समकालीन जनमत
पुस्तक

विमल कुमार के काव्य संग्रह ‘मृत्यु की परिभाषा बदल दो’ की पुस्तक समीक्षा

पवन करण


इस दौर में कवि विमल कुमार की सक्रिय रचनात्मक निरंतरता उल्लेखनीय और आश्वस्तिकारी है। ‘सपने में एक औरत’ से बातचीत से बरास्ते ‘जंगल में आग लगी है’ से होते हुए ‘मृत्यु की परिभाषा’ बदल दो तक वे एक ऐसे कवि हैं जिन्हें अपनी कविता से हासिल की जगह अपने कवि होने पर भरोसा है। मात्र इस वजह से भी वे कवि- प्रतिनिधित्व के अधिकारी हो जाते हैं। उनकी कविता हमें आलोचनात्मक विवेचन का विवेकपूर्ण अवसर भी उपलब्ध कराती है। एक उपमा उन पर फबने में कसर नहीं छोड़ती जब वे हमें अपनी कविता में समय के सखा-कवि की तरह भी मिलते हैं। समय का सखा कवि समाज का सखा कवि होने की पहचान स्वत: प्राप्त कर लेता है।

समय भी स्वयं को व्यक्त करने के लिये कविता में आश्रय लेता है। कविता ही है जो उसके कथन को, उसके ताप, उल्लास और उसकी संवेदना को निर्दोष दर्ज करती है और निसंदेह इतिहास बन जाती है। उल्लेखनीय यह भी है कि इसके बाद भी वह इतिहास कहलाने का आग्रह नहीं रखती। उसके लिये आंदोलित नहीं होती। ये कविता की उदारता है। मनुष्य-समाज इसके लिये कविता का आभार व्यक्त कर सकता है। उससे सीख सकता है। हालाकि इतिहास होना भी इतना आसान नहीं। इतिहास होने की प्रक्रिया में उसे अपना रक्त, मास-मज्जा किस कदर निचोड़ना होता है, इसे कविता से बेहतर जाना जा सकता है।

कविता ने अब तक अपना रास्ता इसी तरह समय को पोसते तय किया है। उसकी गोद इतनी नम और हरी है कि वह कभी वक्त को मुरझाने नहीं देती। कविता समय की अंतिम शरणस्थली है। समय की कोशिशों में भी भटकाव बहुत है जिसके चलते वह चूकता और कविता उसे अचूक बनाते चलती है। कविता ने समय की आँख में मौजूद पुरखा नमी सूखने नहीं दी है। न ही कविता ने अपने भीतर समय की चीखों की गूंज क्षीण होने दी है। कविता की आँख में पल्लवित वे किसी भी समय आपकी आँख से बह सकते हैं। कविता के होठों पर बेचैन वह कभी भी फूट सकती है।

क्या समय शापित है। उसे किसी स्त्री या प्रकृति का शाप लगा है जो वह किसी पुरूष की तरह अपनी बेचैनी और अपराधबोध से मुक्ति के लिये हर बार कविता की देहरी पर आ बैठता है। क्या उसे कविता पर और बस कविता पर इतना भरोसा है कि वह ही उसे बार-बार मरने से बचा सकती है। नवरूप और नवजीवन देकर वह उसे उसको ही सौंप सकती है। उसका आग की तरह जलना और मनुष्य की तरह चलना देख सकती है। उसका हवा की तरह बहना और त्वचा की तरह सहना जान सकती है।

घटनाक्रम समय को दूषित करने में नहीं चूकते। घटनाओं का काम समय को हर समय स्वस्थ बनाना ही नहीं होता। जब समय के नियंत्रण के बाहर, समय में मौजूद कारक तत्व समय को पराजित कर स्वयं को विजेता महसूस करने लगते हैं तब हताश समय के पास कविता में दर्ज होने का विकल्प ही बचता है। वह वहाँ निदान खोजने की कोशिश करता है मगर उसे अपना बनाती कविता उसके आगे भविष्य बिछा देती है। कविता हमेशा से यही करती आई है। समकालीन कविता का यही सुभाव आज भी स्थायी है।

निश्चित तौर पर पूर्ववर्ती कविता को इस दृष्टिकोण से भी, कि क्या वह, अधिकतर धार्मिक और राज्य के दबाव की कविता ही रही है, परखा गया होगा और अभी उसकी इस पहल पर और परख जारी होगी। मगर यह सामने है कि समकालीन कविता ने इस परंपरा को दृढ़ता से पीछे छोड़ दिया। वह आज जनपक्षधर कविता है। वह आज राज्य और धर्म के दवाब में नहीं बल्कि आज उसका धर्म और राज्य पर दवाब है। इसीलिए आज वह सत्ता और धर्म दोनों की हिकारत की शिकार है। वह दोनों के निशाने पर है।

मगर कविता कब डरती है। निर्भिकता उसकी पहचान है। वह कवि को अपने जैसा बना लेती है या वह अपने जैसे ही किसी को कवि होने, घर फूकने के लिए चुनती है। कवि विमल कुमार को भी हम एक उदाहरण मान सकते हैं। जो उसकी चाहत जैसा नहीं होता और उसे नाथने की कोशिश करता है उसकी कवि-परख के लिए वह उसे समाज के सामने धकेल देती है। कविता जानती है समय की गति बहुत तेज है उसे रोकना, उसे हाथ पकड़कर अपने पास बिठा पाना बेहद कठिन है। निडर कविता यह काम बख़ूबी कर लेती है। इसीलिए वह समय के साथ नहीं उससे आगे दौड़ती दिखाई देती है।

मृत्यु की परिभाषा बदल देने जैसा आक्रोशित-आग्रह करतीं इस संग्रह की कविताएँ आहत समय की शरणस्थली की शक्ल में स्वयं को पुनर्प्रमाणित करती हैं । घायल समय दर्द से कराहता, स्वयं के लिए औषधी-उपचार तलाशता इन कविताओं में हमें, हमारी ओर देखता मिलता है। आपदाएँ-दुर्घटनाएँ, मिलन-विछोह, मृत्यु-जीवन जैसी भूमिका में सबको हम यहाँ सक्रिय पाते हैं। समय जो स्वयं हमारी शक्ल में यहाँ हमसे बतियाता और अपने घाव दिखाता है। हताशा को आशा के द्वार तक छोड़ आता, मुरझाने को खिलने में बदलने के लिए बेचैन समय। कविता का सामीप्य, समय को, इस हौसले के पुनरावलोकन के लिए, धीरज उपलब्ध कराता है।

इन कविताओं में समय हमारे मुखौटे लगाये है। हमें इस बात पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि वह हमारी तरह सोचता और कहता है। उसका कहना कि “देखो, देखो यह जीवन की किताब है हर कोई चूम लेना चाहता है इसका कबर” हमें मनुष्य कथन से दूर नहीं ले जाता। हम सब बैठे हैं मौत की एक ट्रेन में । यह ट्रेन कहाँ जायेगी। कहाँ रुकेगी। किसी को पता नहीं। यह कथन भी हमारा ही है। मगर जीवन को मौत के इस भय तक पहुँचाने वाले कारक कविता की निगाह से बच नहीं पाते। भले ही अरचनात्मकता उन्हें बने रहने के लिये सुरक्षित मचान उपलब्ध करा देती हो। मगर जीवन के आगे कविता में उनके उजागर हो जाने से बड़ा सबूत क्या हो सकता है।

आपदाएँ, महामारियाँ, दुर्घटनाएँ कहकर नहीं आतीं मगर वे जातीं भी नहीं कहीं । वे हमारे जीवन में, हमारे इर्द-गिर्द हमेशा मौजूद रहती हैं और साथ रहती हैं उनसे जूझने की हमारी सफलताएँ और विफलताएँ। ठीक वैसे जैसे समय की अतिथिशाला कविता हमारे मन में। प्रस्फुटित होती न होती। यदि कविता समय की शरणशाला है तो हमारे मन कविता के कच्चे-पक्के, टूटते-गिरते- ढहते-बनते घर। हम खड़े-तने-डटे हैं तो कविता खड़ी-तनी-डटी है। मनुष्य कविता की छाया है अथवा कविता मनुष्य की परछाई। समय की संगत में इसे कविता और हम तय कर सकते हैं।

 

पुस्तक: मृत्यु की परिभाषा बदल दो (काव्य संग्रह)

कवि: विमल कुमार

प्रकाशक: आपस पब्लिशर्स एवं ड्रिस्ट्रीब्यूटर्स

मूल्य: 190/— रूपये मात्र

 

 

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