समकालीन जनमत
पुस्तक

पवन करण के कविता संग्रह ‘स्त्री मुग़ल’ की पुस्तक समीक्षा

अलका बाजपेयी


‘स्त्री मुगल’ ( राधाकृष्ण प्रकाशन, 2023) पवन करण जी की 100 कविताओं का एक संग्रह है जो कि मुग़ल साम्राज्य के भीतर रहने वाली राजघरानों की महिलाओं की भावनाओं, संवेदनाओं को व्यक्त करता है। साहित्यिक कृतियों में और ख़ासकर काव्य विधान में तथ्यात्मक ऐतिहासिकता का प्रश्न गौण होता है कि क्या ‘वाकई ऐसा ही था। ‘इसलिए ये कविताएँ भी, मेरी समझ से, एक इतिहास की तरह नहीं देखी जानी चाहिए लेकिन, साहित्य घटनाओं से परे जाकर मानव मन की कुछ ऐसी अवस्थितियों, उधेड़ बुनों और आंतरिक मानवीय पुकारों को ज़रूर रचता है जो देश काल इतिहास की सीमाओं से परे जाकर उसे एक सर्वकालिक मानवीय चेतना का जीवंत दस्तावेज़ ज़रूर बनाती हैं।

इन्हीं अर्थों में पवन करण जी के इस कविता संग्रह को पढ़ा देखा जाना चाहिए। (अन्यथा साहित्य की बैसाखी के सहारे इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्याओं को सही ठहराने का खतरा मौजूद रहता है।) कवि ने अपनी कविताओं में मुग़ल दरबार की स्त्रियों की मनोदशा को इतनी संजीदगी से बरता है कि वास्तव में यह कविता संग्रह दरबारी पन से बाहर निकल पर व्यापक महिलाओं के हालातों और उनकी विडंबनाओं का एक प्रामाणिक साहित्यिक दस्तावेज बन जाता है।

इस किताब को पढ़ने के बाद जो बात दिमाग में सबसे तेज रोशनी करती है वह यह है कि स्त्रियाँ चाहे वे बादशाहों की बेगम हों, शहज़ादियाँ हों या बंदियाँ या फिर राजाओं की रानियाँ, राजकुमारियाँ या फिर दासियाँ – सभी की नियति एक ही होती है।

स्त्रियों की नियति पुरुष द्वारा बनाई गई बाहरी दुनिया की हरकतों, जंगों से अलग नहीं है। देखिए —
जिसे किसी ने सुना नहीं वह,
दुश्मन के खेमें की ओर बढ़ते
हुए कहा मैंने खुद से
औरतें जंग का हिस्सा न होते
हुए भी
जंग का हिस्सा होती हैं
खानजादा ।
(ख़ानज़ादा बेग़म कविता से)

किस तरह से महिलाएँ अपने समाज की हिफाज़त के लिए बहादुरी से खुद की कुर्बानियाँ देती हैं, उसके लिए यह पंक्तियाँ देखिए –
खुर्शीद, मैंने वहाँ से चलते
समय ही सोच लिया था
मुझे पाने के लिए जिस कबीले
को रौंदकर रख दिया बादशाह
बाबर ने, मैं
उसी कबीले की हिफाजत
का जिम्मा मांगूंगी।
(खुर्शीद कविता से)

कभी परिवार की इज्जत बचाने के लिए खुद को मिटा देना, इच्छा के विरुद्ध या इच्छा से —
मैं उनकी बेटी हूँ और बेटी को
उसके शौहर से अलग कर देने
का मतलब उसकी
गुलाब सी जिंदगी से खुशियां
नोच लेना है
जब कोई सूखती हुई बेल तुम्हें
दिखाई दे
समझ लेना मुगलिया फैसले
की मारी
वह कोई तैमूरी शहजादी है।
(हबीबा बेगम कविता से)

इतिहास तो पुरुषों के कारनामों का लिखा जाता रहा है। स्त्रियों के हिस्से का इतिहास कब लिखा जाएगा ,पता नहीं। मुगलिया सल्तनत की महिलाएं इस क्रूर हकीकत से रूबरू हैं कि भले ही
कुछ नाम तो इतिहास में दर्ज हो गए, लेकिन बहुत सारे नाम आज भी अनजाने हैं –
सच तो यह है कि खोई हुई
औरतों से भरी पड़ी
तारीख ने मुझे भी अपने में
दर्ज कर
लिया है
( अकीक बेगम कविता से)
महिलाओं की समाज में स्थिति उनके वर्ग से शायद ही तय होती हो, उनकी एक समान लैंगिक स्थिति है और वह यह है कि पुरुषवादी समाज में वे मात्र एक महिला की दशा में ही खुद को पाती हैं। जैसे –
राजपुतानियाँ हों या मुगलियाँ हों
बेगमें हों या शहज़ादियां वे
सब मेरी
और तुम्हारी तरह औरतें हैं
सबका इंतजार और प्यास
एक सी है।
(रोकय्या बेग़म कविता से )

पुरुषवाद के मद में चूर मर्द महिलाओं के जीवन, उनकी दशा और संवेदनाओं के बारे में कितना कम जानते हैं या कुछ नहीं जानते —
मुगल हों या राजपूत दोनों ही
हम औरतों के बारे में कितना
कम जानते हैं
तराजू के पलड़े में पोशाक और
पकवान
और दूसरे पलड़े में हमें
बिठाकर
तौलने में कोई हिचक नहीं
होती इन्हें
(रोकय्या बेग़म कविता से)

मज़हब चाहे जो हो लेकिन महिलाओं के जीवन में वह बेड़ियाँ ही बनता है। कारण यह है कि दुनिया के सारे धर्मों की बागडोर पुरुष के हाथ में ही है। इन बेड़ियों से मुक्ति की चाह रखने वाली स्त्रियाँ की एक दिली कसमसाहट को देखिए —
आपको चाहिए कि आप सब
दीन – ए- इलाही की जगह
दीन – ए – औरत
मजहब शुरू करें और उसे
चलाने की
जिम्मेदारी भी वे औरतों को
सौंपे ।
वह मजहब से बाहर निकलने
की सोचेगी
तो उसकी टांगे काट दी
जाएगी
वह दीन – ए – इलाही चलाने
को कहेगी
तो उसकी जुबान तराश दी
जाएगी
उसे उसका औरत होना नहीं
भूलने दिया जाएगा
(ख़ानम सुल्तान बेग़म कविता से)

मर्दवादी समाज में एक महिला की हैसियत एक देह है जो पुरुष के भोग के लिए है। भोग भी एकनिष्ठ नहीं बल्कि जैसे घर को बाज़ार के तमाम सामानों से भर लेना कि जब जो मन हो उस तरह से सामान को भोगा जाए। देखिए ये पंक्तियाँ –
एक बेगम के हाथों की मेहंदी
फीकी नहीं पड़ती कि अपने
पीछे
उसे दूसरी बेगम आती
दिखाई देती है ।
(कंधारी बेगम कविता से)

और अंत में, स्व से बाहर निकलकर दुनिया की तमाम महिलाओं के दुख दर्द और पीड़ा से खुद को जोड़ने की एक आत्मिक चीत्कार सुनिए जिसमें गहन बेबसी और ‘ दुनिया के मजदूरों एक हो ‘ की तर्ज पर ‘ दुनिया की महिलाएँ एक हो ‘ की एक घुटी हुई इच्छा दिखती है –
दुनिया की औरतों को बता
दें कि हम
मुगलिया औरतों की हालत
आपसे भी
ज्यादा ख़राब है
(अक़बराबादी बेग़म कविता से )

इस कविता संग्रह में में पवन जी ने जिस खूबसूरती से मुग़लिया राज घराने की महिलाओं की पीड़ा, उनकी छटपटाहट, उनकी बेबसी और जज़्बातों को कविता में ढाला है, वह वाकई क़ाबिले-तारीफ़ है और महिला केंद्रित साहित्य जगत में इस कविता संग्रह को एक विशिष्ट स्थान देता है ।


सामान्य प्रचलित स्त्री विमर्श इस धारणा पर आधारित है कि एक महिला ही किसी महिला के मन को पकड़ सकती है। पवन करण जी की ये कविताएँ इस मिथ को ध्वस्त करती हैं और उनके भीतर के एक सच्चे साहित्यिक की उस प्रतिभा और क्षमता को रेखांकित करती हैं जिसमें बिना ‘वह’ दुख भोगे भी एक रचनाकार पर-काया – प्रवेश कर सकता है और प्रमाणिक सहिया सृजन कर सकता है।

पवन करण जी इन अदभुत कविताओं के लिए बधाई के पात्र हैं । उनकी कविताएँ समीक्षा साहित्य आलोचना के प्रचलित मापदंडों का अतिक्रमण करती हैं और उन पर  पुनर्विचार किए जाने  की मांग भी  करती हैं।

पुस्तक: स्त्री मुग़ल (काव्य-संग्रह)

कवि: पवन करण

प्रकाशन: राधाकृष्ण प्रकाशन

मूल्य: 292 (पेपरबैक)

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