समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

फासीवाद को मुँह चिढ़ाता ‘‘ एंटिफा ’’

( श्रीनिवासन रमानी का यह लेख ‘ द हिन्दू’ में 21 सितंबर को प्रकाशित हुआ है। समकालीन जनमत के पाठकों के लिए इसका हिंदी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है )

मई 2020 में अफ्रीकी-अमेरिकी जार्ज फ्लाॅयड की हत्या के बाद उपजे ‘‘ ब्लैक लाइव्स मैटर ’’ प्रदर्शनों के बाद अभी हाल में ही डोनाल्ड ट्रम्प के करीबी कंजर्वेटिव कार्यकर्ता चार्ली किर्क की हत्या से बौखलाये अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक बार फिर फासीवाद विरोधी आन्दोलनों को निशाने पर लिया है और इस एंटिफा (एंटी-फासिस्ट) को आतंकवादी सगठनों की सूची में डालने की मंशा जाहिर की है।

बीते बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने घोषणा की है कि वह फासीवाद विरोधी आन्दोलन (एंटिफा) को आतंकी सगठनों की सूची में डालने जा रहे हैं। यह दूसरा मौका है जब डोनाल्ड ट्रम्प ने इस प्रकार की कोई घोषणा की है।

इसके पहले मई 2020 में भी अफ्रीकी-अमेरिकी जार्ज फ्लाॅयड की हत्या के बाद उपजे ‘‘ब्लैक लाइव्स मैटर’’ प्रदर्शनों के बाद इसी प्रकार की घोषणा वह कर चुके हैं। इस बार ऐसी घोषणा कंजर्वेटिव कार्यकर्ता चार्ली किर्क की हत्या से जुड़ी हुयी है। उसकी हत्या के बाद से ही ट्रम्प प्रशासन ने तमाम वामपंथी-सक्रियताओं से दो-दो हाथ करने का मन बना लिया है।

‘ एंटिफा ’ किसी भी मायने में कोई वास्तविक संगठन नहीं है, बल्कि इससे अधिक यह एक ऐसा सैद्धान्तिक एवं राजनीतिक आन्दोलन है जिसमें वे विभिन्न स्वतंत्र समूह सक्रिय रूप से भाग लेते हैं जिनके लक्ष्य एक होते हैं- ऐसे लोगों एवं समूहों से मुठभेड़ करना जिन्हें वे फासीवादी मानते हैं, जो श्वेत-श्रेष्ठता के हामी होते हैं, जिनकी मान्यतायें धुर-दक्षिणपंथी होती हैं या जो अतिवादी कार्यक्रमों में संलिप्त होते हैं। इस आन्दोलन की न तो कोई नियंत्रक संरचना होती है और न ही कोई केन्द्रीय नेतृत्व।

न्यूयार्क टाइम्स ने न्याय विभाग के सुरक्षा प्रभाग के पूर्व कार्यकारी प्रमुख मेरी मैक-काॅर्ड सरीखे विधिवेत्ता के कथन का उल्लेख करते हुये कहा है कि इस प्रकार के विकेन्द्रित आन्दोलन को आतंकवादी सगठन घोषित किये जाने का कोई विधिसम्मत तरीका है ही नहीं।

‘ ट्रुथ सोशल ’  पर ट्रम्प द्वारा एंटिफा को ‘‘एक मौलिक-वाम आपदा (रेडिकल लेफ्ट डिज़ास्टर)’’ और एक ‘प्रमुख आतंकी सगठन’’ घोषित किया जाना अमेरिकी राजनीति में एक प्रबल रूढ़िवादी व्यवस्था के पैरोकार वैचारिक-तंत्र का प्रतीक है। रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक समूहों के साथ साठ-गाँठ कर के, विशेषतः इंटरनेट द्वारा संचालित ‘‘आल्ट-राइट’’, साजिशी सोच एवं ‘‘ मागा ’’ कार्यकर्ताओं के मेलजोल के माध्यम से समय के साथ परवान चढ़ती यह रूढ़िवादी सोच, इस पुरानी पार्टी को धुर-दक्षिण की ओर धकेलने में लगी हुयी है। फाॅक्स न्यूज़ जैसा रूढ़िवादी मीडिया घराना भी अक्सरहा वाम-समूहों, जिनमें ‘एंटिफा’ समूह भी है , पर हमले के लिये जोर-शोर से आह्वान करता रहता है।

यह सम्भव है कि किर्क की हत्या को लेकर ध्रुव-दक्षिण समूहों में अमेरिकी राष्ट्रपति का क्रोध ज़ाहिर हो, लेकिन इसके लिये एंटिफा को औपचारिक रूप से दोषी ठहराना कठिन है। अमेरिकी विधिवेत्ताओं का दावा हे कि संघीय कानूनों के अनुसार विदेशी आतंकी संगठनों पर यह ठीकरा फोड़ा जा सकता है पर घरेलू कानूनों में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है। यह हो सकता है कि ट्रम्प रिपब्लिकन-नियंत्रित कांग्रेस को इसके लिये कटघरे में खड़ा करने का प्रयास करें पर अभिव्यक्ति एवं सभा करने की स्वतंत्रता में किये गये प्रथम संशोधन के कारण उनकी यह चाल भी विधिक चुनौतियों के दायरे में आ सकती है। ऐसे में एंटिफा पर ही निशाना साधना उनकी रणनीति के लिये लाभकर हो सकता है, वामपंथी कार्यकर्ताओं पर एक हल्लाबोल चला कर और असहमति की रगों में कँपकँपी पैदा करके इस राजनीतिक कदम को विधिमान्य बताया जा सकता है।

 

ऐतिहासिक सन्दर्भ

फासीवाद-विरोधी आन्दोलन की जड़ें 1930 के यूरोप में तलाश की जा सकती हैं, उस दौर में नाजीवाद एवं फासीवाद के उभार के विरुद्ध कार्यकर्ता संगठित हो गये थे। इतिहासकार मार्क ब्रे ने अपनी पुस्तक ” एंटिफा : द एंटी-फासिस्ट हैंडबुक ” में कहते हैं कि 1932 में जर्मनी की कम्युनिस्ट पार्टी ने गली-गली में नाजियों का विरोध एवं प्रदर्शन करने के उद्देश्य से ‘एंटीफासिस्टश्यास्चू ऐक्स्च्यू’ की स्थापना की थी।

एडोल्फ हिटलर के सत्ता में आने के साथ ही इस समूह को जबरन नेस्तनाबूद कर दिया गया था। वह यह भी लिखते हैं कि इसका ऐतिहासिक दृष्टान्त लन्दन के 1936 के ‘‘बैटिल ऑफ कैबिल स्ट्रीट ’’ में भी ढूँढा जा सकता है जिसमें फासीवादियों के ब्रिटिश संगठन के मुकाबले में वहाँ के यहूदी निवासी और वामपंथी प्रदर्शनकारी उठ खड़े हुये थे।

आधुनिक एंटिफा-आग्रही इसे इस बात का सबूत मानते हैं कि किसी फासीवादी कदम के खिलाफ मजबूती से खड़े होकर ही उसको ताकतवर बनने से रोका जा सकता है।

ब्रे के अनुसार इस आन्दोलन की उत्पत्ति 1980 के नस्लवाद विरोधी- एंटी-रेसिस्ट एक्शन (एआरए) समूह से हुयी जो बाद में जाकर एक अव्यवस्थित मशाल-संजाल (टाॅर्च नेटवर्क) के नाम से जाना गया। इसकी मुठभेड़ श्वेत-श्रेष्ठता के हामियों से भी हुयी थी। वर्जीनिया के शर्लोट्सविल में 2017 में आयोजित ‘‘यूनाइट द राइट’’ रैली के साथ हुयी हिंसक झड़प बाद के बाद यह आन्दोलन पर्याप्त चर्चा में आया था।

उन घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी प्रिंसटन के प्रोफेसर काॅर्नेल वेस्ट का कहना है कि उस दिन फासीवाद विरोधियों की भूमिका रक्षात्मक रही। सैद्धान्तिक रूप से सामान्यतः एंटिफा के सदस्य वाम-झुकाव वाले होते हैं, हाँलाकि उनमें से अनेक अराजकतावादी, पूँजीवाद-विरोधी और तानाशाही-विरोधी विचार भी रखते हैं। उनका डेमोक्रेटिक पार्टी से कुछ भी लेना-देना नहीं है।

युक्तियाँ एवं विवाद

एंटिफा की कार्यशैली से प्रगतिशील तबके में गम्भीर दरार पड़ गयी है। इस आन्दोलन में अहिंसक-सक्रियता से लेकर सामने से मुठभेड़ करने तक विभिन्न युक्तियों का प्रयोग जाता है जिनमें कभी-कभी आमने-सामने की तू-तू-मैं-मैं और सम्पत्तियों का तोड़फोड़ भी शामिल होते हैं। उनकी डिजिटल सक्रियता में ‘डाॅक्सिंग’ (विरोधियों की निजी जानकारियाँ भी ऑनलाइन उजागर करना) और ‘नो-प्लेटफाॅर्मिंग’ (तथाकथित फासीवादियों के कार्यक्रमों में इतनी बाधा डाल देना कि उन्हें अपना कार्यक्रम ही निरस्त कर देना पड़े) भी शामिल हो सकते हैं।

इस प्रकार की उत्पाती रणनीति का विरोध खुद वाम के भीतरखाने भी होता है। वयोवृद्ध बुद्धिजीवी नोम चोम्स्की का कहना है कि इस प्रकार की कार्यवाहियाँ ‘‘ दक्षिण-पंथ के लिये वरदान ’’ होती हैं क्योंकि वे वाम राजनीतिक लक्ष्य को कमतर बना सकती हैं। इस दृष्टिकोण का समर्थन विद्वज्जन इस प्रकार करते हैं कि हिंसा पर आधारित आन्दोलनों की तुलना में अहिंसक आन्दोलन प्रायः अधिक सफल होते हैं। वहीं दूसरी ओर ब्रे जैसे फासीवाद-विरोधी हिंसक आन्दोलन के समर्थकों का मानना है कि ‘‘फासीवादी खतरे का लड़ाकू फासीवाद-विरोधी जवाब दिया जाना इतिहास-सिद्ध है।’’

ऐसे विवादों के बावजूद अमेरिका में एंटिफा और धुर-दक्षिणपंथी अतिवाद के बीच का अंतर स्पष्ट है। मैरीलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गैरी ला-फ्री के शोध से पता चला है कि किसी भी आतंकवादी घटना का एंटिफा से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है। यह निष्पत्ति एफबीआई के आंकड़ों से भी स्थापित होती है और यही कारण है कि अमेरिकी अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सियों ने एंटिफा को कभी प्रबल आतंकी खतरा नहीं माना। इस प्रकार के नाम-निर्देश के लिये ट्रम्प का अनवरत दबाव एक सुविचारित राजनीतिक पैंतरेबाजी प्रतीत होती है। इससे पुलिस को ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में बड़ी तेजी से उभर रहे जनांदोलनों को ज्यादा सख्ती से कुचलने और असहमत समूहों की हड्डियों में सिहरन पैदा करने का बहाना मिल सकेगा।

ट्रम्प जिस प्रकार एंटिफा की भयावहता को बढ़ा-चढ़ा कर बता रहे हैं वह कुछ नया नहीं है। 2020 में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ प्रदर्शनों के दौरान एंटिफा-कार्यकर्ताओं के बारे मेें गढ़ा गया झूठा विमर्श स्थानीय जाति-समूहों- अधिकांशतः रिपब्लिकन नेताओं और कन्ज़र्वेटिव मीडिया के आकाओं- के दुष्प्रचार के माध्यम से, बहुत तेजी के साथ 41 अमेरिकी शहरों में फैल गया था जबकि पुलिस विभाग ने बाद में खुद स्पष्ट किया कि इस प्रकार का कोई संकट न तो था और न कहीं कुछ घटित ही हुआ था।

एंटिफा की विकेन्द्रित प्रकृति से यही ध्वनित होता है कि व्यावहारिक दृष्टि से पारम्पिरिक आतंकवाद-विरोधी संदर्भ में यह अर्थहीन है, परन्तु वामपंथी-कार्यकर्ताओं की बढ़ी हुयी निगरानी और उनके प्रतारण को विधिक-मान्यता देने के लिये इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। ट्रम्प को अपने प्रथम कार्यकाल के बर-अक्स, इस बार ऐसे कदम उठाने के लिये कम आन्तरिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि वर्तमान प्रशासन में उनके वफादार पहले से अधिक महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं।

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