इलाहाबाद। कोरस इलाहाबाद द्वारा 12 सितंबर को हिन्दुस्तानी एकेडमी में महादेवी वर्मा छठा स्मृति समारोह का आयोजन किया गया । समारोह में “महादेवी वर्मा की नारी चेतना और आज का समय” विषय पर संगोष्ठी हुई और दूसरे सत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ।
इस सलाना कार्यक्रम की शुरुआत महादेवी वर्मा के गीत ” कैसे उनको पाऊं आली ” से महुआ ने किया । इसके बाद कोरस के साथियों ने सामूहिक गायन किया।
कार्यक्रम की अगली कड़ी में प्रो. अर्चना सिंह ने कहा कि महादेवी वर्मा के पूरे लेखन ने प्रश्न करना सिखाया है। यह प्रश्न पितृ सत्ता से भी था और समाज की संरचना से भी था। उन्होंने उस समय की पत्रिका स्त्री दर्पण में प्रकाशित एक कार्टून का जिक्र किया, जिसमें एक स्त्री पढ़ती हुई और पुरुष बच्चा खेलता हुआ दिखाई देता है। इस कार्टून में यह व्यंग्य था कि मैडम स्त्री मुक्ति की तैयारी कर रही हैं और घर का पुरुष बच्चा खेला रहा है। उस समय का भाव बोध स्त्री को परिवार तक सीमित करता था किन्तु महादेवी ने स्त्री को समाज और राष्ट्र के निर्माण का अनिवार्य अंग माना । महादेवी ने जिन बिम्बो और रुपकों का प्रयोग किया वे समाज की जटिलता और स्त्री प्रश्न की गहराई को व्यंजित करते हैं। ‘श्रृंखला की कड़ियाँ का पुनर्नपाठ होना चाहिए और स्त्री जीवन के सामने आज की चुनौतियों के आलोक में उसके महत्व को रेखांकित किया जाना चाहिए।

मुख्य वक्ता प्रो. प्रज्ञा पाठक ने कहा कि महादेवी बड़ी रचनाकार हैं। ऐसा नहीं है कि सन 1990 के बाद स्त्री लेखन को धार मिल गई, उससे पहले बड़ी संख्या में स्त्रियों ने साहित्य लिखा है लेकिन उनसे हमारा परिचय ही नहीं हुआ। वह कभी भी मुख्य धारा के साहित्य में आया ही नहीं। इलाहाबाद की उर्वर धरती स्त्री चेतना के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। स्त्री दर्पण पत्रिका ने स्त्री चिंतन के परिदृश्य को बदल दिया। इसका प्रकाशन 1909 में शुरू हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ में उन्होंने जो सवाल उठाये थे समाज ने उसे स्वीकार नहीं किया था। उनकी मानसिकता उसके लिया तैयार नहीं था। यदि आप समाज में परिवर्तन करना चाहते हैं तो आपके साथ क्या हो रहा है उसे जानना होगा। उस समय के साहित्य ने पहचाना कि कहां हमारे साथ गलत हो रहा है। महादेवी ने अगर इतनी कविताएं नहीं लिखी होती तो उनका स्थान साहित्य में कहां होता? प्रो. प्रज्ञा पाठक ने महादेवी वर्मा के साहित्य और आज के समय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि उनकी कविताओं में सिर्फ दुःख पीड़ा और कष्ट नहीं है। वे स्त्री समाज के परिचय और इतिहास की बात करती हैं। उसे उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए।

प्रो. अनुराधा कुमार ने अध्याक्षीय वक्तव्य दिया।
सांस्कृतिक सत्र में राकेश यादव की टीम ने कत्थक की प्रस्तुति किया। जसपाल बाँगा, श्याम सुंदर मुदगल संतोष दुबे और हरगोविंदपुरी द्वारा झीनी- झीनी बीनी चदरिया, तोरा मोरा मनुवा कैसे एक होय आदि जनगीत प्रस्तुत किये ।

कार्यक्रम का संचालन शिवांगी गोयल तथा धन्यवाद ज्ञापन प्रो. रेखा पाण्डेय ने किया। कार्यक्रम का संयोजन प्रतिमा रानी ने किया।

आयोजन में प्रो. संतोष भदौरिया, प्रो. प्रणय कृष्ण, प्रो. कुमार वीरेंद्र, प्रिय दर्शन मालवीय, सुरेंद्र राही, हरीश चंद्र पाण्डेय, डॉ. लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता, प्रो. सरोज सिंह, प्रो. आभा सिंह, प्रो. अनीता गोपेश, संध्या नवोदिता, सीमा आजाद, जफ़र बख़्त, रश्मि मालवीय, प्रो.विवेक तिवारी झरना,मालवीय प्रतिमा सिंह रानी, ज्योति शुक्ला, पूजा कुमारी विश्वविद्यालय के शोधार्थी विद्यार्थी आदि मौजूद रहे।

