समकालीन जनमत
ज़ेर-ए-बहस

चार लाख पद ख़त्म और ‘ माननीयों ’ की वेतन वृद्धि

बजट से ठीक एक दिन पहले अखबारों में खबर छपी कि केंद्र सरकार लगभग 4 लाख ऐसे पद खत्म करने जा रही है,जो पांच सालों से खाली हैं.आज बजट आया तो पता चला कि राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,सांसदों आदि के वेतन में अच्छी खासी बढ़ोतरी की गयी है.इन दोनों बातों का आपस में कोई सम्बन्ध भले ही न हो,लेकिन ये दोनों ही केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं की अभिव्यक्ति तो हैं ही.
सोचिये कि यदि राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति या सांसदों का वेतन बढाने का प्रस्ताव बजट में नहीं शामिल होता तो क्या इनमें से किन्ही महानुभाव के बच्चों की फीस समय पर चुकाए जाने में कोई बाधा पैदा होती ? क्या इनमें से किसी के घर में,इस वेतन वृद्धि के बगैर चूल्हा नहीं जलता ? जाहिर सी बात है कि ऐसा कुछ नहीं होता.इस वेतन वृद्धि के बगैर भी इनमें से कोई भूखों नहीं मरता बल्कि अच्छी-खासी विलासितापूर्ण जीवन शैली,इनमें से अधिकाँश महानुभावों की है.लेकिन इनके वेतन-भत्ते इतने महत्वपूर्ण हैं कि वे केंद्रीय बजट के जरिये बढाए जा रहे हैं.
दूसरी तरफ उन 4 लाख पदों की बात करें.इन पदों पर नियुक्ति होती तो कई परिवार पलते और कई परिवार चलते.लेकिन इनके रिक्त होने को,इन पदों को खत्म करने का आधार बनाया जा रहा है.जरा सोचिये,ये पद किसने भरने थे? क्या ये उन बेरोजगारों ने भरने थे,जो इन पदों पर नियुक्त किये जाने योग्य हैं? ये पद भरने की प्रक्रिया की गाड़ी के पहियों को गति उन्होंने ही देनी थी,जिन्होंने आज राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,सांसद आदि अपनी बिरादरी के लोगों को वेतन वृद्धि की सौगात दी है.
जिन कई नारों पर सवार हो कर केंद्र की सत्ता में मोदी सरकार आई थी,उनमे “ बहुत हुई बेरोजगारी की मार,अब की बार मोदी सरकार ” का नारा भी था.साथ ही हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वायदा भी था.लेकिन इस बजट तक आते-आते वायदा एक साल में 70 लाख रोजगार के अवसरों के सृजन पर पहुँच गया है.
थोड़ी देर के लिए, चलिए मान लेते हैं कि अन्य तमाम बातों की तरह हर साल, दो करोड़ रोजगार देने की बात भी, एक और खालिस जुमला था.लेकिन इन चार लाख पदों का क्या? ये नए सृजित नहीं किये जाने थे.ये तो सृजित थे.इन पर केवल नियुक्ति प्रक्रिया चलाई जानी थी.4 लाख पद जो सृजित थे,उनपर नियुक्ति करना मुश्किल लगे,राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति और सांसदों का वेतन बढ़ाना आसान तो समझ सकते हैं कि सरकार कितनी जनपक्षधर है.बड़े पूंजीपतियों के लाखों करोड़ रूपया,हर साल माफ़ करने में कोई भार खजाने पर न महसूस होता हो और 4 लाख पद,सरकार का खर्च कम करने के नाम पर खत्म किये जा रहे हों तो समझ लीजिये कि सरकार,किसके साथ है. 4 लाख रिक्त पदों को खत्म करके, जब पकौड़े का ठेला लगाने वाले को स्वयं की उपलब्धि, प्रधानमंत्री जी बताएं, तो दृष्टि,दिशा और दशा समझ ही सकते हैं.

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