बेगूसराय। जन संस्कृति मंच (जसम) ने चार जनवरी को दिनकर कला भवन के कैंपस में प्रख्यात रंगकर्मी सफदर हाशमी की याद में विचार गोष्ठी का आयोजन किया। विचार गोष्ठी का विषय ‘ सफदर हाशमी का रंगमंच और हमारा आज का रंगमंच ‘ था जिस पर रंगकर्मियों, लेखकों, संस्कृति कर्मियों ने विचार वीकत किये।
गोष्ठी जे प्रारंभ में रंगनायक द थियेटर के कलाकार देवेंद्र कुंवर ने जनगीत गाया। रंगकर्मी चंदन वत्स ने शहीद गान – ‘उनसे प्रणाम कहना, उनको सलाम कहना ‘ गाकर सबको रोमांचित कर दिया। शिक्षाविद् मुकेश कुमार ने काव्य पाठ किया। कमल वत्स द्वारा ‘ संविधान बचाओ देश बचाओ ‘ बुक स्टाल लगाया गया।
गोष्ठी में जन संस्कृति मंच के राज्य सचिव दीपक सिन्हा ने कहा कि आज के दौर में सफदर को याद करना एक कालखंड को याद करना है। सफदर एक कहानी के मुख्य पात्र के रूप में रंगमंच में आते हैं, जिनकी हत्या नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ करते हुए साम्प्रदायिक मानसिकता के गुंडों ने कर दी। वे इप्टा और उनकी पुरानी विरासत को आगे बढ़ाते हुए ‘जन नाट्य मंच’ (जनम) के माध्यम से भारतीय नुक्कड़ (स्ट्रीट) थिएटर का पर्याय के प्रतीक बन गए। उन्होंने रंगमंच को सड़कों पर ले आए। आज का रंगमंच जनता के रंगमंच से दूर चला गया है। क्यों गया, इसकी समीक्षा होनी चाहिए।
युवा रंगनिर्देशक इम्तियाजुल हक डब्लू ने कहा कि सफदर हाशमी का उद्देश्य शोषितों-वंचितों की आवाज़ बनना था,। उन्होंने अपने नाटकों के जरिए शोषण और असमानता पर प्रहार किया। ‘ हल्ला बोल ‘ जैसे नाटकों में इसकी अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। उनका बलिदान भारतीय प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन का मिशाल बन गया।

एक्टिविस्ट कमल वत्स ने कहा कि 1973 में स्थापित जनम के साथ, उन्होंने भारतीय नुक्कड़ नाटक आंदोलन को नई दिशा दी। इसे एक शक्तिशाली जन-संचार का माध्यम बनाया। आज के इस कार्यक्रम की तिथि की महत्ता यह है कि सफदर हाशमी की हत्या के महज दो दिन बाद यानी चार जनवरी को उसी स्थान पर नाटक ‘ हल्ला बोल ‘ की प्रस्तुति की गई, जहां उनकी हत्या हुई थी।
पत्रकार सह कवि प्रवीण प्रियदर्शी ने कहा कि सफदर का मानना था कि असली दर्शक मज़दूर, किसान और आम नागरिक हैं। उनका रंगमंच अभिजात्य नहीं, बल्कि जन-सामान्य के जीवन से जुड़ा था, जो सीधे उनसे संवाद करता था, उपदेश नहीं देता था।
युवा रंगकर्मी चंदन वत्स ने कहा कि भले ही उनका नाटक साम्यवाद से प्रेरित रहा और सत्ता के दंभ, पूंजीवादी शोषण और सामाजिक असमानता पर सीधा प्रहार करता रहा। वे जनता की आवाज थे।
जसम के अध्यक्ष रंगकर्मी विजय कुमार सिन्हा ने बहस को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उन्होंने दस्तागोई (कहानी कहने की कला) और लोकगीतों जैसी भारतीय लोक कलाओं को अपने नाटकों में शामिल किया, जिससे उनकी पहुँच और प्रभाव बढ़ा।
समय सुरभि अनंत के संपादक तथा प्रलेस के साहित्यकार नरेंद्र कुमार सिंह ने कहा कि उनके लिए रंगमंच केवल कला नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संघर्ष का एक माध्यम था, जो जनता को जागरूक करता था।
युवा एक्टिविस्ट तथा एआईएसएफ के ईशु वत्स ने कहा कि सफदर हाशमी का लक्ष्य सामाजिक परिवर्तन लाना था । अपने नाटकों के जरिए इस काम को आगे बढ़ा रहे थे।
युवा रंगकर्मी संतोष राही ने कहा कि 1989 में ‘हल्ला बोल’ का प्रदर्शन करते समय उन पर जानलेवा हमला हुआ, जिसमें उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन इस घटना ने उनके काम को और प्रासंगिक बना दिया और एक बड़े जन आंदोलन को जन्म दिया।
‘ प्रत्यक्ष गवाह ‘ के संपादक पुष्कर कुमार सिंह ने कहा कि चुनौतियां बहुत है , किंतु हमे काम करना है। आज के रंगमंच को बचाना है तभी हम सफदर की लड़ाई को जारी रख पायेंगे .
इस मौके पर जसम की ओर से घोषणा की गई कि फरवरी माह में नुक्कड़ लाईव थियेटर फेस्टिवल का आयोजन किया जाएगा।
कार्यक्रम में रंगकर्मी हरिकिशोर ठाकुर , राजाराम आर्य, पंकज कुमार सिन्हा, डी एन ब्रह्मचारी , राजू सिन्हा तनु , भारत भूषण मिश्रा अधिवक्ता, मो. तनवीर अधिवक्ता, नीलेश झा, रामपुकार दास , राहुल कुमार, रंजन कुमार , वरिष्ठ रंगकर्मी अरविंद कुमार सिन्हा ,आर वाई ए के राज्य पार्षद संजय कुमार ,पंकज कुमार झंटू आदि उपस्थित थे।

