समकालीन जनमत
गणेश का बसोहली मिनिएचर ( नेशनल म्यूजियम )
साहित्य-संस्कृति

विघ्नकर्ता से विघ्नहर्ता, शूद्र गणनायक से देवता बनने का सफ़र

दलितों के बीच गणेशोत्सव मनाने, मूर्तियां स्थापित करने के लिये सत्ताधारी पार्टी व संगठन द्वारा फंडिंग के आरोपों के बीच गणेश कौन हैं, इसे लेकर भी एक बहस छिड़ गई है। कोई उन्हें शूद्र देवता बता रहा है तो कोई आर्य देवता। इतिहासकार देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय ने अपनी पुस्तक ‘लोकायत’- प्राचीन भारतीय भौतिकवाद का अध्ययन’ के दूसरे खंड ‘समाजिक पृष्ठभूमि का अध्ययन’  में गणेश के बाबत ‘गणपति’ शीर्षक चैप्टर में 85 पृष्ठों में विस्तार से लिखा है। इसी किताब के हवाले से यह प्रश्न हल करने की कोशिश की गई है कि गणेश कौन हैं, और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई।

‘ लोकायत ’ दावा करता है कि गणपति सदा से देवता नहीं थे। कम से कम आधुनिक अर्थ में तो नहीं। वह बाद में देवता बने और जिस प्रक्रिया से देवत्व को प्राप्त हुए वह उसी प्रक्रिया का सैद्धांतिक प्रतिबिंब थी जिससे राजसत्ता का उदय हुआ। जनजातीय व्यवस्था के भग्नावशेषों पर राज्यव्यवस्था का उदय हुआ है। संपत्ति के व्यक्तिगत स्वामित्व पर आधारित राजसत्ता का उदय वर्गीकृत समाज में पूर्वकालीन आदिम साम्यवाद के अवशेषों पर हुआ। उसी प्रकार मानव चेतना में आध्यात्मिक विचारों का प्रादुर्भाव आध्यात्मिकता से पहले के काल के आदिम विचारों के अवशेषों पर हुआ।

गणपति का अर्थ है – साधारण जनों का मुखिया या नायक। छठी शताब्दी में गणपति को गणनायक या वराहमिहिर कहा जाता था जिसका अर्थ है- किसी जन समुदाय या पौर संघ का मुखिया। महिधर ने ‘ वाजसनेयी संहिता ’ पर अपने भाष्य में इस नाम की व्याख्या करते हुए लिखा- ‘ गणनाम गणरुपेण पालकम् ’ अर्थात जो गणो या सैन्य दलों की रक्षा करता है।

पुरोहित वर्ग का शत्रु गणपति

पांचवी शताब्दी में रचित ‘ मानव गृह्य सूत्र ’ में कहा गया है कि गणपति या विनायक केवल भय तथा तिरस्कार की भावना उत्पन्न करने वाला देवता है। गणपति के कारण शासन करने की योग्यता रखने वाले राजकुमारों को राज्य नहीं मिलता, सभी गुणों से संपन्न होते हुए भी राजकुमारियों को पति नहीं मिलता, संतान उत्पन्न करने की क्षमता होते हुए भी स्त्रियां बांझ रहती हैं। अन्य स्त्रियों की संतानों की मृत्यु हो जाती है। योग्य, विद्वान अध्यापक को छात्र नहीं मिलते और छात्रों की शिक्षा-दीक्षा में व्यवधान आ जाता है। व्यापार और कृषि में विफलता का मुंह देखना पड़ता है। इस तरह गणपति को अमंगल का जीता जागता रूप माना जाता था।

याज्ञवल्क्य ने ‘ याज्ञवल्क्य संहिता ’ में लिखा है- “ रुद्र और ब्रह्मा ने बाधाएं उत्पन्न करने के लिये विनायक को गणों का मुखिया (गणानाम् आधिपत्ये) नियुक्त किया। उससे आक्रांन्त व्यक्ति स्वप्न में देखता है कि वह डूब रहा है, लाल कपड़े पहने हुए सिर मुंड़े लोग हैं, मांसाहारी पशुओं की सवारी कर रहा है, चांडालों, गधों, ऊंटों आदि के साथ वास कर रहा है। वह अपने शत्रुओं से दूर भागने का प्रयत्न कर रहा है किंतु ऐसा न कर सकने के कारण उनके चंगुल में आ जाता है। ”

‘ मनु स्मृति ’ में मनु निर्देश देते हैं कि – जो लोग गणयज्ञ करते हैं उन्हें अंत्येष्टि भोज में सम्मिलित न होने दिया जाये। एक श्लोक में मनु ने गणपति को दलित वर्गों और शूद्रों का देवता बताया है। मनु के अनुसार शूद्र केवल अन्य लोगों के उतरे हुए कपड़े पहन सकते थे और दूसरों का जूठन ही खा सकते थे। गणयज्ञ क्या है। कात्यायन स्त्रोत सूत्र में कात्यायन लिखते हैं – गणयज्ञ कोई उपासना क्रिया नहीं थी बल्कि यह बंधुओ (भातृनाम्) और मित्रों (सखिनाम्) द्वारा मिलकर सामूहिक रूप से किया जाने वाला अनुष्ठान था।

याज्ञवल्क्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि विनायक गणों  का देवता इसलिये बना कि वह बाधाएं उत्पन्न कर सके (कर्म विघ्न सिद्धार्थम्)। वहीं बौधायन के धर्मसूत्र में गणपति को केवल एक शब्द से संबोधित किया गया है और वह शब्द है- ‘विघ्न’ यानि बाधा। पौराणिक साहित्य कहता है गणपति न सिर्फ़ बाधायें उत्पन्न करता था बल्कि ऐसा करते हुए वो रक्त भी बहाता था।

कहा जाता है कि गणपति के हस्तशीश में केवल एक दांत रह गया था इसी से उसका नाम एकदंत पड़ा। यह बचा हुआ एकदंत रक्तवर्ण था। तांत्रिक साहित्य में इसका स्पष्टीकरण यह कहकर दिया गया था कि इस दांत के ऊपर शत्रुओं का रक्त लगा था, जिनका संहार किया गया था। किंतु शत्रु कौन हो सकते थे ‘ ब्रह्म वैवर्त पुराण ’ ने इसका उत्तर एक रोचक कथा से जरिये दिया है। परशुराम और गणपति के बीच युद्ध हुआ था। परशुराम ने एक कुल्हाड़ा गणपति के ऊपर दे मारा, जिससे गणपति का एक दांत टूट गया। यह कुल्हाड़ा गणपति के पिता ने ही बनाया था। जैसा कि सभी जानते हैं परशुराम ब्राह्मणों व पुरोहित वर्ग की सर्वोच्च स्थिति के घोर समर्थक थे। तो क्या इसका तात्पर्य यह है कि अपने काल-समय में गणपति का प्रमुख शत्रु पुरोहित वर्ग था। प्राचीन ब्राह्मण साहित्य में गणपति के प्रति जो तिरस्कार भाव है उससे तो इसी धारणा की पुष्टि होती है।

 

मूर्तियों के विकास में छुपी है गणपति के देवता बनने का रहस्य

अतुल प्रसाद गुप्त की पुस्तक ‘ शिक्षा और सभ्यता ’ के हवाले से डी. पी. चट्टोपाध्याय ‘लोकायत’ में लिखते हैं गणपति के प्रति यह घृणा केवल साहित्य के स्त्रोतों तक सीमित नहीं थी। गणपति की कुछ प्रतिमाओं में उन्हें बहुत भयावह दानव के रूप में दर्शाया गया है। यह इस बात का प्रतीक है कि प्रारम्भ में गणपति के प्रति किस तरह की धारणा थी। उनकी भोड़ी नग्नता और साथ ही आभूषणहीन होना इस बात का आभास देते हैं कि तब तक वह साधारणजन के स्तर से ऊपर नहीं पहुंचे थे।

गणेश के आदिवासी रूप के समझने के लिये वे प्रतिमायें महत्वपूर्ण हैं जिनमें गणपति के प्रति विरोधी और तिरस्कारात्मक भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं। बंगाल में पत्थर से बनी हुई ऐसी मूर्तियां पायी गई हैं। जिसमें गणपति को भृकुटितारा के पद्मासन के नीचे या देवी पर्णेश्वरी के कमल सिंहासन के नीचे पड़े हुए दिखाया गया है। गणपति के हाथों में तलावर और ढाल होने से यह संकेत मिलता है कि उन्होंने संघर्ष किये बिना आत्मसमर्पण नहीं किया था। इसके अलावा तिब्बत की कुछ कांस्य प्रतिमाओं में गणपति को महाकाल के चरणों के नीचे दबा हुआ दिखाया गया है। चीनी यात्री यी-त्सिंग ने वर्णन किया है कि भारतीय बिहारों और मठों के द्वार पर एक देवता की मूर्ति होती थी-जिसके हाथ में सोने की थैली थी और इस देवता का नाम महाकाल था। ये बातें इस बात का प्रमाण है कि महाकाल का संबंध अभिजात्य वर्ग और शासक वर्ग से था। महाकाल नियम और व्यवस्था का देवता था।

इसके अलावा बौद्ध देवी मंजुश्री द्वारा गणपति को पददलित करने के दृश्यवाली मूर्तियां दुर्लभ नहीं हैं। इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण प्रतिमा एक ऐसे देवता की मिली है जिसका नाम विघ्नांतक था और जिसका सीधा सा अर्थ है विघ्नों का नाश करने वाला। इस देवता के पैरों के नीचे गणपति का होना केवल यही अर्थ रखता है कि वह विपत्तियां उत्पन्न करता है। नेपाल की एक पुरानी लोककथा है कि ओडियान का एक पंडित काठमांडू के पास बागमती नदी के तट पर कुछ विशेष सिद्धि के लिये अनुष्ठान कर रहा था। गणेश ने इस बौद्ध को सिद्धि प्राप्त करने से रोकने के लिये अलंख्य बाधायें खड़ी कीं। पंडित आवश्यक क्रियानुष्ठान न कर सका तो उसने संकट की घड़ी में बाधाओं का नाश करने वाले बौद्ध देवता का आह्वान किया, जो विघ्नांतक का भयंकर रूप धरकर आये और गणेश को पराजित किया।

गणेश के जन्म की परस्पर विरोधी पौराणिक कथायें

मोनियर विलियम्स के हवाले से ‘ लोकायत ’ कहता है यद्यपि गणेश बाधाएं उत्पन्न करते हैं, तो वह उन्हें दूर भी करते हैं। इस तरह बदली हुई परिस्थितियों में कार्य शुरु करने से पहले ‘नमो गणेशाय विघ्नेश्वराय’ यानि मैं विघ्न के देवता गणेश को नमन करता हूँ कहकर उनका स्मरण किया जाने लगा। विघ्नकर्ता के विघ्नहर्ता सिद्धिदाता बनने की प्रक्रिया में उन्हें उच्च वंश का वंशज बताना आवश्यक था। अतः पौराणिक साहित्य ने गणपति के जन्म के बारे में सोचा। फाउचर ने ठीक ही कहा है कि इन कथाओं की अप्रासंगिकता से भी अधिक इनकी विसंगतियां यह सिद्ध करने के लिये पर्याप्त हैं कि अभीष्ट बात को प्रस्तुत करने की आवश्यकता की पूर्ति के लिये सामान्य से निम्न स्तर के लेखकों ने बहुत बाद में इन कथाओं का आविष्कार किया।

कभी यह दावा किया गया कि गणपति एक पुरुष से उत्पन्न हुए बिना किसी स्त्री के। वहीं एक दूसरी कथा में कहा गया कि पुरुष के सहयोग के बिना एक स्त्री के गर्भ से पैदा हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि देवता के रूप में गणपति का जन्म सामान्य रूप से नहीं हुआ था । इसके अतिरिक्त गणपति के जन्म के साथ एक प्रकार की अपवित्रता की भावना जुड़ी हुई थी और जिसे पुराणों में पूर्ण रूप से दूर नहीं किया जा सकता था।

एक कथा स्कंद पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण में आई है कि एक बार पार्वती अपने मल के साथ खेल रही थी और उन्होंने इस मल को एक आकार दे दिया। यह एक विचित्र आकार था जिसके प्रति पार्वती स्वयं आकृष्ट हो गई और उन्होंने इसमें प्राण फूंके और इसे अपना पुत्र कहा। एक अन्य कथा है कि पार्वती जिस उबटन को अपने शरीर पर मलती थी उसमें अपना मल मिश्रित करके वह गंगा के उद्गमस्थल पर गई और एक हस्तिमुख वाली मालिनी नामक राक्षसी को यह मिश्रण पीने के लिये बाध्य किया। इसके परिणाम स्वरूप मालिनी के गर्भ से एक बालक जन्मा जिसे पार्वती ले गई। इस प्रकार गणपति के देवताओं की श्रेणी एक दत्तक के रूप में लाया गया न कि जन्म से। लेकिन गणपति का हस्तिमुख कैसे बना इसे लेकर पौराणिक साहित्य कठिनाइयों में पड़ गया।

दक्षिण भारत के ‘सुप्रभेदागम’ में एक अति विलक्षण कथा है। एक बार शिव व पार्वती ने हस्तिमुद्रा में संभोग किया जिससे हस्तिमुख वाला बालक उत्पन्न हुआ। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार जन्म के पश्चात शीघ्र ही गणेश पर शनि की दृष्टि पड़ गई और गणेश कट गये, इसलिए विष्णु ने एक शोकग्रस्त माता पर दया करके एक हाथी का सिर उस बालक के शरीर पर लगा दिया। वहीं स्कंद पुराण के मुताबिक गणेश का सिर जन्म से पूर्व ही नहीं था। सिंदूर नामक एक दैत्य माता के गर्भ में प्रविष्ट हो गया और उसने गर्भस्थ बालक का सिर खा लिया। जब बालक जन्मा तो उसे अपने लिये स्वंय ही एक सिर प्राप्त करना पड़ा। उसने गजासुर नामक हस्ति दानव का सिर काटा और अपने शरीर पर लगा लिया। इस तरह हस्ति मुख वाली राक्षसी मालिनी, व गजासुर राक्षस के आवरण में यह तथ्य निहित है कि गणेश के पूर्वज मूल रूप से आदिवासी राक्षस व राक्षसी थे।

 एक और कथा है कि इंद्र के नेतृत्व वाले अभिजात देवतागण शिव के निवासस्थल सोमनाथ के पर्वतीय क्षेत्र में नीच जाति वाले शूद्रों तथा उनकी स्त्रियों के एक समागम से डर गये। देवताओं ने शिव से प्रार्थना की किंतु उन्होंने इस सभा को नहीं रोका। तब सभी देवता पार्वती के पास गये। उन्होंने इस जन समूह के विनाश के लिये अपने शरीर के मल से एक विपत्तिकारक देवता का सृजन किया।

विघ्नराज का रुपांतरण

 ‘वाजसनेयी’ संहिता में गणपति शब्द बहुवचन में हैं। ‘मानव गृह्य सूत्र’ में चार विनायकों का उल्लेख है, याज्ञवल्क्य ने इन्हें अनेक बताया है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी गणेस्वरों और विनायकों के संबन्ध में बहुवचन का प्रयोग किया गया है। भंडारकर का अनुमान था कि जो चार विनायक थे वे कालांतर में एक हो गये। संभवतः विभिन्न गणपतियों के विभिन्न आकार व विशेषताएं थी। ‘तैत्तरीय संहिता’ ने संकेत किया है कि गणपति की शक्ल पशुओं जैसी थी। तांत्रिक पुस्तकों में गणपति के 50 नामों में से वृषभद्रयज और वृषकेतन (दोनों का अर्थ बैल) तथा द्विजिह्वा (सांप) नाम और इनके चिन्ह सांप व बैल बताये हैं। हस्तिमुख की भांति विभिन्न गणपतियों के पशु नाम संभवतः इस बात का संकेत करते हैं कि इनका प्रादुर्भाव प्राचीन टोटमवादी विश्वासों से हुआ।

पहले के बहुत से गणपतियों में से किसी एक निश्चित गणपति का चुनाव किया जाना और उसके स्वभाव तथा उसके प्रति जनभावना में परिवर्तन आना कोई संयोग की बात नहीं थी। ये परिवर्तन उस प्रक्रिया को प्रतिबिंबित करते हैं जिसके अंतर्गत कोई जाति जो हाथी को अपना टोटम चिन्ह मानती थी वह विजयी होकर सबसे श्रेष्ठ सर्वोच्च राज्य बन गई। यह जाति अपने टोटेम के प्रति जो श्रद्धाभाव रखती थी वह बना रहा कितुं उसका स्वरूप बदल गया। जाति का टोटम देवता बन गया, केवल नाम वही रहा।

‘लोकायत’ गणपति की सवारी मूषक के बाबत कहता है कि देवताओं को अपना वाहन स्वंय चुनने की स्वतंत्रता नहीं थी। यह निर्णय इस बात से किया जाता कि जिस जाति या कबीले को पराजित किया गया है उसका टोटम क्या है।

कोडिंगटन की किताब ‘एशेंट इंडिया’ में गणपति की ऐसी प्रतिमा का उल्लेख है जिसमें वह पूर्ण वैभव और साज सज्जा के साथ दिखाए गये हैं। यह मूर्ति ईसवी सन् पांच सौ के आस-पास मानी जाती है। और इसे गणपति को नए रूप में प्रस्तुत करने वाली प्रारम्भिक मूर्तियों में से एक समझा जाता है। कुमारस्वामी के हवाले से डी पी चट्टोपाध्याय लिखते हैं कि गुप्त राजाओं के शासनकाल से पहले के मूर्तिशिल्प में गणेश की कोई मूर्ति नहीं है। गणेश की प्रतिमाएं अचानक ही गुप्तकाल में बनीं और ये दुर्लभ नहीं थीं। वही काणे का अनुमान है कि गणेश की सर्वविदित विशेषताएं और उनकी पूजा ईसवी सन् पांच सौ या छः सौ से पूर्व होने लगी थी। ये सभी अनुमान पुराणों में उपलब्ध प्रमाणों से मेल खाते हैं। इस प्रकार हमें यह आभास मिलता है कि गुप्तकाल से कुछ पहले ही गणेश देवता बने होंगे।

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