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इलेक्टोरल बॉन्ड : अनियमित और असीमित कॉर्पोरेट घूसखोरी का सबसे बड़ा खेला

15 फरवरी 2024 का दिन भारत के चुनावी इतिहास का यादगार दिन बन गया जब देश के उच्चतम न्यायालय की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से आदेश पारित कर मायावी चुनावी बाॅन्ड की हवा निकाल दी, उसे असंवैधानिक घोषित कर दिया। यह बाॅन्ड मायावी इस अर्थ में था कि साफ तौर पर रिश्वतखोरी दिखायी दे रही थी पर यह रिश्वतखोरी नहीं थी। बड़े से बड़ा चन्दा दीजिये और सरकार से मनमाफिक काम करवाइये और काॅलर सफेद भी रखिये, कोई धब्बा नहीं। यह योजना वास्तव में हाल के वर्षों में सत्ता का सबसे नंगा नाच था। उच्चतम न्यायालय का यह फैसला लोकतंत्र में जनाधिकारों के पक्षधर लोगों के लिये उत्साहवर्धक होगा, खासतौर पर विशाल कारपोरेट ताकतों के खिलाफ़ आम आदमी के जद्दोजहद के संदर्भ में।

सच है कि राजनीतिक पार्टी चलाने के लिये धन की आवश्यकता होती है और चुनावों में तो अतिरिक्त रूप से इसकी जरूरत बढ़ जाती है। पर इसका यह अर्थ तो नहीं होता कि कम्पनियों से धनउगाही करके चुनाव जीते जाएं और बाद में उन्हें लाभ पहुँचाने के लिये जरूरी-गैर जरूरी कदम उठाये जाएं। पहले राजनीतिक दलों के सामान्य क्रियाकलाप उनके सदस्यता-शुल्क से चलते थे और चुनाव जैसे बड़े खर्चे के लिये लोगों से चन्दा लिया जाता था। आज भी बहुत सी संस्थायें अपने खर्चे के लिये चन्दे पर ही निर्भर रहती हैं। यह भी सच है कि संसद या विधान-सभा के चुनावों का क्षेत्र चूँकि बहुत बड़ा होता है, इसलिये अपने मतदाता से सम्पर्क करने के लिये राजनीतिक दलों को अपेक्षाकृत अधिक धन की आवश्यकता होती है। तो इसके लिये हमारे कानूनों में पर्याप्त व्यवस्था पहले से ही थी। व्यवस्था यह थी कि –

1- वो कम्पनियाँ जो तीन साल से अधिक से चल रही हों वे अपने पिछले तीन साल के औसत शुद्ध मुनाफे के 7.5 प्रतिशत से कम की धनराशि किसी राजनीतिक दल को दान कर सकतीं थीं पर इसका विस्तृत विवरण उन्हें अपने शेयरधारकों से साझा करना पड़ता था।

2- कानूनी रूप से राजनीतिक दलों के लिये यह आवश्यक था कि वे 20,000 रुपये से अधिक प्राप्त प्रत्येक अनुदान का विस्तृत विवरण चुनाव आयोग के समक्ष प्रस्तुत करें।

जाहिर है कि इसके चलते न तो बड़े कारपोरेट राजनीतिक पक्षधरता की लालच में किसी दल की झोली में अकूत सम्पदा उड़ेल पा रहे थे और न ही कोई दल चुनाव में बेतहाशा बहाने के लिये किसी कारपोरेट से बड़ी धनराशि की उगाही कर पा रहा था। इस तरह की रिपोर्ट भी आ रही थीं कि विस्तृत विवरण देने से बचने के लिये कम्पनियाँ 19-19 हजार रुपये के कई अनुदान अपने खातों में दिखा रही थीं। पर यह वास्तव में बहुत झंझटिया काम था।

अनुदानदाताओं और उनके लाभार्थियों को इस झंझट से छुटकारा दिलाने का बीड़ा उठाया 2017 में, तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली ने। पहली फरवरी 2017 को उन्हें बजट प्रस्तुत करना था। उन्होंने उसके ठीक 4 दिन पहले, 28 जनवरी दिन शनिवार को
भारतीय रिजर्व बैंक को एक पत्र लिखकर इलेक्टोरल बाॅन्ड पर उसकी टिप्पणी आमंत्रित की। 29 जनवरी को रविवार था, छुट्टी का दिन, फिर भी रिजर्व बैंक ने सक्रियता दिखाते हुये 30 जनवरी को अपनी टिप्पणी प्रस्तुत कर दी। बैंक ने अपनी टिप्पणी में बाॅन्ड को लेकर अपनी गम्भीर चिन्तायें व्यक्त कीं और कहा कि इससे गैरकानूनी वित्तीय गतिविधियों में इज़ाफ़ा होगा, इसमें पारदर्शिता की कमी है और इससे गैरकानूनी धनदोहन की सम्भावना बढ़ जायेगी। पर सरकार ने इन टिप्पणियों को दरगुजर कर दिया और एक  फरवरी को इलेक्टोरल बाॅन्ड योजना घोषित कर दी। इसके साल भर के भीतर ही 2 जनवरी 2018 को इसका गजट नोटीफिकेशन भी जारी कर दिया गया।

मोदी सरकार को पता था कि इस प्रकार का कोई विधेयक राज्य-सभा से पारित नहीं हो पायेगा क्योंकि वहाँ भाजपा का बहुमत नहीं था और इस विधेयक के चीर-फाड़ की पूरी गुंजायश थी, इसलिये इसे आरबीआई एक्ट में संशोधन के जरिये वित विधेयक 2017 के रूप में लोकसभा में बजट के साथ प्रस्तृत किया गया और पारित करा लिया गया। इस विधेयक के पारित होने के रास्ते में कम्पनी अधिनियम 2013, आयकर अधिनियम 1961, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और फाॅरेन कन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) 2010 के कुछ प्राविधान आड़े आ रहे थे, सो इनको भी संशोधित कर दिया गया। गर्ज यह कि सरकार इस विधेयक को पारित करने के लिये कटिबद्ध थी और इसके लिये हर उचित-अनुचित कदम उठाये गये। दिलचस्प यह है कि कारपोरेट फन्डिंग और चुनी हुयी सरकारों को गिराने और विधायकों/सांसदों के खरीद-फ़रोख़्त में सहायक कालेधन के लेनदेन के पुराने प्राविधानों को रद्द नहीं किया गया, उल्टे ऐसे कारोबार में दिन-ब-दिन बढ़ोत्तरी ही होती गयी।

वित्त विधेयक 2017 में एक प्राविधान यह भी किया गया कि पुरानी व्यवस्था के अन्तर्गत किसी व्यक्ति द्वारा अधिकतम 20,000 रुपये अनुदान की सीमा को घटाकर 2000 रुपये कर दिया गया। इस प्रकार पुरानी व्यवस्था में निम्न परिवर्तन हो गये –

1- व्यक्तिगत अनुदान की अधिकतम सीमा 2000 रुपये ही रह गयी।

2- इलेक्टोरल बाॅन्ड के आने से पिछले तीन साल के औसत मुनाफ़े का 7.5 प्रतिशत तक ही अनुदान किये जाने की अधिकतम सीमा निष्प्रभावी हो गयी।

3- इससे राजनीतिक दलों के लिये पॉलिटिकल फंडिंग की विस्तृत सूचना प्रस्तुत किये जाने की बाध्यता भी समाप्त हो गयी।

4- भारत में कार्यरत विदेशी कम्पनियों की सब्सिडियरी के जरिये प्राप्त अनुदान को वैध करार दिये जाने से चुनावों में विदेशी धन के प्रयोग में अब कोई बाधा नहीं रही।

इलेक्टोरल बाॅन्ड जारी किये जाने और इसका लाभ उठाने की समस्त प्रक्रिया के कुछ महत्वपूर्ण विन्दु निम्नवत थे –

1- ये बाॅन्ड भारतीय स्टेट बैंक की कुछ चुनी हुयी शाखाओं से ही एक वर्ष में केवल चार बार जारी किये जाने थे- जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्तूबर माह में। हर बार बिक्री की कुल अवधि 10 दिन की होनी थी, यानी साल में कुल 40 दिन।

2- ये बाॅन्ड बियरर प्रकृति के थे। बियरर चेक की तरह इनमें भी कोई नाम लिखने की व्यवस्था नहीं थी। ज़ाहिर है कि क्रेता का विवरण बैंक की उस शाखा के अतिरिक्त और किसी के पास नहीं होना था।

3- ये बाॅन्ड पाँच विभिन्न मूल्यवर्गों में जारी किये जाने थेः- रु0 1000, रु0 10,000, रु0 100,000, रु0 10,00,000 और रु0 1,00,00,000 के मूल्यवर्ग में ।

4- ये बाॅन्ड वही व्यक्ति या कम्पनी खरीद सकती थी जिसका के0वाई0सी0 और बैंक खाता नियमानुसार सत्यापित (वेरीफाइड) हो। इस खरीदी पर आयकर में छूट का भी प्राविधान था।

5- ये बाॅन्ड उसी राजनीतिक दल को दिये जाने थे जो चुनाव आयोग द्वारा मान्यताप्राप्त हो और उसे पिछले लोकसभा/विधानसभा चुनाव में कुल वाटों के एक  प्रतिशत से अधिक वोट मिले हों।

6- बाॅन्ड खरीद के 15 दिना के भीतर पानेवाले दल के लिये आवश्यक था कि वह इसे अपने खाते में जमाकर दे। यह अवधि बीत जाने पर इस बाॅन्ड का भुगतान किसी भी तरह सम्भव न था और यह धनराशि प्रधानमंत्री राहत कोष में जमा हो जानी थी। इसी 15 दिन की अवधि में बाॅन्ड का क्रेता यदि चाहे तो उसी बैंक में उसे जमा करके अपनी धनराशि वापस ले सकता था।

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के खर्चे बढ़ जाते हैं। इसको ध्यान में रखते हुये 7 नवम्बर 2022 को इलेक्टोरल बाॅन्ड स्कीम में संशोधन करते हुये बिक्री की अवधि में इस प्रकार बढ़ोत्तरी की गयी कि लोकसभा का चुनाव होने की
स्थिति में उसे 30 दिन और विधानसभा का चुनाव होने की स्थिति में 15 दिन और बढ़ा दिया जाय, इस प्रकार आवश्यकतानुसार बिक्री की अवधि 40/70/85 दिन भी हो सकती थी। गौरतलब है कि यह संशोधन उस समय किया गया जब गुजरात और हिमाचल प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव की तिथियाँ घोषित की जा चुकी थीं और दोनों राज्यों में आदर्श आचार संहिता लागू थी। यानी सरकार ने खुद आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन किया था।

अब जरा कुछ सरकारी आँकड़ों पर गौर किया जाय –

1- 5 फरवरी को सरकार ने लोकसभा में कहा कि इस योजना के लागू किये जाने से लेकर अब तक 30 बार में कुल रु0 16,518 करोड़ के बाॅन्ड जारी किये गये हैं।

2- वित्तीय वर्ष 2022-23 तक के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार जारी किये गये बाॅन्डों की कुल धनरााशि रु0 12,979 करोड़ थी, जिसमें से भाजपा को रु0 6,555 करोड़ और कांग्रेस को रु0 1,123.29 करोड़ (यानी भाजपा का लगभग 1/6) मिले और तृणमूल
कांग्रेस, बी0आर0एस0, बी0जे0डी0, डी0एम0के0 और वाई0एस0आर0सी0पी0 को कुल मिलाकर 350 करोड़ रुपये से कुछ अधिक ही मिल सके। ताज़ा आंकड़े आने दीजिये, यह फर्क निश्चित रूप से और बढ़ा दिखायी देगा। इस प्रकार चुनावी बाॅन्ड सत्तारूढ़ दलों के लिये कारपोरेट फंडिंग का एक अनाम हथियार था और चूँकि अधिकांश राज्यों में भाजपा डबल इंजन की सरकार चला रही है इसलिये वही इसकी सबसे बड़ी लाभार्थी रही है।

3- ये बाॅन्ड विभिन्न मूल्यवर्गों में निर्गत किये जाने थे परन्तु जुलाई 2023 तक के उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार 94 प्रतिशत से अधिक बाॅन्ड तो सिर्फ एक करोड़ रुपये के मूल्यवर्ग वाले बिके और शेष 5 प्रतिशत से अधिक बाॅन्ड दस लाख रुपये मूल्यवर्ग के थे। छोटे मूल्यवर्ग के बाॅन्डों की कोई गिनती ही नहीं। इससे एक बात तो साफ है कि अनुदान केवल कम्पनियाँ ही देती हैं, कोई सामान्य हैसियत का व्यक्ति नहीं। यानी नियमों में ‘इंडीविजुअल’ का उल्लेख पाखण्ड के अलावा और कुछ नहीं है।

इन चुनावी बाॅन्डों के मुद्दे पर पहली जनहित याचिका अक्तूबर 2017 में दाखिल की गयी थी जिसमें केवल दो विन्दुओं को लेकर आपत्ति व्यक्त की गयी थीः-

1- बाॅन्ड के क्रेता और लाभार्थी के बारे में न तो किसी व्यक्ति को कोई जानकारी होने की कोई गुंजाइश  है और न ही चुनाव आयोग को। इसलिये किसी पार्टी के आय के स्रोत के बारे जानकारी पाना असम्भव हो गया।

2- इस योजना को वित्त-विधेयक के रूप में प्रस्तुत किये जाने से राज्यसभा में इसपर चर्चा नहीं हो सकी। इस प्रकार यह अधिकारों के विलगन के सिद्धान्त (डाॅक्ट्रिन ऑफ सेपरेशन ऑफ पावर) और सूचना के अधिकार का हनन है।

यह प्रकरण अभी भी लम्बित है।

15 फरवरी 2024 को जो निर्णय आया है उस मामले में एसोसियेशन फाॅर डेमोक्रेटिक राइट्स (एडीआर), गैर सरकारी संस्था काॅमन काॅज़, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी ), कांग्रेस की प्रतिनिधि जया ठाकुर, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, शादान फरासत
और प्रशान्त भूषण की याचिकाओं को एकसाथ मिलाकर सुना गया है। संविधान पीठ में स्वयं मुख्य न्यायाधीश डी0वाई0 चन्द्रचूड़, संजीव खन्ना, आर0 गवई, जे0बी0 पारदीवाला और मनोज मिश्र थे। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना को छोड़कर बाकी चार जजों के निर्णय खुद
मुख्य न्यायाधीश ने लिखे थे परन्तु न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने अपना निर्णय स्वयं लिखा था, फिर भी विषयवस्तु में दोनों एकसमान थे। इसीलिये इसे सर्वसम्मत निर्णय कहा जा रहा है।

इस मामले में पीठ के समक्ष विचारार्थ विन्दु निम्न थेः-

1- इस बॉन्ड का मूल दोष इसकी अपारदर्शिता है। दानदाता व्यक्ति या कम्पनी और लाभार्थी राजनीतिक दल दोनों की जानकारी केवल और केवल भारतीय स्टेट बैंक के पास रहती है। बैंक से कोई भी जानकारी सत्तारूढ़ दल को सहज ही प्राप्य है परन्तु किसी अन्य व्यकित या संस्था के लिये यह सुविधा नहीं है। इसलिये यह सूचना के अधिकार और इसीलिये यह मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 19(1)(ए) का भी उल्लंघन है।

2- कम्पनी कानून में संशोधन असंवैधानिक है। कालेधन पर अंकुश लगाने के नाम पर सूचना के अधिकार और इसीलिये मौलिक अधिकारों के अनुच्छेद 19(1)(ए) का भी का उल्लंघन अनुचित है।

3- किसी व्यक्ति या कम्पनी द्वारा किसी राजनीतिक दल को समर्थन या वित्तीय योगदान दिया जाना एक सीमा तक तो ठीक है पर उसके बाद ‘कुछ देने के बदले कुछ पाने’ (क्विड प्रो को) की सम्भावना बढ़ जाती है। बाॅन्ड खरीदने और उसे किसी दल को देने की कोई ऊपरी सीमा तय नहीं है।

4- राजनीतिक सम्बन्धों की गोपनीयता का अधिकार एक सीमा तक तो ठीक है पर इसका विस्तार यदि इस स्तर तक हो जाय कि वह सार्वजनिक नीतियों को ही प्रभावित करने लगे, तो यह उचित नहीं है।

5- इस योजना के तहत सत्ताधारी दल के पास तो दानदाताओं की पहचान रहती है पर किसी अन्य के पास यह सुविधा नहीं होती।

इन्हीं आधारों पर पीठ ने निम्न आदेश पारित कियेः-

1- भारतीय स्टेट बैंक इन बाॅन्डों का जारी किया जाना तत्काल प्रभाव से रोक देगा।

2- भारतीय स्टेट बैंक दिनांक 12.04.2019 से लेकर अबतक खरीदे गये सभी बाॅन्डों का विवरण भारतीय चुनाव आयोग को प्रस्तुत करेगा। विवरण में खरीद की तारीख, क्रेता का नाम और बाॅन्ड्स के मूल्यवर्ग का उल्लेख होगा।

3- भारतीय स्टेट बैंक उन लाभार्थी राजनीतिक दलों का विवरण भी भारतीय चुनाव आयोग केा प्रस्तुत करेगा जिन्हें दिनांक 12.04.2019 से लेकर अबतक इन बाॅन्डों के जरिये अनुदान प्राप्त हुआ है। इसके विवरण में राजनीतिक दलों द्वारा भुनाये गये प्रत्येक बाॅन्ड, भुनाये जाने की तिथि और उसके मूल्यवर्ग का उल्लेख होगा।

4- ये सूचनायें भारतीय स्टेट बैंक इस निर्णय के तीन सप्ताह के भीतर (दिनांक 06.03. 2024 तक) भारतीय चुनाव आयोग को प्रस्तुत कर देगा।

5- भारतीय स्टेट बैंक से प्राप्त सूचनायें भारतीय चुनाव आयोग प्राप्ति के एक सप्ताह के भीतर (दिनांक 13.03.2024 तक) प्रकाशित कर देगा।

6- जिन चुनावी बाॅन्डों की 15 दिन की वैधता अवधि अभी भी बाकी है, वे राजनीतिक दलों द्वारा भुनाये नहीं गये हैं, उन्हें राजनीतिक दलों को जारी करनेवाले बैंक को वापस करना होगा और उनकी धनराशि क्रेता के खाते में वापस कर दी जायेगी।

यह स्पष्ट है कि चुनावी बाॅन्ड्स के जरिये धन का यह अबाध प्रवाह कोई धर्मादा या ‘काॅरपोरेट सोशल रिस्पाॅन्सिबिलिटी’ नहीं है। जैसे ही दानदाताओं और लाभार्थियों का विवरण प्रकाशित हो जायेगा, वैसे ही हमें यह साफ-साफ दिखायी देने लगेगा कि कॅारपोरेटी दरियादिली और और सत्तारूढ़ दलों, खासतौर पर मोदी सरकार और भाजपा नीत राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध करायी जा रही मलाई के बीच ‘कुछ देने के बदले कुछ पाने’ (क्विड प्रो को) का सम्बन्ध है। इस योजना में नाम को छुपाये रखने का उद्देश्य ‘कुछ देने के बदले कुछ पाने’ (क्विड प्रो को) ही था। यह गोपनीयता की आड़ में काॅरपोरेट क्रोनियों और उनके राजनीतिक भागीदारों के बीच का गठजोड़ को ही पुख्ता कर रहा था। चुनावी बाॅन्ड योजना निश्चित रूप से अनियमित और असीमित काॅरपोरेटी घूसखोरी का एक शिष्ट रूपान्तर है। इसने भारत की चुनावी प्रक्रिया को दीमक की तरह चाट डाला है। यह कुछ हाथों में धन के अकूत संग्रह और भारत के काॅरपोरेट घरानों की सबसे प्रिय पार्टी की और झुकती चुनावी-तुला के बीच का पुल है।

देखना यह है कि क्या मोदी सरकार की कठपुतली बना भारतीय स्टेट बैंक, और भारतीय चुनाव आयोग वास्तव में उच्चतम न्यायालय के आदेशों का अनुपालन करता है। सरकार को जो करना है करे, हम भारत के लोगों को भारत के बंदी-लोकतंत्र में कुछ देर से ही
प्राप्त सही, इस न्यायिक प्रोत्साहन से शक्ति अर्जित करनी चाहिये और गणतंत्र पर अपना दावा मजबूत करने की लड़ाई को और तेज कर देना चाहिये। इस समय सबसे महत्वपूर्ण कार्य है चुनावी बाॅन्ड के इस पर्दाफ़ाश का प्रयोग करके हम फासीवाद को मजबूत करने वाली काॅरपोरेट ताकतों और राज्य की शक्तियों के बीच के गठजोड़ को बेनकाब कर दें। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोगों पर यह असंवैधानिक योजना लादने वाली सरकार को, जिसने इस गलत प्रकार से प्राप्त धन का प्रयोग करके राजनीतिक शक्ति प्राप्त कर ली है, आनेवाले चुनावों में हम अपने वोट की ताकत से बेदखल कर दें।

( इस लेख के कुछ अंश ‘एमएल अपडेट’ 20 से 26 फरवरी से अनूदित/सम्पादित हैं )

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