बनाया। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से उस दौर के गद्य को भी विशिष्टता दी। मध्यवर्ग की नई पीढ़ी को उन्होंने अपनी कहानियों में सशक्त ढंग से अभिव्यक्त किया है। वे सामाजिक व्यवस्था के विभेदीकरण को पहचानने वाले कथाकार थे। वे उस विभेदीकरण के खिलाफ खड़ा होकर लड़ने वाली ताकतों का मजबूत होना जरूरी मानते थे।

प्रगतिशील लेखक संघ लखनऊ की अध्यक्ष रीता चौधरी ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनका संघर्ष रचनात्मक के साथ वैचारिक था। पहल के द्वारा न सिर्फ नये लेखकों को मंच दिया बल्कि विश्व साहित्य से हिंदी समाज को जोड़ने का काम किया। उन्होंने कहानियां 25 ही लिखी लेकिन वे हमारे आजादी के बाद के यथार्थ का आईना हैं।
इस मौके पर इप्टा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राजेश श्रीवास्तव व महामंत्री शहजाद रिज़वी, डॉ राही मासूम रज़ा एकेडमी से भगवान स्वरूप कटियार, भाकपा से कामरेड परमानंद आदि ने भी अपनी शोक संवेदना व्यक्त की। लक्ष्मी कांत शर्मा ने उनके साथ बिताए चालीस साल की यादों को साझा किया। अवन्तिका सिंह ने कहा कि ज्ञान जी कहते थे कि मशहूर लेखक छोटे शहर से निकलते हैं।

कार्यक्रम का संचालन प्रलेस लखनऊ की सचिव इरा श्रीवास्तव ने किया। आरम्भ में ज्ञानरंजन के चित्र पर पुष्पांजलि की गई तथा आखिर में दो मिनट का मौन रखकर सभी ने श्रद्धा-सुमन अर्पित किया।

