समकालीन जनमत
जनमत

80वां स्वतंत्रता दिवस, मोदी और दिमागी नक्सल

जयप्रकाश नारायण 

ब्रेख्त की एक कविता है-

जनरल, तुम्हारे टैंक के पास शक्तिशाली पहिए हैं

जो जंगलों को उजाड़ सकते हैं और सैकड़ों आदमियों को रौंद सकते हैं

लेकिन उसमें एक कमी है

उसे एक ड्राइवर की जरूरत होती है।

जनरल, तुम्हारे बम शक्तिशाली हैं

लेकिन उसमें एक खराबी है

उसे एक मैकेनिक चाहिए

जनरल, आदमी बहुत उपयोगी है

वह उड़ सकता है, वह मार सकता है

लेकिन उसमें एक नुक्स है

वह सोच सकता है

सच है मोदी जी आप और आपका संघ परिवार इसी दिमाग से डरा हुआ है। और 80 वें स्वतंत्रता दिवस पर आपका यह डर लाल किले से बाहर निकल आया। क्या गजब संजोग है, संघ के 100 साल पूरे हो चुके हैं। संघ का दावा है, कि उसके करोड़ों स्वयंसेवक और हजारों बेबी आर्गनाइजेशन तन मन धन सामर्थ्य शक्ति से एक ही राष्ट्रीय दायित्व (संघ कार्य) कंधे पर उठाये थे।वह था हिंदू राष्ट्र को महान बनाने के लिए खासकर हिंदुओं और आमतौर पर हिन्दुस्तान में निवास करने वाले लोगों को संस्कारित करना । उनका शुद्धिकरण “जिसे वे संस्कारित करना कहते हैं” करते हुए उन्हें कट्टर हिंदू राष्ट्रवादी बनाना। व्यवहारिक जीवन में जिसका मतलब है, कि अबोध बच्चों के बालमन को संघ द्वारा गढ़े मिथ्या इतिहास, ज्ञान, कुतर्क, सामंती संस्कारों व मृत और जड परंपरा का महिमा मंडन करते हुए उनके दिमाग को अनुकूलित करना । इसके लिए उनका मुख्य हथियार शाखा कार्य है। शाम को बाल साखा किशोर शाखा और सुबह की शाखाओं द्वारा एक खास तरह का मनुष्य गढ़ना। जिससे हिंदू गर्व बोध जागृत किया जा सके। इसके लिए निम्न कार्य किए जाते हैं।
एक -एक राष्ट्र प्रेम नाम का अमृत पान कराना – संघ 1925 में बना । उस समय भारत अंग्रेजों का गुलाम था। श्रेष्ठ और महान भारतीय नागरिक अंग्रेजों से युद्ध रत थे ।संघ इस युद्ध का विरोधी था। उसका कहना था कि गोरों के खिलाफ लडना शक्ति और ऊर्जा का दुरुपयोग है। हिंदुओं को गोरो से लड़ कर अपनी शक्ति नष्ट नहीं करना चाहिए।बल्कि उसे भविष्य में सांस्कृतिक शुद्धिकरण के लिए सचित रखना होगा।

दो-19वीं और 20वीं सदी मानव सभ्यता के संपूर्ण इतिहास में ज्ञान विज्ञान साहित्य कला संस्कृति और मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों के (समानता स्वतंत्रता बंधुत्व और न्याय) की चेतना के विस्फोट का काल है। जिसे संघ ने खारिज कर दिया ।

तीन -संघ प्राग्ऐतिहासिक काल की उपलब्धियों को मानव सभ्यता के लिए सर्वश्रेष्ठ मानता है। उसी सभ्यता से ज्ञान परंपरा संस्कृति और नायक लेने का आग्रह करता है। जिसे आधुनिक जीवन प्रणाली और सभ्यता पर आरोपित करना उसका सर्वोच्च लक्ष्य है।

चार-वह मध्यकाल यानी मुस्लिम काल को गुलामी और अंधकार युग मानता है। इसलिए 400 साल पहले इतिहास के पन्नों में समा गए मुगल शासको के खिलाफ अनवरत सांस्कृतिक वैचारिक युद्ध लड़ रहा है। व्यावहारिक जीवन में भारत के मुसलमानोके खिलाफ यह युद्ध निर्देशित है। धर्म की उसकी अपनी व्याख्या है । वस्तुतः संघ आज भी धर्म युद्ध लड़ रहा है । जिससे संघी समझ केअनुसार हिंदू राष्ट्र बना सके। यहां हमें समझना चाहिए की संघी भी जानते हैं कि वे एक भ्रम पैदा कर रहे हैं। ऐसा कोई राष्ट्र अब दुनिया में वजूद में लाना संभव नहीं है। इसलिए संघ की परियोजना षड्यंत्र पूर्ण यूटोपिया का निर्माण करती है।

पांच – संघ परिवार के कार्य क्षेत्र का दायरा इस्लाम पाकिस्तान और लोकतंत्र के सम्पूर्ण संस्पेस के खिलाफ फैला है। इस्लाम (ईसाई और अन्य धर्म भी) विरोधी नफरत हिंसा का समाज के‌ नलिका तक विस्तार और षड्यंत्र की संगठित प्रणाली का निर्माण।

छ:-आधुनिक लोकतांत्रिक समाज से घृड़ा। तर्क विज्ञान (तकनीक नहीं) का विरोध, लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष समता समानता बंधुत्व बराबरी भाई चारा वाले समाज का निषेध तथा वर्ण व्यवस्था के गौरवबोध पर टिका हारारकी वालासमाज । वस्तुत आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य और संस्थाओं का विनाश। संघ कार्य का मुख्य क्षेत्र है। 12 वर्षों के मोदी शासन की उपलब्धियां यही हैं।

सात-वर्तमान विश्व की आधुनिक चेतना जो श्रम की लूट और पूंजी के संकेंद्रण को वर्तमान विश्व के तनाव टकराव युद्ध गरीबी भुखमरी और पिछड़ेपन का मूल कारण समझतीहैं। संघ की वैचारिक परियोजना इसके निषेध पर खड़ी है।

यही कारण है कि संघ के विचारक हिंदुओं में” शत्रुबोध के अभाव ” को उनके पतन का मूल कारण मानते हैं। इसीलिए संघके वैचारिक अभियान का केंद्रीय तत्व और दिशा शत्रुबोध जागृत करना है। संघ के समस्त विमर्श में एक” अन्य” या “ओ और हम” होता है। जिसको आगे रखकर स्वयंसेवकों को सांस्कारित किया जाता हैं। बाल शाखाओं से ही यह अभियान शुरू होता है और अंत में सत्ता प्राप्ति के बाद राज्य की सभी संस्थाओं संसाधनों और प्रचार तंत्र को इसी दिशा में मोड़ दिया जाता है।

संघ केमुख्य शत्रु हैं -धार्मिक अल्पसंख्यक, वैज्ञानिक चेतना युक्त नागरिक, तर्कवादी, लोकतांत्रिक मानवाधिकार कार्यकर्ता, वर्ण व्यवस्था विरोधी और सामाजिक समता व जाति विनाश के लिए काम करने वाले सभी नागरिक जिसमें दलित पिछड़े और हासिए के लोग है। संघके अनुसार जमीदार राजेमहाराजे पूंजीपति के साथ गुलाम प्रजा श्रम बेचता मजदूर गरीबी भुगमरी बेरोजगारी अभाव पिछले जन्म के कर्म का फल व प्राकृतिक विभाजन है। जो शाश्वत है। (हालांकि इसे धूर्तता पूर्वक सुंदर शब्दावली में छिपाया जाता है।)
“चिंहित शत्रुओं खिलाफ शत्रु बोध जागृत करना संघ केस्वयंसेवकों अनुसांगिक संघटनों और समर्थकों का मुख्य कार्यभार है “।

आठ- यही कारण है कि संघ के महान पूर्वजों के लिए अंग्रेज पिता तुल्य थे। संधी हिंदुत्व वादी उनके नालायक बच्चे थे। विश्व जन गण का शत्रु और लुटेरों का सरगना ट्रंप मित्र है और नरसंहार का दोषी इजरायली पीएम नेतन्याहू का देश ‘फादर ऑफ द नेशन ‘है । मोटा मोटी सघ की संपूर्ण परियोजना इसी विचार सारणी पर केंद्रित है।

नक्सल दिमाग – इस तरह के संक्षिप्त विश्लेषण से सौ साल के संघ कार्य और संघनीत वाजपेई सरकार से लेकर 12 साल के मोदी सरकार के कार्यकाल की प्राथमिकता को समझा और देखा जा सकता है। 13 वर्षों से पूर्ण बहुमत वाली मोदी सरकार के क्रिया कलापों प्राथमिकताओं और उपलब्धियों को देखते हुए भारतीय नागरिकों को इस भ्रम से मुक्त हो जाना चाहिए कि यह सरकार आधुनिक भारत का नेतृत्व करने में सक्षम है। सरकार चाहे जनता की गाड़ी कमाई को जितना भी आत्मप्रचार पर खर्च करे। मीडिया को खरीद ले, संस्थाओं पर कब्जा कर ले और कॉर्पोरेट पूंजी के लिए समर्पित कर दे। लेकिन उसके पास भारत की समस्याओं को हल करने की दिशा समझ और दृष्टि नहीं है।

इसलिए मोदी सरकार जब किसी समस्या से घिर जाती है ।तो उससे पार पाने के लिए सरकार के पास दमन (अपराधिक ) के अलावा कोई मार्ग नहीं होता। इसके साथ हो एक शत्रु ढूंढ लेती है।वर्तमान जैन जी आंदोलन में मोदी सरकार को यह शत्रु नक्सली दिमाग के रूप में दिखाई देने लगा।सच है कि नक्सली दिमाग देश में सत्ता धारियों द्वारा खड़ा किए गए भ्रम पाखंड झूठ आडंबर के आवरण को फाड़ कर उन्हें नंगा देता है। जिसे संधियों ने बड़ी दूर तथा पूर्वक वर्षों की मेहनत से गढकर तैयार किया है।

इसलिए लाल किले की प्राचीर से 80वें स्वतंत्रता दिवस पर मोदी ने ‘नक्सली दिमाग’ को देश के लिए खतरनाक घोषित किया है । संघ की वैचारिक पराजय-जेन -जी आंदोलन से निकले महान लोकतांत्रिक संदेश से डर कर मोदी ने उसका मुकाबला करने के लिए देश में समानांतर अर्ध सैनिक नागरिक तंत्र (सिविल डिफेंस फोर्स और सिस्टम)विकसित करने का आवाहन करके यह संकेत दे दिया है कि भारत अब किस दिशा में आगे बढ़ने वाला है। देश के लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष जन गण लाल किले के एलान में निहित खतरनाक उद्देश्य को जितना जल्दी समझ लेंगे ।वही 140 करोड़ भारतीयों के लिए शुभ होगा। भयभीत मोदी और लुटेरे सत्ताधारियों को नक्सलियों द्वारा देश समाज और मेहनतकश‌ जनता के स्वार्थ में सब कुछ न्योछावर करदेने की जिजीविषा सपने में भी पहले भी पीछा करती रही हैऔर आज भी। कर रही है।

नया प्रयोग नहीं है -अगर कोई यह समझता है कि नक्सली दिमाग से लड़ने का आवाहन नया है। तो उसे यह भ्रम त्याग देना चाहिए । संघ के पास मोरल पुलिसिंग फोर्स पहले से है।इसके पहले देशने बजरंग दल के गुंडा वाहिनी को देखा है। जो गौ रक्षा,लबजिहाद धर्म रक्षा के नाम पर निर्दोष नागरिकों की हत्या करते रहे हैं ।यही नहीं छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम नाम से राज्य द्वारा हथियारबद हत्यारा दस्ता बना था। जिसे माओवादियों का मुकाबला करने के प्रयोग किया गया था । सलवा जुडम के अर्ध सैनिक हत्यारे दस्ते ने कई हजार आदिवासी गांव जलाए। लाखों आदिवासी विस्थापित हुए। सैकड़ो मारे गए। जनता के सशक्त प्रतिरोध से उन्हें पीछे हटना पड़ा । (गांधीवादी हिमांशु कुमार के अनुसार)।
बुद्धिजीवियों की हत्या – हिंदुत्ववादियों की पुरानी परियोजना रही है। कौन नहीं जानता कि अभिनव भारत श्री रामसैने जैसे अर्ध गुप्त हत्यारे संगठन और मिलिंद एकबोटे जैसे संघी स्वयं सेवक अपराध और हत्या में लिप्त रहे हैं। डा नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, महान कन्नड़ विद्वान एम एम कलवर्गी और पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या किसने की थी। संघ के अनेक वरिष्ठ स्वयंसेवक बम विस्फोट हत्या अपराध जैसे कामों में पकड़े गए थे और संघ के कार्यालयों में बम बनाते हुए नांदेड़ से लेकर कानपुर तक बम विस्फोट हो चुके हैं । जिसमें उनके कार्यकर्ता भी मारे गए थे। संघ की पुरानी और बहु परीक्षित परियोजना है ।समानांतर अर्ध सैनिक दस्ता तैयार करना। जिससे अल्पसंख्यक को बुद्धिजीवियों सामाजिक कार्यकर्ताओं और असहमत नागरिकों को नियंत्रित किया जा सके।
महाराष्ट्र मध्य प्रदेश और झारखंड में जब भाजपा की पहली सरकारे बनी। तो मजदूरों और गरीबों के तीन नेताओं की हत्या हुई।जिसमें महाराष्ट्र में दत्ता सामंत, छत्तीसगढ़ में शंकर गुहा नियोगी और झारखंड में माले के लोकप्रिय विधायक महेंद्र सिंह थे। हत्या की सूई उस समय थी भाजपा नेताओं की तरफ घूमी थी।

भाजपा अकेली पार्टी है ।जहां भाजपा सरकार बनने के बाद बड़े नेताओं की हत्या के आरोप भाजपा के ही नेताओं पर लगे थे । जिसमें उत्तर प्रदेश में ब्रह्म दत्त द्विवेदी गुजरात में हरेंद्र पंड्या जैसे कद्दावर नेता प्रमुख हैं।

तो फर्क क्या है- फ़र्क सिर्फ यह है की 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर लाल किले से प्रधानमंत्री ने नक्सली दिमाग को समाज से बाहर करने के लिए सिविल डिफेंस सिस्टम और फोर्स बनाने का ऐलान करके खुलेआम देश को जो संदेश दिया है । उसकी आशंका पहले से ही थी। यह आकलन पहले से था कि जब मोदी सरकार संकट में जाएगी तो देश को आंतरिक टकराव में झोंक सकती है। ऐसे समय में जब जैन जी और जेन -अल्फा का का आंदोलन महानगरों से बाहर निकल कर छोटे-कस्बों शहरों और सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में फैल रहा है ।- जनता का भारी आक्रोश के केंद्र सरकार के खिलाफ संघनित होता जा रहा है। तो लालकिले की प्राचीर से “हिटलर के प्रयोग को दोहराने “का ऐलान निश्चय ही लोकतांत्रिक भारत के लिए खतरे का संकेत है।

वैश्विक चिंता –संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग और अमेरिकी सरकार के अल्पसंख्यक तथा मानवाधिकार संस्थाओं की जून की रीपोर्ट में आशंका व्यक्त की गई थी। कि भारत जीनों साइड की तरफ बढ़ रहा है। यहां तक कि अमेरिका में आर एस एस को आतंकी संगठन घोषित कर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है। ओह! सच इतना नजदीक था।

ऐसा डर क्यौ– ऐसे दौर में जब हिंदुत्व कॉर्पोरेट गठजोड़ के पास स्वघोषित मजबूत नेतृत्व है और शासक वर्गों के विचारकों चिंतकों अर्थशास्त्रियों समाज शास्त्रियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय लुटेरी ताकतों प्रत्यक्षतः मोदी और आरएसएस के साथ है।तो मोदी को लालकिले से हिटलर के प्रयोग को भारत में दुहराने की जरूरत क्यों पड़ी। लगता है आर्थिक संकट अब राजनीतिक संकट में बदलने लगा है। साम्राज्यवादी पूंजी के समक्ष (अमेरिका के साथ व्यापार समझौता) समर्पण के बाद हमारे समाज का बुनियादी संकट सघन हो रहा है। मोदी के नेतृत्व में शासक वर्गों को उससे निपटने का कोई रास्ता दिखाई न दे रहा। इस समय बढती गरीबी भुखमरी अशिक्षा कुपोषण बेरोजगारी आत्महत्या और पलायन के सभी रीकार्ड टूट रहे है।। ऐसे समयमें 80 वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब प्रधानमंत्री लालकिले से देश को संबोधित कर रहे थे । तो उनके चेहरे देह भाषा से हताशा निराशा सर चढ़कर बोल रही थी। लाल किले से प्रधानमंत्री की 76 मिनट के दिशा हीन उबाऊ भाषण से स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था कि संकट के सड़क से संसद तक फ़ैल जाने से वह डरे हुए है । जिस‌ दौर में बंगाल असम चुनाव में विपक्ष को रौंदते हुए भाजपा का विजई रथ तेजी से भारत विजय के राह पर पड़ा था और राजनीतिक दल पत्तों की तरह बिखर रहे थे। उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था। उसी समय नादान काकरोचों का (जेन जी) जन सैलाब पैलट गन इलेक्ट्रिक वैटन कील कांटे वाली लाठियां और सरकार केप्रशिक्षित गुंडों के हमलों व आंसू गैस के गोलों के डर को हवा में उड़ाते हुए संसद के इर्द-गिर्द लहरों की तरह उमडने लगा । जिससे इस्तीफा न होने वाली वाली सरकार के शिक्षा मंत्री को बेगैरत होकर पद से हटना पड़ा । हॉलात ऐसे हो गए की प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री तक की जुबान बंद हो गई। वे संसद से भाग खड़े हुए और जनआक्रोश प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगा है।
मजबूत और खूंखार नेताके भ्रम का टुटना-, युवाओं ने सरकार को घुटने पर ला दिया है। हालात यह हो गया किप्रधानमंत्री और गृहमंत्री संसद से पलायन कर गए । गोदी मीडिया अमित शाह की चुप्पी को ऐसे प्रसारित कर रहा था कि वह कोई बड़ा धमाका करने वाले हैं। लेकिन संसद के सत्र के समापन के एक दिन पहले जब वे यानी अमित शाह मीडियाके सामने आए तो गुब्बारा पिचक चुका था। मीडिया द्वारा गढ़े गए अपराजेय नेतृत्व का मिथक चकनाचूर हो गया है।भारत के कोने-कोने में सड़कों स्कूलों विश्वविद्यालय चौराहों पर युवाओं की कतारें लहरों की तरह उमड़ रही थी। ऐसे ही समय के लिए क्रांतिकारी जन कवि गोरख पांडे ने लिखा था-
,,,,वे डरते हैं।
किस चीज से डरते हैं वे।
की एक दिन निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना बंद कर देंगे।
जो सरकार प्रतियोगी परीक्षाओं जैसी अति महत्वपूर्ण परीक्षा भी करा पाने में अक्षम हो ।उसके खिलाफ स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा जन सैलाब सड़कों पर उतर आना मनुष्य के जिंदा होने का निर्णायक दस्तावेज है।
लाल किले का घिसापिटा-एकालाप-प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से परीक्षा लीक,बेरोजगारी महंगाई सीमा का संकट, गैस की क़िल्लत विद्यालयों की बंदी मजदूरों की इतिहास के सबसे बड़ी हड़ताल के बाद दिल्ली में लाखों की तादात में कॉकरोचोके पहुंचने की ऐतिहासिक घटना पर चुप्पी साध लेना। यह दिखाता है कि भाजपा सरकार के पास देश को देने के लिए मुसीबत के अलावा कुछ नहीं बचा है। 25 करोड़ लोगों को गरीबी से मुक्त कराना, एक करोड़ एआई प्रशिक्षित फौज तैयार करना और 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने जैसे जुमले अब लोगो अखरने लगे है। मोदी के एकलाप शुरू होते ही करोड़ों लोगों ने अपने हाथ में रीमोट उठा लिया ।

सवाल जवाबदेही का है -प्रधानमंत्री जी सवाल जवाब देही का है।सिविल डिफेंस फोर्स बनाने का नहीं, लोकतंत्र की मूल आत्मा है शासको का जनता के प्रति जवाब देह होना। अब लोगो को हवाई सपने और खोखले वादे नहीं चाहिए। ठोस परिणाम और जवाब देही चाहिए। अगर जबावदेही मांगने पर सत्ता डराने लगे । तो समझ लीजिए संकट कितना गहरा है। लेकिन लोग हैं कि डरने के लिए तैयार नहीं। पिछले 12 साल से जो डर लोकतंत्र की धमनियों में फैलाया गया था। वह हवा हो चुका है। अब लोग सरकार के एक-एक काम का हिसाब चाहते हैं। नइससे ज्यादा न इससे कम।

सरकार के पास जबाव नहीं -जब प्रधानमंत्री लाल किले पर प्रकट होने वाले थे ।उसके दो दिन पहले 12 वर्षों से लापता कैगकी रिपोर्ट आई। कि केंद्रीय सरकार के 15 मंत्रालय में 5हजार करोड़ से ज्यादा रुपए का कोई हिसाब किताब नहीं है। आश्चर्य है चौतरफा बढ़ रहे जन आक्रोश के बारे में एक शब्द बोलने का साहस प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीन से नहीं जुटा सके। पेपर लीक राम मंदिर में दान की लूट और सैकड़ो जगह से आ रही भ्रष्टाचार की खबरों पर बोलने का साहस उन्हें कहां से होगा। इसलिए पीएम डर बांटने लगे।

कांकरोचो की क्रांतिकारी कतारों ने जिस साहस योग्यता दक्षता और वैचारिक परिपक्वता के साथ विकल्प पेश किया है। उससे हिंदुत्व कॉर्पोरेट गिरोह का डरना स्वभाविक है। अगर यह डर स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले पर दिखने लगे ।तो समझ लेना चाहिए की जनता के संघर्ष का निर्णायक दौर शुरू हो चुका है।
नक्सली दिमागका भूत- आपको याद होगा कि कुछ वर्ष पहले पुलिस अकादमी के दीक्षांत समारोह में नव प्रशिक्षित पुलिस अधिकारियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने चेतावनी दी थी कि अब देश को वाह्य‌‌ दुश्मनों से नहीं आंतरिक दुश्मनों से खतराहै। आंतरिक दुश्मनों को चिन्हित करते हुए उन्होंने कहा था कि मानवाधिकार वादी, लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता पर्यावरण विद और दलितों पिछड़ों आदिवासियों अल्पसंख्यकों के हक की आवाज उठाने वाले लोग ही आज के लिए खतरा है। यह विकास विरोधी है। इसलिए उन्होंने ने सभी लोगों को शत्रु के लाइन में खड़ा कर दिया और नव प्रशिक्षित अधिकारियों से अपील की। आप जब सेवा में जाएं तो इनके साथ इसी नजरिए से व्यवहार करें। इसलिए प्रधानमंत्री द्वारा दिमागी नक्सली शब्द की खोज वही पुराना जुमला है। जो इसके पहले अर्बन नक्सली आंदोलन जीवी टुकड़े-टुकड़े गैंग सीकुलर गैंग के रूप में समय-समय पर संघी तहखाना से बाहर निकलता रहा है। मोदी ने अपनी डर को जनता के अंदर वापस लौटा देने के लिए दिमागी नक्सली शब्द को उछाल दिया है ।लेकिन जो दीवाने हैं। क्रांति के परवाने हैं। वे इस तरह के जुमले को गंभीरता से लेते हुए भी पीछे मुड़ने वाले नहीं है।

नक्सली दिमाग का जुमला किसके लिए-सीजेपी के आंदोलन में आइशा जैसे छात्र संगठन जब उतारे तो उनके ऊपर कई कोनों से हमला शुरू हुआ था। कई वामपंथ के शुभचिंतकों ने इसे एक और ऐतिहासिक भूल करार दिया। कई तथाकथित क्रांतिकारी डंडा लेकर मैदान में आ गए और लानत मनालत करने लगे । उनके शब्दकोश में जितनी तरह की राजनीतिक लाछन हो सकते थे ।सब लगा दिए गए। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन तेज होता गया छात्रों युवाओं के अंदर दशकों से पल रहा आक्रोश फूट निकाला । युवा देश के कोने-कोने से जंतर मंतर की तरफ दौड़ पड़े। भारीजन गोलबंदी से मध्यवर्गी डर मिटाने लगा और वैचारिक समझ बदलने लगी। आंदोलन की अगुवाई कर रहे सीजेपी के नेताओं और सोनम बांचुक को लेकर उठने वाली इशंकाएं पीछे चली गई।।
बेईमानी तुलना का अंत-2013 में कांग्रेस के खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थन करने का आरोप को फिर उछाल दिया गया। अन्ना के विश्वास घात और आम आदमी पार्टी के उदय के साथ जोड़ कर कहा गया किमालेपुरानी गलती दोहरा रहा हैं। लेकिन हमारे शुभचिंतक 13 और 26 के बीच हुए सामाजिक चेतन हुए बदलाव का मूल्यांकन करने के लिए तैयार नहीं थे। 13026 के बीच मेंमें जो सामाजिक बदलाव हुए हैं ।डेमोग्राफी में जो परिवर्तन आया है।तकनीक एआई और सूचना के क्षेत्र में जो भारी क्रांति हुई है। उसने युवाओं की चेतना में जिस तरह का गुणात्मक बदलाव किया है ।बहुत से लोग उसे बदलाव को नहींदेख पारहेथे । इसलिए आंदोलन में उतरने और उसकी अगुवाई करने में का मौका उन्होंने गंवा दिया।
ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन के छह कार्यकर्ता अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल मं सोनम वांगचुंग के साथ अलग मंचपर बैठ गए। जिससे आंदोलन की वैचारिकी दिशा सिद्धांत और धार को जिस स्तर पर ऊंचा उठाया। उसने भारत के जनतांत्रिक प्रगतिशील धर्मनिरपेक्ष ताकतों को नए उत्साह से भर दिया। आप जानते ही हैं कि किस तरह से नेहा दानिश अली मनीष आमीन जैसे आइशा के कार्य नेता राष्ट्रीय व्यक्तित्व बन गए। यही नही विभिन्न वामपंथी छात्र युवा संगठनों की भूमिका ने आंदोलन को ठोस दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आंदोलन की उपलब्धि- जहां दशकों से फैलाया जाए गए अद्दश्य डर को नौजवानों ने हवा में उड़ा दिया ।वही मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास के एक बड़े हिस्से का भाजपा से मोह भंग हुआ है ।जो आंदोलन के दौरान समय-समय पर प्रकट हो रहा था ।मोदी ने ऐसे ही लोगों को डराने के लिए नक्सली दिमाग का शोसा छोड़ने के लिए लाल किले का इस्तेमाल किया है।लेकिन देश-भर में दलितों पिछड़ों अल्पसंख्यकोंऔर प्रगतिशील लोकतांत्रिक समाजो को आंदोलन से भारी ऊर्जा मिली है ।अब उन्हें संघी फरेब और तिकड़म से पीछे नहीं धकेला जा सकता।

मोहन भागवत का खेल-संघ दोनों भूमिका अपने पास रखना चाहता है ।सत्ता की मलाई काटते हुए जन आक्रोश को कैसे ठंडा किया जाए । यह चिंता संघ को सता रही है। 100 वर्ष में खड़ा किए गए आडंबर के अचानक ढह जाने से संघी प्रोजेक्ट को भारी धक्का लगा है। इसलिए भागवत ने डैमेज कंट्रोल पर काम शुरू कर दिया है।लेकिन पाखंड तो पाखंड ही होता है । नीता अंबानी एडिटोरियम मेंहुए युवा संवाद से निकले हुए नौजवान लड़के लड़कियों ने जिस तरह से सवाल उठाए और पूछा उससे मोहन भागवत के लिए अपना क्रूर चेहरा छुपाना संभव नहीं रहा। वे निराश होकर पुराने रास्ते पर लौटते हैं और भारत को फिर विश्व गुरु बनाने लगे हैं। हंसिए मत! भारत विश्व मानचित्र पर डेवलप कंट्री नहीं, पुअर कंट्री में दर्ज होचुका है।
जेन जी से अल्फा जनरेशन तक – जेन जी ने आंदोलन का बैटन अल्फा पीढ़ी के हाथ में सौंप दिया है। आश्चर्यजनक रूप से अल्फा जेनरेशन ने आंदोलन की कमान अपने हाथ में ले ली है जगह-जगह से स्कूली ड्रेस में लड़कों के प्रतिरोध की खबरें आ रही है।वे अपने रोजमर्रा की जिंदगी में विद्यालयों हो होंगे जारहे कष्टके खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। बरसों से दबा आक्रोश अल्फा पीढ़ी की हवा में उठी मुट्ठियों के साथ इंकलाब जिंदाबाद के नारे में बदल गया है। विद्यालय में छात्रों के लिए सामान्य सुविधाओं का अभाव शौचालय पानी किताब खाने में कीड़ा पानी वाली सब्जी जली रोटी बड़ा चावल और आने जाने के रास्ते की दुर्दशा तथा विद्यालयों के मर्जर जैसे न जाने कितने सवालों और रूप में आंदोलन का मुद्दा बन रहा है। संघ के आदर्श गुरुजी की गुरु भक्ति और पैर छूने के क्रम में अपनी अस्मिता को समर्पित कर देने तथा पाखंडी मंत्रोच्चार के खिलाफ अल्फा पीढ़ी का जो आक्रोश दिख रहा है।वह निश्चय ही नए भारत के निर्माण के लिए आवश्यक ऊर्जा का विस्फोट है। आइए !इस युवा जागरण का जोरदार तालियोंसे स्वागत करें।

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार

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