समकालीन जनमत
पुस्तक

शिव कुमार पराग की ग़ज़लगोई :आँधियों में जलते चिराग़

जितेंद्र कुमार


शिव कुमार पराग की दस ग़ज़लें वरिष्ठ ग़ज़लकार डॉ. डी. एम. मिश्र द्वारा संपादित ‘ग़ज़ल एकादश ‘(हिंदी श्री पब्लिकेशन, प्रथम संस्करण, 2021) में शामिल हैं। डॉ. डी. एम. मिश्र द्वारा चयनित एवं संपादित ग्यारह जनपक्षधर ग़ज़लकारों में शामिल होना, एक साहित्यिक स्वीकृति है; इस पहचान के लिए शिव कुमार पराग को लंबा आत्मसंघर्ष करना पड़ा है। उनकी रचनात्मकता के बारे में वरिष्ठ ग़ज़लकार हरेराम समीप लिखते हैं: ‘विद्यार्थी जीवन से ही उनकी कविताएँ प्रकाशित होने लगी थीं। 1975 में आपातकाल और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के ‘संपूर्ण क्रांति ‘ आंदोलन ने उनके लेखन को गति और दिशा प्रदान की। उन दिनों की लगभग सभी बड़ी पत्रिकाओं में पराग जी की रचनाएं निरंतर प्रकाशित होने लगीं। कमलेश्वर और धर्मवीर भारती द्वारा संपादित पत्रिकाओं जैसे,’ सारिका, गंगा और धर्मयुग में पराग की ग़ज़लें उन दिनों प्रकाशित और चर्चित होती रहीं। अब तक उनकी पाँच पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं — जिसमें एक ग़ज़ल -संग्रह ‘देख सको तो देखो ‘है। इस ग़ज़ल संग्रह के प्रथम संस्करण में 86 ग़ज़लें संकलित थीं। अभी इस संग्रह के परिवर्द्धित संस्करण में पराग जी की 111 ग़ज़लें संगृहित हैं।

हिंदी ग़ज़ल की प्रगतिशील जनवादी धारा को भाषा,भाव, विचार और सरोकार की कठिन लड़ाई लड़नी पड़ी है,तब हिंदी की जनपक्षधर धारा हिंदी साहित्य संसार में अपने को स्थापित करने में सफल हो सकी है। कवि -आलोचक सुशील कुमार (राँची) लिखते हैं –‘ हिन्दी ग़ज़ल की रोमानी संस्कृति से जन संस्कृति तक की यात्रा आसान नहीं है।…..। आचार्यों ने न केवल इसकी उपेक्षा की,बल्कि सामंती और दरबारी विधा कहकर इसे हिन्दी की केन्द्रीय विधाओं से अलग -थलग रखा।…..। लेकिन प्रचुर संख्या में भाषा और ‘कंटेंट’ के स्तर पर दुष्यंत काल 1970) से अब तक चल रहे हिंदी ग़ज़ल के आत्मसंघर्ष में जो कई नये अध्याय जुड़े हैं, उनका कोई खास मतलब और मकसद तो होगा ही।…..। रवायती शायरी से मुठभेंड़ और आत्मसंघर्ष में हिंदी ग़ज़लकारों ने उर्दू ग़ज़ल से न केवल किनारा किया, बल्कि अपने प्रतिमान और सरोकार भी अलग कर लिए ( लिख चुकने के बाद : हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष ‘)।

‘देख सको तो देखो ‘ ग़ज़ल – संग्रह के ग़ज़लकार शिव कुमार पराग हिंदी ग़ज़ल के बारे में अपनी वैचारिकता स्पष्ट करते हैं -‘ हिंदी ग़ज़ल में वैचारिकता एवं साहस का होना बहुत आवश्यक है। बिना वैचारिकता के वह दिशाहीन हो जाएगी और बिना साहस के लिजलिजी।……। हिंदी ग़ज़ल आम आदमी के दु :ख -दर्द में,उसके संघर्षों में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है।वह आम आदमी की चिंता भी करती है और इस जनतंत्र में विसंगतियों पर सवाल उठाते हुए संघर्षों में भी शामिल होती है (हिन्दी ग़ज़ल तेवर, प्रतिरोध और संघर्ष की काव्य – विधा है ‘ ।

पराग जी अपनी हिंदी ग़ज़ल की रचना -प्रक्रिया के बारे में लिखते हैं,’ नौकरी के क्रम में गाँव-गाँव घूमता रहा। ग्रामीणजन की असह्य पीड़ा को देखा तो उसके अपरिमित उल्लास को भी देखा,उसकी चुप्पी देखी तो प्रतिरोध और उनका गुस्सा देखा और आसक्ति भी। इन्हीं अनुभूतियों के बल पर मैं अपनी कविता के राग को जनता के अनुराग से जोड़ पाया हूँ।’

ग़ज़लकार शिव कुमार पराग की रचना -दृष्टि में उनकी समष्टिगत व्यापक अनुभूतियां हैं,जन सरोकार हैं। उन्हें लगता है कि मुल्क की चालक शक्तियाँ शैथिल्य की शिकार हैं ; वे देश को एक पत्रहीन पेड़ों की बगिया की तरह देखते हैं जहाँ गतिशीलता की प्रतीक हवा मंद -मंद बहती है ; शक्ति की प्रतीक डालियाँ हैं और वहाँ पतझड़ दृश्यमान् है।खोई – खोई चिंतित उदास जनता (उपमेय ) का उपमान पतझड़ में शज़र की पत्रहीन डालियां ही हो सकती हैं। क़र्ज़ में डूबे किसानों की लहलहाती फ़सल महाजन काटता है।यह दृश्यबंध स्वतंत्रता के बहुत बाद के भारत का है।
” आज अपना देश ऐसा हो गया है,
जैसे घोड़े बेच कोई सो गया है।
सरसराती हवा,झरती डालियां,
हर कहीं पतझड़ का आलम हो गया है।
सीधे सच्चे लोग चिंतित दीखते हैं,
लग रहा जैसे कहीं कुछ खो गया है।
लहलहाती फसल अब तक काटते हैं,
बहुत पहले क़र्ज़ कोई बो गया है।”

स्वतंत्रता के पश्चात् देश के संचालन के लिए एक संविधान बना, जिसमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक समानता की बातें की गई हैं, लेकिन वर्णगत -जातिगत भेदभाव मिटा नहीं ; आर्थिक – सांस्कृतिक – ऐतिहासिक खाइयाँ थोड़ी और चौड़ी और गहरी होती गईं।ऐसा नहीं कि यथास्थिति बनी रही ; यथास्थिति का पहाड़ ऊपरी वर्ग के लिए टूटा। ग़ज़लकार पराग इस वस्तुस्थिति को छोटी बह्र के अशआर में पूरी सहजता के साथ पिरोते हैं —-

जो दबे थे दबे रह गए,
और उभरे उभारे गये।
तन गई उनकी कोठी नई,
भाड़ में सारे नारे गये।
हम रहे जैसे -तैसे सदा,
वो सजाए -सँवारे गये। (ग़ज़ल 32)

राष्ट्रीय स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद सत्ता की राजनीति ने वंचितों को सपने दिखाये, लेकिन उनके सपने कभी साकार नहीं हुए। संग्रह में कई ऐसे अश् आर इस राजनीतिक बेइंसाफी को प्रतिबिंबित करते हैं —

बुझी आँखें ,होंठ सूखे,फूस के घर हम रहे,
हमको जाने कैसे -कैसे ख्वाब दिखलाये गये। (ग़ज़ल 7)

हालांकि गरीब की आँखों में उजालों का भरम बना रहा।
दुष्यन्त कुमार का एक शेर है –
हर तरफ़ एतराज़ होता है,
मैं अगर रोशनी में आता हूँ।
पराग जी की जीवन की अनुभूतियां लगभग वैसी ही हैं —

” जब भी हमारी आँखों के सपने हरे हुए,
क्या बात हुई,लोग तुनककर खड़े हुए।” (ग़ज़ल 34)
आत्मपरक ढंग से कहा गए शेर का भाव समष्टिपरक है।

” लोगों की आंखों में वो गड़ने लगा,
सुख मेरा जब घुटरुवन चलने लगा। (ग़ज़ल 39)

एक और शेर पढ़िए
” फिर हमारी आँखों में सपने सुगबुगाए हैं,
फिर जहाँपनाहों के चेहरे तमतमाए हैं।” ( ग़ज़ल -46)

शिव कुमार पराग हिन्दी ग़ज़ल की उस धारा के शायर हैं जिसने उसे सामंती रूढ़ियों, प्रवृत्तियों और सौंदर्य -दृष्टि से मुक्त कर,उसे अन्याय और दमन के खिलाफ संघर्ष और प्रतिरोध की काव्य -विधा की पहचान दिलायी।शायरी का ऐतिहासिक कार्य -भार इतना भर नहीं है कि वह अपने वर्तमान की मानवीय पीड़ा को लयात्मक और संवेदनात्मक स्वर मात्र से नवाज़ दे, बल्कि उसका कार्य -भार यह भी है कि वह उत्पीड़ित समुदाय को जुल्मो -सितम के खिलाफ़ रचानात्मक प्रतिरोध के जरिए उसे मुक्ति -संघर्षों के लिए भावात्मक और वैचारिक रूप से उत्साहित एवं दृढ़ करे। इसलिए इस धारा के प्रस्तावक और प्रतिपादक दुष्यंत कुमार ने कहा था —
” अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।”

आगे यह भी कहा कि “कोई हंगामा करो, ऐसे गुज़र होगी नहीं ” और ” आकाश में सूराख ” करने के लिए ‘एक पत्थर तबीयत से ‘ उछालने के लिए कहा। जनवादी शायर अदम गोंडवी (1947–2011) ‘समय से मुठभेंड़ ‘ की बात करते हुए कहते हैं —

“जनता के पास एक ही चारा है बगावत,
ये बात कह रहा हूँ होशोहवास में।
भूख के एहसास को शेरो – सुखन तक ले चलो,
या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो।”

प्रतिरोध और संघर्ष की जनवादी धारा में शिव कुमार पराग के पहले कमल किशोर ‘श्रमिक’,(1937—कानपुर), सुरेन्द्र श्लेष (1941–जयपुर), शलभ श्रीराम सिंह , फ़ैजाबाद (5.11.1938–22.04.2000) ,राम कुमार कृषक 1.10.1943) राम मेश्राम (20.12.1946), डॉ डी एम मिश्र (15.10.1950–सुलतानपुर), हरेराम समीप (13.08.1951- फ़रीदाबाद ), प्रभा दीक्षित (1962-कानपुर),बल्ली सिंह चीमा (1952-अमृतसर) आदि का नाम लिया जा सकता है जिनसे यह धारा जीवंत है।और कई नाम हैं जिनका उल्लेख किया जा सकता है। शिव कुमार पराग कहते हैं —

” यातना के दौर में दहशत भरा मुँह खोलता हूँ,
मैं कई सपनों के बीचोंबीच होकर बोलता हूँ।”

‘पराग’ प्रतिरोध के लिए प्रतिरोध नहीं करते, बल्कि उनके पास तानाशाही की जगह लोकतांत्रिक विकास का वैकल्पिक मॉडल (सपना ) है।लोक जीवन में ‘चेतना के शब्द वितरित ‘ करते हैं ‘हर कहीं ‘ ।लोक जीवन में चेतना नहीं होगी तो जनवादी परिवर्तन के मर्म को उत्पादक शक्तियाँ नहीं समझेंगी और उत्साहित होकर परिवर्तन की धारा को सम्बल प्रदान नहीं करेंगी ।’पराग’ जी की सोच -समझ प्रौढ़ है।लोक में जबतक वैज्ञानिक चेतना नहीं होगी,लोक में परिवर्तन के पक्ष में एकता और एकजुटता नहीं होगी।आपसी अंतर्विरोध का समाधान एकता की आवश्यक शर्त है।’पराग’ फरमाते हैं —

‘ आपस की बातें थीं,आपस में सुलझ जातीं,
कुछ तुमने कहा होता,कुछ हमने सुना होता।’

‘ पराग ‘ की सामाजिक दृष्टि वस्तुगत स्थितियों को गहराई से परखती है ; आम आदमी का जीवन धुआँ- धुआँ है —
‘ आग लगी है उसके सारे जीवन में
खुद को धुआँ- धुआँ पाता है आदमी।’

इस शेर का मज़्मून तो व्यापक है ही,कहन का अँदाज़ बिल्कुल नया,तरल एवं सरल है। हिंदी ग़ज़ल को नया तेवर देता हुआ।कह सकते हैं कि शिव कुमार पराग हिन्दी ग़ज़ल के तेवर को पूरी सादगी के साथ,अदम गोंडवी के कार्य – भार को दो क़दम आगे ले चलते हैं।एक नज़्म ‘ हथियार उठा ले ‘ में अदम जनता को जागृत करते हुए उन परिस्थितियों का उल्लेख करते हैं, जिनमें जनता को,मुल्क के रहनुमा के ख़िलाफ़ ‘हथियार उठा लेना चाहिए ‘; जैसे -” जम्हूरियत के तन पे ज़िना के निशान हों / जनता को हक़ है हाथ में हथियार उठा ले।” ध्यातव्य है कि अदम अपनी शायरी में जनता के चित्त को ज्ञानोदय से आलोकित करना चाहते हैं, वे नया राजनीतिक मंत्र जनता के कानों में फूँक रहे हैं ;’पराग’ जनवादी सामाजिक सांस्कृतिक ऐक्टिविस्ट हैं,वे संघर्ष के मैदान में खड़े होकर, आत्मविश्लेषण के साथ ग़ज़ल कहते हैं।संघर्ष के कुछ साथी,उनकी अस्थायी पराजय पर,’आस्तिनों में साँपों’ की तरह हँसते हैं,तब वे ठगे से रह जाते हैं। उन्हें अफ़सोस होता है कि ‘हम पास रहे लेकिन हम साथ रहे होते/जो कुछ भी हुआ होता, अच्छा ही हुआ होता ‘(ग़ज़ल -62). ‘पराग’ का अनुभव संसार जे पी आंदोलन से लगाकर वर्तमान महागठबंधनों के दौर का साक्षी है।जे पी आंदोलनकारी कितने टुकड़ों में बँट गये,सब जानते हैं। वर्तमान महागठबंधनों के हिस्सों के बीच खींचतान से कौन शक्तियां लाभान्वित होती हैं,सब पता है। एक मौजूँ शेर है :’ तालमेल की मेज़ों पर/गोटियां बिछाते हैं लोग।’लेकिन ‘पराग’ का शायर हिम्मत नहीं हारता।जीवन की लड़ाई तो लड़नी ही पड़ेगी। अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उस बूढ़े मछुआरे को याद किया जा सकता है कि जब वह दूर समुद्र में जाकर मछली मारकर लौटता है तो समुद्र की लहरें तो रूकावट पैदा करती ही हैं,शार्क मछली भी उसके शिकार पर बार बार झपटा मारती है।मछुआरा तट पर खाली लौटता है। लेकिन पराजय स्वीकार नहीं करता।उसी अँदाज़ में ‘पराग’ की शायरी जनसंघर्षों में मिली पराजयों से विचलित नहीं होता;पराग के अश् आर पढ़ें —

“वो चिराग़ कोई चिराग़ है जो जला नहीं बुझा नहीं,
वो भी आदमी कोई आदमी है जो गिरा नहीं,जो उठा नहीं।
जहाँ चाह वहाँ राह है, यह मंत्र कानों में गूँजता,
मेरी राह काँटों भरी हुई,मुझे दूरियों का पता नहीं,
उनकी उम्मीद, विश्वास और तत्परता देखिये।

“जरा धूप खिड़की से आए तो कोई गीत कमरे में रोप दूँ।”
” लोहा हूँ हथौड़े की चोट खा रहा हूँ,
शोलों में तप के लाल हुआ जा रहा हूँ।
मैं बिजलियों की आँख का तारा हूँ दोस्तों,
अंधी गुफ़ा में जलती ग़ज़ल गा रहा हूँ।”

“हार कर बैठ हम नहीं सकते,
हम तो गिरते -सँभलते रहते हैं।
एक न एक दिन तो उठ खड़े होंगे,
हम जो भीतर उबलते रहते हैं।”(ग़ज़ल –69,111)

इन शेरों में ग़ज़लकार खुद शामिल हैं।वे उत्पादक समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते, वे स्वयं उत्पादक समाज का हिस्सा हैं।उनकी जिंदगी के एहसासात नये हैं, इसलिए उनके बिंब नये हैं, शब्दावलियां लोकजीवन की हैं, ग़ज़लों की लोकधर्मिता उनकी विशेषता है।
‘पराग’ छोटी बह्रों वाले शेरों में ग्राम्य जीवन को सुलभ पदावलियों से लोकजीवन में चलते दैनंदिन चलते संघर्षों को रूपायित करते हैं —

“कुहरे,भँवर,थपेड़े,ओले,पत्थर सब,
सह जाते हैं मुसकाते -मुसकाते हम।”

वे ग़ज़लियत के शिल्प और परंपरा को विकसित करते हुए अपनी ग़ज़ल कहते हैं,छोटी बह्र के इन शेरों में इसे महसूस कर सकते हैं —
“जो अँधेरों के समर्थन में थे,
धूप के पोस्टर उठाये हैं।”

इस ऐतिहासिक यथार्थ की ज़मीन पर मुझे पहला शेर मिल रहा है।हम सब जानते हैं कि कौन सी राजनीतिक शक्तियां हैं जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता में हिस्सा नहीं लिया,अपने मुख्यालय पर तिरंगा के बदले आधी सदी तक काला झंडा फहराया और आज वे ही देशभक्ति का परचम हवा में उड़ा रही हैं।पराग जी ने इस पूरे वाक्या को एक शेर में भाषिक सुंदरता के साथ कह दिया है। वे आगे कहते हैं —
‘जब कभी पांव लड़खड़ाए हैं,
मंदिरों के करीब आये हैं।’ (ग़ज़ल -80)
कुछ और शेर पढ़िए —

‘ख़ून का तालाब जिस दिन आइना हो जाएगा,
मैं समझता हूँ सही चेहरा उभरकर आएगा।’

ग़ज़लकार शिव कुमार पराग की तल्ख़ अनुभूतियां महसूस करती हैं कि अधीनस्थ समाज को अपना हक़ पाने के लिए और प्राप्त अधिकारों को बचाए रखने के लिए बहुत बड़ी कुर्बानियां और शहादतें देनी पड़ सकती हैं,इतना कि लोकधर्म का तालाब शहादतों के खून से भर जाए और आइना की तरह चमकने लगे।ऐसा अनोखा बिम्ब मैं पहली बार पा रहा हूं, आख़िर मेरी भी सीमाएं हैं। और एक शेर पढ़िए —
‘रस्सी नहीं है रोशनी कि गाँठ पड़ेगी,
फिर आओ और खुद को उजाले से जोड़ लो ‘। ( ग़ज़ल -84)
बाजारवाद के खिलाफ एक उल्लेखनीय शेर —

‘धरा को एक मंडी में बदलकर,
मज़े में हर लुटेरा दीखता है।’(ग़ज़ल –85)

शिव कुमार पराग ने अपनी ग़ज़लों में उर्दू छंदों (बह्रों) का ही प्रयोग किया है।ग़ज़ल के पहले शेर को मत्ला कहते हैं और अंतिम शेर को मक़्ता कहते हैं जिसमें उर्दू शायर तख़ल्लुस का उपयोग करते हैं। दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज़लों में कभी भी तख़ल्लुस का इस्तेमाल नहीं किया और आजकल हिन्दी ग़ज़ल में शायर प्रायः तख़ल्लुस का प्रयोग नहीं करते हैं।’पराग’ जी ने भी अपनी ग़ज़लों में तख़ल्लुस का प्रयोग नहीं किया है। क़ाफ़िया,रदीफ़,रुक्न,अर्कान के बगैर ग़ज़ल की कल्पना नहीं की जा सकती है। शिव कुमार पराग उर्दू छंद शास्त्र के प्रयोग में माहिर हैं।एक नमूना देखिए –
‘हर समय वे दुलारे गये,
एक हम ही तो मारे गए।’

इस ग़ज़ल में क़ाफ़िया के शब्द हैं – दुलारे,मारे, किनारे,उभारे,नारे,सँवारे जो नियमित: दुरुस्त हैं।इसका रुक़्न है -‘ फाइलुन ‘यानी SIS, और अर्कान है – फाइलुन फाइलुन फाइलुन। ग़ज़ल के सानी मिस्रे में ‘तो’ आया है जो गुरु है लेकिन तकतिअ्(गणना) में उसकी गिनती लघु के रूप में होगी। इस तरह अनेक ग़ज़लों की जांच और तकतिअ् की सकती है। अशुद्धियां ना के बराबर मिलती हैं। लेकिन क़ाफ़िया,रदीफ़,बह्र के दुरुस्त होने मात्र से ग़ज़ल में मज़्मून और बुस’अत(विस्तार) स्वयं नहीं आ जाती है। उसके लिए शायर की जीवन -दृष्टि,उसकी ज्ञानात्मक संवेदना, समृद्ध अनुभव संसार और जन सरोकार का व्यापक असर होता है।तभी वह शायरी के लिए सही विषय -वस्तु,सटीक रूप का प्रयोग कर सकेगा। शिव कुमार पराग के पास वो गैर -साम्प्रदायिक,गैर -जातिवादी, वैज्ञानिक टेंपरामेंट, तार्किक बुद्धि और वर्गीय जनवादी जीवन -दृष्टि है जिसके आलोक में वे ग़ज़लों की रचना करते हैं। वे यथास्थिति के नहीं परिवर्तन के शायर हैं —
‘परिवर्तन की आस लगाए बैठा हूं,
अब भी थोड़ी आग बचाये बैठा हूंँ।’
वे आशावादी भी उतने ही हैं —

‘जनता का शासन सचमुच का आएगा,
कविताओं में अलख जगाये बैठा हूँ।( ग़ज़ल –111)

वे उन काली शक्तियों की पहचान रखते हैं जो डबल फेस से जनता को छल रही हैं —
‘जो अँधेरों के समर्थन में थे,
धूप के पोस्टर उठाये हैं।
ये तिरंगे को चाहते कब थे,
अब तिरंगे को गाते रहते हैं।’(ग़ज़ल –109)

शिव कुमार पराग अपनी ग़ज़लों को लोकधर्म के अनुकूल भाषाई संस्कार देते हैं; वे तत्सम, तद्भव,बिदेशी शब्दों से यथासंभव बचने का प्रयास करते हैं। इसलिए उनकी ग़ज़लों में सहजता और सम्प्रेषणीयता है।भविष्य में उनकी पहचान का और विस्तार होगा।

 

 

ग़ज़ल -संग्रह: देख सको तो देखो
शायर: शिव कुमार पराग
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन

मूल्य : 299 रुपये मात्र


 

समीक्षक: जितेन्द्र कुमार, राज्य अध्यक्ष, जसम, बिहार।

पता: मदनजी का हाता,आरा -802301, मो नं 9113426600

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