समकालीन जनमत
कहानी

‘ ऐ लड़की ’ : परिवार के व्यर्थताबोध की कहानी

 

“आधुनिक वैयक्तिक परिवार नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित है”-एंगेल्स

कृष्णा सोबती की चर्चित लम्बी कहानी ’ ऐ लड़की ’ माँ-बेटी के मूल्यों, विचारों और दृष्टियों की टकराहटों और आपसी नोक-झोंक को समेटती उनके परस्पर लगाव, जुड़ाव और आपसी समझ को साकार करती एक अनूठी कहानी है। यह कहानी माँ-बेटी के रिश्तों की उलझन भरी बारीकियों और जटिलताओं को बहुत ही संयम और धैर्य के साथ सुलझाती उसे एक नया आयाम देती है। माँ-बेटी के जटिल लेकिन गहरे लगाव और जुड़ाव के इर्द-गिर्द इसमें स्त्री-पुरुष, घर-परिवार और संतान से स्त्री के सम्बन्धों की गहन पड़ताल है। इसके साथ ही स्त्री के अपने चुनाव, निजता, स्वतंत्रता और आज़ादी के सवाल को भी उठाया गया है। मृत्यु की छाया में जीवन से जुड़े ज्वलन्त प्रश्नों और सम्बन्धों पर किये गये विचार-विमर्श में एक दार्शनिक ऊँचाई है। एक स्त्री के समग्र जीवन के अनुभवों के निचोड़ और निष्कर्षों ने इसे विश्वसनीय और अर्थगर्भ बनाया है। ऊपर से अलग, विपरीत और विरोधी दिखने वाली बेटी सिर्फ भौतिक और शारीरिक रूप से ही नहीं माँ के जीवन के निष्कर्षों की भी तार्किक परिणति है। इसलिए माँ-बेटी का असहज रिश्ता कहानी के अंत में दोस्ती में तब्दील हो जाता है, जहाँ दोनों में एक दूसरे के प्रति सहृदयता, समझ और सम्मान का भाव है।

यह कहानी मृत्यु के करीब पहुँची एक उम्रदराज मध्यवर्गीय महिला की मनःस्थिति और मनोविज्ञान को भी उजागर करती है; जीवन पर जिसकी पकड़ धीरे-धीरे छूटती जा रही है। उसके पास उतरने के लिए स्मृतियों का एक अंतहीन तहखाना है। घर-परिवार में गहरे तक धँसी यह स्त्री परिवार से अपेक्षित प्रतिदान न मिलने के बावजूद जीवन से निराश और हताश नहीं है। आसन्न मृत्यु का अहसास भी उसे जीवन के बाकी बचे पलों को सम्पूर्णता में जीने से रोक नहीं पाता।

इस कहानी की मुख्य चरित्र माँ की गिरकर कुल्हे की हड्डी टूट चुकी है और वह चलने-फिरने से लाचार है। बिस्तर पर पड़े-पड़े उसकी पीठ में घाव बन चुका है, जो फैलता ही जा रहा है। बिस्तर पर पड़ी माँ भले ही चल-फिर नहीं पा रही हो पर उसकी समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय हैं। वह हर आहटों, आवाजों को पहचानती हुई सजग और चौकन्नी है। पिता पहले ही गुजर चुके हैं। माँ ने एक संयमित और व्यवस्थित जीवन जिया है। वह खुले दिल की है। बीमारी की अवस्था में भी हँसी-मजाक करना नहीं भूलती। आमतौर पर वृद्धजनों में शिकायत की प्रवृत्ति और दुखों का रोना ज्यादा होता है। इस स्त्री में गजब का आत्मसंयम और नियंत्रण है। उसका जीवन में अगाध विश्वास है। दुनिया उसके लिए बहुत खूबसूरत है। घर-परिवार और बच्चे इसे और भी सुन्दर और सार्थक बनाते हैं। वह एक जिन्दा दिल इन्सान है। वृद्ध और बीमार होती हुई भी जीवन से भरी हुई। उसमें चुहल और अजीब तरह का खिलंदड़ापन भी है। वह इस विषम परिस्थिति में भी जीवन और सम्बन्धों पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं है। उसकी इच्छा शक्ति बहुत मजबूत है।

कहानी की मम्मू एक कठिन स्थिति में है। उसके मन में सोच-विचार और स्मृतियों की लहरें उठती-गिरती रहती हैं। कभी नकारात्मक तो कभी सकारात्मक विचार आते-जाते हैं। वह अपने उस दौर में है जब शरीर साथ छोड़ने लगता है और इन्द्रियाँ ज्यादा सजग और सक्रिय हो उठती हैं। मन की खिड़कियों से अच्छे-बुरे दिन झाँक जाते हैं। माँ के विचार मृत्यु पर केन्द्रित न रहे इसलिए बेटी जान-बूझकर माँ की किसी बात के सिरे को पकड़ कर उसे अच्छी यादों की तरफ मोड़ देती है। माँ के पास स्मृतियों का अथाह संसार है। वह बार-बार उसमें लौटती है। स्मृतियाँ ऊन के गोले की तरह लुढ़क कर फैलती चली जाती है। वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की मानिंद उसमें खिंची चली जाती है। ये स्मृतियाँ उसके जीवन का अविभाज्य हिस्सा हैं; जिसे उसने एलबम की तरह सहेज कर रखा है। अचानक उसका कोई पृष्ठ खुलता है और वह उसमें खो जाती है। उसके समक्ष अब जीवन की हरी-भरी घाटियाँ नहीं, पतझड़ में गिरते पत्तों की तरह स्मृतियों का सैलाब है। मूलतः यह स्मृतियों में बिखरे टुकड़े-टुकड़े जीवन को बीनती हुई कहानी है।

मृत्यु जीवन का शाश्वत सत्य है। यह जीवन के साथ परछाई की तरह चलता है। यह मानवीय जीवन की सच्चाई है कि जीवन शरीर में ही साकार होता है पर एक स्थिति ऐसी भी आती है जब शरीर बोझ बन जाता है और मनुष्य यंत्रणा में उससे मुक्ति की कामना करने लगता है। शरीर हमारा अपना होता है। इस शरीर का दुःख भी हमें खुद ही झेलना पड़ता है। दूसरा किनारे पर बैठा हमारी अकुलाहट, छटपटाहट का अंदाजा लगा सकता है। सहानुभूति भी रख सकता है पर हमारा दुख कम नहीं कर सकता। इस कहानी की मुख्य चरित्र माँ को परिस्थितियों ने मृत्यु की दहलीज पर ला खड़ा किया है। लेकिन वह मृत्यु से भयभीत नहीं है। उसने उसे सहज स्वाभाविकता के साथ स्वीकार किया है। अपनी आसन्न मृत्यु के प्रति उसमें एक अजीब तरह की निर्लिप्तता और निस्संगता है। वह सत्य से आँखें नहीं चुराती और न ही मृत्यु के समक्ष उसने समर्पण किया है।

माँ का भरा पूरा परिवार है। बेटे-बेटी, बहु, पोते-पोती, नाती-नातिन सब कोई है पर वह छोटी बेटी के साथ अकेली रहती है। सब की आस, सबकी याद बनी हुई है। हर आहट पर लगता है, उनमें से कोई लौटा है पर कोई आता नहीं है। फिर भी वह दुखी नहीं है। किसी को दोष और उलाहना नहीं देती। वह अत्यन्त सहनशील है। उसे दुखों को जज्ब करना आता है। वह बहुत दिलेरी के साथ मृत्यु की प्रतीक्षा कर रही है। अपना दुःख-दर्द प्रायः छिपाती है। खुद को लेकर उसकी शिकायत बहुत कम है। तकलीफ बर्दाश्त करने की उसमें अद्भुत क्षमता है। वह इतनी जिन्दा दिल है कि अपनी मौत के बारे में भी चुहल करती है। हँसी-मज़ाक से माहौल को हल्का बनाये रखती है। वह स्त्रियों के दर्द सहने की क्षमता का सम्बन्ध प्रसव पीड़ा से जोड़ती है।

जिजीविषा कृष्णा सोबती के कथा साहित्य का केन्द्रीय तत्व है। इस कहानी की माँ भी बीमारी, दुःख-दर्द को एक झटके में परे रख कर अपनी ज़िन्दगी के बाकी बचे पलों को अपनी इच्छानुसार जीना चाहती है। बीमारी और पीड़ा में उसने अपने आप को लिपटाया नहीं है। वह उन सबसे परे निर्लिप्त है। वह जीवन में इतने गहरे तक रची-बसी है कि उसे उन प्राचीन भारतीय विश्वासों पर तनिक भी भरोसा नहीं है, जो जीवन और संसार को माया मानता है। उसे इस जीवन में ही सारे सौन्दर्य और सत्य का अहसास होता है। वह जीवन को डूबकर जीने की प्रबल पक्षधर है। इस जीवन और संसार का अनुभव उसे अनोखा, अद्भुत और अनश्वर जान पड़ता है। उसे विश्वास है कि जीने के लिए जीवन के समर में उतरना पड़ता है। किनारे बैठ कर जीवन का आनंद नहीं लिया जा सकता। जैसे-जैसे मृत्यु उसके करीब आती है, जीवन और प्रकृति के प्रति उसका आकर्षण बढ़ता चला जाता है।

कोरस द्वारा ‘ ऐ लड़की ‘ की नाट्य प्रस्तुति का एक दृश्य

 

यह पृथ्वी, यह संसार इतना सुन्दर, वैविध्यपूर्ण और रहस्यमय है कि लम्बी ज़िन्दगी जी कर भी मम्मू को लगता है कि बहुत कुछ छूट रहा है। इस संसार की अतीव सुन्दरता, निरन्तरता और अमरता में उसे गहरा विश्वास है। वह उसे अभी भी पूरी शक्ति के साथ अपनी ओर आकर्षित करता है। वह बेटी से कहती भी है-“आकाश में उड़ते पाखी तो देखे हैं न तुमने! टहनियों से फूटती हरी-हरी कोंपलें भी देखी होंगी! बदलती रूत की हवाएँ भी महसूस की होंगी! ओस-जड़ी घास पर नंगे पाँव तो चली हो न! सरदियों की गुनगुनी धूप भी सेंकी होगी! लड़की, दुनिया में क्या से क्या नेमतें भरी पड़ी हैं” (कृष्णा सोबती/’ऐ लड़की’/राजकमल पेपर बैक्स संस्करण 2018/पृ.-48)।

इस कहानी की लड़की का चरित्र अत्यंत संयमित है। उसमें भी माँ की तरह गजब का आत्म नियंत्रण है। वह प्रायः अपने को ढील नहीं देती। माँ के प्रति अपनी भावनाओं को भी नियंत्रित रखती है। उसमें भरपूर सहनशीलता है। माँ के तंज का भी तीखेपन से जवाब नहीं देती। वह दूसरों की शिकायत से भी बचती है। माँ की तकलीफदेह बीमारी की स्थिति में भी उसका निरन्तर बोलना किसी भी युवती में चिड़चिड़ेपन का भाव पैदा कर सकता है पर उसके व्यंिक्तत्व पर इसका नामोनिशान नहीं है। वह बहुत जल्दी न तो उत्साह में आती है और न ही उसे उदासी घेरती है। वह मैदानी नदी की तरह शांत और गंभीर है। आत्म सम्मान और आत्म गौरव से भरी हुई। इस अर्थ में वह माँ के करीब है। वह वस्तुतः माँ की अनुभवप्रसूता है। उसके जीवन की निचोड़ और निष्कर्ष। एक बार माँ बेटी से कहती भी है-“यात्रा मेरी और निचोड़ तुम्हारा”।

माँ के समस्त घर-परिवार, नेह-नातों के अनुभवों और स्मृतियों को झुठलाती बेटी उसके समक्ष चुनौती की तरह है, जिसे वह बार-बार सम्बोधित करती है। उसके स्त्री होने और स्त्री जीवन की सार्थकता का अहसास कराती है। माँ जिस अवस्था में है, बेटी उससे टकराने से बचती है। प्रायः चुप रहती है और कभी-कभी प्रतिरोध में कमरे से बाहर चली जाती है।

माँ और बेटी का रिश्ता सिर्फ हाड़-मांस का रिश्ता नहीं है। माँ उसे शरीर के साथ-साथ अपनी कल्पना और स्वप्न से भी रचती है पर दोनों का जुदा होना मानवीय नियति है। अन्ततः दोनों दो व्यक्तित्व हैं। अतः एक दूसरे की छायाप्रति नहीं हो सकते। इस कहानी में माँ खुद से बेटी की भिन्नता को स्वीकार करती है। कभी-कभी वह बेटी में खुद को भी देखती है। उससे जीवनी शक्ति प्राप्त करती है। वह बेटी के अकेलेपन को लेकर चिंतित है। वह उसके जीवन में जमे बर्फ को पिघलाना चाहती है। उसके जीवन की मरूभूमि में सब्जबाग के सपने उतारना चाहती है। पल भर की उसकी खिलखिलाहटों को सुरक्षित पकड़ लेना चाहती है। वह मानती है कि पुरुष के बिना स्त्री का जीवन निरर्थक और बेकार है। उसके जीवन में आने से ही राग और रंग लौटता है। लेकिन इसके साथ ही वह उसकी निजता और स्वतंत्रता का सम्मान भी करती है। बेटी भी बीच-बीच में माँ को छेड़ती है। माँ की लाग-डाँट भी बनी रहती है। वह बेटी को झिड़कती भी है तो प्यार से। बेटी के प्रति सख्ती-नर्मी का उसका खेल चलता रहता है। कभी अचानक वह सख्त हो उठती है तो अगले ही क्षण मक्खन की तरह मुलायम। इस नोक-झोंक के बावजूद दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह समझती हैं। लड़की पहले थोड़ा-बहुत खीजती थी पर बाद में दोनों की आपसी समझदारी बढ़ती है। कहानी के अंतिम हिस्से में माँ जब बेटी के कमरे में आती है तो बेटी के आमंत्रण पर दोनों सिगरेट पीते हैं। इसके बाद की बातचीत में आत्मीयता ज्यादा है। यहाँ सिर्फ माँ का एकालाप नहीं है। दोनों के बीच सच्चा और सार्थक संवाद है।

आमतौर पर माता-पिता चाहते हैं कि उसकी संतान समाज के बने-बनाये ढर्रे पर चले ताकि उसे परेशानियों का सामना करना न पड़े। इन ढर्रों को चुनौती देने के अपने खतरे हैं। माता-पिता उन्हें इन खतरों से बचाना चाहते हैं। यही कारण है कि वैवाहिक जीवन के परंपरागत स्वरूप को नकारने के कारण माँ बेटी से खिन्न और अप्रसन्न है। वह बेटी की शादी, घर-परिवार और भविष्य को लेकर चिंतित है। इन सबके बिना उसे अधूरी मानती है। उसका अकेला रहना उसे अखरता है। वह चाहती है कि वह अपने को कसे और काबू में न रखे। माँ जानती है कि बेटी ने स्त्री के घर-परिवार वाले परंपरागत स्वरूप को अस्वीकार किया है पर इस नयी सोच के अनुरूप उसने नये सम्बन्ध विकसित नहीं किये हैं। अतः वह बार-बार इशारों में उससे पूछती है कि उसने अपना मनचाहा किया ? उसने किसी को अपना दोस्त क्यों नहीं बनाया ?

इस कहानी में माँ-बेटी के रिश्ते आपस में बदल गये हैं। माँ बेटी की तरह हो गयी है और बेटी माँ की भूमिका में ज्यादा जिम्मेवार। यह सच्चाई है कि वृद्ध होकर व्यक्ति फिर से बच्चा बन जाता है और बच्चे मजबूत सहारा बन जाते हैं। माँ बेटी पर तंज कसती है। उसे छेड़ती है, सीख देती है पर बेटी कुढ़ती और ऊबती नहीं है। कभी-कभी मीठी चुटकी लेती है। दोनों के बीच एक अदृश्य डोर है, जिससे दोनों एक दूसरे के मन को समझती हैं और संतुलन बनाये रखती हैं। एक तरह से यह दो अकेली स्त्रियों की कहानी है। माँ का भरा-पूरा परिवार है पर अपने समस्त दर्द और पीड़ाओं के साथ मृत्यु के आगमन की प्रतीक्षा में वह अकेली है और बेटी गृहस्थ जीवन को न चुनकर अकेली। दोनों में अन्तर यह है कि माँ के पास घर-परिवार की स्मृतियों का एक सघन संसार है, जिसमें वह बार-बार लौटती है पर बेटी के पास यह पूँजी नहीं है। माँ के विचार परंपरागत आम मध्यवर्गीय स्त्री के विचार हैं। जीवन के अनुभवों ने उसे नए तरह से सोचने के लिए प्रेरित किया है। माँ का रूखापन और तंज धीरे-धीरे कम होता जाता है। माँ-बेटी अंत में सखी-सहेली जैसा व्यवहार करने लगती है।

मातृत्व एक विलक्षण अनुभव है। यह स्त्री को विशिष्ट रचनात्मक गरिमा प्रदान करता है। माँ के रूप में उसकी समस्त सृजनात्मक ऊर्जा साकार हो उठती है। वह उसका एक स्वाभाविक प्राकृतिक कर्म है। वह संतान में अपनी छवि देखती है। उसे आकार देती है। अपनी महत्ता और सार्थकता को उससे जोड़ लेती है। इसीलिए हमारे शास्त्रों और पुराणों में माँ की महिमा का गुणगान है। इस कहानी की माँ भी स्त्री के सृजनधर्म और मातृत्व को गौरवान्वित करती है। उसे लगता है कि अपनी गर्भावस्था के दौरान स्त्री कुछ विशिष्ट हो जाती है। कुछ अलग तरह की क्षमताएँ और विशिष्टताएँ उसके भीतर पैदा हो जाती हैं। इन दिनों वह प्रकृति से एकाकार हो उठती है। माँ बेटी से कहती है-“लड़की, बच्चा बनाना एक तरह का यज्ञ ही है री ! इन दिनों औरत पूरे ब्रह्माण्ड से शक्ति के कण खींचकर अपनी ऊर्जा ज्वलित कर लेती है। अपने में कुछ विशिष्ट हो जाती है। अपने अन्दर का आकाश निरखती है। जीव उत्पन्न करने में उसकी गूँथ-गूँज कुदरत से मिली रहती है।…… अपनी समरूपा उत्पन्न करना माँ के लिए बड़ा महत्त्वकारी है। पुण्य है। बेटी के पैदा होते ही माँ सदाजीवी हो जाती है। वह कभी नहीं मरती। हो उठती है वह निरंतरा ।…… वही सृष्टि का स्रोत है” (कृष्णा सोबती/’ऐ लड़की’, वही. पृ.-42, 43)।

कोरस द्वारा ‘ ऐ लड़की ‘ की नाट्य प्रस्तुति का एक दृश्य

अकेली रहने वाली बेटी को माँ हर तरह से घर-परिवार और संतान के महत्त्व को समझाने की कोशिश में लगी रहती है। वह मानती है कि बच्चे जीवन के पुरस्कार हैं। बच्चों को जन्म देकर माँ एक तरह से मृत्यु को झुठलाती है। वह अपने बच्चों में अपने जीवन की निरंतरता देखती है। वह बेटी से कहती है “बच्चा हो गोद में तो समझो तीनों लोक एक मिश्री के कूजे में”। उसे लगता है माँ बनना एक अलग तरह का अनुभव है, जिसे माँ बनकर ही जाना जा सकता है। इसे जानने और महसूस करने का और कोई दूसरा विकल्प नहीं है। पुरुष इस अनुभव से वंचित रहता है। माँ के महत्त्व और उसके प्रेम की विलक्षणता को स्पष्ट करते हुए एरिक फ्राॅम ने कहा है-“माँ हमारा वह घर होती है, जहाँ से हम आते हैं-हमारी प्रकृति, हमारी मिट्टी, हमारा समुद्र।…. माँ के प्रेम का पूरा सार ही बच्चे के विकास से जुड़ा होता है, जिसका अर्थ है वह बच्चे को अपने से अलग हटाकर एक स्वतंत्र मनुष्य बनने के लिए तैयार करती है। यहीं माँ का प्रेम रत्यात्मक (इरोटिक) प्रेम से भिन्न हो जाता है। रत्यात्मक प्रेम में दो अलग व्यक्ति एक बनने की प्रक्रिया में से गुजरते हैं; जबकि माँ के प्रेम में एक ईकाई के रूप में विकसित दो व्यक्ति अलग होने की प्रक्रिया से गुजरते हैं।…….. माँ को बच्चे से अलग होने की यह प्रक्रिया न केवल बर्दाश्त करनी होती है, बल्कि उसे इसमें पूरा सहयोग भी देना होता है। इसी पड़ाव पर माँ का प्रेम एक दुष्कर कार्य बन जाता है, और पूरी निःस्वार्थता के साथ सब कुछ सिर्फ देने की और बदले में बच्चे की खुशी के अलावा कुछ न चाहने की माँग करता है” (एरिक फ्राॅम/’प्रेम का वास्तविक अर्थ और सिद्धान्त’/संवाद प्रका./पहला संस्करण 2002/पृ.45, 52)।

लोभ लालच और स्वार्थ की दुनिया में स्त्री से माँ के रूप में निःस्वार्थ प्रेम की माँग करना कहाँ तक उचित है? माँ के प्रेम के रूप में स्त्री का गौरवान्वीकरण एक सीमा तक ही उचित है। इसके आगे वह एक छल में परिवर्तित हो जाता है। इस गौरव गाथा के पीछे उसके समस्त दुःखों और पीड़ाओं पर पर्दा डाल दिया जाता है। मातृत्व स्त्री का एक हिस्सा है। उसे सिर्फ माँ तक सीमित नहीं किया जा सकता। ’स्त्री सिर्फ एक गर्भाशय और दो अंडाशय’ मात्र नहीं है। यह न तो जैविक मजबूरी है और न ही स्त्री की नैतिक जिम्मेवारी। यह उसका अपना चुनाव है और इसकी आज़ादी उसे मिलनी चाहिए। अभी तक दुनिया के बहुत कम राष्ट्रों और समाजों ने स्त्री को यह आज़ादी दी है। एक समय था जब बच्चों के लालन-पालन में समूह और परिवार की स्त्रियाँ हिस्सा बटाती थीं। संतान एक सामूहिक जिम्मेवारी होती थी पर आण्विक परिवार की अवधारणा ने इसका सारा बोझ स्त्री के ऊपर डाल दिया है। मातृत्व स्त्री का एक नैसर्गिक वैशिष्ट्य है। संसार की समस्त मादा जीवधारी इस दायित्व का निर्वहण करते हैं। संतान का पालन-पोषण उन्हीं के जिम्मे आता है लेकिन अन्य जीवधारियों की माताओं के लिए यह गुण उनकी सीमा नहीं बनता पर स्त्री के लिए उसके पैरों की बेड़ी और व्यक्तित्व के विकास की बाधा बन जाता है। पुरुष से उसे अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। संतान माता-पिता की साझी जिम्मेवारी है और इसके लिए नये संदर्भ में पारंपरिक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में बदलाव की आवश्यकता है। अन्यथा मातृत्व से स्त्री की मुक्ति की आकांक्षा मानवता के भविष्य के लिए चिंताजनक हो सकता है।

यह कहानी मातृत्व का सिर्फ गौरवान्वीकरण ही नहीं करती बल्कि उसकी ऐतिहासिक पीड़ा के मर्म को भी उद्घाटित करती है। संतान स्त्री के हिस्से का बहुत कुछ छीन लेती है। माँ की विडम्बना यही है कि वह सबको मर-खटकर, पाल-पोस कर बड़ा करती है पर इन्हीं संतानों की उसे कुर्बानी देनी पड़ती है। आगे चलकर उसका कोई नहीं रह जाता। सबकी अपनी-अपनी जिन्दगियाँ होती हैं। अपने-अपने दायरे और वह परिधि से बाहर छूट जाती है। उसे टुकड़ों में बाँट दिया जाता है। इस कहानी की माँ खुद को संतान को सुख देने वाली दुधारू गाय बना दिये जाने की पक्षधर नहीं है। वह बेटी से समस्त माताओं की पीड़ा उद्घाटित करते हुए कहती है-“माँ पैदा करती है। पाल-पोसकर बड़ा करती है। फिर उसी की कुर्बानी। माँ को टुकड़ों में बांटकर परिवार उसे यहाँ-वहाँ फैला देता है। कारण तो यही न, समूची रहकर कहीं उठ खड़ी न हो! माँ को प्योसर गाय या धाय बनाकर रखे रहते हैं। खटती रहे। सुख देती रहे। उसका काम इतना ही है। वह अपने तईं कुछ भी समझती रहे, पर बच्चों के लिए मात्र घर की व्यवस्था करनेवाली”    (’ऐ लड़की’/वहीं, पृ.-74)।

शादी करना या माँ बनना इन दोनों मामलों में स्त्री के चुनाव या निर्णय को महत्त्व मिलना चाहिए। इस कहानी की माँ चाहती है शादी के बाद भी स्त्री के व्यक्तित्व की स्वाधीनता बनी रहे। स्त्री पुरुष के अधीन न रहे। वह अपनी नर्स सूसन से कहती है-“सूसन, शादी के बाद किसी के हाथ का झुनझुना नहीं बनना। अपनी ताकत बनाने की कोशिश करना”। शादी के बाद आधिपत्य का भाव सिर्फ पुरुषों में ही नहीं, स्त्रियों में भी होता है। इस जटिलता को भी माँ समझती है। स्त्री पति के तन-मन पर सर्वाधिकार चाहती है। माँ का बेटे पर जो स्वाभाविक अधिकार होता है, उसे वह खुलेआम चुनौती देती है। वह सिर्फ अधिकृत ही नहीं होती, अधिकार भी जमाना जानती है। खासकर पति पर।

हमारे समाज के रीति-रिवाज और नियम कायदे कुछ ऐसे हैं कि शादी के बाद एक स्त्री को वह घर छोड़ना पड़ता है, जिसमें वह पलती बढ़ती है। इस तरह औरतें हमेशा दो घरों को साथ लेकर चलती हैं। एक घर वह जो पीछे छूट जाता है और दूसरा वह जिसमें धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमाती हैं। पहले वाला घर धीरे-धीरे धुँधला पड़ता जाता है पर स्मृतियों में बसा रहता है। माँ को घर को बनाये रखने और थामे रखने का गर्व है पर कहीं न कहीं अपनी लम्बी जिन्दगी की व्यर्थता का बोध भी है। घर को बनाती, सँभालती, चलाती स्त्री खुद कहीं पीछे छूट जाती है। वह इन सबसे कहीं न कहीं अलग भी होती है।

इस कहानी की माँ में पारिवारिक सम्बन्धों के प्रति गहरी रागात्मकता है। उसे लगता है कि पारिवारिक जीवन में बहुत कुछ खो कर भी कुछ बचा रह जाता है लेकिन अकेली जिन्दगी में न तो कुछ खोता है, न बचता है। वह कहती है कि घर-परिवार की छोटी सी कर्मभूमि से ही स्त्री की अपनी और दूसरों की पहचान जुड़ी है। लेकिन इस चरित्र की विडम्बना यह है कि परिवार के गौरवान्वीकरण के बावजूद उसमें अपने को खो देने का उसे दुःख भी है। अपना निजत्व और अपनी अस्मिता खोने का दर्द वह महसूस करती है। गृहस्थ जीवन के अनुभव उसके लिए सिर्फ सुखद ही नहीं है; उसके अनुभव कड़वे भी हैं। वह जानती है कि गृहस्थी को चलाये रखने के लिए स्त्री को बहुत कुछ सहना पड़ता है। “गृहस्थ में पाँव रखकर स्त्री का जो मंथन-मर्दन होता है, वह भूचाल के झटकों से कम नहीं होता। औरत सहन कर लेती है, क्योंकि उसे सहन करना पड़ता है” (’ऐ लड़की’/वही., पृ.-73)। घर-परिवार से ही जुड़े स्त्री के घरेलू श्रम की उपेक्षा का मौजूँ सवाल भी लेखिका ने इस कहानी में उठाया है। पुरुष बाहरी कार्य करता है तो उसके बदले उसे अर्थ की प्राप्ति होती है पर स्त्री घर में जो खटती-मरती है उसे निरर्थक समझा जाता है। उसका कोई मूल्य महत्त्व नहीं होता।

माँ परिवार में पुरुष की भूमिका को पहचानती है और इसका कारण भी। इसका कारण है उसकी कमाई। परिवार चलाने की उसकी जिम्मेवारी। यही स्त्री को अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य करता है, “घर का यह खेल बराबरी का नहीं, ऊपर-नीचे का है। घर का स्वामी कमाई से परिवार के लिए सुविधाएँ जुटाता है। साथ ही अपनी ताक़त कमाता-बनाता है। इसी प्रभुताई के आगे गिरवी पड़ी रहती है बच्चों की माँ”  (’ऐ लड़की’, वही.पृ.-55)। कृष्णा सोबती का स्त्री विमर्श पुरुष विरोधी नहीं है। वे स्त्री जीवन में पुरुष के महत्त्व को समझती हैं। हाँ, वे पुरुष की अधीनता को स्वीकार नहीं करतीं और स्त्री स्वतंत्रता की पक्षधर हैं। एक बेहतर स्त्री पुरुष सम्बन्ध को वे इस रूप में देखती हैं, जहाँ दोनों एक दूसरे के व्यंिक्तत्व का सम्मान करें। लेकिन पितृसत्तात्मक सामाजिक और पारिवारिक संरचना में क्या यह संभव है? निश्चित रूप में नहीं।

स्त्रियों के व्यक्तित्व हरण में पितृसत्तात्मक परिवार की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। प्रेम से, दबाव से, परंपरा और कत्र्तव्य के नाम पर परिवार के भीतर हमेशा स्त्री के व्यक्तित्व को सीमित किया जाता है। इस रचना की मम्मू भी अपनी पारिवारिक जिम्मेवारियों के कारण अपना मनचाहा नहीं कर पायी फिर भी परिवार को गौरवान्वित करती है। एंगेल्स ने परिवार में छुपी स्त्री की दासता के बीज को बहुत पहले पहचान लिया था, “आधुनिक वैयक्तिक परिवार नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित है और आधुनिक समाज वह निकाय है, जो वैयक्तिक परिवारों के अणुओं से मिलकर बना है। आज अधिकतर परिवारों में, कम से कम मिल्की वर्गों में, पुरुष को जीविका कमानी पड़ती है और परिवार का पेट पालना पड़ता है। इससे परिवार के अन्दर उसका आधिपत्य कायम हो जाता है और उसके लिए किसी कानूनी विशेषाधिकार की आवश्यकता नहीं होती। परिवार में पति बुर्जुआ होता है, पत्नी सर्वहारा की स्थिति में होती है” (फ्रे़डरिक एंगेल्स/’परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति’/प्रगति प्रका., मास्को/दूसरा संस्करण-1986/पृ.-90)।

कृष्णा सोबती का कथा साहित्य स्त्री अस्मिता और स्वाधीनता की प्रबल पक्षधरता का साहित्य है। उन्हें मालूम है कि परिवार ही सबसे पहले स्त्रियों की स्वतंत्रता और आज़ादी का अपहरण करता है फिर इस कहानी की मुख्य चरित्र मम्मू परिवार की इतनी प्रबल पक्षधर क्यों है ? क्या इसलिए कि वह पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ स्त्रियाँ परिवार को ही अपना सर्वस्व मानती थीं। हालाँकि बीच-बीच में पारिवारिक जीवन के भीतर उसकी पीड़ाएँ भी उभरती है। उसे लगता है कि परिवार में वह ऐसी मशगूल हुई कि अपना मनचाहा कुछ भी न कर पायी। इसीलिए संतुलन बनाये रखने के लिए कहानी में माँ के प्रतिपक्ष के रूप में बेटी को रखा गया है, जिसने परिवार की अपेक्षा अपने अकेलेपन और निजता का वरण किया है। माँ अपनी बेटी से बातचीत के क्रम में स्त्री को परिवार की धुरी और केन्द्र बताकर जिस परिवार का गुणगान करती रही, वही परिवार आज उससे विलग है। समस्त दुःख और पीड़ाओं को सहती आज वह मृत्यु शैय्या पर अकेली है। अन्ततः यह अकेलापन ही हाथ लगना है तो फिर वह मरना-खपना किसलिए ? फिर बेटी ने घर-परिवार वाला रास्ता नहीं चुना तो क्या बुरा किया ? अतः बेटी का जीवन माँ के अनुभवों से निकला निष्कर्ष जान पड़ता है। कहानी का आन्तरिक ढाँचा परिवार की व्यर्थता की ओर ईशारा करता है। तो क्या यह प्रकारान्तर से परिवार के व्यर्थताबोध की कहानी है !

वस्तुतः परिवार उतना पवित्र है भी नहीं जितना उसे समझा जाता है। एक सर्वसत्तावादी राज्य की समस्त संरचनाएँ परिवार के भीतर भी मौजूद रहती हैं। वह परस्पर प्रेम, सहयोग, सौहार्द्र और सहानुभूति की उर्वर जमीन न होकर तानाशाही की पाठशाला में परिवर्तित हो जाता है। इसीलिए स्त्रीवादी लेखिका ओरियाना फलासी ने परिवार नामक संस्था पर जोरदार हमला किया है-“ मैं परिवार में विश्वास नहीं करती। परिवार ऐसा झूठ है, जिसे शक्तिशाली लोगों ने दूसरों को नियंत्रित करने, उन पर शासन करने और उनकी विनम्रता का शोषण करने के लिए गढ़ा है। जब हम अकेले होते हैं , तो आसानी से विद्रोह करते हैं, पर जब दूसरों के साथ होते हैं, तो आसानी से घुटने टेक देते हैं। परिवार और कुछ नहीं, उस व्यवस्था के हाथों में लगाम की तरह है, जो हमें विद्रोह नहीं करने देती। इसकी पवित्रता काल्पनिक है। अगर कुछ सच है, तो वह हैं वे बच्चे, वे वयस्क, वे औरतें, जो एक-दूसरे से परस्पर घृणा करते हुए, एक दूसरे को नापसंद करते हुए भी एक ही छत के नीचे रहने को, एक ही नाम धारण करने को मजबूर हैं” (ओरियाना फलासी/’एक ख़त अजन्मे बच्चे के नाम’/संवाद प्रका., मुम्बई: मेरठ/संस्करण-2006/पृ.-35)।

इस कहानी की माँ कुछ पुराने ख्यालों की है। उसे स्त्री-पुरुष की बराबरी, पारस्परिकता की जगह इस बात पर विश्वास है कि “ मर्द का दबदबा रहना ही चाहिए ”। वह मानती है कि स्त्री-पुरुष में बराबरी की बात की जाती है पर यह बराबरी कभी होती नहीं। स्त्री की भूमिका परिवार में नाविक की तरह होती है। परिवार उसके बूते ही चलता है। वह कहती है कि पुरुष कस्तूरी मृग है, भागता हुआ। स्त्री उस भागते हुए मृग को कुछ पल के लिए थाम लेती है और खुद मृगया बन जाती है। विडम्बना यह है कि उसके भीतर स्त्री के शिकार हो जाने की इस प्रवृत्ति का विरोध नहीं है। वह उसमें आनंद लेने लगती है। वह इस बात से खुश है कि पति के घर में लड़के-लड़की में कोई फर्क नहीं था। वह यह भी कहती है कि मैंने बेटे-बेटियों में फर्क नहीं किया। लेकिन मृत्यु के करीब पहुँचकर वह बेटी से अपने बेटे को बुलाने की बात करती है। ’खूँटे पर से घोड़ा खोल’ देने के लिए उसे भाई को आवाज देने को कहती है। यहाँ माँ के अवचेतन में पैठी बेटों की श्रेष्ठता ग्रन्थि उजागर हो जाती है।

अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद समग्रता में यह कहानी स्त्री की अस्मिता और उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व की तलाश की कहानी है। परिवार स्त्री का पर्याय नहीं है। वह परिवार से अलग एक व्यक्तित्व भी है। यह व्यक्तित्व परिवार के हुजूम में कहीं खो जाता है। कहानी की मम्मू भी अंततः परिवार से विलग अपना व्यक्तित्व तलाशने की कोशिश करती है-“मैं तुम सब की माँ जरूर हूँ, पर अगल हूँ। मैं मैं हूँ। मैं तुम नहीं और तुम मैं नहीं”। माँ का यह बोध व्यक्तित्व की स्वतंत्रता का बोध है, जिसे कहानी स्थापित करती है। यह कहानी इस बात पर भी बल देती है कि स्त्री स्वाधीनता और स्वतंत्रता का मार्ग आत्मनिर्भरता से होकर गुजरता है। जब तक स्त्री आर्थिक दृष्टि से स्वतंत्र नहीं होगी, उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता हमेशा खतरे में रहेगी। परिवार में स्त्री की भूमिका निर्धारित करते हुए मम्मू बेटी से कहती है कि “उसका वक्त तब सुधरेगा जब वह अपनी जीविका आप कमाने लगेगी”।

स्त्री का अपना व्यक्तित्व हो। वह पुरुष के हाथों का खिलौना न बने। यही इस कहानी का निष्कर्ष है। इस कहानी की मुख्य चरित्र मम्मू के लिए स्त्री स्वाधीनता का अर्थ यह है कि वह न तो किसी को सताये और न ही किसी के द्वारा सतायी जाये। इस संदर्भ में वह अपनी बेटी को लेकर आश्वस्त है। उसकी बेटी जिस स्वतंत्रता और स्वाधीनता की पक्षधर है, उस लायक अभी हमारा परिवार और समाज नहीं बन पाया है। अभी हमारे पास जो पारिवारिक ढाँचा है, उसमें स्त्री के लिए ज्यादा कुछ गुंजाइश नहीं है। माँ बेटी से कहती है-“तुम-सी निजकारी गूँज के लिए बड़ा आकाश और बड़ी धरती चाहिए।…… जो दिलों पर अर्गलाएँ चढ़ा लेते हैं, उनका आकाश उन्हीं तक रह जाता है। उनकी दौड़ भी उनके घर तक ही समाप्त। बस उसी के आसपास थई-थई रोटियाँ सेंकते जाओ, मकड़ी का जाल बुनते जाओ। सुन रही हो न, वहाँ भी ज़्यादा कुछ नहीं रखा।….. तुम किसी के अधीन नहीं। स्वाधीन हो। लड़की, यह ताकत है। सामर्थ्य। शक्ति। समझ रही हो न”    (’ऐ लड़की’/वहीं, पृ.-49,50)?

इस प्रकार आखिरकार माँ बेटी की स्वतंत्रता को स्वीकारती है। परिवार का गुणगान करती हुई भी परिवार के भीतर स्त्री के अकेलेपन को पहचानती है। अन्ततः उसे सारे सम्बन्धों की निरर्थकता का अहसास होता है। यही कारण है कि वह बेटी से कहती है “सुनो, बेटा-बेटियाँ, नाती-नातिन, पुत्र-पौत्र-मेरा सब परिवार सजा हुआ है, फिर भी अकेली हूँ। और तुम! उस प्राचीन गाथा के बाहर हो, जहाँ पति होता है, बच्चे होते हैं, परिवार होता है। न भी हो दुनियादारी वाली चैखट, तो भी तुम अपने आप में तो आप हो। लड़की, अपने आप में आप होना परम है, श्रेष्ठ है” (’ऐ लड़की’/वही.,पृ.-57)! यह इस कहानी का चरमोत्कर्ष है। स्त्री की निजता और स्वाधीनता का उद्घोष। लेकिन माँ अपनी बेटी की निजता और स्वाधीनता की कद्र करते हुए भी जानती है कि सिर्फ अपनी निजता के सीमित घेरे में भी हमेशा कैद नहीं रहा जा सकता। खुद से भी आज़ादी की जरूरत पड़ती है। अपने को भी खुला छोड़ना होता है। अपने गंुजलक से बाहर निकलना पड़ता है। वह यह नहीं चाहती कि बेटी घर बसाये। वह चाहती है कि वह अपने को खुला छोड़ दे। अपने मन की करे। लड़की भी माँ को आश्वस्त करती है कि वह कमजोर नहीं है। उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं है-“मैं किसी को नहीं पुकारती। जो मुझे आवाज देगा मैं उसे जवाब दूँगी। अम्मू अब तो तसल्ली है”? और जवाब में माँ कहती है “तुम मेरे मन की संतान हो”। यही वह बिन्दु है जहाँ माँ-बेटी एक समान धरातल पर आ कर खड़ी हो जाती है। दोनों के तार आपस में मिल जाते हैं।

माँ की बढ़ी उम्र, कुल्हे की हड्डी का टूटना, आपरेशन, घावों का ठीक न होना, दवा, इंजेक्शन, दर्द की टीसें, दुःख की लहरें और इन सब के बीच डूबते-उतराते किश्ती की तरह जीवन और स्मृतियों से आच्छन्न मनःस्थिति में घर पर रहने वाली अकेली बेटी और देख-रेख करने वाली सूसन को सम्बोधित दिशानिर्देशों, इच्छाओं, बड़बड़ाहटों, चुहल, छेड़छाड़ और तंज भरे वाक्यों से इस कहानी का ताना-बाना बुना गया है। इस कहानी में क्रमबद्ध और व्यवस्थित आख्यान नहीं है। संवादों से कहानी की परतें धीरे-धीरे खुलती हैं । मूलतः यह स्मृतियों में टुकड़े-टुकड़े जीवन को बीनती हुई कहानी है। माँ की स्मृतियों में कौंधते जीवन के महीन और बारीक रेशों से जुड़कर यह आकार ग्रहण करती है। अपनी संरचना में यह रचना कहानी से बड़ी और उपन्यास से छोटी है। स्थितियों, चरित्रों और मूल संवेदना की दृष्टि से यह उपन्यास की अपेक्षा कहानी के ज्यादा करीब है। अतः इसे लम्बी कहानी कहना ज्यादा उचित है। स्त्री स्वतंत्रता की हामी होते हुए भी कृष्णा सोबती ने इसमें स्त्री जीवन के यथार्थ का एक पक्षीय उद्घाटन न कर उसके बहुआयामी और अन्तर्विरोधी स्वरूप को उद्घाटित किया है। वे फैसला देने को उद्धत न्यायाधीश की अपेक्षा एक रचनाकार की संवेदनशील और सतर्क दृष्टि से यथार्थ को हर कोण से जाँचने-परखने का जतन करती हैं।

इस लम्बी कहानी में लेखिका अपनी ओर से कुछ नहीं कहतीं। कथा के सारे सूत्र संवादों और बातचीत से ही खुलते हैं। संवाद के केन्द्र में बेटी है। सब कुछ उसी को सम्बोधित है लेकिन उसकी ओर से प्रतिक्रिया और प्रतिउत्तर में बराबर की भागीदारी नहीं है, जो संवाद के लिए आवश्यक है। अतः यहाँ संवाद से ज्यादा एकालाप है। ज्यादातर माँ ही बोलती है। कभी-कभी तो बेटी की ओर से भी। लेकिन इस स्वकथन में मनः स्थितियों के अनुरूप स्वाभाविकता, विविधता और आकर्षण बनाये रखना एक बेहद चुनौती भरा कार्य था, जिसे लेखिका ने बखूबी निभाया है। भाषा में नाटकीय संवादों की चुस्ती है। बीच-बीच में कुछ वाक्य जीवन के मर्म को उद्घाटित करते हुए सूक्तियों जैसे हैं। जीवन को गहरे तक पैठकर जीने वाली स्त्री के जीवनानुभवों के निचोड़ इसमें पिरोये हुए हैं। अतः इनमें स्वाभाविकता है।

इस कहानी की भाषा में काव्यात्मकता का पुट है। बहुत ही संवेदनशील प्रसंगों, स्थितियों को संकेतों, प्रतीकों, उपमानों और इशारों में व्यक्त किया गया है। मृत्यु के करीब पहुँची स्त्री के मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कथालेखिका ने ’सूखती हुई अन्दर की नमी’, ’तड़प रही मछली’, ’चतुर्दिक रेत ही रेत’ जैसे बिम्बों का सहारा लिया है। ये वे बिम्ब हैं जो दर्द से तड़पती स्त्री की मनःस्थिति का वास्तविक अहसास कराते हैं। इस तरह कहानी में काव्यात्मक औजारों का समुचित इस्तेमाल हुआ है। बातचीत में नाटकों की संक्षिप्ति, कसी हुई चुस्त संवाद शैली का प्रयोग हुआ है। यह कहानी कथा, कविता और नाट्य के मिश्रण से तैयार जीवन का सान्द्र घोल है, जिसमें विधाओं की दूरियाँ ही नहीं मिटती, जीवन और मृत्यु के दो छोर भी एक ही बिन्दु पर सिमट आते हैं।

एक स्तर पर यह कहानी माँ और बेटी की दो पीढ़ियों की जीवन के सम्बन्ध में दो दृष्टियों की असहमति की कहानी है। बेटी की ओर से यह असहमति कम है, माँ की ओर से ज्यादा। एक के पास अनुभवों का विराट संसार और स्मृतियों का अथाह खजाना है तो दूसरे के पास भविष्य, जिसे वह अपने तरह से जीना चाहती है। इस कहानी की सीमा यही है कि माँ अपने विचारों, अनुभवों और जीवन मूल्यों को लेकर जितनी मुखर है, बेटी उतनी ही सौम्य, शांत और गंभीर। बेटी में नयी पीढ़ी की सचेत और स्वतंत्र स्त्री के व्यक्तित्व की झलक मिलती है पर कहानी में उसका व्यक्तित्व विकसित होकर खिल नहीं पाया है। माँ के एकालाप से आक्रान्त उसका व्यक्तित्व दबा-दबा सा दिखाई पड़ता है। वह खुलकर माँ के कई परंपरागत विचारों का प्रतिउत्तर नहीं दे पाती। माँ की बीमारी और उसकी आसन्न मृत्यु की स्थिति में उसके साथ बराबरी के स्तर पर वैचारिक टकराहटें संभव भी नहीं थी। यह इस कहानी की संरचनात्मक कमजोरी है। परिणामस्वरूप पतनशील, क्षयशील जीवन मूल्यों और विचारों की दृष्टि से यह कहानी जितनी मुखर है, प्रगतिशील जीवन मूल्यों के प्रति उतनी ही उदासीन। माँ के व्यक्तित्व ने बेटी को आच्छादित कर उसके जीवनाकाश को लगभग ढक लिया है। माँ के विचारों में भी एकरूपता नहीं है। कभी वह बिलकुल पारंपरिक घरेलू स्त्री की तरह बात करती है तो कभी उसके विचार प्रगतिशील जान पड़ते हैं। विचारों के इस ऊहापोह से कई बार बेटी को भी हैरानी होती है। इस ऊहापोह के कारण यह कहानी परस्पर अन्तर्विरोधी विचारों का समुच्चय बन गयी है। अक्सर एक दूसरे को काटती लकीरें विभ्रम में डालती हैं।

अपनी सीमाओं के बावजूद ’ऐ लड़की ’ मृत्यु से मुढभेड़ करती, जीवन का उत्सव मनाती एक स्त्री की अदम्य जिजीविषा की कहानी है। यह संसार और जीवन की खूबसूरती में अगाध विश्वास पैदा कर जीने की ललक जगाती है। यह माँ-बेटी के अपरिभाषित रिश्तों की गिरहों को खोलती-सुलझाती स्त्री की अस्मिता और वैयक्तिक स्वतंत्रता की तलाश करती एक नायाब कहानी है। माँ-बेटी की आपसी समझ और संवेदना की अन्तः सलिला दोनों व्यक्तित्वों को रससिक्त करती है। शिकायत, उलाहना, हँसी-मजाक, सोखी, चुहल और बनावटी गुस्से का हर रंग इसमें घुला-मिला है। यहाँ आपसी रिश्तों का धूप-छाँही रंग मूड के अनुसार बदलता है। माँ-बेटी का सम्बन्ध उछलती-कूदती, गिरती-भागती पहाड़ी नदी की तरह है। लेकिन जीजीविषा के तमाम ब्योरों के बावजूद कथा लेखिका की मूल दृष्टि भविष्य के जीवन की ओर उन्मुख होने की अपेक्षा अतीत की स्मृतियों, शास्त्रों, पुराणों के आप्त वचनों और मृत्यु की ओर ज्यादा आकृष्ट है। अपने आकर्षक शिल्प, चुस्त नाटकीय संवाद, मार्मिक वाक्यों और चमत्कृत करने वाली काव्यात्मक भाषा के बावजूद कथा लेखिका की विश्वदृष्टि की अस्पष्टता के कारण यह एक सुन्दर और अच्छी कहानी होते हुए भी बड़ी कहानी बनते-बनते रह गयी है।

( संपर्क -सियाराम शर्मा, 7/35, इस्पात नगर, रिसाली, भिलाई नगर, जिला-दुर्ग (छत्तीसगढ़) ,  पिन-490006, मो.न.-9329511024, 8319023110 , ई.मेल[email protected] )

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