कविता

स्मिता सिन्हा की कविताएँ जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज है

निरंजन श्रोत्रिय


स्मिता सिन्हा की इन कविताओं से गुजरना अपने उदास समय को गहराई से देखने, महसूसने और अंततः उससे जूझने की प्रक्रिया है। इस संग्रह को किसी कवयित्री का संग्रह समझ उसमें स्त्री विमर्श का रूटीन खोजना बेमानी होगा। स्मिता की कविताओं की प्रकृति समावेशी है।

अपने समय, समाज, प्रकृति, प्रेम, रिश्तों और आत्मप्रवंचनाओं की विभिन्न कोणों से पड़ताल मानो कवयित्री की मूल प्रतिज्ञा है। प्रथमदृष्टया यह कवयित्री तमाम आशंकाओं और अवसाद से भरी हुई लगती है जो असमंजस भरे मन से तमाम विसंगतियों का पीछा कर रही है। वह अपने समक्ष ऐसे कठिन समय को पाती है जिसमें यांत्रिक दबावों के कारण प्रकृति के आदिम स्पर्श यहाँ तक कि उस स्पर्श की स्मृति तक को भुलाने की साजिशें हैं। रौशनी की जगह पराबैंगनी किरणें और हवा की जगह जहरीला धुआँ है। साथ ही यहाँ एक छोटे-से झरोखे से अनंत जीवन के विस्तार को नापने की आकांक्षा है, एक बड़ी जिजीविषा के साथ। सब कुछ नष्ट होते जाने की कगार पर पर यहाँ

उस न्यूनतम हँसी को बचा लेने का अदम्य प्रयास है जो किसी बंजर जमीन के लिए आवश्यक होती है-‘कि खिलखिला उठे/ एक उदास नदी/ तुम्हारी हँसी में।’ ‘दरवेश’ शृंखला की अंडरटोन कविताओं में मन, समय और ब्रम्हांड के गूढ़़ कोनों-किनारों को खंगालने की जद्दोजहद है- किसी सूफियाना निर्दोष प्रश्न के साथ जहाँ दर्शन भी है मगर वैयक्तिकता भी।

प्रेम जैसे अलौकिक अनुभव को वह देह से विदेह होने की सीमा तक आत्मसात् करना चाहती है और इस संदर्भ में अज्ञेय, शमशेर और ब्रेख्त जैसे कलमकारों को केवल उद्धृत ही नहीं करती बल्कि चाँद और दो देहों के बीच एक त्रिकोणीय रिश्ता भी कायम करती हैं।

कवयित्री स्मिता सिन्हा की कविता इस मायने में प्रतिरोध की कविता है कि वहाँ ‘लोकतंत्र’ में कुछ न कर पाने की आत्मग्लानि में एक व्यापक राजनीतिक चेतना व्याप्त है, कि वह इस बहरे युग में चीखने का आव्हान करती है कि अब कोई विकल्प शेष नहीं , कि इस संशय में भी उसकी प्राथमिकता सियासत के मुँह पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ हो जाने की है, कि वह उन चेहरों की शिनाख्त कर पा रही है जो अपने को धो, पोंछ, चमका और अंततः बाजार के लिए सजा रहे हैं, कि वह तंज कर आगाह करती है उन अपराधियों को जिनके नाखूनों में इंसान के गोश्त के टुकड़े फँसे हुए हैं और जो उनके खिलाफ जिंदा सबूत हैं।

जब हम इन कविताओं में विस्थापन के दर्द को पढ़ते हैं तो दरअसल उसकी सीमाओं तक जाने की यातना भी भोगते हैं। विस्थापन के आयाम जो सपनों, स्मृतियों, सांसों, सिलवटों, भाषा, विचार, रिश्तों बल्कि रूह तक व्याप्त हैं। ये कविताएँ तमाम विद्रूपताओं के बीच फूटने जा रही रूलाई को रोक लेने का जनपक्षधर सरोकार है ताकि मजबूती का विश्वास बचा रहे।

स्मिता की कविता हवा, पानी, भाषा के अमानवीय बंटवारों के बीच थर्रा रही धरती को न सिर्फ थामने बल्कि उस पर चमकीली मुस्कान चस्पा करने की जरूरी कोशिश है। कवयित्री जानती है कि नक्शे विसंगतियां छुपा लेते हैं लेकिन फिर भी उन बचे हुए दृश्यों को संजो लेना चाहती है जो प्रकृति के उपादानों नदी, बादल, हवा, तितली, मछली, कौए, कबूतर और बिल्ली के बच्चे द्वारा रचे गए हैं।

स्मिता सिन्हा की ये कविताएँ जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज है जहाँ अपनी सारी उदासी को तितलियों के चटख पंखों के नीचे छोड़ने की प्रतिज्ञा है, नष्ट होती जा रही सृष्टि को बचाने के लिए ढाई आखर ‘प्रेम’ लिखने की प्रतिश्रुति है और नदी के लिए लम्बी उम्र की मार्मिक प्रार्थना है क्योंकि उसी के साथ मछली की उम्र भी बंधी हुई है।

 

 

 

स्मिता सिन्हा की कविताएँ

1. दर्द

एक सुबह जैसे ही आँखें खुलीं
बलकनी में रखे गत्ते के डब्बे पर बैठी
एक चिड़िया गा रही थी
उसके गाने में दर्द था
निर्वासन, भूख-प्यास और उसकी उड़ान थी

उसे सुनती हुई
अपने दर्द को महसूस कर रही थी
पर गा न सकी…
घर का आँगन तो कब का छूट चुका था
बाग-बगीचे उजड़ चुके थे
गाँव की पगडंडियों पर चले बरसों बीत गए

बहुमंजिली इमारतों में दस बाय बारह का कमरा
जिसमें रोशनी और हवा के लिए कुछ होल्स हैं
उनसे होकर जहरीली हवा और
यूवी किरणें प्रवेश करती हैं
मैं सभी होल्स बंद कर लेती हूँ
और यह कमरा…
मेरे लिए गत्ते का डब्बा बन जाता है

 

2. लोकतंत्र

हम कुछ नहीं करते
सिवाय उन गलियारों में झांकने के
तमाम अधूरे प्रश्नों के बदले
सिर्फ एक पूरे प्रश्न का उत्तर
ढूँढने के बजाय
हम निकल जाते हैं
सिर झुकाए थके कदमों के साथ
उन चौखटों के बाहर
हम कुछ नहीं करते
जब हमारे कई जरूरी सवालों के सामने
वे खड़े करते जाते हैं
जाने कितने गैरजरूरी सवाल
और हम उनमें ही उलझ कर रह जाते हैं
हम तब भी कुछ नहीं करते
जब वे हमारे मुँह पर ही पलट देते हैं आईना
और खुद नकाब पहन निकल जाते हैं
लगातार करते जाते हैं वे खारिज
हमारी माँगें, धरने
भूख, विवशता और सपने
और अपने किये वो तमाम वादे
हम तब भी कुछ नहीं करते
सिवाय चैक-चैराहों पर ठुंसी-सी पड़ी
उस भीड़ का हिस्सा बनने के
बेवजह के चिंतन और विमर्शों के साथ
इन अनियमितताओं के साथ संतुलन बनाने के
हम कुछ भी नहीं करते
जबकि हम
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं।

 

3.नमक

मैंने देखे हैं
उदासी से होने वाले
बड़े-बड़े खतरे
इसीलिए डरती हूँ
उदास होने से
डरती हूँ जब गाती है
वो नीली आँखों वाली चिड़िया
सन्नाटे का गीत
सारी-सारी रात
उस सूखे हुए दरख्त पर बैठे हुए
ताकते हुए आकाश

उदास तो वो
आले पर रखा हुआ दिया भी है
जिसमें रोज जलती है
उम्मीद की लौ
उदास तो वो चूल्हा भी है
जिसके पास बच जाती है
बस थोड़ी-सी ठंडी राख
वो हरी कोमल दूब भी उदास होती है न
जब लाख कोशिशों के बावजूद
संभाल नहीं पाती
ओस की एक अकेली बूँद
वो नदी भी
जिसमें होती है
सागर जितनी प्यास

मैंने देखा एक मन को उदास होते हुए
देखी शिद्दत से सहेजी
उसकी सारी नमी को बह जाते हुए
होठों ने भी चखी उदासी
और कहा
नमक-सी तासीर है इसकी
बस उसी दिन से डरती हूँ मैं
छिपा देती हूँ
अपनी पीठ के पीछे
नमक के बड़े-बड़े पहाड़
हाँ, डरती हूँ
क्योंकि मैंने भी सुन रखा है
नमक की क्रांति के बारे में …।

 

4.विश्वास

उस दिन कितने विश्वास से
पूछा था तुमने
‘माँ, तुम सबसे ज्यादा मजबूत हो न!
तुम तो कभी नहीं रो सकती।’
और
मैं बस मुस्कुरा कर रह गई
तुम्हें पता है
उस दिन
उसी वक्त
मैंने छुपाई थीं
कुछ बूँदें
जो आँखों की कोर से
छलक पड़े थे
हो तो यह भी सकता था
कि मैं रोती तुम्हारे सामने
फूट-फूटकर
समझती तुम्हें कि
रोने का मतलब
कमज़ोर होना नहीं
पर मैं चुप रही
तुम्हारा विश्वास बचाना
जरूरी लगा था मुझे
उस दिन….।

 

5. छूटना एक शहर का

छूटना
रिक्त होना होता है
शून्य तक
उन धुंधलाती स्मृतियों में…

छूटना
सहेजना होता है
पिछली सारी
चमकती सुबहों को
ढलती शामों को…

छूटना
इकट्ठा करना होता है
सारे दस्तावेज
उन तमाम बिखरे
विस्मृत अवशेषों में…

छूटना
गिनना होता है
पुराने रास्तों पर
चल चुके
सारे कदमों को…

छूटना
बढ़ना होता है
फिर से
अपनी मंजिल की ओर

छूटना
शुरू करना होता है
एक नया सफर
नए सपनों के साथ…

छूटना
छोड़ना होता है
एक शहर को
या कि
तुम्हारा छूट जाना
वहीं उसी शहर में।

 

6. चीखो, बस चीखो

चीखो
कि हर कोई चीख रहा है
चीखो
कि मौन मर रहा है
चीखो
कि अब कोई और विकल्प नहीं
चीखो
कि अब चीख ही मुखरित है यहाँ
चीखो
कि सब बहरे हैं
चीखो
कि चीखना ही सही है
चीखो
बस चीखो
लेकिन कुछ ऐसे
कि तुम्हारी चीख ही
हो अंतिम
इस शोर में….।

 

7. थोड़ी-सी ज़िंदगी

मेरे बच्चे
तुम कामयाब बन रहे हो
लेकिन तुम वो नहीं देख पा रहे
जो मैं देख रही हूँ
मैं देख रही हूँ
तुम्हारी पीठ पीछे
एक सरकता जीवन
किताबों के बोझ से झुके
तुम्हारे कंधे
फीकी पड़ती तुम्हारी हँसी
धीरे-धीरे तुम्हारा
कुम्हलाता चेहरा
मैं उदास रहती हूँ आजकल
नहीं समझ पा रही कि
कहाँ गलत हो गई मैं
महसूसती हूँ अक्सर
आसपास उलझता-सा
छूटता-सा कुछ
अभी जब व्यस्त होगे तुम
लिखने में
पढ़ने में
समझने में दुनिया को
एक नए सिरे से
ठीक इसी समय
मैं देख रही हूँ
तुमसे छूट गई उस दुनिया को
जिसका होना बेहद जरूरी है
इस मुश्किल वक्त में

मैं चाहती हूँ
छीन लूँ तुमसे
ये किताबें और कलम
क्योंकि इनसे आती नहीं
भाषा की तमीज
भावनाओं की कोमलता
मैं चाहती हूँ
छोड़ आऊँ तुम्हें
उन लहलहाती फसलों के बीच
तुम खूब दौड़ो
उन पगडंडियों पर
गिरो, बार-बार गिरो
फिर संभलों खुद ही
तुम पकड़ो उन रंगबिरंगी तितलियों को
और कभी छुप जाओ
झरबेरियों की ओट में
तुम ढूँढो खट्टे-मीठे बेर
और उलझ-उलझ जाओ
पतंगों की डोर से
मैं चाहती हूँ कि
तुम जानो कि
क्या होते हैं
ये परब, परिवार
ये मेड़, निवाड़
मैं चाहती हूँ कि
तुम जानो कि
हम सब से कहीं ज्यादा
सभ्य होते हैं
ये गाँव के गँवार

मैं चाहती हूँ कि
तुम बारिश में भींग कर
लौटो मेरे पास
मिट्टी में सने हों
तुम्हारे कपड़े
और ढेर सारे
सूरजमुखी के फूल हों
तुम्हारे हाथों में
मैं चाहती हूँ कि
तुम लौटो अपने
खिलखिलाते बचपन के साथ
हाँ, मेरे बच्चे
मैं नहीं चाहती कि
तुम बनो सिर्फ एक कामयाब इंसान
मैं तो बस चाहती हूँ
तुममें बची रहे
थोड़ी-सी ज़िंदगी भी….।

 

8. दरवेश

बोलो न दरवेश
ऐसा क्यों है कि
वह एक समवेत मौन नाद
सिर्फ मुझे ही सुनाई देता है
जिसमें जाने कितने ही जन्मों का विस्तार है
जाने कितने जन्मों का संगीत
जो धीरे-धीरे घुलता जाता है
मेरी शिराओं में
और अनावृत होती जाती हूँ मैं
अपनी आत्मा तक
कुछ भी तो अकथ्य नहीं रह जाता
कुछ भी अनछुआ नहीं हमारे बीच

बोलो न
कि ऐसा क्यों
कि इस विपरीत समय के शोरगुल में भी
मैं सो जाती हूँ बेसुध
तुम्हारी पीठ पर टेक लगाकर
कि जाने कितने सफ़र की थकान है
मेरे जिस्म में

जानते हो
वो जो कुछ भी अनिश्चित है हमारे बीच
वो जो कुछ भी अलक्षित
वही, बस वही बाँधता है मुझे तुमसे
जैसे मछली की उम्र बँधी होती है
नदी के साथ….।

 

9. शतावरी

उसने प्रेम चुना और प्रतिकार भी
मौन सदैव उसके अनुराग की अभ्यर्थना रहा
और हृदय का स्पंदन
मानो बांसुरी से निकलने वाली स्वर लहरियां
उस प्रगल्भ रात्रि में
जब उसकी आँखों से बहती रही शतावरी
और दूर सुमेरू पर चमकता रहा एक पूरा चाँद
वह बेतहाशा चूमती रही पारिजात के पुष्पों को
और स्वतः आलोकित होती रही
अपनी देह के विदेह होने तक
वह नमक की लड़की थी
अपनी देह के नमक में घुलती रही
एकसार होने तक…..।

 

10. मंजरा

तुमने कहा नदी
मैं खिलखिलाकर हँस पड़ी
तुमने कहा हवा
मैंने बादलों पर फैला दिये
अपने दोनों हाथ
तुमने कहा सपने
मैं तितलियों से मांग लाई
कुछ चटख, सुर्ख़ रंग
तुमने कहा आकाश!
मैंने मुस्कुराते हुए तुम्हारा नाम लिया
तुमने कहा विदा!
और मरती चली गई मेरी आँखों में
तुम्हारी सबसे प्रिय वह सुरमई मछली

समझने वाली बात है कि
मेरी आँखों में अब भी उतरती है वहीं संाझ
मेरी आँखों में अब भी जलती है वही आग
उस काले कौए की आँखें
और भी काली-काली हुई जाती है
झुलसते जाते हैं कबूतरों के पर
बिल्ली का एक बच्चा भागता है
डर कर इधर से उधर
फाख्ता कूँ-कूँ करती
उड़ती चली जाती है कहीं दूर
और एक हरियाया दरख़्त जल कर
ठूँठ हुआ चला जाता है

समझने वाली बात है कि
अब भी हर रोज फूटती है
मेरी देह से एक नदी
अब भी हर रोज़
मैं खिलखिलाकर हँसती हूँ।

 

11. उपसंहार

वह मरना चाहती थी
एंगेल्स की किताब होकर
चाहती थी कि
जब मरे तो
एक बार फिर से मर जाए उसका शहर

वह बरमूडा ट्राइंगल के एकांत में
अपना सबसे पसंदीदा गीत गुनगुनाते हुए
(मेरी जां! मुझे जां न कहो मेरी जां!!)
अपने प्रेमी की बाँहों में
मर जाना चाहती थी

वह कई आसमानों के दर्द को महसूसते हुए
हवा, पानी, धूप होकर…
या दूर क्षितिज से अपने पंखों को टकराकर
मर जाना चाहती थी!

वह चाहती थी
किसी मिट्टी की भभकती आग होकर राख होना
किसी बंदूक की गोली-सी होकर
खत्म होना था उसे

वह चाहती थी
टेफलास की लाल दीवारें होना…
पूर्वांचल में उड़ते सिगरेट के धुएँ की धुंध में
मरना था उसे!

एक ही उम्र में जाने कितनी बार
मरना चाहा था उसने
और एक हड़बड़ाहट में
पूरी उम्र निकल गई हो जैसे

उसे समझ नहीं आया कि
कैसे मरे वह
सियासत के मुँह पर पड़े
उस थप्पड़-सी होकर
या कि
अपने महबूब के चुम्बनों से पिघलकर…

सो एक दिन वह मर गई
अपने ही सपनों में आकर
और यह भी उसका भ्रम निकला कि
उसके हँसने से हँसती है दुनिया
उसके मरने से मर जाएगी!!

 

12. कुछ नहीं बदलता

उस रोज़ देखा मैंने
तुम्हें खुद को धोते
पोंछते, चमकाते
करीने से सजाते हुए
कितने व्यस्त थे तुम
खुद को बचाने में
जबकि तुम्हें बचाना था
अपने वक़्त की
कई-कई नस्लों को
कुछ नहीं बदलता
अगर तुम रहने देते
अपनी कमीज पर
काले गहराते खून के धब्बे
और सहेजते बाकी बचे
खून को बहने से
लेकिन कलफ़ लगी
झक्क सफेद कमीज पहनना
जरूरी लगा तुम्हें
कुछ नहीं बदलता
अगर तुम रूकते थोड़ी देर
और सिखाते उन कदमों को
चलने की तमीज
लेकिन जूतों का नाप लेना
ज्यादा जरूरी था तुम्हारे लिए

तुम्हें पता है
जब तुम कर रहे थे
अपनी- अपनी शक्लों की लीपापोती
ठीक उसी वक़्त
गहरे तक खरोंची जा रही थी
कहीं इंसानियत
हैवानियत उफान पर थी
देखो तो जरा
खून में लिपटे
उन ठंडी पड़ी गोश्त के टुकड़े
तुम्हारे नाखून में तो
फँसे नहीं पड़े हैं
जाओ धो डालो इन्हें भी
समय रहते ही
बेहद ताजे व जिंदा सबूत हैं
ये तुम्हारे खिलाफ़
बोल उठेंगे कभी भी….।

 

13. पिता का मन

मैं लिख देती हूँ
अपने घर की नींव
घर की ऊँची छत
और सारी मजबूत दीवारें
अपनी गली, अपना मोहल्ला
और अपने घर का पता

मैं लिख देती हूँ
चूल्हे में धधकती आँच
पकती रोटियाँ
और तृप्त होती भूख

मैं लिख देती हूँ
एक सुकून भरी नींद
और कुछ मीठे सपने

मैं लिख देती हूँ
आँगन का वो विशाल दरख्त
और पत्ती-पत्ती छाँव
मैं लिख देती हूँ
सागर, धरती, आकाश
और पहाड़-सा एक जीवन
बस नहीं लिख पाती तो

चेहरे की कुछ झुर्रियाँ
खुरदुरी हथेलियां
और थकते लड़खड़ाते कदम
हों  कभी भी नहीं लिख पाती मैं
अपने पिता का मन……।

 

(कवयित्री  स्मिता सिन्हा, जन्मः 30 दिसम्बर 1977, पटना (बिहार), शिक्षाः भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली से पत्रकारिता और पटना से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर। सृजनः एक काव्य संग्रह ‘बोलो न दरवेश’ प्रकाश्य। देश भर की पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, लेख प्रकाशित। पुरस्कारः हिन्दी अकादमी नईदिल्ली द्वारा युवा पुरस्कार।

संप्रतिः स्वतंत्र पत्रकारिता एवं रचनात्मक लेखन।

ई-मेलः [email protected]

टिप्पणीकार निरंजन श्रोत्रिय ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ से सम्मानित प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक , निबंधकार और कहानीकार हैं. साहित्य संस्कृति की मासिक पत्रिका  ‘समावर्तन ‘ के संपादक . युवा कविता के पाँच संचयनों  ‘युवा द्वादश’ का संपादन  और वर्तमान में वनस्पति विभाग, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गुना में प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष ।

संपर्क: [email protected])

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