रश्मि चक्रवर्ती
स्वतंत्र पत्रकार रश्मि चक्रवर्ती का यह लेख 22 फरवरी को ‘ द हिन्दू ’ में प्रकाशित हुआ था । समकालीन जनमत के पाठकों के लिए इस लेख का हिंदी अनुवाद दिनेश अस्थाना ने किया है।
कोल्हापुर की एक आशा वर्कर , नेत्रदीपा पाटिल ने 52 वर्षीय हसीना अतर की देखभाल अपनी बेटी की तरह की और उसे सामान्य जीवन जीने लायक बना दिया। 2019 में एक साल के अंदर-अंदर हसीना अतर ने अपने पूरे परिवार को खो दिया था और नतीजतन वह अवसाद में आ गई थीं। इसके बाद पाटिल और मानसिक-स्वास्थ्य में प्रशिक्षित उनकी दो सहयोगिनें, आगे आयीं। वे अतर से बातें करतीं, नियमित रूप से उनके घर जातीं, उनके घर की साफ-सफाई करतीं, उनके लिए खाना लातीं और इस बात का भी ध्यान रखतीं की वह समय-समय पर अपनी दवाएं लेती रहें।
इन तीन आशा कार्यकर्ताओं द्वारा अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर मानवीय कर्तव्य निभाने की बदौलत आज अतर पूर्णतः स्वस्थ हैं और काफी हद तक आत्मनिर्भर बन गई हैं।
इस प्रकार की कहानियाँ उन 10.4 लाख आशा कार्यकर्ताओं के दैनंदिन भावनात्मक-श्रम का बयान हैं जो एक स्वैक्षिक कार्यबल होने के बावजूद ग्रामीण स्वास्थ्य-सेवाओं में प्राथमिक संपर्क-केंद्र होती हैं। वे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, क्षयरोग की देखभाल, असंचारी रोगों का सर्वेक्षण, अभिलेखों का ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीके से रख-रखाव और दूसरे अनगिनत कामों को एकसाथ साधती हैं। और उनका मामूली सा वेतन, जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होता है- मध्य-प्रदेश में रु0 6,400 से लेकर महाराष्ट्र में रु0 13,000 तक- प्रायः लटका ही रहता है।
हाल में ही कुछ क्षेत्रों में सरकारी अस्पताल और गैर-सरकारी योजनाओं में भी आशा कार्यकर्ताओं से ‘मानसिक स्वास्थ्य द्वारपाल’ का भी काम लिया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) ने आशा कार्यकर्ताओं के राष्ट्र-व्यापी प्रशिक्षण कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य प्रतिरूप को भी शामिल करना शुरू कर दिया है। आशा कार्यकर्ताओं से किशोरों-किशोरियों को परामर्श देने और अवसाद, दुष्चिन्ता एवं आत्महत्या की प्रवृत्ति को चिन्हित करने और प्रमाणिक जागरूकता उत्पन्न करने को कहा जा रहा है जबकि वे पहले से ही काम के बोझ और अल्प-वेतन के तले कराह रही हैं।
संकटग्रस्त पुकारें
इस समय 5.6 करोड़ से अधिक भारतीय अवसाद से और 3.8 करोड़ से अधिक लोग दुष्चिन्ता संबंधी विकारों से त्रस्त हैं। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो ने वर्ष 2023 में 1,71,418 आत्महत्या के मामले अभिलिखित किए थे। 2017 के मानसिक स्वास्थ्य कानून द्वारा आत्महत्या के मामलों को अनापराधिक घोषित कर दिये जाने के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता अत्यंत सीमित और प्रायः कलंक-ग्रस्त है। ऐसे ही अवसरों पर आशा कार्यकर्ताओं की प्रविष्टि होती है। जम्मू एवं कश्मीर के नेशनल हैल्थ सिस्टम्स रिसोर्स सेंटर के एक प्रशिक्षक, मो0 सादिक़ खान बताते हैं कि “जिन स्थानों पर मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ बहुतायत में हैं वहाँ विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। आशा कार्यकर्ता ऐसा प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए सक्षम हैं क्योंकि वे ही अपने समाज को अच्छी तरह समझ सकती हैं और इसीलिए वरीय होती हैं।“
बंगलुरु के निम्हान्स में डा0 अनीश वी0 चेरियन, पास के ही चन्नापटना तालुक में आत्महत्या-निवारण की एक समुदाय-आधारित परियोजना का नेतृत्व करते हैं। निम्हान्स ने 1,000 से अधिक आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को आत्महत्या के विरुद्ध जागरूकता पैदा करने एवं उसके संभावित खतरों, की चपेट आनेवाले लोगों को चिन्हित करके “कीटनाशकों और शराब तक उनकी पहुँच को घटा कर” प्रशिक्षित किया है और उनको मानसिक स्वास्थ्य के विकल्पों से जोड़ा भी है। डा0 चेरियन बताते हैं कि “हम आशा कार्यकर्ताओं के प्रयास से आत्महत्या के प्रयास के 800 से अधिक मामले चिन्हित कर चुके हैं।“
अनुसूया लोकेश अब मानसिक स्वास्थ्य के संभावित लक्षणों- मतिभ्रम, दुष्चिन्ता, उग्र-क्रोध और बेचैनी को पहचान पाती हैं। पहले ये अंध-विश्वास के लक्षण माने जाते थे। चन्नापटना के रामपुरा की एक आशा कार्यकर्ता बताती हैं कि “अब हम समझ गए हैं कि यह मस्तिष्क-रसायन का मामला है। और इसमें शर्म की कोई बात नहीं है, इसका इलाज़ संभव है।“
मध्य-प्रदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के वरिष्ठ संयुक्त निदेशक डा0 प्रभाकर तिवारी कहते हैं कि 2020 से अब तक 14,750 आशा कार्यकर्ताओं को मानसिक स्वास्थ्य, तंत्रिका-संबंधी विकारों और वास्तविक कुरीतियों के क्षेत्र में प्रशिक्षित किया जा चुका है। यद्यपि इस संबंध में अब तक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी “ग्रामीण क्षेत्रों को शामिल करते हुए” यह कहा जा सकता है कि इस राज्य में मानसिक स्वास्थ्य केन्द्रों में जागरूकता की पहलकदमी के प्रमाण साफ-साफ दिखाई दे रहे हैं।
अधिकांश आशा कार्यकर्ताओं के लिए मानसिक स्वास्थ्य एकदम नया विषय है। मध्य-प्रदेश सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे एक अलाभकारी मानसिक स्वास्थ्य संगठन-‘संगत’ द्वारा प्रशिक्षित नर्मदापुरम की एक आशा वर्कर सीता चौरे कहती हैं “मुझे नहीं पता था कि बातों से भी किसी को ठीक किया जा सकता है।“ संगत के प्रिन्सिपल इंवेस्टिगटर डा0 अनंत भान बताते हैं कि वर्ष 2019 से लेकर अबतक कई जिलों में लगभग 5,000 आशा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है। यह संगठन आशा कार्यकर्ताओं को उनके काम के लिए थोड़ा-बहुत भुगतान करता है।
स्वयं-सहायता ही सर्वोत्तम सहायता है
एक ओर तो आशा कार्यकर्ताओं से बिना किसी भुगतान के या बहुत मामूली भुगतान के एवज में दूसरों की देखभाल करने की उम्मीद की जाती है, पर उससे भी बड़ा विरोधाभास यह है कि उन्हें इस सेवा के लिए जो मानसिक तनाव झेलना पड़ता है उसपर प्रायः किसी का ध्यान ही नहीं जाता। स्वास्थ्य-सेवा शृंखला की आखिरी कड़ी होने के कारण उनके स्वास्थ्य की किसी को कोई चिंता ही नहीं है। अब कुछ अलाभकारी संगठनों ने इस रिक्तिका को भरने की दिशा में आगे बढ़ते हुए थोड़ा-बहुत धन देना शुरू किया है।
स्वास्थ्य-कर्मियों के हितों पर की बेहतरी पर काम करनेवाली दिल्ली में स्थित जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ द्वारा ‘द रेजिलिएन्स कोर्बोरेटिव’ (टीआरसी) नाम से एक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। उत्तर-प्रदेश के गोरखपुर में आशा कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर वह एक डिजिटल औज़ार विकसित कर रहा है। इंदौर की हेमलता जॉर्ज ने इसके पहले एक ऐप विकसित किया था जिसमें साइकोएजुकेशन, ध्यान एवं योग के विडियो थे। वह बताती हैं कि “जब इन्फ़्लुएंसर विशेषतः मानसिक स्वास्थ्य पर व्याख्यान दे रहे होते तो इन वीडियोज़ के माध्यम से उसे समझना बहुत आसान हो जाता था।“
निम्हान्स के ‘सुरक्षा’ प्रोजेक्ट में भी सामुदायिक स्वास्थ्य-कर्मियों को तनाव-प्रबंधन और आवश्यकतानुसार खुद की देखभाल का प्रशिक्षण देने के कार्यक्रमों की व्यवस्था है।
मध्य-प्रदेश के सीहोर जिले में ‘संगत’ ने 2022-23 में 40 आशा कार्यकर्ताओं के बीच एक ऐप के माध्यम से विश्व स्वास्थ्य संगठन के सेल्फ-केयर मॉडल पर आधारित ‘संभव’ कार्यक्रम चलाया था। डॉ0 भान कहते हैं कि “हमें उम्मीद है कि सरकार इन सीखों के माध्यम से अर्जित ज्ञान को अपने नियमित कार्यक्रमों में शामिल कर लेगी और वर्तमान में चल रही गतिविधियों और लोगों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए सेवाओं को जारी रखना सुनिश्चित करने के लिये प्रोत्साहन देने का प्रविधान करेगी।

