Monday, October 3, 2022
Homeशख्सियतकामरेड ज़िया भाई ज़िंदाबाद !

कामरेड ज़िया भाई ज़िंदाबाद !

( 28 सितम्बर 1920 को इलाहाबाद के जमींदार मुस्लिम परिवार में पैदा हुए ज़िया –उल-हक़ ने अपने जीवन के सौ साल पूरे कर लिए हैं. नौजवानी में ही समाजवाद से प्रभावित हुए ज़िया साहब अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए और बकायदा पार्टी के दफ़्तर 17 जानसेन गंज, इलाहाबाद में एक समर्पित होलटाइमर की तरह रहने लग गए. 1943 में बंगाल के अकाल के समय जब महाकवि निराला कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा संचालित राहत अभियान में अपना सहयोग देने पार्टी दफ्तर पहुंचे उस समय जि़या भाई ही पार्टी के जिला सचिव थे और निराला जी ने अपनी दस रूपये की सहयोग राशि उन्हें सौंपी.

अपने जीवन का एक हिस्सा ज़िया साहब ने पत्रकार के रूप में भी निभाया और दिल्ली रहे. इस रोल में भी वे बहुत कामयाब रहे. हो ची मिन्ह जैसी दुनिया की नामचीन हस्तियों के साथ इंटरव्यू करने का मौका भी उन्हें मिला. साठ के दशक से वे अपनी पार्टनर और शहर की मशहूर डाक्टर रेहाना बशीर के साथ इलाहाबाद में पूरी तरह बस गए. पिछली आधी शताब्दी से ज़िया साहब इलाहाबाद के वामपंथी और लोकतांत्रिक स्पेस की धुरी बने हुए हैं. अपने दोस्ताना व्यवहार के कारण वे जल्द ही सबके बीच ज़िया भाई के नाम से जाने गए. आज उनके सौवें जन्मदिन के मुबारक़ मौके पर समकालीन जनमत उन्हें बहुत मुबारक़बाद पेश करता है और उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए दुआ करता है.

इस मुबारक़ मौके पर हम ज़िया भाई के चाहने वाले तमाम युवा और बुजुर्ग साथियों के संस्मरण पेश कर रहे हैं जिन्हें उपलब्ध करवाने के लिए उनके बेटे और छायाकार सोहेल अकबर का बहुत आभार.

इस कड़ी में पेश है समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय का लेख. सं. )

_________________________________________________________________________________________________________

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य, इलाहाबाद के पुरनियां जिन्हें प्यार से हम ज़िया भाई कहते हैं, आज सौ साल के हो गए।

जन्मदिन मुबारक हो ज़िया भाई!

हाल -हाल तक सभा-सेमिनार-गोष्ठियों हम सभी उन्हें सबसे युवा कह कर ही संबोधित करते रहे। अब वे थक गए हैं। आज़ादी और कम्युनिस्ट आंदोलन, भारत और पाकिस्तान की न जाने कितनी स्मृतियां संजोए जिया भाई की स्मृति अब साथ छोड़ रही है।

उनसे जुड़े कुछेक वाकये कभी नहीं भूलते। उनमें से एक वाकया संक्षेप में यह-

आज 28 सितंबर भगत सिंह के जन्मदिन की भी तारीख़ है। लेकिन बात 23 मार्च भगत सिंह के शहादत दिवस पर हुए एक आयोजन की है। ज़िया भाई उस आयोजन की सदारत कर रहे थे। वक्ताओं ने भगत सिंह के जीवन और चिंतन के साथ गांधी और भगत सिंह के विचारों के बीच फ़र्क़ और टकराव के साथ भगत सिंह की फांसी और गांधी की भूमिका की आलोचना के पहलुओं पर भी बहुत सारी बातें कीं। अध्यक्षीय वक्तव्य देने ज़िया भाई उठे। उन्होंने बहुत संक्षेप में अपनी बात रखी। उस दौर को याद किया। कम्युनिस्ट विचार और भगत सिंह पर बात की और अंत में पूरी संजीदगी और हमारे वर्तमान समय को संकेतित करते हुए एक वाक्य कहा- ‘सबकुछ के बावजूद हमें यह भी याद रखना चाहिए कि साम्प्रदायिकता के सवाल पर आज़ाद भारत के पहले शहीद गांधी जी हैं। इसे याद न रखना भारी भूल होगी।’

पूरे हॉल में एक अजीब सी गंभीरता तारी हो गई थी। ज़िया भाई का यह वाक्य सहसा सबके दिलो-दिमाग में एक नए तरह से जा बैठा। इस वाकये को मैं भूल नहीं पाता।

दूसरा एक वाकया यह कि विभूति नारायण राय ने इलाहाबाद में दलित प्रश्न पर एक वर्कशॉप आयोजित की थी। प्रकाश करात समेत देश भर से अन्य बहुतेरे चिंतक आए थे। अंतिम दिन दोपहर बाद निराला सभागार में उसपर एक खुला सत्र भी रखा गया था। खुले सत्र की सदारत ज़िया भाई ही कर रहे थे। कुछ लोगों को ही उस सत्र में बोलना था। जब सारे वक्ता बोल चुके तो ज़िया भाई अध्यक्षीय वक्तव्य देने उठे। इस संदर्भ के पुराने कम्युनिस्ट आंदोलनों के अनुभवों को वे बहुत प्रभावी ढंग से रख रहे थे कि इसी बीच एक शब्द उनके मुंह से निकला। किन्हीं नकारात्मक प्रवृत्तियों के लिए उन्होंने ‘चमरपन’ या ‘चमरचिट्टई’ शब्द का प्रयोग किया। सभा में सब सकते में अवाक। उस शब्द के निकलने के साथ एक दलित बुद्धिजीवी साथी खड़े हो गए और पूछा यह क्या होता है? ज़िया भाई अचकचाए और किंचित विचलित से। उनके चेहरे पर इस शब्द के मुंह से निकलने की शर्म और मलाल के साथ पूरी सहजता से बोले- माफ़ी चाहता हूं। संस्कार लफ़्ज़ रूप में बहुत गहरे बैठे होते हैं और हम किस कदर उससे बेखबर होते हैं, उसका कैसे मैं औचक शिकार हो गया खुद मैं सोच रहा हूँ।’ सभा में शांति थी और ज़िया भाई की बातों पर यकीन। वे इसके बाद और बहुत कुछ महत्व की बातें बोले।

उस दिन बिना लेकिन, किंतु, परंतु के अपनी ग़लती, कमजोरी की आलोचना का सहज स्वीकार का उनका रूप हम सबने देखा। सभा समाप्ति के बाद यही चर्चा सबकी ज़बान पर था।

( समकालीन जनमत के  प्रधान संपादक और हिंदी के महत्वपूर्ण आलोचक रामजी राय राजनीतिक और सांस्कृतिक मोर्चों पर समान रूप से सक्रिय हैं । वे जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं । rai.ramji@gmail.com) 

 

 

RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments