महेश सिंह
देश में करोड़ों लोगों की सुबह हर दिन भागदौड़ से शुरू होती है। ये लोग हर दिन अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए घरों से निकलते हैं। मुंबई की लोकल ट्रेनों में धक्का-मुक्की करते लोग, दिल्ली के मेट्रो स्टेशनों पर लंबी कतारें, बेंगलुरु के ट्रैफिक में फंसे आईटी पेशेवर और गांवों से शहरों की ओर पलायन करते मजदूर- इन सबकी कहानी एक ही है। हर कोई बेहतर जीवन की तलाश में है। हर कोई ढेर सारा ‘ पैसा ‘ कमाना चाहता है। हम अक्सर अपनी चर्चाओं में महंगाई, बेरोजगारी, अमीरों की बढ़ती संपत्ति और गरीबों की बदहाली आदि पर बात करते हैं। हम सवाल उठाते हैं कि आखिर देश की जीडीपी बढ़ने के बावजूद आम आदमी की जेब खाली क्यों है? क्यों एक किसान अपनी फसल का उचित दाम नहीं पाता, लेकिन वही फसल मॉल में जाकर सौ गुना महंगी बिकती है ? इन सवालों के जवाब हमें कार्ल मार्क्स की मशहूर किताब ‘ दास कैपिटल ‘ में मिलते हैं। लगभग डेढ़ सौ साल पहले लिखी गई यह किताब आज के डिजिटल और स्टार्टअप इंडिया के दौर में भी हमारे समाज की आर्थिक नब्ज को समझने के लिए जरूरी है। यह लेख किसी भारी-भरकम सिद्धांत को थोपने के लिए नहीं लिख रहा हूँ। इस लेख का उद्देश्य आम नागरिक को यह बताने की कोशिश मात्र है कि उसके पसीने की कमाई और बाजार की चमक-दमक के बीच क्या रिश्ता है।
तो सबसे पहले हमें अपने आस-पास की दुनिया को देखने के नजरिए पर बात करनी होगी। मार्क्स ने इसे ‘माल’ या कमोडिटी के जरिए समझाया है। आज का भारत एक बहुत बड़ा बाजार है। हमारे लिए खुशी का मतलब अब ‘खरीदारी’ हो गया है। त्यौहार हो या जन्मदिन, हम खुशियां मनाने के लिए बाजार की तरफ दौड़ते हैं। इसे मार्क्स ने ‘माल का अंधविश्वास’ कहा था। आज हम जिस तरह से ब्रांडेड कपड़े, महंगे स्मार्टफोन और विदेशी गाड़ियों के पीछे भाग रहे हैं, वह इसी अंधविश्वास का उदाहरण है। हम वस्तु की कीमत और उसकी चमक तो देखते हैं, लेकिन उसके पीछे छिपे मानवीय रिश्तों को नहीं देख पाते। जब हम एक ऑनलाइन सेल में सस्ता जूता खरीदते हैं, तो हम यह नहीं सोच पाते कि उसे बनाने वाले मजदूर को आगरा या कानपुर की किसी अंधेरी कोठरी में कितने घंटे काम करना पड़ा होगा और उसे क्या मजदूरी मिली होगी। आज के भारतीय समाज में वस्तुओं ने इंसानों की जगह ले ली है। हम व्यक्ति का सम्मान उसके ज्ञान या व्यवहार से नहीं करते। हम देखते हैं कि उसके पास कितनी गाड़ियां और गैजेट्स मौजूद हैं। यही बाजार का चरित्र है। यह बाजारीकरण हमारे सामाजिक ताने-बाने को योजनाबद्ध तरीके बदल रहा है। अब तो रिश्ते भी नफे-नुकसान के तराजू पर तौले जाने लगे हैं।
असल मे इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में ‘पैसा’ है, लेकिन आज के भारत में पैसा अब केवल लेन-देन का साधन नहीं रह गया है। सच कहें तो यह एक भूख बन गया है। इस भूख को हम ‘पूँजी’ के नाम से जानते हैं। पैसे का एक रूप वह है जो जरूरतों को पूरा करता है और दूसरा रूप वह है जो केवल ‘और ज्यादा मुनाफा’ के लिए लगाया जाता है। आज हम जिस कॉर्पोरेट संस्कृति को देख रहे हैं, वह इसी ‘पूँजी’ का खेल है। भारत में बड़े-बड़े उद्योगपति और बहुराष्ट्रीय कंपनियां निवेश इसलिए नहीं करते कि उन्हें समाज सेवा करनी है। उनका लक्ष्य तो यह है कि उनका पैसा और ज्यादा पैसा बनकर वापस आए। इसे ही ‘पूँजी का संचय’ कहा जाता है। आज हमारे देश में अरबपतियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। समाचारों में हम सुनते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। लेकिन साथ ही हम यह भी देखते हैं कि भारत में आर्थिक असमानता भी ऐतिहासिक स्तर पर है। एक तरफ एंटीलिया जैसे गगनचुंबी महल हैं, तो दूसरी तरफ धारावी जैसी बस्तियां। इस विरोधाभास को मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। असल में यह उस पूँजीवादी व्यवस्था का नतीजा है जिसे मार्क्स ने बहुत पहले समझा दिया था। पूँजी का स्वभाव ही है कि वह एक जगह इकट्ठी होती जाती है और बाकी समाज को अभाव में छोड़ देती है।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह मुनाफा जो अमीरों को और अमीर बना रहा है, आता कहां से है? क्या यह शेयर बाजार के जादू से पैदा होता है? नहीं, बिल्कुल भी नहीं ! यह मुनाफा ‘अतिरिक्त मूल्य’ या सरप्लस वैल्यू से आता है, जो सीधे तौर पर मेहनत करने वाले इंसान से निचोड़ा जाता है। इसे एक भारतीय फैक्ट्री या ऑफिस के उदाहरण से समझना आसान है। मान लीजिए, गुड़गांव या नोएडा की किसी कंपनी में एक कर्मचारी काम करता है। वह अपनी मेहनत, कौशल और समय देकर कंपनी के लिए दिन भर में मान लीजिए 50,000 रुपये का काम करता है। लेकिन कंपनी उसे दिन के अंत में वेतन के रूप में केवल 2,000 रुपये देती है। बिजली, कच्चा माल और मशीन का खर्च निकालने के बाद भी जो मोटा पैसा बचता है, वह कंपनी का मुनाफा है। यह मुनाफा उस कर्मचारी की मेहनत का वह हिस्सा है जिसका उसे कभी भुगतान नहीं किया गया। आज के दौर में जब हम देखते हैं कि कंपनियों के सीईओ करोड़ों का पैकेज ले रहे हैं और वहीं निचले स्तर के कर्मचारी की तनख्वाह से उसका घर चलाना भी मुश्किल होता जा रहा है तो हमें समझ आता है कि शोषण का यह तंत्र कितना गहरा है।
आज के भारत में इस शोषण का स्वरूप बदल गया है। अब यह सिर्फ धुएं उगलती चिमनियों वाली फैक्ट्रियों तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी पहुँच अब एसी ऑफिसों और हमारे मोबाइल फोन तक है। ‘गिग इकोनॉमी’ इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। आज लाखों युवा डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर या फ्रीलांसर के रूप में काम कर रहे हैं। उन्हें ‘पार्टनर’ कहा जाता है, लेकिन असलियत में वे दिहाड़ी मजदूर से भी ज्यादा असुरक्षित हैं। मार्क्स ने कहा था कि मजदूर अपनी ‘श्रम शक्ति’ बेचता है। आज का डिलीवरी बॉय न केवल अपनी श्रम शक्ति बेच रहा है, बल्कि अपनी बाइक, पेट्रोल और अपना स्वास्थ्य भी दांव पर लगा रहा है। एल्गोरिदम तय करता है कि उसे कितना काम मिलेगा और कितना पैसा। यहां कोई न्यूनतम वेतन नहीं है, कोई भविष्य निधि नहीं है और कोई छुट्टी का अधिकार भी नहीं है। यह ‘अतिरिक्त मूल्य’ निचोड़ने का आधुनिक और क्रूर तरीका है। हम और आप जब 10 मिनट में डिलीवरी पाकर खुश होते हैं, तो हम अनजाने में उस तंत्र का हिस्सा बन जाते हैं जो इंसान को मशीन की तरह खटा रहा है।
पूँजीवाद अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए हमेशा दो रास्ते चुनता है, जो आज के भारतीय कार्यस्थल पर साफ दिखाई देते हैं। पहला रास्ता है- काम के घंटे बढ़ा देना। इसे ‘निरपेक्ष अतिरिक्त मूल्य’ कहा जाता है। हाल ही में भारत में ’70 घंटे काम करने’ के बयान पर काफी बहस हुई थी। यह मानसिकता उसी पुरानी सोच का हिस्सा है कि मजदूर से जितना हो सके काम लो। आज प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाला युवा कहने को तो 9 से 6 की नौकरी करता है, लेकिन लैपटॉप और स्मार्टफोन ने उसे 24 घंटे काम से बांध दिया है। घर जाने के बाद भी ऑफिस के मेल और वॉट्सऐप ग्रुप उसे चैन नहीं लेने देते। यह काम के घंटे बढ़ाकर बिना एक्स्ट्रा पैसा दिए मुनाफा कमाने का ही तरीका है। दूसरा रास्ता है- तकनीक का इस्तेमाल करके उत्पादकता बढ़ाना, जिसे ‘सापेक्ष अतिरिक्त मूल्य’ कहते हैं। आज भारत में ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चर्चा जोरों पर है। मशीनों और सॉफ्टवेयर ने काम को बहुत तेज कर दिया है। जो काम पहले दस क्लर्क मिलकर करते थे, अब एक सॉफ्टवेयर कर देता है। इससे कंपनी का खर्च बचता है और मुनाफा बढ़ता है। लेकिन इसका नुकसान किसे होता है? आम नौकरीपेशा इंसान को। उसे डर दिखाया जाता है कि अगर उसने मशीन की गति से काम नहीं किया, तो उसे बदल दिया जाएगा। यह तकनीक जो हमारा जीवन आसान बनाने आई थी, आज हमारी नौकरियों पर तलवार बनकर लटक रही है और हमें मानसिक तनाव दे रही है।
बेरोजगारी का मुद्दा भी इस लेख का एक अहम हिस्सा है। मार्क्स ने इसे ‘औद्योगिक आरक्षित सेना’ या ‘इंडस्ट्रियल रिजर्व आर्मी’ कहा था। आज भारत में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है। एक चपरासी की नौकरी के लिए पीएचडी धारक भी लाइन में खड़े नजर आते हैं। क्या यह केवल जनसंख्या की समस्या है ? नहीं, असल बात तो यह है कि बेरोजगारों की एक फौज होना पूँजीवादी व्यवस्था के लिए फायदेमंद है। जब बाजार में नौकरी मांगने वाले बहुत ज्यादा होंगे और नौकरियां कम, तो काम करने वालों को डर रहेगा। वे कम वेतन, खराब माहौल और बिना किसी सुरक्षा के भी काम करने के लिए तैयार हो जाएंगे। क्योंकि उन्हें पता है कि गेट के बाहर सैकड़ों लोग उनकी जगह लेने को तैयार खड़े हैं। आज भारत के निजी क्षेत्र में जो वेतन नहीं बढ़ रहे हैं या शोषण हो रहा है, उसका एक बड़ा कारण यह ‘रिजर्व आर्मी’ ही है। यह डर कर्मचारियों को एकजुट होने से रोकता है और उन्हें अपनी शर्तों पर काम करने को मजबूर करता है।
इसके अलावा, आज हम भारत में विकास के नाम पर जो उथल-पुथल देख रहे हैं, उसे समझने के लिए ‘आदिम संचय’ या प्रिमिटिव एक्यूमुलेशन का सिद्धांत बहुत प्रासंगिक है। इतिहास में यह जमीनों के बाड़ेबंदी के रूप में हुआ था। आज भारत में यह आदिवासी क्षेत्रों में खदानों के लिए, जंगलों की कटाई के लिए या बड़े-बड़े एक्सप्रेसवे और प्रोजेक्ट्स के लिए जमीन अधिग्रहण के रूप में हो रहा है। हमे यह समझना होगा कि जब एक किसान या आदिवासी को उसकी जमीन से बेदखल किया जाता है तो वह केवल अपना घर नहीं खोता बल्कि वह अपनी आजीविका के साधन से कट जाता है। उसके पास अब जीने का एक ही सहारा बचता है- शहर जाकर मजदूरी करना। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। हम देखते हैं कि कैसे जल, जंगल और जमीन जो पहले समुदायों के थे, अब निजी कंपनियों के मुनाफे का स्रोत बन रहे हैं। यह विकास का वह चेहरा है जिस पर अक्सर मुख्यधारा की चर्चाओं में पर्दा डाल दिया जाता है। लेकिन यह लाखों भारतीयों की कड़वी सच्चाई है।
आज के समय में शिक्षा और स्वास्थ्य का बाजारीकरण भी इसी पूँजीवादी सोच का विस्तार है। जो चीजें बुनियादी अधिकार में होनी चाहिए थीं, वे अब ‘माल’ बन गई हैं। प्राइवेट अस्पताल और महंगे स्कूल आज मुनाफे की मशीनें बन चुके हैं। एक आम भारतीय अपनी जिंदगी की जमापूँजी का एक बड़ा हिस्सा केवल इलाज और बच्चों की फीस भरने में खर्च कर देता है। यह स्थिति इसलिए पैदा हुई है क्योंकि पूँजी हर उस क्षेत्र में घुसना चाहती है जहाँ से मुनाफा कमाया जा सके। मानवीय संवेदनाओं और जरूरतों का स्थान अब ‘प्रॉफिट मार्जिन’ ने ले लिया है। मार्क्स की किताब हमें यह देखने की दृष्टि देती है कि कैसे हमारी बुनियादी जरूरतों को भी व्यापार में बदल दिया गया है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हम निराश हो जाएं या तकनीक और विकास का विरोध करें। लेकिन हमें जागरूक तो होना ही होगा। आज का भारतीय नागरिक जब तक इस आर्थिक चक्रव्यूह को नहीं समझेगा तब तक वह सही सवाल नहीं पूछ पाएगा। हमे यह समझ में नहीं आएगा कि गरीबी, बेरोजगारी और हमारे जीवन का तनाव केवल हमारी व्यक्तिगत असफलता नहीं है। यह तो उस सिस्टम का परिणाम है जिसमें हम जी रहे हैं। जब हम समझते हैं कि ‘अतिरिक्त मूल्य’ हमारी मेहनत से पैदा होता है, तो हम अपने हक की मांग करना सीखते हैं। जब हम समझते हैं कि बेरोजगारी पूँजीवादी व्यवस्था की जरूरत है तो हम सरकार और नीतियों से रोजगार के अधिकार की बात करते हैं।
वस्तुतः कार्ल मार्क्स की किताब ‘दास कैपिटल’ आज के भारतीय समाज को जागरूक करने और उसके हक, अधिकारों के प्रति सचेत रहने की चेतना देने का काम करती है। इस किताब के अध्ययन से हमे यह पता चलता है कि चमकते हुए शॉपिंग मॉल्स के पीछे के अंधेरे गोदामों की हकीकत क्या है। यह बताती है कि शेयर बाजार के उछाल और किसान की आत्महत्या के बीच क्या संबंध है। यह हमें चेताती है कि अगर हम इंसान को केवल मुनाफा कमाने का एक पुर्जा समझते रहेंगे, तो हम एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जहां दौलत तो बेहिसाब होगी, लेकिन सुकून और इंसानियत कौड़ियों के भाव बिकेगी। आज जरूरत है कि हम विकास की ऐसी परिभाषा गढ़ें जहाँ केंद्र में ‘पूँजी’ नहीं, बल्कि ‘इंसान’ हो। जहाँ तकनीक का इस्तेमाल काम के घंटे कम करने और जीवन स्तर सुधारने के लिए हो न कि बेरोजगारी बढ़ाने के लिए। जहाँ समृद्धि चंद हाथों में सिमटने के बजाय सबमें बंटे। एक आम नागरिक के तौर पर यह समझ ही हमारे और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर, न्यायपूर्ण और मानवीय भारत बनाने की पहली सीढ़ी है। इसलिए, इन विचारों को केवल किताबी बातें न मानकर हमें इन्हें अपने दैनिक जीवन के संघर्षों और समाज की दशा-दिशा से जोड़कर देखना होगा। यही हमारी वैचारिक चिंतन की सच्ची सार्थकता हो सकती है।
( लेखक गिरिडीह, झारखंड में शिक्षक और परिवर्तन पत्रिका के संपादक हैं )

