‘ मेरा दागिस्तान ‘ से जो रिश्ता रसूल हमजातोव का है, वही अजय कुमार का जौनपुर से है। यह शहर, इसके गांव-कस्बे, गलियां-चौराहे, सेवा प्रेस-रास मंडल -हिंदी भवन, मिली जुली तहज़ीब, रिवायत, बोली-बानी इनके अंदर घुला-मिला है, दिल में धड़कता है, नसों में रक्त के रूप में प्रवाहित है। इन्हीं खूबियों के कारण आलोचक प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने उनके कविता संग्रह ‘नया बीजक’ का जौनपुर में लोकार्पण करते उन्हें ‘जौनपुर का रसूल हमजातोव’ कहा था। 10 जुलाई को रात आठ बजे जौनपुर में अपने निवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली।
अजय कुमार जी इधर कुछ अरसे से बीमार चल रहे थे। इसके बावजूद जौनपुर के हिन्दी भवन में पिछले महीने लाइब्रेरी सम्मेलन का आयोजन हुआ। यह उन्हीं की पहल से संभव हुआ। फिर भी समस्या थी। पिछले हफ्ते आशा भाभी यानी उनकी पत्नी से बात हुई थी। उनका पढ़ना-लिखना जारी था। लेकिन अकेलापन ने घेर रखा था। पुराने साथी एक-एक कर दुनिया छोड़ चुके थे। जो नए थे, उनके जीवन की आपाधापी और व्यस्तता ऐसी थी कि मिलना जुलना कम हो गया था। आशा भाभी के साथ बातचीत में यह तय हुआ कि जसम के 12-13 जुलाई के राष्ट्रीय सम्मेलन के बाद वे लखनऊ आएंगे। हम लोगों के बीच ही रहेंगे। उनसे सुना जाएगा। उन पर फिल्म बनाई जाएगी। उन्हें लेकर कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। पर सब बातें अब बातें बनकर रह गई हैं। उसके पहले ही उन्होंने इस दुनिया से कूच कर दिया।
अजय कुमार हिंदी उर्दू के बीच सेतु थे। इस पर एक लेख भी लिखा था ‘हिंदी उर्दू सियामी जुड़वा बहनें’। यह लेख ‘जन संस्कृति’ और ‘जनसंदेश टाइम्स ‘ में छपा। वामिक जौनपुरी के सोहबत से उन्होंने बहुत कुछ सीखा था।
वामिक साहब की ‘भूका बंगाल’, ‘मीना बाजार’ जैसी अनेक रचनाओं को हिंदी साहित्य समाज तक पहुंचाने का काम किया। याद आता है कि उन्हीं की कोशिशों से 1986 में इलाहाबाद के विज्ञान भवन में हुए जसम के पहले राज्य सम्मेलन में उन्होंने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। यह उनका ही प्रयास था कि वामिक साहब की किताब ‘ वामिक जौनपुरी: एक रौशन मीनार
‘ हिंदी में आई।
अजय कुमार जसम के संस्थापकों में रहे हैं। इसकी ओर से उर्दू विभाग बना। उसके वे प्रभारी बनाए गए। जौनपुर के हिंदी भवन में 1986 में हिंदी-उर्दू लेखकों का दो दिनों का सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें कैफ़ी आज़मी, वामिक जौनपुरी, होश जौनपुरी, अली अहमद फातमी सहित अनेक उर्दू के नामचीन अदीब शामिल हुए थे।
अजय कुमार उन चुनिंदा अनुवादकों में रहे हैं जिन्होंने विदेशी साहित्य को हिंदी के पाठकों तक पहुंचाने का काम किया। विशेष रूप से चीनी साहित्य को लेकर किया गया अनुवाद कार्य को रेखांकित किया जाना चाहिए। 80 के दशक की वाम-पत्रिकाओं के माध्यम से इनके अनुवाद ने हम जैसों को लू शुन जैसे चीनी लेखकों के साहित्य से परिचय कराया। अनुवाद ही नहीं कला, साहित्य, सिनेमा, नाटक, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में उन्होंने लिखा। बीते कुछ सालों से सुनने में दिक्कत हो रही थी। मशीन लगाया गया। वह भी बहुत कारगर नहीं हुआ। फिर भी आशा भाभी के माध्यम से बात होती थी।

अजय कुमार जी को घुम्मकड़ी यानी दुनिया को देखन-जानने का शौक था। गर्मी के दिनों में पहाड़ पर चले जाते। जब लौटते तो लखनऊ उनका एक स्टेशन होता। पहुंचते ही खबर करते। फिर मिलने-जुलने, सुनने-सुनाने का सिलसिला शुरू हो जाता। अनेक कार्यक्रम हमने लखनऊ में उन्हें लेकर आयोजित किए । पिछले साल अक्टूबर में वियतनाम, कंपूचिया आदि देशों की यात्रा कर लखनऊ आए थे।है लखनऊ में मुख्य तौर से उनका घर मूर्तिकार धर्मेंद्र कुमार के यहां होता था। पहुंचते ही फोन खनखनाते । बस क्या था ? भगवान स्वरूप कटियार, अशोक श्रीवास्तव, असगर मेहंदी, फरजाना मेहंदी, बीके सिंह आदि पहुंच गए। गोष्ठी हो गई। उन्होंने अपनी यात्रा के संस्मरण सुनाए। वे एक अच्छे संस्मरण लेखक भी रहे हैं। उनके संस्मरणों में अनेक शख्सियतें शामिल रही हैं जैसे ठाकुर प्रसाद सिंह, वामिक जौनपुरी, नरेश सक्सेना आदि। वहीं मेहनतकश आम लोगों पर भी उन्होंने खूब लिखा है।
अजय कुमार मूलत कवि रहे हैं। उनकी कविताओं में जीवन के अनेक रंग मिलते हैं। समय, समाज पर उनकी गहरी पकड़ है। वहां इरोम शर्मिला हैं तो बछेंद्री पाल हैं। संगीत के भी मर्मज्ञ हैं, इसी तरह विश्व सिनेमा के भी।लखनऊ में होने वाले फिल्म फेस्टिवल में वे नियमित रूप से आते रहे हैं। उनका व्याख्यान सिनेमा जैसी विधा को लेकर हमारी समझ को बढ़ाने वाला होता था। उन्होंने विश्व सिनेमा पर विशेष तौर से इरानी सिनेमा पर खूब लिखा है। उनके सिनेमा पर लिखे लेखों की किताब के प्रकाशन की योजना है। यह आगे के हमारे कार्यभार में शामिल है।
अजय कुमार जी ने कहानियां भी लिखी हैं। बात अधूरी रह जाएगी यदि हम उनके कलाकार की चर्चा न करें। यह तो भूलता ही नहीं कि हरेक नए साल पर पोस्टकार्ड पर अपनी कलाकृति के साथ नए साल का संदेश देते। उसमें जिंदगी के गहरे अर्थ होते हैं जो हम तक पहुंचते और धीरे-धीरे खुलते।
हमारा उनसे 50 साल पुराना साथ था। 1976 में जब हमने लखनऊ से ‘परिपत्र’ निकलना शुरू किया तब से। पहली मुलाकात 1980 में अजय सिंह के भीकमपुर कॉलोनी के निवास पर हुई थी। ‘आमुख’ (संपादक – कंचन कुमार) में चीनी साहित्य का उनके द्वारा किया गया अनुवाद छपा था। उस समय वे नौजवान थे। अब वे अस्सी पार कर चुके थे। बीमारियों की चपेट में थे। फिर भी पढ़ने लिखने की ललक कम नहीं हुई थी।
अजय कुमार जी का गहरा जुड़ाव भाकपा-माले से था। इंडियन पीपुल्स फ्रंट के निर्माण के दौर में उसकी बैठकों को अपनी लेखनी से जीवन्त कर देते। यही उन्होंने जसम के स्थापना सम्मेलन में किया। उनके नोट्स के आधार पर ही केदारनाथ सिंह का स्वागत भाषण तथा गुरशरण सिंह का उद्घाटन भाषण प्रकाशित कर पाने में सफल हुए। सार रूप में कह सकते हैं कि अजय कुमार का जीवन एक सांस्कृतिक योद्धा का है जो न थकता है, न रुकता है। हम फासीवाद की जिस विभाजनकारी संस्कृति के दौर में हैं, इसे उन्होंने 80 के दशक में ही देख लिया था। उस दौर में उन्होंने जो कुछ लिखा, वह आज की सच्चाई है। अपनी कविता में वे कहते हैं-
‘ कौन बांटता है मुझको ?
कौन मुझे खुद से लड़वाता है ?
किसकी सुख-संपत्ति की खातिर
देश टूट जाता है,
वही दुश्मन बन जाता है
जिससे युग-युग से भाई का नाता है
वही दुश्मन बन जाता है
जो कल तक देशभक्त कहलाता है
धरती पर रहने वालों का
यह कैसा कच्चा नाता है ?
इस मिट्टी से उगकर कोई
कैसे इस मिट्टी से कट जाता है ?
देश बात-बात में कैसे बंट जाता है
जो इस मिट्टी में अपना खून मिलाता है
मरकर इस मिट्टी में दफनाया जाता है
फिर किसके एक इशारे पर
देश का दुश्मन बन जाता है ?’

