लखनऊ। जन संस्कृति मंच (जसम), उत्तर प्रदेश ने रविवार (25 अक्टूबर, 2026) को संगठन का 41वां स्थापना दिवस यू.पी. प्रेस क्लब, हजरतगंज में मनाया। इस मौके पर ‘न्याय और लोकतंत्र के हक में सांस्कृतिक आंदोलन’ विषय पर आयोजित संवाद में प्रलेस, जलेस, इप्टा के प्रतिनिधियों ने भी शिरकत की। सभी ने लोकतंत्र-विरोधी, सांप्रदायिक, अमीरपरस्त, किसान-मजदूर-छात्र-युवा-विरोधी मौजूदा फासीवादी निजाम से लड़ने के लिए एक व्यापक संयुक्त सांस्कृतिक आंदोलन का आह्वान किया।
संवाद की शुरुआत करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष राकेश ने कहा कि हम व्यापक सांस्कृतिक मोर्चा बनाकर ही न्याय और लोकतंत्र के सवाल पर लड़ सकते हैं, लेकिन किन्हीं वजहों से वैसा पुख्ता मोर्चा नहीं बन पाया है। उन्होंने कहा कि संस्कृति कर्म का अर्थ केवल कविता, कहानी, नाटक वगैरह नहीं है, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना, असहमति व्यक्त करना भी है; दलित, पिछड़े, महिलाएं, छात्र-युवा जिनकी आवाज दब जाती है, उनकी आवाज बनना है। राकेश ने व्यापक मोर्चे के लिए अपनी ओर से एक मसौदा खाका पेश किया, जिसमें उन्होंने सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक अधिकार, आर्थिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक सद्भाव और मानवीय एकता के लक्ष्य को मोर्चे की बुनियाद बताया। उन्होंने कहा कि इस पूरे कार्यक्रम को सभाकक्षों से निकालकर मजदूर बस्तियों, गांवों, विश्वविद्यालयों तक ले जाने की जरूरत है। हमें सुनिश्चित करना है कि जनता दर्शक नहीं, बल्कि सहभागी बने।

जसम के राष्ट्रीय महासचिव मनोज सिंह ने कहा कि हम सन 1985 में जसम की स्थापना पर संस्थापक महासचिव गोरख पांडे द्वारा दिखाये गये रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं और “भारतीय जनता के जीवन से जुड़ा जीवित संगठन बनना चाहते हैं”। उन्होंने कहा कि जब समाज और राजनीति में बड़े बदलाव की आहट हो तो सांस्कृतिक संगठन इससे अलग कैसे रह सकता है। हालांकि कई लोग यह महसूस करते हैं कि सांस्कृतिक संगठन उस ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर पाये हैं। न्याय और लोकतंत्र की कुछ स्थापित कसौटियां हमारे सामने मौजूद हैं – क्या कानून सबके साथ समान व्यवहार कर रहा है; क्या सामाजिक समानता, अवसर की समानता है; क्या अभिव्यक्ति का अधिकार, आंदोलन का अधिकार है; क्या चुनाव साफ-सुथरे हैं। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए लड़ रहे आंदोलनकारियों से ‘पीस बांड’ भरवाया जा रहा है, और उन पर हमले के लिए दक्षिणपंथी गुंडों की फौज को पुलिस संरक्षण मिल रहा है। जंतर मंतर की तरह देश भर में विरोध-प्रदर्शन के स्थान छीने जा रहे हैं। मौजूदा व्यवस्था के साथ लड़ाई जितनी राजनीतिक है उतनी ही सांस्कृतिक भी। अगर भाजपा को सत्ता से हटा भी लें तो उसकी सांस्कृतिक सत्ता से लड़ने के लिए व्यापक प्रगतिशील सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है। सृजन कर्म व्यक्तिगत स्तर पर हो सकता है, लेकिन संघ परिवार के सांस्कृतिक वर्चस्व से संगठन बनाकर ही लड़ा जा सकता है।
व्यापक मोर्चे की दिशा में पहल के बारे में उन्होंने बताया कि पांच संगठनों – प्रलेस, जलेस, जसम, इप्टा, जनम – ने एक संयुक्त मोर्चा बनाया है। इसके तहत बीते जुलाई माह में प्रेमचंद जयंती का साझा राष्ट्रीय आयोजन लखनऊ में हुआ। इसी तरह, नवंबर में मऊ में राही मासूम रजा की जन्मशती मनायी जायेगी, और उसके बाद ज्योतिबा फुले के 200वें जन्मदिवस पर दिल्ली में कार्यक्रम होगा। उन्होंने युवाओं और छात्रों को सलाम पेश करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार और अनैतिकता में आकंठ डूबी सरकार हिल चुकी है। उसमें इतनी हिम्मत नहीं बची है कि हजारों की तादाद में लोगों को जेल में ठूंस सके।

जलेस के डॉ विभु प्रकाश सिंह ने इस संवाद को एक अकादमिक गहराई प्रदान की। उन्होंने कहा कि न्याय का आधुनिक सर्वमान्य सिद्धांत है – कानून के सामने सबका समान होना। 19वीं सदी के विधि-दार्शनिक जॉन ऑस्टिन ने कहा था कि ‘कानून संप्रभु की आज्ञा है’। यानी देश का एकमात्र शासक जो कह दे वही कानून है। समय बीता, आधुनिक लोकतंत्र में शक्तियों का विभाजन हुआ, और राज्य की संप्रभुता किसी एक व्यक्ति में सिमटी नहीं रह गयी। लेकिन ऐसा लगता है कि समय का पहिया उलटा घूमकर फिर वहीं पहुंच गया है। पूरा विश्व दक्षिणपंथी शासकों से शासित होने की ओर बढ़ रहा है। लोकतंत्र का आदर्श माने जाने वाले पश्चिम यूरोपीय देश भी उधर ही फिसलते दिख रहे हैं। इसके पीछे है पूंजी की अपार शक्ति। पहले जो झीना पर्दा था, अब वह भी हट गया है। पूंजीपति ट्रंप का प्रचार एक दूसरा पूंजीपति मस्क कर रहा था। अमेरिका का विदेशी मंत्री सीधे भारत के जामनगर पहुंच जाता है, एक पूंजीपति से मिलने, कारोबारी सौदा करने।
डॉ सिंह ने अमेरिकी दार्शनिक जॉन रॉल्स के ‘न्याय के सिद्धांत’ का जिक्र किया जिसके दो मुख्य आधार हैं – अवसर की निष्पक्षता सबके पास हो; वंचित लोगों को अधिकतम लाभ मिले। लेकिन आज निष्पक्षता गायब है; अदालतें प्रेमचंद के जमाने में भी सेठों की गुलाम थीं, आज भी हैं। वंचितों को अधिकतम लाभ हर महीने कुछ किलो अनाज और चंद रुपयों के डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर तक सिमट गया है। उन्होंने कहा कि अनेक खामियों के बावजूद, अब तक ज्ञात शासन पद्धतियों में लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ है। आंबेडकर की दृष्टि में, लोकतंत्र ऐसी शासन पद्धति है जिसमें बिना रक्तपात के नागरिकों के सामाजिक-राजनीतिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आता है। लेकिन यह परिवर्तन क्यों नहीं आ पा रहा? यहां उन्होंने आंबेडकर की एक और उक्ति का हवाला दिया – भक्ति धर्म के क्षेत्र में भले ही मुक्ति का मार्ग हो, लेकिन राजनीति में यह तानाशाही को जन्म देती है। अभी देश आंदोलनों से गुजर रहा है। इसमें संस्कृति कर्मियों को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। हमें दरबारी संस्कृति कर्मी और बौद्धिक नहीं चाहिए। हमें नागार्जुन, फैज, गोरख पांडे, नाजिम हिकमत चाहिए। हमें बोलना है, हर प्रताड़ना के बावजूद, अपने स्वप्न के लिए।
प्रलेस के शकील सिद्दिकी ने कहा कि इस स्थापना दिवस के बहाने हम अंधेरे समय से लड़ने, नयी सुबह लाने पर बात कर पा रहे हैं। प्रेमचंद के दिखाये रास्ते, प्रलेस के पहले सम्मेलन में उनके अध्यक्षीय भाषण को बार-बार याद करने की जरूरत है जिससे हम यह न भूल जाएं कि एक सांस्कृतिक संगठन से उनकी क्या अपेक्षाएं थीं। आज ऐसा लगता है जैसे भारत फिर से 1930 के दशक वाली स्थिति में पहुंच गया है – वही सांप्रदायिक वातवरण, महिला विरोधी विचार, जातिवादी भावना। हम बार-बार ऐसी शक्तियों से लड़े हैं और लड़ते रहेंगे। बाबरी मस्जिद और देश के सांप्रदायिक सौहार्द की रक्षा के लिए संस्कृतिकर्मियों द्वारा लड़ी गयी लड़ाई इसकी एक मिसाल है। उन्होंने प्रलेस की 90 साल की विरासत की भी चर्चा की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर ने उन परिस्थितियों को बयान किया जिसमें जलेस और जसम का जन्म हुआ। उन्होंने कहा कि नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद 1970 का दशक आंदोलन और जनाक्रोश का दशक था। ऐसे वातावरण में नयी क्रांतिकारी ऊर्जा के साथ नये संगठन भी बने। लेकिन वक्त गुजरा और 90 का दशक आते-आते सांप्रदायिकता राजनीति के केंद्र में आ गयी। बाबरी मस्जिद ढहायी गयी, और फासीवाद की आहट जैसे-जैसे बढ़ती गयी प्रगतिशील सांस्कृतिक संगठन एकजुट होने लगे। 2014 के बाद हमारे सामने फासीवाद का खतरा और विकराल रूप में है। असहमति और विरोध को कुचला जा रहा है, जंतर मंतर इसका ताजा उदाहरण है। लेकिन इस देश की जनता चुप बैठने वाली नहीं है। सीएए-एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग, काले कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन हुआ। और अब जेन ज़ी आंदोलन ने भय का वातावरण तोड़ दिया है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के डर को इससे समझा जा सकता है कि वे पूरे मानसून सत्र में संसद से भागे रहे। तमाम जुल्म-उत्पीड़न के बीच दृढ़ता कैसी होती है, यह आइसा के छात्र नेताओं ने दिखाया है। उन्होंने हम संस्कृतिकर्मियों को भी राह दिखायी है।
कार्यक्रम का संचालन जसम लखनऊ के सचिव फरजाना मेहंदी ने किया। धन्यवाद ज्ञापित किया सूचित माथुर ने । इस मौके पर भगवान स्वरूप कटियार, सुहेल वहीद, शहजाद रिज़वी, रिजवान अली, इरा श्रीवास्तव, नगीना निशा, विमल किशोर, राजा सिंह, शहंशाह हुसैन, शैला खन्ना, धर्मेंद्र कुमार, शैलेश पंडित, सत्य प्रकाश, अनिल कुमार श्रीवास्तव, के के शुक्ला, नागेंद्र प्रताप, सुशील कनौजिया, आरके वर्मा, रामायण प्रकाश, मनीष कुमार, सीमा भारती, शशांक सिद्धार्थ, नितिन राज, हर्षवर्धन, प्रभात त्रिपाठी, मधुसूदन मगन आदि समेत कई स्थानीय संस्कृति कर्मी, प्रबुद्ध जन, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

