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बांगरमऊ की शादी में पढ़ी गयी एक नयी शपथ

2 फरवरी को नितिश कनौजिया की  बारात भी उत्तर भारत की आम बारात जैसी थी. कुछ बारातियों की लापरवाही और कुछ लखनऊ शहर के जाम की वजह से हम शाम 5 की बजाय 7 तक ही उन्नाव के बांगरमऊ कसबे के लिए शहर छोड़ सके. पतली सड़क होने की वजह से 70 किमी की दूरी नापने में करीब ढाई घंटे लग गए. जब तक हम बांगरमऊ कसबे पहुंचे स्थानीय बैंड पूरे जोश के साथ ‘यह देश है वीर जवानों का .. अलबेलों का मस्तानों का..’ बजा रहा था.

बैंड दल को आकर्षक बनाने के लिए बिजली के हौदे किशोर लड़कों ने ही पकड़े थे हालांकि वे भी रह रह कर अपने पाँव बैंड की धुन पर थिरका रहे थे.

बांगरमऊ के श्याम कलां रिसॉर्ट में घरातियों की खूब भीड़ जमा थी और रिसॉर्ट के एक कोने पर बना डी जे और उसका संचालक पूरी उदारता के साथ शादी में पधारे मेहमानों के साथ प्रयोग कर रहा था. गाने का चुनाव हरियाणा के चलताऊ गानों से लेकर अवधी, भोजपुरी और बालीवुड की संगीत लहरियों से हमारे कानों के धैर्य और क्षमता की परीक्षा लेने पर तुला था.

खाने की मेज पर भी अप्रत्याशित भीड़ थी जिस वजह खाने के मजे की बजाय रात दस बजे किसी तरह पेट भरने की हड़बड़ी अधिकांश मेहमानों में दिख रही थी.

खूब सारे हो हल्ले के बाद इस रिसॉर्ट में एक नयी घटना हुई जिसकी तस्दीक के लिए मैंने इतनी कहानी बनायी है. यह बात है उस शपथ की जो उस शादी में पढ़ी गयी. दूल्हे नितिश कनौजिया  और दुल्हन संध्या सिंह के कड़े निर्णयों की वजह से उन्नाव के बांगरमऊ की इस शादी में शादी का कोई मंडप न था न ही पंडितों का कोई तामझाम.

कुछेक घराती और शायद बराती भी अपनी दुनाली बन्दूक लटकाए घूम रहे थे लेकिन उन्हें भी उसे दागने का कोई अवसर दूल्हे दुल्हन ने न दिया. खाना हो जाने के बाद डी जे का कर्कश संगीत प्रयोग बंद हुआ और एक छोटे समूह के बीच दूल्हा दुल्हन ने शपथ लेनी शुरू की. शपथ स्थानीय शिक्षक द्वय गीता और विबुधेश यादव ने संकल्पित की थी जिन्होंने खुद यह प्रयोग अपनी शादी में दुहराया. थोड़ी ही देर में उत्तर प्रदेश के पिछड़े कसबे में एक बेहद विचारवान संस्कृति की नींव डाली जा रही थी जिसमें शायद पहली बार किसी विवाह स्थल से दूल्हा दुल्हन शपथ की तीसरी पंक्ति में यह कह रहे थे कि “विपरीत, विरुद्ध या आपात् स्थितियों में भी हम दोनों एक दूसरे के प्रति अपमानजनक व्यवहार और विश्वासघात नहीं करेंगे। और किसी भी प्रकार से हम एक दूसरे को हानि नहीं पहुँचायेंगे बल्कि सद्भावना रखते हुए  एक के या एक दूसरे के हित में न्यायपूर्ण हल निकालेंगे ।”

 

अच्छी बात यह भी रही कि शपथ के तुरंत बाद उपस्थित लोगों से साक्षी के रूप में हस्ताक्षर लिए गए और इसतरह उन्हें भी इस नयी सामाजिक हलचल में भागीदार बनाया गया.

नीचे लिंक पर चटका लगाकर पढ़ें पूरी शपथ.

दस्तावेज़ (शादी की शपथ )

शपथ के कुछ मिनटों बाद ही एक सुखद अंत की तरह से वर वधू ने जयमाल की रस्म पूरी कर माहौल और खुशनुमा और सार्थक बनाया.

उम्मीद है कि नितिश और संध्या की यह पहल बांगरमऊ कसबे के और युवाओं को भी प्रेरित करेगी.

 

 

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