पवन करण
भाषा पत्थरों की मगर आहत नहीं करती किसी को: मुस्तफ़ा ख़ान की कविताएँ
मुस्तफ़ा ख़ान लंबे समय से कविताएँ लिख रहे हैं। समय-समय पर इनकी कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलती रही हैं। कविताओं के प्रकाशन में अंतराल इस संशय को भी जन्म देता रहा है कि कहीं समय उन्हें लिखने-पढ़ने से दूर लेकर तो नहीं चला गया। मगर कभी भी कहीं उनकी कोई कविता पढ़ने में आकर उनकी उपस्थिती को काव्यपरिदृश्य पर बनाये रखती रही है। अच्छा यह है कि उनका पहला संग्रह ‘पत्थरों की भाषा में’ अयन प्रकाशन से इस बरस प्रकाशित होकर आया है।
मुस्तफ़ा ख़ान की कविता इस मामले में ध्यान देने लायक है कि वह हिंदी कविता को अब तक छूटे हुए कुछ दृश्यों और घटनाओं से समृद्ध करने में एक हद तक सफल होती है। उनकी कविता हिंदी के पिछले पाँच-सात दशकों से कविता लिख रहे कवियों की कविता जैसी ही है। उसमें कम नयापन है। मगर कुछ दृश्य और घटनाएँ अदेखी हैं इसीलिये उनकी कविता ध्यान देने लायक है। इसी वजह से उनका पहला कविता संग्रह स्वागत योग्य है।
कविता में नौ सौ चूहे, बिल्ली और हज जैसा विषय मेरे पढ़ने में पहली बार आया है। संभव कई पाठकों को भी ऐसा ही लगे मगर यह है और चुनौती देता हुआ और ‘आस्था’ से भिड़ता हुआ है। कवि ने एक मुहावरे को कविता में लाकर किस तरह ‘हज्जन बिल्ली’ जैसी सर्वथा नूतन उपमा तक पहुंचाया है वह आश्वस्तिकारक है। ‘आस्था’ को लेकर बेचैनी हर कवि में है और उसका प्रतिकार भी। हम बस प्रतीकों को देखकर ही किसी को समूह और सोच का हिस्सा नहीं मान सकते। क्या इन पंक्तियों को पढ़कर आप कवि मन के सामाजिक भेद को रेखाकिंत कर सकते हैं-
उनके जूते मेरी चमड़ी के बने हैं
मेरे हाथों से झांकतीं रगो में बहता खून
उनके ट्यूवबैल के पानी से पतला है
मेरी टांगें उनके लट्ठ की मुटाई से कमजोर हैं
कानून की मोटी किताबें नोटों की गड्डीयों से पतली हैं।
कवियों की पीड़ाओं और चिंताओं के रंग एक से हैं। क्रियाओं के बदलने से वे बदल नहीं जाते। वह जानता है ईश्वर या अल्लाह की तरह बड़ा पेट भी एक ही है। जिसमें करोड़ों भूखे पेटों का दाना पानी समा गया है। सीमेंट, पत्थर, डामर, सड़कें, पुल, खेत, खेतों के हकदार और उनके बच्चे, खाली ज़मीने पगडंडियाँ, आम रास्ते, मकान योजनाएँ, परियोजनाएँ, राहत कार्य, बजट यहाँ तक कि आकाश समुद्र और हवा भी। समूचे संसाधन इस पेट की जद में है। इसके सामने कायदे-कानून बौने और आमजन असहाय हैं। बड़ी सरलता और मासूमियत से मुस्तफ़ा अपनी कविता में इतना सब कह जाते हैं। कवि को भाषा की ओट में अपनी चालाकी नहीं छुपाना चाहिये और जब वे यह भी कहते हैं कि मैं नहीं चाहता कि कभी मेरा भी हो जाये बड़ा पेट और खुद समा जाऊँ अपने या किसी बड़े पेट में, ईमानदार कवि और सहज नागरिक नजर आते हैं।
बारात में लाइट उठाये औरत, चुनाव में वाहन, इकतीस मार्च, ख़ुदा का घर और उसके बंदे, निठल्ले, ब्रॉयलर चिकन, पानी पाउच बेचते बच्चे लोहपीटे, प्रतिरोध के संप्रश्न, जिन्नों का शहर, कभी सोचा न था, जनाजे में शामिल लोग संग्रह की वे कविताएँ हैं जो कवि के कस्बाई और मोहल्लाई जीवनदृश्यों को पहचानने और उनको अपनी कविता का हिस्सा बनाने का संकेत देते हैं। कवि का जीवन और उसके कवि मानस को भी हम उसकी कविताओं में पहचान सकते हैं। अपनी कविता जैसा कवि या कवि जैसी कविता।
मुस्तफ़ा ख़ान के इस पहले कविता संग्रह को पढ़िये और अपनी कविता स्मृति का हिस्सा बनाईये।

