Wednesday, August 17, 2022
Homeख़बरअंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: नफरत और हिंसा के खिलाफ अमनपरस्ती की बेख़ौफ़ आवाजें

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: नफरत और हिंसा के खिलाफ अमनपरस्ती की बेख़ौफ़ आवाजें

 

बनारस: बीते 8 मार्च को स्वयंवर वाटिका, लंका, वाराणसी में आल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेंस एसोसिएशन ने ‘नफरत और हिंसा के खिलाफ अमनपरस्ती की बेख़ौफ़ आवाजें’ नाम से गौरी लंकेश और अस्मां जहाँगीर को समर्पित अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया |

कार्यक्रम की शुरुआत में बी.एच.यू. की बी.एड. की छात्रा निधि यादव को श्रद्धांजलि दी गई, जिसकी अभी हाल ही में बनारस में एक सांड के हमले में दर्दनाक मौत हो गई | इस दर्दनाक घटना के लिए नगर निगम प्रसाशन को जिम्मेदार ठहराने तथा जिम्मेदार अफसरों की तुरंत गिरफ्तारी की मांग भी की गई | ऐपवा की राज्य सचिव कुसुम वर्मा ने घटना पर दुःख और रोष जताते हुए कहा कि एक नौजवान लड़की, जिसकी उम्र सपने देखने और उन्हें पूरा करने की थी, ऐसी दुखद घटना का शिकार हो गई | राज्य सरकार जिस तरह से मनमानी कानूनों को थोप रही है तथा आवारा पशुओं के नियंत्रण की कोई भी उचित व्यवस्था नहीं कर रही है, वह भी इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार है |

साथ ही साथ सीरिया में हो रहे नरसंहार की भर्त्सना भी की गई तथा मंदिर निर्माण को लेकर दिए गए श्री श्री रविशंकर के उस बयान की भी निंदा की गई, जिसमें उन्होंने भारत के सीरिया बन जाने की धमकी दी थी | जहाँ हमें सीरिया के हालात पर संवेदनात्मक रुख अख्तियार करना चाहिए, वहाँ इस तरह के भड़काऊ बयान देश के सामाजिक ताने-बाने को क्षतिग्रस्त ही करेंगे |

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के उर्दू विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. शाहिना रिज़वी ने कहा कि सामाजिक बदलाव और स्त्री अधिकार की लड़ाई महिलाओं और पुरुषों को मिलकर लड़नी होगी | बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की प्रो. प्रतिमा गोंड़ ने कहा कि धर्म और संस्कृति की आड़ में महिला मुक्ति के रास्ते अवरुद्ध किए जा रहे हैं |

प्रो. शाहिना रिज़वी

दिल्ली विश्वविद्यालय से आई असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉ. उमा गुप्ता ने विश्व महिला दिवस के इतिहास को याद करते हुए कहा कि आज का दिन महज शुभकामनाओं और बाज़ार द्वारा दी जा रही उपहार-छूटों का दिन नहीं है | आज का दिन दुनिया की श्रमशील और कामगार महिलाओं ने अपने संघर्ष से हासिल किया है | इस मौके पर डॉ. उमा गुप्ता ने विगत दिनों हुए बी.एच.यू. की छात्राओं के आन्दोलन को याद करते हुए कहा कि जिस तरह देश के विभिन्न विश्वविद्यालय परिसरों में महिलाओं के खिलाफ हमले बढ़ रहे हैं, हमें एक व्यापक एका और आन्दोलन की आवश्यकता है | जहाँ बाज़ार महिलाओं की आज़ादी के नाम पर उनके शोषण के नए-नए टूल्स विकसित कर रहा है, वहीं सत्ता प्रतिष्ठान गैर संवेदनशील रवैये से शोषण के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं |स्त्रियों को उनके शरीर तक रिड्यूस करने की पितृसत्तात्मक साजिशों को बेनकाब करने और अपने अधिकारों को हासिल करने की लड़ाई तेज़ करने की आज सबसे ज्यादा जरूरत है |

डॉ. उमा गुप्ता

इस मौके पर दिल्ली से आई डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्देशिका पुष्पा रावत की फिल्म ‘निर्णय’ की स्क्रीनिंग की गई | यह फिल्म हमारे समाज में लड़कियों के निर्णय लेने की आज़ादी के सवाल को उठाती है | अपना कैरियर चुनने, अपना साथी चुनने, अपने जीवन को अपनी पसंद से जीने का निर्णय लेने का अधिकार भी हमारे समाज में महिलाओं को नहीं है | स्क्रीनिंग के बाद बातचीत के सत्र में निर्देशिका ने दर्शकों के सवालों के जवाब भी दिए | एक दर्शक ने सवाल उठाया कि हमारे समाज का ढांचा ऐसा है कि कई बार अपनी बात कह देने के बावजूद वह नहीं किया जाता जो हम चाहते हैं, ऐसे में सवाल उठाने का क्या औचित्य रह जाएगा ? इस सन्दर्भ में हो रही बातचीत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि महिलाओं ने अभी तक जो भी अधिकार अपने लिए हासिल किए हैं उसमें उठाए गए सवालों की महत्वपूर्ण भूमिका है, इसलिए सबसे जरूरी है सवाल उठाना, अपनी बात रखना | बातचीत का सत्र बेहद रोचक और बहसतलब रहा | सवाल-जवाब के इस सत्र में घरेलू कामगारिन शीला ने अपने आर्थिक और सामाजिक शोषण की बात कही जिसे ऐपवा ने घरेलू कामगारिनों को संगठित करने और यूनियन बनाने  की चुनौती के रूप में स्वीकार किया |

अमेठी से आई शिक्षिका डॉ. रूचि दीक्षित ने अपने पुस्तकालय अभियान के अनुभव साझा किए | इस अभियान के विजन को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कस्बों और गांवों में पढ़ने-लिखने की जगहों का बेहद अभाव है | खासकर, लड़कियों को ऐसी सुविधाएँ और भी मुश्किल से उपलब्ध हो पाती हैं | आज का दौर, जब मीडिया और सोशल मीडिया लगातार खतरनाक और सोचे समझे तरीके से भ्रम और झूठ का प्रचार कर रहे हैं, राष्ट्रवाद के नाम पर इतिहास और संस्कृति को योजनाबद्ध तरीके से विकृत किया जा रहा है, हमें पढ़ने की संस्कृति का विस्तार करने की आवश्यकता है | अमेठी के एक गाँव में सावित्रीबाई फुले के नाम से एक पुस्तकालय की स्थापना की गई है, इस अभियान को अन्य स्थानों पर भी ले जाने की योजना पर काम किया जा रहा है | डॉ. रूचि ने उपस्थित समुदाय से ऐसे पुस्तकालयों की स्थापना और सहयोग की अपील भी की |

जनगीत प्रस्तुत करते युद्देश बेमिसाल और साथी

कार्यक्रम में हैदराबाद के टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज  से पढ़ाई कर चुकी  संपृक्ता चटर्जी ने कैफ़ी आज़मी की नज़्म ‘उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे…..’ का पाठ किया | जर्मनी से आई यास्मीन ने कार्यक्रम का वीडियो डाक्यूमेंटेशन किया | विकल्प स्टडी सर्कल के विकास ने कहा कि आज के दौर में जब प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक मूल्य लगातार खतरे में हैं, हमें संगठित होकर युवाओं में समझदारी के विकास और संघर्ष के जज्बे के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता है | कार्यक्रम के अंत में युद्धेश बेमिसाल और ऐपवा के साथियों ने ‘तुम बोलोगी, मुंह खोलोगी तब ही तो ज़माना बदलेगा’ जैसे जनगीतों की प्रस्तुति दी | कार्यक्रम का संचालन ऐपवा की स्मिता बागडे ने किया, धन्यवाद ज्ञापन ऐपवा सदस्य सुजाता भट्टाचार्य ने किया | कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं के साथ-साथ बी.एच.यू के शिक्षक, बुद्धिजीवी, रंगकर्मी,  शहर के तमाम सामाजिक कार्यकर्ता, चंदौली से आई ऐपवा की मेहनतकश महिलाएं शामिल थीं |

ऐपवा के साथी

 

RELATED ARTICLES

1 COMMENT

Comments are closed.

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments