पवन करण
कोई भी भाषा हो वह दुर्जनों की ज़बान से बोले जाते समय कसमसाती होगी। जो ग़लत और झूठ बोला जा रहा है और उसके स्थान पर जो सच और सही बोला जाना चाहिए उसे कहने के लिए उसकी छटपटाहट उसके अलावा कौन महसूस करता होगा? और ज़बान सच कहने-लिखने के लिए कोई भी ख़तरा उठाने के लिए तैयार रहती होगी। शायद वह उसे हर रोज़ सैल्यूट करती होगी। सच कहने, सच कहकर प्रतिरोध रचने को तत्पर कोई लेखक, कवि, मनुष्य जब किसी शब्द की खोज में थक रहा होता होगा वह उसके आगे अपने भीतर से खुद निकालकर उस शब्द को रख देती होगी। फिर वाक्य और कथन या कविता ही बनती चली जाती होगी।
क्या भाषा यह सोचकर कि उसमें सच कहा जाये वह अपने लिए बोलने-कहने वाले का चयन भी स्वयं करती होगी। क्या संसार की सभी भाषाओं के सच कहने-बोलने को अभिशप्त लेखक, पत्रकार, विचारक, व्याख्याता, इतिहासकार, कवियों को उनकी भाषा ने चुना है। ये मात्र एक कल्पना है मगर कितनी अनूठी और आवश्यक। यदि ऐसा नहीं तो किसी भाषा में सच का उत्थान स्थापित करने के फेर में अपने लिए संकट पैदा करने को व्यग्र कहने-रचने को लेखक-कवि कहाँ से चले आते हैं। इसे भाषा की ज़िम्मेदारी मानने से नहीं बचा जा सकता। दुनिया में भाषा को माध्यम बनाकर राष्ट्रवादी-सांप्रदायिक कथनों से नागरिकों को अतीतजीवी बनाकर उनके वर्तमान को हथियाने के षडयंत्र को सफल होते ‘भाषा ने जिन्हें कहने के लिए चुना है’ वे देख रहे हैं। मगर उनकी संख्या कम बेहद कम है और जिन्हें भाषा के रास्ते अपना कुंदजहनी बनाया जाना दिखाई नहीं दे रहा उनकी संख्या बहुत ज्यादा।
तब क्या भाषा ने खुद के आपराधिक दुरुपयोग के लिए स्वयं को सत्ता में जमे और जमते जा रहे राष्ट्रवादी कट्टरपंथियों को सौंप दिया है? जबाव होगा नहीं। दुनिया की अधिकांश संपदा जिस तरह कम शक्तिशाली लोगों के हाथों में है। भाषा की वह भावना जिसके चलते वह मनुष्य के पक्ष में बनी रहना और बरती जाना चाहती है, वह भी कुछ लोगों के हाथों में है। अंतर बड़ा है संपदाधारी हर समय समाज का शोषण करके सीमारहित लाभ कमाना चाहते हैं जबकि भाषा के चुने लेखक कवि समाज को शोषण से बचाते हुए उसकी समझ को पोषित करना चाहते हैं। निशाने पर वे हैं जिन्हें सच दिखलाने के लिए भाषा ने चुना है। निशाना वे लगा रहे हैं भाषा जिनकी जुबान से बोली जाती झूठी कहला रही है।
‘गहन है यह अंधकारा’ महाकवि निराला की कविता की पंक्ति है। ऐसे ही दौर के लिए लिखी गई। इसी पंक्ति के शीर्षक से वाम प्रकाशन से कवि संजय कुंदन के संपादन में हिंदी भाषा द्वारा प्रतिरोध रचने के लिए करोड़ों के बरक्स चुने गये सैकड़ों कवियों में से बीस कवियों की पचहत्तर कविताओं को प्रकाशित किया है। इसमें शामिल कवियों की ही नहीं इसमें प्रकाशित होने से रह गये कवियों की भावनाओं की भी तीक्ष्णता इसमें समावेशित है।
इस कविता संग्रह का प्रकाशन इस मामले में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें शामिल लगभग कविताएँ हिंसक राष्ट्रवादी आड़ में भारत के तात्कालिक राजनैतिक-सामाजिक वातावरण में सांप्रदायिक, कट्टरपंथी, विभाजनकारी बहुसंख्यकवादी फैलाव के विरोध में एकजुट होकर सामने आती हैं। इसे भारत में रचनाकारों का एक और प्रतिनिधित्व माना जा सकता है। है भी।
कवि मरने से डरने को तैयार नहीं हैं।
कवि डर से मरने को तैयार नहीं है।
उन कवियों को उनकी भाषा मरने नहीं देगी
जिन कवियों को उनकी भाषा ने चुना है
‘प्रतिकार की इस एक और पहल’ इस संग्रह में शामिल कवि अपनी भाषा के चुने प्रिय और पहचाने कवि हैं। उनकी इन कविताओं का एक जिल्द में होना उल्लेखनीय तो है ही पाठ के स्तर पर भी वे एक नया अनुभव रचती हैं।
आप इसे पढ़ेंगे आपकी भाषा को संतोष मिलेगा।
पुस्तक: गहन है यह अन्धकारा
सम्पादक: संजय कुंदन
प्रकाशक: वाम प्रकाशन
मूल्य: 244 रुपये

