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गोरख स्मृति आयोजन में 27 कवियों का कविता पाठ, गोरख के गीतों का गायन हुआ

पटना. स्थानीय प्रेमचंद रंगशाला परिसर में हिरावल (जन संस्कृति मंच) की ओर से तीसरा गोरख पांडेय स्मृति आयोजन हुआ, जिसमें ‘हिरावल’ और ‘नाद’ के कलाकारों द्वारा गोरख पांडेय के गीतों की प्रस्तुति हुई और 27 कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।

यह आयोजन गोरख पांडेय के तीसवें स्मृति दिवस पर आयोजित हुआ। ‘कविता युग की नब्ज धरो’ गोरख की यह काव्य-पंक्ति इस आयोजन की थीम थी। हिरावल के सचिव संतोष झा ने कहा कि यह आयोजन नई रचनाशीलता के लिए एक मंच बने, यह हमारी कोशिश है। आयोजन का संचालन कवि राजेश कमल ने किया।

कविता पाठ की शुरुआत समरीन शब्बीर की कविता ‘यादें’ से हुई, जिसमें पुराने दिनों सुकून भरे दिनों की यादें थीं- ‘वे कच्ची सड़कें जिन पर चले थे/ पर पक्के रिश्ते निभाए थे’। उत्कर्ष की कविताओं में भी अतीत के जीवन का आकर्षण और ‘समय से वार्तालाप’ था। पूजा कौशिक की कविता ‘समय’ में जीवन में फलसफा निर्माण की प्रक्रिया को अभिव्यक्ति मिली। सोबित श्रीमन की कविता ‘देह का कौड़ी दाम’ स्त्री संवेदना की कविता थी।

‘तुम्हें डर लगता है’ में प्रीति प्रभा ने स्त्री की मुक्ति की आकांक्षा को स्वर दिया- तुम्हें डर है कि जमीन पर चलते हुए कहीं हवा से दोस्ती न कर लूं। आशिया नकवी की एक कविता महिलाओं की आजादी के सवाल पर केंद्रित थी, तो दूसरी कविता फासिस्ट हत्याओं के खिलाफ थी।

सत्यम कुमार झा ने ‘बथानी टोला’ शीर्षक कविता में कहा- एक पीढ़ी खत्म हो गई न्याय की गुहार पर। शशांक मुकट शेखर  की कविताओं में श्रम, बाजार, प्रकृति और मनुष्य के सुकून की तलाष के द्वंद्व को अभिव्यक्ति मिली। नताशा ने ‘विध्वंस और सृजन’ कविता में कहा- ‘जिस समय अधिकतम ठिकाने पर बम बरसाए जा रहे होंगे/ कोई कली कहीं चटक रही होगी।’ सुधाकर रवि ने बुद्ध के नाम पर चलने वाले धर्मधंधे पर प्रहार किया और कहा कि काशीऔर बोधगया में कोई फर्क नहीं है। अंचित की ‘कविता युग’ शीर्षक कविता में कवियों के दुनिया के द्वंद्व का इजहार हुआ। संजय कुमार कुंदन ने ‘कैट वाक’ शीर्षक नज्म सुनाया।

विक्रांत ने ‘अधकपारी’, अर्पण कुमार ने ‘ शिकारी’ और ‘बघनखा’, उपांशु ने ‘गांधी मैदान की एक याद’ और ‘आत्मबोध के बाद विकास के लिए…’, रोहित ठाकुर ने ‘कविता’ और ‘यादों को बांधा जा सकता है गिटार की तरह’, सुधीर सुमन ने ‘प्रेम के लिए’ और ‘बासंती बयार की तरह’, रंजीत वर्मा ने ‘ऐसे ही नहीं बना यह हिंदुस्तान’, श्रीधर करुणानिधि ने ‘30 जनवरी’ और ‘अपने-अपने हिंडोले में’, अस्मुरारी नंदन मिश्र ने ‘लड़कियां प्यार कर रही हैं’ और ‘बांस’ तथा नेहा नारायण ने ‘मेरी कलम’ और सागर ने ‘सन् 2080’ शीर्षक कविताओं का पाठ किया।

कृष्ण सम्मिद्ध ने दो शीर्षकविहीन कविताएं सुनाईं। रघुनाथ मुखिया की राजनीतिक व्यंग्य से भरपूर कविताओं पर खूब तालियां बजीं। राकेष रंजन की कविताओं- ‘तुम्हारे अद्भुत बोल’ ‘हल्लो राजा’ ‘लूट मार क्यों होर्या ’ आदि को भी काफी सराहा गया।

नाट्य गायन दल ‘नाद’ के मो. जानी, आसिफ और इरफान ने गोरख के गीत ‘हमारे वतन की नई जिंदगी हो’ और ‘समय का पहिया’ शीर्षक गीतों को नए अंदाज में सुनाया, जिसकी लोगों ने काफी तारीफ की। राजन कुमार ने गोरख पांडेय की गजल ‘रफ्ता रफ्ता नजरबंदी का जादू हटता जाए है’ गाकर सुनाया।

हिरावल के संतोष झा और सुमन कुमार ने गोरख पांडेय की याद में लिखे गए दिनेश कुमार शुक्ल के गीत ‘जाग मेरे मन मछंदर’ का गायन किया।

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए जसम के राज्य सचिव सुधीर सुमन ने कहा कि गोरख की कविताएं आज के समय में पहले से भी ज्यादा प्रासंगिक हो गई हैं, हर तरह के लोकतांत्रिक आंदोलन के साथ उनकी कविताएं नजर आती हैं। ‘वे डरते हैं’ आज के युग की प्रतिनिधि कविता बन गई है। गोरख तीस साल पहले बिछड़े थे, पर पिछले तीस साल में वे आजादी और बराबरी की लड़ाई लड़ने वाले और बेहतर समाज-राज का सपना देखने वालों के महबूब कवि हैं।

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