समकालीन जनमत
कहानी

पढिए स्लोवेनियन कहानीकार लिली पोटपारा की कहानी ‘ झूठ ’

( लिली पोटपरा स्लोवेनियन साहित्य की एक प्रसिद्ध व पुरस्कृत लेखिका व अनुवादिका हैं। उनके कहानी संग्रह (Bottoms up stories) को 2002 में प्रोफ़ेशनल एसोसिएशन ऑफ़ पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स ऑफ़ स्लोवेनिया की तरफ़ से प्राइज़ फ़ॉर बेस्ट लिटरेरी डेब्यू ” सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रस्तुत अनुवाद क्रिस्टीना रेयरडन के अंग्रेज़ी अनुवाद का अनुवाद है, जो ‘एल्केमी जर्नल ऑफ़ ट्रांसलेशन’ में प्रकाशित हुआ था समकालीन जनमत के पाठकों के लिए  हिंदी अनुवाद  कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क के  हिन्दी-उर्दू के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉक्टर आफ़ताब अहमद ने किया है । समकालीन जनमत  में  लिली पोटपारा की  कहानी ‘चाबी ’ प्रकाशित हो चुकी है। आज पढिए उनकी एक और कहानी ‘ झूठ ’ )

अभी घर न जाइए नानी!” टिंका अपनी नानी से रिरियाते हुए कहती है, जो उसके बालों में कंघी करते हुए घड़ी की ओर देखने लगी थीं। टिंका को मालूम है कि नाना काम से घर वापस आने वाले होंगे और भूखे होंगे। फिर भी वह नहीं चाहती कि उसकी नानी अपने घर जाएँ। नानी के चले जाने के बाद उसे  अपना अपार्टमेंट अजीब तरह से ठंडा महसूस होने लगता है, हालाँकि उसके फ़ौरन बाद उसकी माँ और पापा घर आते हैं। “थोड़ी देर और रुकिए, इतनी जल्दी क्या है?”

नानी उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहती  हैं: “ठीक है, मैं बस दुकान तक जाऊँगी। ब्रेड लाना है, और नाना के लिए कॉफ़ी भी लानी है।”

            टिंका का रिरियाना रुक जाता है। नानी कोट पहनती हैं। वे हाल के आईने पर एक नज़र डालती हैं, अपना बैग उठाती हैं और चली जाती हैं। टिंका दौड़कर बेडरूम की खिड़की के पास जाती है, क्योंकि वहाँ से बाहर आँगन नज़र आता है, जहाँ से दुकान से अपार्टमेंट में दाख़िल होने वाले हर व्यक्ति को वह देख सकती है।

टिंका खिड़की के पास दुबकी बैठी है। उसे सामने के गेट से माँ आती हुई नज़र आती हैं। वह अपने पापा को फ़ोर्ड कार की बग़ल में कार पार्क करते हुए देखती है और लोगों को काम से घर वापस आते हुए देखती है।

“टिंका, किचन में आओ। आख़िर तुम कर क्या रही हो? वहाँ ऐसी क्या बात है जो इतनी देर से  बैठी हो?” माँ नानी के पकाए लंच को दुबारा गर्म करते हुए कहती हैं। पापा कुछ नहीं कहते क्योंकि काम के बाद उन्हें बहुत भूख लगी है और वे फ़ौरन खाना चाहते हैं।

टिंका खिड़की के बाहर देखती है। उसे पेशाब लगा है, लेकिन वह वहाँ से हटती नहीं, क्योंकि उसे मालूम है कि उसके जाते ही नानी वापस आएँगी। उसे होमवर्क करना है, लेकिन वह नहीं करती क्योंकि नानी अब किसी भी वक़्त वापस आ सकती हैं।

सूरज धीरे-धीरे डूब रहा है। टिंका दौड़कर बाथरूम में पेशाब करने जाती है। उसकी बहन म्यूज़िक स्कूल से घर वापस आती है। माँ चिड़चिड़ाई हुई हैं, और पापा फ़ुटबाल खेलने गए हैं। जिस शीशे से टिंका अपना चेहरा सटाए बैठी है वह उसके मुँह की भाप से धुंधला गया है।

अब तक़रीबन रात हो चुकी है। टिंका का मुँह बदमज़ा सा हो रहा है। उसे महसूस होता है कि जैसे उसके पेट में एक अजीब सा मकड़ी का जाला हो। जैसे सैंकड़ों चिपचिपे मकड़े उसके अन्दर रेंग रहे हों।

“बेटी, यहाँ आओ, कार्टून देखो। आख़िर तुम्हें आज हुआ क्या है?” माँ कहती हैं, जो अभी भी बुरे मूड में हैं।

“मैं नहीं आती,” टिंका धीरे से कहती है। फिर कहती है: “ नानी अभी-अभी दुकान गई हैं। दुकान बंद होने वाली है। वो अब आने ही वाली होंगी।

नानी वापस नहीं आतीं। टिंका अपना पाजामा पहनती है और थोड़ा दही खाती है। अब वह खिड़की को नहीं देख रही है। वह किसी की तरफ़ नहीं देखती। वह अब कुछ देखना ही नहीं चाहती। लेकिन उसके लिए आँखें बंद करना भी कठिन है क्योंकि वह आँखें मूंदती है, तो उसे नानी नज़र आती हैं- दरवाज़े से निकलकर  दुकान की तरफ़ जाते हुए। वे सैकड़ों दफ़ा जाती हैं और सैकड़ों बार वापस नहीं आतीं।

अगली सुबह टिंका को महसूस होता है कि वह एक ही रात में कई साल बड़ी हो गई।

***

 

लिली पोटपरा

लिली पोटपरा स्लोवेनियन साहित्य की एक प्रसिद्ध व पुरस्कृत लेखिका व अनुवादिका हैं। उनका जन्म 1965 में मारीबोर, स्लोवेनिया में हुआ। उन्होंने लुबलाना विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी भाषाओं में 1992 में स्नातक किया। वे स्लॉवेनियन भाषा से अंग्रेज़ी में और अंग्रेज़ी, सर्बियन, और तुर्की भाषाओं से स्लोवेनियन भाषा में फ़िक्शन और नॉन-फ़िक्शन दोनों प्रकार की रचनाओं का अनुवाद करती हैं। उनके कहानी संग्रह (Bottoms up stories) को 2002 में “प्रोफ़ेशनल एसोसिएशन ऑफ़ पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स ऑफ़ स्लोवेनिया” की तरफ़ से “प्राइज़ फ़ॉर बेस्ट लिटरेरी डेब्यू” पुरस्कार से सम्मानित किया गया। क्रिस्टीना रेयरडन द्वारा किये गए उनकी कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद “वर्ल्ड लिटरेचर टुडे” और “फ़िक्शन साउथईस्ट” , “दि मोंट्रियल रिव्यु” में प्रकाशित हो चुके हैं।

वर्तमान में लिली पोटपारा स्लोवेनिया के विदेश मंत्रालय में अनुवादिका के रूप में कार्यरत हैं। साथ ही स्लॉवेनियन भाषा में अनुवाद और साहित्य रचना का काम भी जारी है।

डॉक्टर आफ़ताब अहमद

जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी, दिल्ली से उर्दू साहित्य में एम. ए. एम.फ़िल और पी.एच.डी.डॉक्टर आफ़ताब अहमद  कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क के हिंदी-उर्दू के वरिष्ठ प्राध्यापक  हैं। उन्होंने  सआदत हसन मंटो की चौदह कहानियों का “बॉम्बे स्टोरीज़” नाम से, मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के उपन्यास “आब-ए-गुम का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘मिराजेज़ ऑफ़ दि माइंड’ और पतरस बुख़ारी के उर्दू हास्य-निबंधों और कहानीकार सैयद मुहम्मद अशरफ़ की उर्दू कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद मैट रीक के साथ मिलकर किया है। उनकी अनूदित रचनाएं  “अट्टाहास”, “अक्षर पर्व”, “आधारशिला”, “कथाक्रम”, “गगनांचल”, “गर्भनाल”,“देशबंधु अवकाश”,“नया ज्ञानोदय”, “पाखी”, “बनास जन”, “मधुमती”, “रचनाकार”, “व्यंग्य यात्रा” , “ समयांतर ”,  “सेतु” और “हंस” पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं हैं। सम्पर्क:  309 Knox Hall, Mail to 401 Knox Hall, 606 West 122nd St. New York, NY 10027, ईमेल:   aftablko@gmail.com  

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