सुरेन्द्र कुमार बेदिया
झारखंड की मिट्टी सदियों से संघर्षो की गवाह रही है। यह धरती केवल खनिज संपदा, हरियाली और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि अपने साहसी वीर सपूतों के त्याग, संघर्ष और शहादत के लिए भी प्रसिद्ध है। यहाँ के जंगल, झरने, नदियाँ और पहाड़ न केवल प्रकृति की अनुपम देन हैं, बल्कि वे अन्याय, उत्पीड़न और शोषण के साक्षी भी रहे हैं। इसी धरती ने बार-बार प्रतिरोध की ज्वाला को जन्म दिया है- जब सत्ता की बंदूकें जनता की आवाज को दबाने का प्रयास करती हैं, तब यह मिट्टी स्वयं विद्रोह का रूप धारण कर लेती है।
ऐसा ही 30 अक्टूबर, 1988 को झारखंड केे जिला रामगढ़ में घुटूवा गोलीकांड की घटना ने जनता में नई चेतना और प्रतिरोध की ज्वाला को नया आयाम दिया। यह केवल एक गोलीकांड नहीं था, बल्कि वह त्रासदी थी जिसने झारखंड के हर संवेदनशील मन को झकझोर दिया। उस समय झारखंडी पहचान का आंदोलन अपने उत्कर्ष पर था। आदिवासी अस्मिता, जल-जंगल-जमीन और स्वाभिमान की आवाजें बुलंद हो रही थीं। लेकिन प्रशासन ने इन जनस्वरों का उत्तर संवाद से नहीं, गोलियों से दिया।
घुटूवा की धरती पर चली वे गोलियाँ आज भी सवाल पूछती हैं क्या वह सम्मान, पहचान, न्याय, समानता और अधिकार आज भी वही मायने रखते हैं, जिनका सपना हमारे शहीदों ने देखा था ?
घटना की शुरुआत घुटूवा गांव के झगरू बेदिया के छोटे से किराने की दुकान से होती है। यह दुकान गांव के बीचोबीच स्थित थी, जहां रोजाना गांव के लोग अपनी जरूरत की चीजें-नमक, तेल, साबुन, अनाज और अन्य घरेलू सामान खरीदने आते थे। इसी सादे से दुकान से आगे चलकर वह घटना जन्म लेती है, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया।
दीवाली का समय था पूरे गांव में उत्साह और तैयारी का माहौल था। महिलाएं अपने मिट्टी के घरों को गोबर और लाल-सफेद मिट्टी से लीप-पोतकर उन्हें नया रूप दे रही थीं। आंगन में दीपों के स्थान तय किए जा रहे थे, बच्चे दीये और फुलझड़ियों की बातों में मग्न थे। इसी रौनक और सादगी भरे माहौल के बीच अचानक गांव में अफरा-तफरी मच गई। आबकारी विभाग की पुलिस 5 जीपों में
सवार होकर गांव में घुस आई। बिना किसी स्पष्ट कारण या जांच के उन्होंने जबरन ग्रामीण लोगों को पकड़ना शुरू कर दिया।
कई ग्रामीण महिलाओं को जिन्हें पकड़ पाना संभव हुआ, उन्हें बलपूर्वक जीपों में ठूंस-ठूंसकर बैठाया जा रहा था। पुलिस ने यहां अमानवीयता की सारी सीमाएं लांघ दीं। महिलाओं को बालों से पकड़कर, किसी की बांह मरोड़कर और किसी को घसीटते हुए जबरन गाड़ियों में बैठाया जा रहा था, जबकि मौके पर एक भी महिला पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थी।
यह न केवल कानून का उल्लंघन था, बल्कि महिलाओं की गरिमा और मानवाधिकारों पर सीधा प्रहार था। महिलाएं भय और विरोध से चिल्ला उठीं, पर पुलिस की बेरुखी और कठोरता के सामने उनकी आवाज अनसुनी रह गई। त्योहार की वह घड़ी देखते ही देखते भय और अन्याय के साये में बदल गई। पुलिस की इस बर्बर कार्रवाई और आतंक फैलाने वाली हरकतों से गांव में दावानल की तरह आक्रोश फैल गया।
कुछ ही पलों में खबर पूरे घुटूवा गांव और आसपास के इलाकों में आग की तरह फैल गई। लोग अपने घरों से बाहर निकल आए। प्रतिवाद में ग्रामीणों ने स्वतःस्फूर्त रूप से जबरदस्त प्रतिरोध किया। अपने पारंपरिक हथियारों हंसुआ, टांगी, दउवा, लाठी और डंडा लेकर वीर योद्धा की तरह अपने-अपने घरों से निकल पड़े। सैकड़ों ग्रामीण महिलाएँ भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आक्रोश के साथ मैदान में उतर आईं। उन्होंने उत्पाद एवं आबकारी विभाग के सिपाहियों का डटकर सामना किया
और कुछ महिलाएँ तो गाड़ियों में बिठाई गई महिलाओं को छुड़ाने में सफल भी रहीं।
ग्रामीणों के बढ़ते प्रतिरोध और स्थिति को तेजी से नियंत्रण से बाहर होता देख आबकारी विभाग की पुलिस भयभीत होकर भागने लगे, लेकिन ग्रामीणों ने उनका पीछा करते हुए आगे से पुलिस बल की जीप को रोक लिया। तब तक पुलिस दो गाड़ियों में कुछ महिलाओं को साथ लेकर भागने में सफल हो चुकी थी।
गांव में पीछे रह गए तीन पुलिसकर्मियों और जीप को आक्रोशित ग्रामीणों ने पकड़ लिया और उनकी बुरी तरह पिटाई कर दी। उन्हें बंधक बना लिया गया तथा विभाग की जीप को क्षतिग्रस्त कर अपने कब्जे में ले लिया।
29 अक्टूबर, 1988 के इस घटना की खबर आग की तरह पूरे क्षेत्र में फैल गई। शाम होते-होते आई.पी.एफ अब भाकपा (माले) के लोकप्रिय जननायक मानकुंवर बेदिया अपने कार्यकर्ताओं के साथ घुटूवा गांव पहुँचे। उन्होंने ग्रामीणों से मुलाकात की, स्थिति का जायजा लिया और घुटूवा के प्रखर युवा नेता चंदन बेदिया सहित अन्य ग्रामीणों के साथ थाना पहुँचकर मांग रखी कि ग्रामीणों को तुरंत
रिहा किया जाए और पुलिस अपने सिपाहियों व गाड़ियों को वापस ले जाए। किन्तु पुलिस ने उनकी कोई बात नहीं सुनी। उलटे सभी ग्रामीणों और नेताओं को गिरफ्तार कर दूसरे स्थान पर ले जाया गया, जहाँ उन्हें बेरहमी से पीटा और प्रताड़ित किया गया।
रात लगभग 10 बजे, पुलिस ने आई.पी.एफ के नेता चंदन बेदिया को कमर में रस्सी बाँधकर सिनेमाई ढंग से गाँव में घुसाया। चंदन बेदिया को मोहरा बनाकर पुलिस और अर्धसैनिक बल तीनों बंधक पुलिसकर्मियों को मुक्त करने में सफल हो गए।
अगले दिन, 30 अक्टूबर 1988 को, घुटूवा की घटना की खबर आसपास के गाँवों में फैल चुकी थी। देखते ही देखते हेहल, दुर्गी, पीरी, मसमोहन, ललकी धसना, शिउर-शिउरकंडेर, तेलियातू, कोड़ी, कडरू, बारीडीह, दाडीदाग, खपिया, सांकी, पाली, चिकोर, कटिया, बरतुआ पोचरा, चपरी, कंजगी पडरिया, चुंबा जैसे गांवों से हजारों ग्रामीण उमड़ पड़े। हजारों की संख्या में लोग हाथों में लाल झंडे
और नारे लिखे बैनर लेकर घुटूवा ओ पी थाना के सामने एकत्र हुए। उनका एक ही नारा था -“ गिरफ्तार ग्रामीणों को रिहा करो, अन्याय और पुलिस दमन बंद करो ! ”
जनता शांतिपूर्वक बरकाकाना ओ.पी.घुटूवा थाना का घेराव कर रही थी। उनके बीच महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं की बड़ी तादाद थी। यह आंदोलन किसी हिंसक टकराव का नहीं, बल्कि अपने हक और मान-सम्मान की आवाज उठाने का
था। जनसभा में ढोल-नगाड़ा, नारे और गीतों की गूंज थी।

जनता की इस एकता और प्रतिरोध से प्रशासन घबरा उठा। जनता को उपद्रवी बताकर हजारीबाग के तत्कालीन उपायुक्त (डीसी) और पुलिस अधीक्षक (एसपी) के आदेश पर अचानक पुलिस की टुकड़ी ने भीड़ को तितर-बितर करने के बजाय सीधी फायरिंग शुरू कर दी। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। पुलिस फायरिंग से निकली गोलियों से तीन निहत्थे ग्रामीणो रिझनी देवी, बलकहिया देवी और रामप्रसाद महतो शहीद हो गये। इन तीनों ने झारखंड की अस्मिता, न्याय और स्वाभिमान की लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति दे दी। गोलियों की बौछार से सुरेश बेदिया, प्रभु बेदिया, सोमर मुंडा , रामदेव करमाली, विश्वनाथ महतो, विगन करमाली सहित दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।
आंदोलन का नेतृत्व चंदन बेदिया, देवकीनंदन बेदिया, विश्वेश्वर बेदिया, परमेश्वर बेदिया ने संभाल रखी थी।
इस घटना की सूचना रेडियो बी बी सी लंदन से प्रसारित हुआ था। इस घटना से प्रशासन की ओर से मृतकों के परिवारों को न्याय देना तो दूर बल्कि उनके शव तक परिवार जनों को सौंपने से इनकार कर दिया। चालीस लोगों पर मुकदमा दायर किया गया था। यह क्रूरता उस दौर के पुलिस दमन की पराकाष्ठा थी।
यह वह दौर था जब इस इलाके में आईपीएफ द्वारा संगठन का विस्तार कर संघर्ष की उर्वर जमीन तैयार की जा रही थी। 60 के दशक में केन्द्रीय कार्यशाला बरकाकाना के फैक्ट्री में विस्थापितों की समस्या को लेकर जुझारू संघर्ष को अंजाम दिया गया था। सामाजिक छुआछुत व जातीय भेदभाव के विरूद्व जन जागृति चलायी जा रही थी। समाज में हाशिये की जिंदगी जी रहे दलित, आदिवासी, ग्रामीण गरीब रेजा-कुली में काम करने वाले मजदूरों के पक्ष में ठेकेदारों,महाजनों-सूदखोेरों के शोषण के विरूद्ध मुखर और धारावाहिक आंदोलन चरम पर था। पुलिसिया गुंडा गठजोड के आतंक को जन पहलकदमी से परास्त किया जा रहा था।
जमींदारों के खिलाफ एवं महिलाओं के लिए मान-सम्मान का संघर्ष, कोलियरियों फैक्टियों में असंगठित मजदूरों की न्युनतम मजदूरी के सवाल पर आंदोलन, पीटीपीएस में 18 गांवों में विस्थापन के सवाल पर लंबी लडाई, उत्पाद पुलिस, जंगल सिपाही, थाना के पुलिसिया आतंक के खिलाफ संघर्ष और पर्यावरण प्रदुषण सरीके जनमुददों पर श्रृंखलाब़द्ध आंदोलन उस समय उफान पर था।
घुटूवा गोलीकांड पुलिस, गुंडा गंठजोड़ और भ्रष्ट नेताओं व अफसरशाही की गहरी मिलीभगत का नतीजा था। ये सभी ताकतें नहीं
चाहती थी कि आई.पी.एफ.इस इलाके केे गरीब गुरबों, मजदूरों और आदिवासियों को संगठित कर एक सशक्त जनआंदोलन खडा कर सके।
इसलिए इस आंदोलन को कुचलने के लिए दमन, षडयंत्र और हिंसा का सहारा लिया गया। लेकिन आई.पी एफ का कारवां तमाम बाधाओं और दमन के बावजूद रामगढ़ की धरती पर लगातार आगे बढ़ता रहा।
घुटूवा गोलीकांड ने झारखंडी समाज में एक नई चेतना का संचार किया। गांव में लोगों ने शहीदों की स्मृति में गीत और लोककथाएँ रची। नागपुरी, और खोरठा जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में जनगीत बने जिनमें शहीदों के नाम और संदेश गूंजते हैं-
तोहर खून के लाली से धरती में होतय उलगुलान
ए शहीद नाय भुलबय हमर तोहर बलिदान ’
सहीदेक सपनवा के याद रखिया भईया याद रखिया बहिन
1988 के याद रखिया भईया याद रखिया बहिन
उ काला दिनवा के
रिझनी, बलकहिया के रामप्रसाद महतो के
याद रखिया भईया, याद रखिया बहिन
पुलिस जुलूमवा के याद रखिया भईया याद रखिया बहिन
घुटूवा गोलीकांडवा के
यह घटना झारखंडी संस्कृति के उस मूल तत्व को उजागर करती है कि यहाँ की परंपरा हमेशा अन्याय के खिलाफ खड़ी रही है। घुटूवा गोलीकांड सिर्फ इतिहास की एक दुखद घटना नहीं,बल्कि यह चेतना का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है
कि जब कभी अन्याय होती है, तो जनता अपनी एकता और संघर्ष से इतिहास का निर्माण करती है।
घटना के बाद शहीदों की याद में एक बडी रैली के माध्यम से जन प्रतिरोध सभा का आयोजन किया गया जिसमें काॅमरेड महेन्द्र सिंह सभा को संबोधित कर पुलिसिया दमन पर दोषी आला पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त कर उस पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग की थी। इसके बाद सेंट्रल वर्कशॉप बरकाकाना (रामगढ़) के समीप एक शहीद स्मारक का निर्माण किया गया। इस स्मारक पर तीनों शहीदों रिझनी देवी, बलकहिया देवी और रामप्रसाद महतो के नाम अंकित हैं।
हर वर्ष 30 अक्टूबर को यहाँ शहादत दिवस मनाया जाता है। आसपास के तमाम गाँवों से हजारों लोग इस स्मारक स्थल पर एकत्र होते हैं, अपने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके अधूरे सपनों को पूरा करने का संकल्प लेते हैं। आज यह दिवस केवल तीन शहीदों को याद करने का नहीं है बल्कि यह झारखंडी अस्मिता, अधिकार और मान-सम्मान की लड़ाई की जीवित प्रतीक बन
चुका है।
मौजूदा दौर में देश की सता पर काबिज फासीवादी ताकतें सांप्रदायिकता भडका कर अल्प संख्यकों के बीच विभाजन पैदा करने की साजिश रच रही है, ताकि जनता का ध्यान असली समस्याओं बेरोजगारी, निजीकरण, प्रकृति-विनाशऔर श्रमिकों के उत्पीड़न से हटे। वे आवाज उठाने वाले लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, आदिवासी नेतृत्वों और सजग नागरिकों पर दमनात्मक कार्रवाई कर रहे हैं, सता से सवाल करने वालों को जेल में डालकर अभिव्यक्ति और प्रतिरोध की आजादी को कुचला जा रहा है।
आज हमारे लोकतंत्र और संविधान पर सबसे बड़ा खतरा मंडरा रहा है। मतदाता सूची को अद्यतन करने के नाम पर विशेष गहन पुनरीक्षण ( एसआईआर) के जरिए गरीबों के वोट के अधिकार को छीना जा रहा है, सरकार नीतियां बना कर सार्वजनिक संस्थाओं को निजी हाथों में सौंप रही है। जल, जंगल, जमीन और खनिज संसाधनों पर काॅर्पोरेट दबदबे को बढ़ावा दे रही है, और वन संरक्षण जैसे कानूनों को कमजोर करना चाहती है ताकि डायनासोर कंपनियां सर्वस्व हडप सकें। ऐसी परिस्थिति में घुटूवा के शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए व्यापक जन-आंदोलन खड़ा कर हर स्तर पर एकजुट होकर प्रतिरोध करना होगा। लोकतंत्र, संविधान, न्याय, समानता और आजादी बचाने के लिए आवाज बुलंद करने होंगे।

