समस्तीपुर। मिथिलांचल के सुप्रसिद्ध जनकवि एवं मार्क्सवादी विचारक डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद की जयंती के अवसर पर 17 मई को जन संस्कृति मंच के तत्वावधान में ‘ मिथिलांचल के जनवादी साहित्यिक–सांस्कृतिक एवं कम्युनिस्ट आंदोलन के विकास में जनकवि सुरेन्द्र प्रसाद का योगदान ’ विषयक संगोष्ठी का आयोजन ‘लेनिन आश्रम ’ में किया गया।
संगोष्ठी की संयुक्त अध्यक्षता जन संस्कृति मंच के राज्य उपाध्यक्ष डॉ.रामबाबू आर्य और एवं भाकपा–माले की समस्तीपुर इकाई के जिला सचिव उमेश कुमार ने की।
कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत सुरेंद्र बाबू की तस्वीर पर पुष्पांजलि तथा अजय कलाकार, भोला जी, खुर्शीद खैर, सावन जी, विद्यानंद दास द्वारा जनवादी गीतों की प्रस्तुति से हुई। कार्यक्रम का संचालन जसम समस्तीपुर के जिला सहसचिव अरविंदानंद ने किया।
कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए जसम राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य प्रो. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि जब स्वाधीनता आंदोलन को याद करते हैं तो गांधी, अम्बेडकर, भगत सिंह जैसे उस दौर के नायकों को भी याद करना होगा। इसी तरह मिथिलांचल के कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक दौर को याद करते हुए सुरेन्द्र प्रसाद जी को याद करना लाजमी हो जाता है। मिथिलांचल के साहित्यिक–सांस्कृतिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में उनका व्यक्तित्व हिमालय जैसा ऊंचा था। अकारण नहीं है कि नागार्जुन के बाद मिथिलांचल के सबसे महत्वपूर्ण कम्युनिस्ट संगठक एवं कवि के रूप में सुरेन्द्र बाबू को याद किया जाता है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार राहुल सांकृत्यायन ने अपने साहित्य से देशभर में हजारों कम्युनिस्ट बनाए थे उसी तरह मिथिलांचल में सुरेन्द्र बाबू ने हजारों कम्युनिस्ट कार्यकर्ता पैदा किए थे। समस्तीपुर के कम्युनिस्ट आंदोलन की बुनियाद मजबूत करने में उन्होंने अविस्मरणीय भूमिका निभाई थी। माकपा के जिला कार्यालय के निर्माण आंदोलन तथा कालान्तर में भाकपा माले के जिला कार्यालय निर्माण आंदोलन का उन्होंने सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था। इसके साथ ही उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए संत कबीर महाविद्यालय, विद्या भगत महिला कॉलेज सहित 4–5 महाविद्यालयों की स्थापना की। यहीं के वासुदेवपुर चंदेल एवं हरिशंकरी गांव में उच्च विद्यालय की स्थापना की। उनके सामाजिक–राजनीतिक आंदोलन के केंद्र में जिस प्रकार आम आदमी एवं हाशिए का समाज था उसी तरह उनके सृजनकर्म में भी हाशियाकृत समाज का ही केंद्रीय स्थान था। उनके तिमरांचल, एक और लहर हाथ की, हवा को इसका दुःख है, जन्मते पंख.. गूंजती किरणें, परित्यकता जैसे कविता संग्रह दलित, महिला एवं अल्पसंख्यकों के जीवन–संघर्ष एवं इनकी मुक्ति की राह तलाशते हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन में जसम बिहार के राज्य उपाध्यक्ष डॉ. रामबाबू आर्य ने कहा कि सुरेन्द्र प्रसाद वास्तविक अर्थों में आर्गेनिक इंटेलेक्चुअल थे। उन्होंने लेखन और आंदोलन में समान रूप से सक्रिय भूमिका निभाई। मिथिलांचल को साठोत्तर के दशक में चरम सामंती शोषण का गढ़ माना जाता था। वैसे समय में सुरेन्द्र बाबू ने सामंती जुल्म–उत्पीड़न से संघर्ष करने के लिए आंदोलन का रास्ता अपनाया। उन्होंने बतौर बुद्धिजीवी एवं कम्युनिस्ट कार्यकर्ता मुक्तिकामी आंदोलनों के लिए जीवनपर्यंत जोखिम उठाया। आज सुरेंद्र बाबू जैसे महापुरुषों का योगदान है कि दलित–वंचित समाज के लोग सिर उठा कर जीते हैं।
जसम समस्तीपुर के जिला अध्यक्ष डॉ.प्रभात कुमार स्वास्थ्य कारणों से कार्यक्रम में सशरीर उपस्थित नहीं थे। इस अवसर पर उन्होंने अपने संदेश के माध्यम से कहा कि डॉ. सुरेंद्र ने समाज के लिए बहुत कुछ किया। बढती उम्र के बावजूद उन्होंने भाकपा-माले की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। सामाजिक परिवर्तन के प्रति वे प्रतिबद्ध थे। साहित्यकार के रूप में भी उन्होंने अपने गीतों से समाज के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे उन्होंने कहानियां लिखने के लिए प्रेरित किया। मेरी कहानियां “टूटती खामोशी” और “उपहार” उन्होंने चुनौती पत्रिका में प्रकाशित कर मुझे प्रोत्साहित किया। वे नवोदित लेखकों को हमेशा प्रोत्साहित करते थे। आज जब उनके जन्मदिन पर मैं उन्हें याद करता हूं तो उनके साथ बिताए हुए वर्ष आंखों के सामने घूम जाते हैं।
माले समस्तीपुर के जिला सचिव उमेश कुमार ने कहा कि सुरेन्द्र प्रसाद मिथिलांचल में सांस्कृतिक, शैक्षणिक एवं राजनीतिक आंदोलन के शिल्पकार और न्यूक्लियस थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में हमेशा आंदोलनों को सींचने–संवारने का काम किया।
जनवादी लेखक संघ के जिलाध्यक्ष डॉ. शाह जफर इमाम ने कहा कि दशकों तक सुरेन्द्र बाबू का संग–साथ रहा। छात्र आंदोलन के दौर से उनसे मेरा जुड़ाव रहा। आज हम जिस भीषण सांप्रदायिकता के माहौल में जी रहे हैं, उसकी आहट को सुरेन्द्र बाबू ने नब्बे के दशक में पहचान लिया था। अपनी पत्रिका तथा सांस्कृतिक सक्रियता के माध्यम से उन्होंने साम्प्रदायिक फासीवादी शक्तियों का जमकर सामना किया। आज के समय में उनकी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए सांप्रदायिकता एवं वर्णवादी वर्चस्वों से संघर्ष करने की जरूरत दरपेश है।
जनवादी लेखक संघ के कार्यकारी जिला सचिव कवि अरुण अभिषेक ने कहा कि सुरेन्द्र बाबू समस्तीपुर में बौद्धिक गतिविधियों की जीवंतता के केन्द्र थे। उन्होंने हमारे जैसे न जाने कितने लिखने–पढ़ने वाले लोगों की सामाजिक–साहित्यिक चेतना को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सुरेन्द्र बाबू के गीत और कविताएं समकालीन संकटों को रेखांकित करते हुए संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं।
माले नेता सुरेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि सुरेन्द्र प्रसाद ने अपने बौद्धिक कर्म एवं सांस्कृतिक अभियानों से जनसेवा तो की है इसके साथ ही उन्होंने वर्षों तक गरीब–गुरबों का मुफ्त होमियोपैथी इलाज किया। वे राजनीति को विशुद्ध जनसेवा का माध्यम मानते थे। वे हमेशा अवसरवादिता, जातीय गोलबंदी एवं सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के विरुद्ध रहे।
माले नेता रंजीत राम ने कहा कि सुरेन्द्र बाबू की कविताएं दलितों–गरीबों के आंदोलनों को मुखरित करती हैं। उनकी कविताओं से जनसामान्य के संघर्ष को शक्ति मिलती है।
कार्यक्रम का विषय प्रवेश जसम दरभंगा के जिला सचिव समीर ने सुरेन्द्र प्रसाद की कविता ‘ हवा को इसका दुःख है ’ शीर्षक कविता के पाठ से किया।
जयंती समारोह में सुरेन्द्र प्रसाद के सुपुत्र प्रवीण कुमार, रंजन कुमार, सुरेंद्र प्रसाद पर शोध कर रहीं शोधार्थी कल्पना कुमारी, रूपक कुमार, विजय नन्दन राय, प्रो.रूपलाल राय, दीपक कुमार आदि ने भी अपनी बातें रखीं।

