समकालीन जनमत
पुस्तक

शांति नायर के कविता संग्रह ‘ज्यामिति’ की पुस्तक समीक्षा

पवन करण


जिनके पास जितने नुकीले कोण हैं वे उतने ही अधिक पुरुष हैं।

शांति नायर की कविताएँ बातचीत में भाग लेने पहुँचती हैं, ज़रा भी आवाज़ न हो इतने धीमे से कक्ष का दरवाज़ा खोलती हैं और चुपचाप सबके बीच जाकर बैठ जाती हैं। वे तब ही अपना मुँह खोलती हैं जब उन्हें लगता है कि अब बातचीत में शामिल लोग चाहते हैं कि वे बोलें। वे संयम और समझ के साथ धीमें और सधे हुए अंदाज़ में अपनी बात कहने में यक़ीन रखती हैं और अपनी बात कहने के बाद वे सबके बीच एक संयत दृश्य और विवेकवान वातावरण तैयार करने में सफल होती हैं। कविता का एक सौम्य और सुंदर चेहरा यह भी है जो हमें मोह लेता है। परिचय को तत्पर जो हमारी आँखों और स्मृति में स्थान बनाता है।

समकालीन हिंदी कविता इस दौर में जो देख और कह रही है। शांति नायर की कविता में भी कहने के स्तर पर उसमें से कुछ नहीं छूटता। उनकी कहन में उपयोग में लिए जाने वाले जो रूपक और अलंकार जो कि बेहद कम हैं, उनकी छटा प्रयोगात्मक हैं। कहने के दौरान भाषा से कम, स्वर के आरोह-अवरोह के उपयोग से तंज उत्पन्न करने की क्षमता से उनकी कविता एक हद तक संपन्न है। पाठक का साथ पाने में सफल होने वाली, यही उनकी कविता की असल शक्ति भी है। सामाजिक क्षरण उनकी कविता के केंद्र में है। जब उनकी कविता में क्षरण सामने आता है तो उसके प्रकार और तरीके भी दिखाई देने लगते हैं। निकृष्ट और अनैतिक राजनैतिक आचरण भी उनकी कविता की निगाह से नहीं बचता। उसे जैसे ही जगह मिलती है उसके कपट को वह सबके सामने रखने से नहीं चूकती। जब आप उसे पढ़ते तो उसका यह गुण उभरकर सामने आ जाता है।

उल्लेखनीय यह भी है कि शांति नायर की कविता घर परिवार के सदस्य की तरह हमारे साथ रहती है या इसे इस तरह भी कहा जाये कि एक कविता-परिवार में हम किसी कविता की तरह रहते हैं। वह दैनिक उपयोग की वस्तुओं और चर्याओं में हमें सांस लेती मिलती हैऔर उसकी सांस हमारी सांस से मिलती है क्योंकि तल्खी उनकी कविता का स्वभाव नहीं है तो स्त्री को लेकर उनके तेवर हिंदी की अन्य प्रमुख स्त्री कवियों जैसा नहीं हैं। मगर जहाँ भी उसका सामना होता है वह स्त्री के जीवन की विडंबना को सबके सामने रखने में देर नहीं करती। ऐसी कुछ कविताएँ अपनी घटना और परंपराजन्य परिस्थितियों और वातावरण के साथ इस संग्रह में मौजूद हैं।

शांति नायर की कविताओं की भाषा कविताओं के मर्म तक पहुँचने में आम बातचीत की भाषा-बोली के स्तर तक सहयोग करती है। उसने कुछ संस्कृत निष्ठ शब्दों को उपमाओं की तरह अपने उपयोग में लिया है। जो नव्यता का अहसास कराता है। संग्रह में शामिल एक कविता तो उन्होंने भाषा पर लिखी है। कथ्य और दृष्टि की प्रौढ़ता का आभास देते इस संग्रह में जीवन को जीवन में रहकर देखे जाने का भाव-वैविध्य मौजूद है।-

प्रतीक्षा अकेले जागती है
स्वप्नों की कोठी में जाकर
टिमटिमाती रोशनी में
कोई पुराना खत बांटती हुई
.
कालीख वाले बर्तन अब नहीं रहे
पर पोतने को उतारू हैं
कई अदृश्य हाथ
कालिमा तुम्हारे उलझे पंखों पर
.
इन्हीं दिनों शहर में कुछ ठेले लगने लगे थे
खट्टे ख़ास क़िस्म के फलों के रस
गली बाजारों में बिकने लगे थे
.
भिन्न हैं ये उम्दा हैं ये मेरे विचार
डिब्बे में बंद मेरे विचार
कभी सड़ते नहीं हैं
डिब्बे में बंद मेरे विचार
कभी बढ़ते भी नहीं हैं
.
केंद्र से परिधि तक की दूरी को
कहते हैं ‘त्रिज्या’….
केंद्र से परिधि तक की दूरी को
कहते हैं तिरिया

●हल्की चीजें आसानी से ऊपर उठ जाती हैं

●यह समय ऐसा है
तुम्हारे चारों ओर ध्वनिभेदी तरंगें हैं
तुम्हारे ऊपर है एक मजबूत ताक
जो बनी हुई है संशय और आशंकाओं से
रख दो तुम अपना सभी कुछ
ऊपर उसी मजबूत ताक पर

●इस पड़ोसी से बैर का गाढ़ा गोंद है
जो उस पड़ोसी से चिपका देता है

●व्यवस्था को स्त्रीलिंग में लिख दिया जाये
पर अधिकार हमेशा होता है पुल्लिंग

●मैं भाप बनकर उठ गई
मैं मेघ बनकर गरजी
मैं दामिनी बनकर कड़की
पर सुनकर पपीहे के बोल
मैं फिर बरखा बनकर बरस पड़ी

●रात अंधेरे में जागता है
पसलियों में सोया लाड़ला दर्द
डाल देती है खुद को
खौलती हुई नींद में उबरने के लिए

●इन्हीं की बदौलत महकता है
दौड़ती गाड़ी का जनाना डिब्बा

●सुना था मंदिर के बाहर ऊंचे पेड़ पर रहते थे भूत
अब वे दिन दहाड़े नीचे चबूतरे पर बैठने लगे हैं

●डाक्टर नाई दर्जी और जेबकतरे
सब कैंची वाले संकाय में आते हैं

●तुमने कहा क्यों करती हो फिजूल में
ये आजादी की बातें
हर स्त्री सुरक्षा चाहती है पुरुष से
मैनें भी कहा
हर स्त्री सुरक्षा चाहती है पुरुष से।

(राजकमल से प्रकाशित इस संग्रह में मीठीं-मोहक, मन को सुकून देने वाली सहज-संप्रेषणीय कविताएं हैं। आप भी पढ़िये)

 

पुस्तक: ज्यामिति (कविता संग्रह)

कवि: शांति नायर

प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

मूल्य: 170 रुपये (पेपरबैक)

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