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पुस्तक

सुमेर सिंह राठौर की डायरी ‘बंजारे की चिठ्ठियाँ’ की पुस्तक समीक्षा

पवन करण


चिट्ठियाँ जो ख़ुद को भेजनी थीं, अपने डरों से लड़ने की कोशिश में, बंजारे की चिट्ठियाँ बन गईं-
‘बंजारे की चिट्ठियाँ’ पढ़ने के बाद मैने सोचा चलो इस पर कुछ लिखा जाये देखा तो बंजारे ने मेरे लिखने के पहले प्रारंभ में ही इसकी शुरुआत कर दी-

वैसे भी बंजारे की लिखीं ये चिट्ठियाँ बंजारे के ही लिए हैं, आप बंजारा होने की चाहत और कूबत रखते हों तो इसे अपनी मान लें मगर इसके लिए उस बंजारा मन और धड़कन की आवश्यकता होगी जो इस किताब के विस्तृत फैलाव को नाप पाने में तुम्हारी मदद कर सके, जिसे तुम्हें अपने भीतर से खोदना होगा।

शानदार डायरी है जो बंजारे के रेत और प्रेम के ढूहों में उसके भटकाव और ठहराव और दृश्यभाव का अंकन और रेखांकन करती है-बेचैनी का भी।
बंजारों की तकलीफ़ें सबसे ज्यादा पावों ने झेली थीं
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जो डोर हाथ में है रेत के, उसे टूटने से वे बचा लेंगे। बरगद, बादल, नदी, पानी, खेत, हवा, रास्ते-सब जाने क्यों बचाने में लगे हैं एक टूटती डोर
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आटे की खीर में न जाने क्या था कि बंजारे जान छिड़कते थे। ख़त्म नहीं हो जाती, तब तक थाली में फिराते रहते अंगुलियां
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वे बस जीने को तकते थे। उन्हें न अगोत्तर सुधारने थे, न ही वे पिछले जन्म के ओढ़ने ओढ़े घूमते थे
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मौसम की शामों को रास्तों पर चलते दिखते हैं पांव बंजारों के
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जो गाते थे गीत झूठी बातों के, उन पर हंसते थे खुलकर।
रातों में मटकी पर अंगूठी की थाप देते हुए बड़ी सी मुस्कराहटों के साथ गाते थे बंजारे
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हर बार उदासी भरा नहीं होता लौटना
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बंजारे कहते हैं कि जिन दिनों गांव गरीब थे, वे कभी किसी गांव से नहीं लौटे थे भूखे।जबकि अब अमीरी के दिनों में किसी घर का दरवाजा नहीं खुलता
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आज़ादियां पानी हैं। रेत की नदियों में बहने वाला पानी। बहता है तो बहने देता हैऔर थम जाता है तो रह जाती है रेत
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भीगने के लिए कोई ज़रूरी है कि ख़ूब बारिश हो। हल्की -हल्की बौछारें भी तो कभी-कभी भिगो देती हैं गहराई तक
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रेगिस्तान में ख़ुशियों के कितने बहाने हैं और हरियाली में एक बहाने की ओर कद़म बढ़ाने के लिए इतना सोचना पड़ता है
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दीवार पर लटकती कठपुतलियां हवा की सिरहन से कांपती हुई मुझ पर हंसती हैं
चुप्पियां चांद बनकर डूब जायेंगी एक दिन
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अपनी बची हुई जमा पूंजी से मैंने दो सिगरेटों खरीदीं। एक से खुद को फीका दूसरे से प्रेम को।
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बंजारे होते थे तो खो जाते थे पांवों की उंगलियों के बिछूड़ियों से चमकते तिलों में…
बंजारों के बचे रह जाने की सबने दुआएं की थीं
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बंजारे की चिठ्ठियाँ पढ़ने के लिए जिस धैर्य और एकाग्रता की आवश्यकता थी, पता नहीं वह मेरे पास थी अथवा नहीं पर मैं तो इन्हें पढ़ गया.. इस दोष को अपने ऊपर से हटाता हुआ कि अब चिट्ठी लिखता-पढ़ता कौन है।

 

पुस्तक: बंजारे की चिठ्ठियाँ 

लेखक: सुमेर सिंह राठौर

प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन

मूल्य: 189 रुपये (पेपरबैक)

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