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January 18, 2020
जेरे बहस

प्रार्थना का साम्प्रदायीकरण और छात्र-सत्याग्रह

  क्या देश के स्कूलों में अब सब कुछ वही होगा जो फिरकापरस्त संगठन चाहेंगे ? प्रार्थना से लेकर सिलेबस तक क्या सब कुछ उन्हीं के मन-मुताबिक़ ही होगा ? साम्प्रदायिक ताकतें अब किस कदर लोगों के दिल-दिमाग को हिंदुत्व-रक्षा के नाम पर जड़ बनाने पर तुली हुई हैं, उसका यह सीधा  और ज्वलंत उदाहरण है. इसे एक छोटी घटना के रूप में देखना हमारी नासमझी होगी.

उत्तर प्रदेश से लगातार दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों पर हमले –हत्याओं की खबरें इधर आती रही हैं। फिर इधर जागरूक पत्रकारों को भी सच कहने /दिखाने के इलज़ाम में जेल भेजा गया है । और अब एक प्राइमरी स्कूल के हेडमास्टर को सस्पेंड करने की खबर है । पीलीभीत जिले के बिसालपुर ब्लॉक के घयास्पुर के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में प्रार्थना के तौर पर बच्चों से प्रसिद्ध शायर अल्लामा इकबाल के प्रसिद्ध गीत—‘लब पे आती है दुआ’ को गवाने पर विश्व हिन्दू परिषद के स्थानीय सदस्य की शिकायत पर वहाँ के हेड मास्टर  फुरकान अली को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया ।

यह बात जितनी हास्यास्पद है उससे कहीं अधिक शर्मनाक और चिंतनीय है । विडम्बना यह है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के चल रहे अंधे जूनून में अब केवल धर्म के कथित ठेकेदार ही नहीं, वरन प्रशासन भी शामिल हो गया हैं. यह अजब-गजब और भयावह चीजें अब हमारे रोजमर्रा की बात हो जा रही है ।

  ‘लब पे आती है दुआ’ यह प्रार्थना, जिसे 1902 में अल्लामा इकबाल ने बच्चों की दुआ के रूप में लिखा था । यह बरसों से विभिन्न स्कूलों या मदरसों में गवाया  जाता रहा है । इसमें शायर ने बच्चों के हवाले से  कहा है–

    लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी

    ज़िंदगी शम्मा की सूरत हो खुदाया मेरी

    हो मेरे दम से यूँ ही मेरे वतन की ज़ीनत

    जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

    ज़िंदगी हो मेरी परवान की सूरत या रब

    इल्म की शम्मा से हो मुझको मुहब्बत या रब

    हो मेरा काम गरीबों की हिमायत करना

    दर्दमंदों से ज़इफों से मुहब्बत करना

    मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको

    नेक जो राह हो उस रह पे चलाना मुझको

  इस प्रार्थना में भला ऐसी कौन-सी आपत्तिजनक बात है कि शिक्षा विभाग ने शिक्षक को सस्पेंड कर दिया ? क्या सिर्फ इसलिए कि यह ‘उनकी’ भाषा उर्दू में लिखी गई है और इसे ‘वही ’ लोग गाते हैं ? इस प्रार्थना को मैंने पहली बार ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह द्वारा संगीतबद्ध एलबम ‘क्राइ फॉर क्राइ’ में सुना था । इस एलबम की सारी रायल्टी अनाथ बच्चों की मददगार संस्थाओं को समर्पित थी । एक बालिका की ही आवाज़ में रिकॉर्ड यह प्रार्थना मेरा विश्वास है, अपने हर सुननेवाले को शिक्षा के बेहद गहरे और ज़रूरी मानवीय सरोकारों से जोड़ता है, जिसमें बच्चों को ज्ञान की रोशनी से अपना जीवन रौशन करने की बात कही गई है, जिसमें अपने बदौलत इस देश की शोभा उसी तरह बढ़ाने की बात कही गई है जैसे बगीचे में फूलों से शोभा होती है, पीड़ितों से मुहब्बत और गरीबों की हिमायत करने की बात कही गई है, जिसमें बच्चों को नेक राह पर चलने की प्रेरणा दी गई है ।

अब ऐसे साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत उत्कृष्ट और संवेदनशील तथा भलाई और परोपकार  की प्रेरणा  देने वाली प्रार्थना क्या महज इसीलिए नहीं गाई जानी चाहिए कि वह उर्दू में लिखी गई है, और जिसे मदरसों में गवाया जाता है ? शिक्षक को ‘तय शुदा प्रार्थना से हटकर’ प्रार्थना कराने के कारण सस्पेंड कर दिया गया । विद्वेषपूर्ण और वर्चस्वकारी धार्मिक-भाषाई राजनीति के चलते इसे ‘हिन्दू बच्चों पर अपनी धर्म और संस्कृति थोपने’ का इलज़ाम लगा कर बंद कराया गया है । जबकि हेड मास्टर बता रहे हैं कि स्कूल में इसके अलावा ‘वह शक्ति हमें दो दयानिधे’ भी गवाया जाता है और राष्ट्रगान तो गवाया ही जाता है, नारे भी लगवाये जाते हैं ।

प्रश्न यह है कि स्कूल में क्या किसी अन्य भाषा की श्रेष्ठ प्रार्थना करना/कराना प्रतिबंधित है ? जबकि यह उन्हीं अल्लामा इकबाल का गीत है जिन्होंने कभी लिखा था-

    सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा,

    हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसितां हमारा

    मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

    हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

 यह बहुत ही दुखद बात है कि जिले के शिक्षा अधिकारी की अनुसंशा पर डी.एम.(कलेक्टर) ने इसे तय शुदा प्रार्थना से हटकर प्रार्थना कराने, इससे छात्रों और अभिभावकों में डर का माहौल बनाने, अपनी मनमानी और हठधर्मी करना मानते हुए जाँच के आदेश के साथ सस्पेंड कर दिया । वहीं, इसी वीडियो में राज्य के बेसिक शिक्षामंत्री अपनी बाइट में इसे किसी तंत्र-मन्त्र की बात बता रहे हैं । सब कुछ इतने पर ही नहीं रुक जा रहा । पीलीभीत के विधायक रामशरण वर्मा संविधान में अनुच्छेद 29,30 और 31, जो विभिन्न समुदायों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित और विकसित करने का अधिकार देता है,उसे ही संविधान से हटाये जाने की मांग कर रहे हैं । (स्रोत: एनडीटीवी पर 17 अक्टूबर  को ‘प्राइम टाइम’ में प्रसारित)

 इस कवरेज से देशभक्ति और हिंदुत्व के नाम पर किये जा रहे अज्ञानता, संकीर्णता और धर्मान्धता की पोल खुल जाती है । इससे भी बढ़कर चिंतनीय है इस देश की जो साझा संस्कृति और विरासत रही है, उसे तोड़ने का काम लगातार किया जा रहा है । धर्मान्धता और अंध राष्ट्रवाद को साजिशन पूरे उफान पर ले आया गया है । क्या अब स्कूलों में कोई भी अच्छी  बात भी किसी दूसरी भाषा की स्वीकार नहीं की जाएगी ? यह गैर कानूनी होगा ? यह शिक्षा और  भाषा के प्रति निहायत साम्प्रदायिक दृष्टिकोण है । इस प्रार्थना के गाए जाने की विश्व हिन्दू परिषद के स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायत इतनी बड़ी और भारी हो गई कि  प्रशासन नीचे से ऊपर तक तुरंत ऐसे मुस्तैद हो गया जैसे यह कोई हिंसा, घृणा फैलाने वाली देशद्रोही प्रार्थना हो ! या बच्चों के साथ बड़ा भारी अन्याय हो गया हो !

यह हद दर्जे की घृणित और साम्प्रदायिक सोच है कि बच्चों को अपने देश की बहुभाषी, बहुरंगी संस्कृति के ज्ञान से वंचित कर उन्हें महज एक ही तरह से बोलना–पढ़ना सिखाया जाय । भाषा जन गण की संपदा होती है । जबकि एक रूसी लोकोक्ति है: “जितनी भाषाएं मैं जानता हूँ, उतनी ही बार मैं  मनुष्य हूँ” । स्कूल की अवधारणा सदैव विचारों की एक ऐसी खुली जगह की रही है, जिसमें बच्चे नई भाषा, नया ज्ञान, नई तकनीक सीखते हैं । इसीलिए भारत सरकार की एक प्रतिष्ठित संस्था ‘सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र’(CCRT) पिछले कई बरसों से इस देश की बहुरंगी संस्कृति, कलाओं, धरोहरों, भाषाओं से स्कूली बच्चों को जोड़ने और इनका महत्व समझाने के लिए काम कर रही है,जिसमें देश के हर भाग के शिक्षकों को इन्हें सुरक्षित-संरक्षित रखने की ट्रेनिंग दी जाती है । मैं भी एक स्कूली शिक्षक हूँ, जिसने यहाँ ट्रेनिंग पाई है । यहाँ अपने विद्यालयों में बच्चों को गवाने-सिखाने  के लिए देश की लगभग सभी भाषाओं के गीत भी सिखाए जाते हैं । जिसमें नीरज का लिखा एक बहुत लोकप्रिय गीत भी शामिल है -‘हिन्द देश के निवासी सभी जन एक हैं, रंग-रूप वेश भाषा चाहे अनेक हैं.’

  ऐसी संकीर्णता और जड़ता उस भारत के उस भविष्य के ख़िलाफ़ है जिसका सपना यहाँ के महापुरुषों ने देखा था. । स्कूल या शिक्षा में ऐसी संकीर्णताओं की जगह नहीं होनी चाहिए। यह कोई राष्ट्र-विरोधी काम नहीं था कि आनन-फानन में सस्पेंड कर दिया जाए । स्कूल में सबकुछ बिलकुल तयशुदा और अंतिम तो नहीं होता । मान लीजिये, इस पर आपत्ति ही थी तो इसकी पूरी जाँच-पड़ताल के बाद कार्यवाही होनी चाहिए थी । दरअसल जिस तरह से इधर धर्म आधारित उग्र नफरत की अंधी और हिंसक राजनीति की जा रही है, अच्छे और ऊंचे आदर्शों व जीवनमूल्यों को छोड़ा जा रहा है, उसके चलते उस हमारे उस समृद्ध साझे विरासत और संस्कृति को कुछ साल के बाद मानो एक बीती हुई बात हो जानी है । तब सबकुछ वही और वैसा ही होगा जो ये चाहते हैं ।

 ऊपर उल्लेखित प्रार्थना इतनी अच्छी है कि मैंने अपने स्कूल में बच्चों को  इसे सिखाया और गवाया है । क्या इसे सीखकर बच्चे एक और भाषा में थोड़ा ही सही, जानकार नहीं हुए होंगे । क्या यह कोई नुकसानदायक चीज़ है ? ज्ञान के क्षेत्र असीमित हैं । यह तो ऐसा महासागर है जिसमें दुनिया की तमाम अच्छी बातें समाहित हैं-चाहे वह किसी भी देश या भाषा की हो । शिक्षा को ऐसा व्यापक और उदार होना ही चाहिए । तभी बच्चों में उस सहृदयता, उदारता, सहनशीलता और परस्पर सहयोग जैसे आदर्श मानवीय मूल्य स्थापित हो सकेंगे जो शिक्षा का एक बेहद महत्वपूर्ण आयाम है । अपना पूरा जीवन प्राथमिक शाला के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में लगाने वाले रूस के प्रसिद्द शिक्षक वसीली सुखोम्लिन्स्की मानते हैं-“शिक्षा बच्चों के लिए रोचक और मनपसंद काम तभी हो सकती है जब वह विचारों,भावनाओं,सृजन,सौन्दर्य और खेलों की उज्ज्वल किरणों से आलोकित हो ”।

   इस मामले में अच्छी बात यह हुई कि उस स्कूल के छात्र अपने उस शिक्षक के सस्पेंशन के विरोध में, उनकी बहाली की मांग को लेकर स्कूल से बाहर आ गए । वे मान रहे हैं कि उनके शिक्षक के साथ गलत और अन्याय हुआ है । ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में 19 अक्टूबर 2019 को प्रकाशित असद रहमान की रिपोर्ट के अनुसार, विरोध करनेवाले ग्रुप के कक्षा 5 के एक छात्र का कहना है, “जब हमने इसे अपनी उर्दू पुस्तक में पढ़ा, हमने इसे पसंद किया तब हेड मास्टर से इसे गाने की अनुमति मांगी । दोनों धर्म के,हिन्दू और मुस्लिम छात्रों, ने ही मांग की । और हेड मास्टर ने इसे हर एक दिन छोड़कर गाने की अनुमति दे दी ” । वहीं  उस स्कूल के चौथी कक्षा के एक छात्र का बयान बहुत तार्किक है: “यदि उन्हें इस कविता को हमारे गाने के कारण सस्पेंड किया गया है तो यह  सरकार की  गलती है जो इसे हमारे पाठ्यक्रम में रखा है । तो क्या इसका मतलब इस सरकार को सस्पेंड कर देना चाहिए ?”

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1 comment

भास्कर चौधुरी October 21, 2019 at 10:22 pm

1995 में जब मैंने डीएवी पब्लिक स्कूल में एक शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुवात ही की थी तो इसी नज़्म को जगजीत सिंह जी के द्वारा निर्देशित गीतों-ग़ज़लों के कैसेट पर पहली बार सुना था और मुझे लगा था कि बच्चों और शिक्षकों के लिए सुबह सबेरे इससे बेहतर प्रार्थना नहीं हो सकती.. मैंने भी कैलाश बनवासी जी की तरह इस नज़़्म को अपने बच्चों को सिखाया उस दिन बेहद गर्व महसूस हुआ जब तकरीबन1800 बच्चों ने पंक्तिबद्ध खड़े होकर पूरे जोशोखरोश के साथ गाया.. बच्चे जब सम्वेत स्वर में लब पे आती है दुआ बनके.. गाया तो यह कहना असम्भव था कि किस बच्चे का पिता मुसलमान है और किसकी माँ हिंदू, जैन, बौद्ध या सिख है। भाईचारे और परोपकार की बात करती यह नज़्म आज मूढ़ और कूपमण्डूकों को अखर रही है इससे ज़्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है. मुझे इस बात का भी बहुत दुख है कि इन तमाम वर्षों में मैंने अपने बच्चों को भयमुक्त माहौल में पढ़ते लिखते खेलते कूदते आगे बढ़ते रहने का सपना देखा है जो आज सत्ता में बैठे घोर सांप्रदायिक लोगों की साजिशों की वजह से टूटता हुआ दिख रहा है। ऐसे घोर निराशाजनक समय में उम्मीद तभी जग सकती है जब तमाम प्रगतिशील सोच वाले आगे आएँ और सत्ता के मद में चूर देश को सौ वर्ष पीछे ले जाने की साजिश कर रहे नेताओं के चंगुल से आज़ाद करें..

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