अजय प्रताप तिवारी
भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना में आदिवासी शब्द किसी विशेष समुदाय की संकेत सूचक ही नहीं है, बल्कि अपने समुदाय के संघर्ष, अस्तित्व एवं सभ्यता के वाहक है। पिछले कुछ दशकों में यह शब्द एक राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। क्या वे आदिवासी हैं या वनवासी ? इस प्रश्न ने भारतीय लोकतंत्र के भीतर आदिवासी अस्मिता और हिंदुत्व की राजनीति के बीच गहरे अंतर्विरोध को उजागर किया है। कमल नयन चौबे की पुस्तक “आदिवासी आर वनवासी: ट्राइबल इंडिया एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ हिंदुत्व ” इस प्रश्न की विवेचन करती है।
यह पुस्तक आदिवासी समाज की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को समझने का प्रयास करती है। और इस बात की पड़ताल करती है कि कैसे आदिवासी समुदाय को दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा ने वनवासी कहकर हिंदू सभ्यता के परिधि में समाहित करने की कोशिश की। लेखक यह दिखाते हैं कि यह केवल नाम का अंतर नहीं, बल्कि पहचान के अधिकार का संघर्ष है। लेख का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि आदिवासी शब्द मूलनिवासिता, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक है, जबकि वनवासी शब्द उन्हें हिंदू धर्म की कथा में गौण पात्र बनाता है। जैसे वनवासी राम के भक्त या अनुचर हों, न कि स्वतंत्र सांस्कृतिक इकाई।
पुस्तक को पाँच प्रमुख खंडों में विभाजित किया गया है। प्रथम खंड में औपनिवेशिक काल में आदिवासी की पहचान से जुडा हुआ है जिसमें ब्रिटिश काल में आदिवासी समुदाय को किस तरह से नस्लीय श्रेणी में स्थापित करने के साथ सभ्य संस्कृति वाले समुदाय से एक पृथक समुदाय के रूप में परिभाषित किया। आज़ादी के बाद आदिवासी समुदाय कई परिवर्तनों से गुज़रा जिसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और पर्यावरण प्रमुख है। आज़ादी के बाद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुख्य धारा में लाने के लिए संविधान ने विशेष अधिकार दिए, लेकिन जमीनी स्तर पर वे अब भी हाशिए पर हैं।
लेखक ने यह भी बताया कि किस तरह आदिवासी क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा के नाम पर राज्यसत्ता का हस्तक्षेप दिन ब दिन बढ़ता रहा है। वनवासी कल्याण और सांस्कृतिक को बढावा देने वाले संगठनों जैसे ” वनवासी कल्याण आश्रम ” की भूमिका की गहराई से चर्चा की है। लेखक ने यह तर्क दिया है कि इन संगठनों ने शिक्षा और सेवा के नाम पर आदिवासियों में हिंदुत्व की विचारधारा की जड़ें जमाने का काम किया है। आदिवासी समुदायों में बढ़ते धर्मांतरण पर कटाक्ष हुए धर्मांतरण को केवल आस्था का तक सीमित नहीं रखा है बल्कि यह सामाजिक न्याय की ओर संकेत किया है।
किताब की अंतिम खंड ‘ समकालीन आदिवासी आंदोलन और भविष्य की दिशा ‘ लेखक में देश में लम्बे समय से चल रहे आंदोलनों जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्यप्रदेश और उत्तर-पूर्व के जनसंघर्षों की चर्चा करते हैं, जो अपने भूमि, जंगल और जल की रक्षा के लिए खड़े हैं। लेखक यह दिखाते हैं कि यह नाम परिवर्तन केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि सत्ता की भाषा का नया प्रयोग है, जहाँ शब्द के भीतर पूरी राजनीतिक रणनीति छिपी होती है।
किताब की भाषा और शैली पर बात किया जाए तो लेखक की भाषा संतुलित, अकादमिक और विश्लेषणात्मक है। उन्होंने समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक और राजनीतिक साक्ष्यों के साथ अपने तर्कों को प्रस्तुत किया है। भाषा में एक पत्रकारिक स्पष्टता भी है, जो पाठक को जटिल बहसों को समझने में सहायता करती है। लेखन शैली में एक गहरी संवेदनशीलता है, वे आदिवासियों को “विषय” नहीं, बल्कि “वक्ता” के रूप में प्रस्तुत करते हैं। पुस्तक पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि लेखक ने आदिवासी समाज को ‘बोलने’ का अवसर दिया है, न कि केवल उनके बारे में लिखा है।

आज के सामाजिक और वैचारिक संदर्भ यह पुस्तक भारत में “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” और “पहचान की राजनीति” के टकराव को समझने का माध्यम है। हिंदुत्ववादी विचारधारा जहाँ आदिवासियों को “राम के अनुयायी वनवासी” के रूप में देखती है, वहीं आदिवासी खुद को एक स्वतंत्र “सभ्यता” के वाहक मानते हैं, जो प्रकृति, भूमि और सामूहिकता पर आधारित है। लेखक तमाम विरोधाभास को उभारते हुए दिखाते हैं कि किस तरह “धर्म”, “विकास” और “राष्ट्रीयता” के नाम पर आदिवासी अस्मिता को पुनर्परिभाषित किया जा रहा है।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह किसी एक विचारधारा का प्रचार नहीं करती। लेखक ने मार्क्सवादी, समाजशास्त्रीय और एंथ्रोपोलॉजिकल सभी दृष्टिकोणों का संतुलित प्रयोग किया है। यह पुस्तक भारत में आदिवासी विमर्श को नई दिशा देती है और यह प्रश्न उठाती है कि क्या “राष्ट्रीय एकता” का अर्थ सांस्कृतिक समानता है या विविधता का सम्मान। आज जब देश में धर्म, जाति और संस्कृति की पहचान पर बहसें तेज़ हैं, यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि “आदिवासी प्रश्न” केवल हाशिये का नहीं है—यह भारतीय लोकतंत्र के केंद्र में है। “आदिवासी या वनवासी” का प्रश्न इस बात का प्रतीक है कि भारत किस दिशा में जा रहा है, क्या वह विविधता को आत्मसात करने वाला देश रहेगा या एकरूपता थोपने वाला राष्ट्र बनेगा।
कमल नयन चौबे की यह कृति भारतीय समाज की आत्मा को झकझोरने वाली पुस्तक है। यह पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि नामकरण की राजनीति में पहचान कैसे मिटाई जाती है। यह केवल राजनीतिक विश्लेषण नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतना का दस्तावेज़ है। पुस्तक अंततः यह संदेश देती है कि आदिवासी समाज को समझने के लिए हमें उन्हें “भारत के अतीत” का हिस्सा नहीं, बल्कि “भारत के भविष्य” की दिशा में देखने की आवश्यकता है। पुस्तक हमें बताती है कि पहचान, इतिहास और संस्कृति कभी स्थिर नहीं होती, वे हमेशा सत्ता और प्रतिरोध के बीच झूलती रहती हैं।“आदिवासी” केवल एक सामाजिक वर्ग नहीं, बल्कि एक वैचारिक आंदोलन है, जो अपने अस्तित्व की पुनः परिभाषा चाहता है। यह पुस्तक उन सभी के लिए अनिवार्य रूप से पठनीय है जो भारत की सांस्कृतिक राजनीति, जनजातीय अध्ययन या समकालीन समाजशास्त्र में रुचि रखते हैं।

