समकालीन जनमत
कविता

मनुज देपावत भारतीय कविता परम्परा का कम पहचाना गया बेहद ज़रूरी नाम है

सतीश छिम्पा


 

कवि मनुज देपावत हिंदी और राजस्थानी के ही नहीं बल्कि भारतीय भाषाओं के क्रांतिकारी कवि और गीतकार थे। विप्लव के इस कवि का जन्म कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी सन 1923 को तत्कालीन बीकानेर रियासत के देशनोक गांव में हुआ था। इनका मूल नाम मालदान देपावत था।

रचनाकार के रूप में मनुज देपावत के नाम से विख्यात हुए। इनके पिता डिंगल के ख्याति प्राप्त कवि कानदान देपावत थे। मनुज की विद्यालय समय की शुरुआती कविता की पृथ्वी थिएटर के संस्थापक पृथ्वीराज कपूर ने सराहना की थी। उनमें बहुमुखी प्रतिभा थी।

मनुज अंबालाल माथुर के साथ बीकानेर के साप्ताहिक ‘लोकमत’ के सह सम्पादक थे। श्री करणी मण्डल देशनोक के संस्थापक सदस्य थे। ‘ललकार’, ‘नयी चेतना’ तथा अन्य पत्र-पत्रिकाओं के सुकवि एवं लेखक रहे। उनके निधन के बाद उनकी क्रांतिकारी कविताओं व गीतों का संग्रह ‘विप्लव गान’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया।

मनुज देपावत सन 1952 में मात्र 29 बरस की उम्र में देशनोक व बीकानेर के बीच घटित हुई रेल दुर्घटना में चल बसे।

वर्ग संघर्ष का जो तेवर उनकी कविताओं में मिलता है- वह उस दौर में अन्यत्र कम ही देखने को मिलता है। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम वर्षों में सक्रिय भी रहे।

मनुज देपावत का समय उथल- पुथल भरा था। एक तरफ हैदराबाद रियासत के निजाम के विरुद्ध (जो निजाम के मार्फ़त और बाद में सीधा भारतीय नवजात पूंजीवाद के विरुद्ध लड़ा गया।) दूसरी तरफ़ स्वतंत्रता के लिए उठी अभावग्रस्त और शोषित जनता में प्रचंड आक्रोश का दावानल उठाया हुआ था- तो बीकानेर रियासत की रियासती लूट और साथ ही रियासत के उत्तर पश्चिम सीमांत पर तेजा सिंह सुतंतर और लाल कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में उठी हुई थी पेपसू की खेत मज़दूर या कहें मुजारा हथियारबंद लहर और इस कवि मनुज ने लिखी थी मनुष्य को जगाने की कविता और महासमर के महान गीत। इसी कारण वे ‘विप्लव के कवि’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

बहुत ही कम उम्र जीने वाले इस महान कवि- गीतकार के हिस्से बहुत कम वक़्त आया था। जिसमें महान सृजन तो इन्होंने किया ही- कई महान काम भी किए। राजस्थानी भाषा का पहला अखबार जोधपुर से जयनारायण व्यास ने प्रकाशित किया था। नाम था ‘आगीवाण’ जिसे अक्सर हिंदी के लोग ‘अग्निबाण’ लिखते हैं के संपादक मनुज थे और जिसके माध्यम से उन्होंने भारत विभाजन के बाद एकीकरण के दौरान जोधपुर, जैसलमेर, जूनागढ़ आदि कुछ रियासतों के पाकिस्तान में शामिल (दरअसल शामिल नही होना चाहते थे बल्कि तिब्बत की तरह बफर स्टेट के रूप में होना चाहते थे।) होने के स्कूप का पहली बार भांडाफोड़ किया तो ‘धोरां वाळा देस जाग रे’ गीत के माध्यम से संघर्ष में शामिल होने के लिए लोक का आह्वान भी किया।

मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय में प्रतिरोध की मार्क्सवादी अवधारणा को कविता में ढाल कर मुक्ति के गीत गाया करते थे जिसे कविता की मुख्य धारा से अलग ही रखा गया था।

मनुज ने मानव समूह, समाज या वर्ग में आर्थिक, जातीय और वर्गीय और शोषण और कुपोषण, जबर जुल्म, अन्याय के विरुद्ध जन का आह्वान करने वाली कविता लिखी जिसमे वर्ग विभेद, पक्षधरता और इंकलाब या मुक्ति का दर्शन है। हिंदी में जिस तरह शलभ श्रीराम सिंह को इंकलाबी कवि माना जाता है उसी तरह मनुज देपावत को भी विप्लव का कवि कहा जाता है।

मनुज देपावत की कविताओं में पक्षधरता का बहुत उच्च रूप उभरकर सामने आता है। उनकी कविताओं में जीवन अपनी संपूर्ण उज्ज्वलता और गरिमा के साथ स्थापित होता है। जहां ‘हर हाथ को काम और हर पेट को रोटी’ अहसान की तरह नहीं बल्कि अधिकार के रूप में स्थापित होती है। वे लोक के संघर्ष को महान मानते हैं। उनकी कविताएं देखें तो पता चलता है कि मनुज इस संघर्ष को किस रूप में देखते हैं। यथा :-

“तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं, वह मेरा जीवन अवलंबन !

जहाँ श्वास की हर सिहरन में, आहों के अम्बार सुलगते !
जहाँ प्राण की प्रति धड़कन में, उमस भरे अरमान बिलखते !
जहाँ लुटी हसरतें ह्रदय की, जीवन के मध्यान्ह प्रहार में !
जहाँ विकल मिट्टी का मानव, बिक जाता है पुतलीघर में !
भटक चले भावों के पंछी, भव रौरव में पाठ बिसार कर !
जहाँ ज़िंदगी साँस ल़े रही महामृत्यु के विकट द्वार पर !
वहाँ प्राण विद्रोही बनकर, विप्लव की झंकार करेंगे !

भाषाई रूप से जनवादी लोक-संस्कृति लोक की वह संपत्ति है जो परिवर्तनगत तत्वों के बीच भी मूल्यगत स्थायित्व को बनाए रखते हैं। समाज में भाषा का सबसे अधिक विकसित और परिष्कृत रूप लौकिक देहात और अशिक्षित जन समूह के बीच से इसी कारण उठकर आता है।

मैं विप्लव का कवि हूँ ! मेरे गीत चिरंतन ।

आज विकट कापालिक बनकर !
महाप्रलय के शंखनाद से मरघट के सोए मुर्दों को जगा रहा हूँ !
जगा रहा हूँ अभिनव की वह ज्वाल निरंतर,
जलकर जिसमें स्वयं भस्म हो जाय पुरातन !

लोक के बीच ही कविता और भाषा का सहज, सरल और वैज्ञानिक विकास इन्हीं के बीच मे कहीं संबोधित होता है। राजस्थान में आलोचक अक्सर मनुज देपावत के साहित्यिक योगदान पर ध्यान नहीं देते हैं जबकि ये भारतीय भाषाओं में उस समय लिखी जा रही कविताओं जिनमें स्वतंत्रता की चेतना के साथ साथ प्रगतिशील मूल्य भी पूरी मज़बूती से मुखर हो रहे थे उनमें अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।

सरोज दत्त, जगमोहन जोशी चेराबंडा राजू, वरवर राव, श्री श्री, शलभ श्री राम सिंह, पाश, संतराम उदासी, नामदेव ढसाल, रेवंतदान चारण, नागार्जुन और धूमिल आदि की समृद्ध परंपरा के पूर्वज कवि हैं मनुज देपावत।

मनुज देपावत की कविताएँ अपने मार्क्सवादी दर्शन को साथ लेकर आती हैं। वे राजस्थानी साहित्य के पहले प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि थे। उन्हें याद करना, प्रकाश में लाना कविता की परंपरा के कुछ बेहद महत्वपूर्ण और अनचीन्हे पहलुओं को प्रकाश में लाना है।

रै उठो किसानां मज़दूरां
थे उंटा कस ल्यो आज जीन
इं नफा खोर अन्याय नै
कर दयो कोडी रा तीन तीन

 

मनुज देपावत की कविताएँ

1.
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

नभ में घिरती मेघ-मालिका,
पनघट-पथ पर विरह गीत जब गाती कोई कृषक बालिका !
तब मैं भी अपने भावों के पिंजर खोल उड़ाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

जब सावन की रिमझिम बूँदें,
आती है हरिताभ धरा पर, गीति है पलकों को मूंदे !
धूमिल मेघों में तब मैं पदचाप किसी की सुन पाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

आँधी में उड़ जाता है मन,
पथिक-पिया के विरह-गीत से गुंजित होते शैल-शिखर-वन !
अपने गीतों की पंखुड़ियाँ, अन्तरिक्ष में छितराता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

चंदा के दर्पण में आकर,
निशा झाँकती है निज यौवन तारों का शृंगार सजाकर !
तब छंदों में बाँध गगन से, स्वप्न-कुमारों को लाता हूँ !
आ बतलाऊँ क्यों गाता हूँ ?

2.
आज जीवन गीत बनने जा रहा है !
ज़िंदगी के इस जलधि में ज्वार फिर से आ रहा है !

छा गई थी मौन पतझड़ की उदासी ,
गान जब से बन गए मेरे प्रवासी !
आज उनको मुरलिका में पुनः कोई गा रहा है !
आज जीवन गीत बनने जा रहा है !

भग्न -वीणा पर बजाए हैं किसी ने !
टूटते से स्वर सजाए हैं किसी ने !
आज उखड़ा श्वास भी संगीत बनने जा रहा है !
आज जीवन गीत बनने जा रहा है !

चिर समय से अपरिचित था रहा कोई !
याद विस्मृति के उदर में रही सोई !
कल रहा अनजान जो, अब मीत बनने जा रहा है !
आज जीवन गीत बनने जा रहा है !

मिल रहे हैं आधार मधु की यामिनी में !
खिल रहा है चाँद उज्जवल चाँदनी में.
चिर विरह भी मधु-मिलन की प्रीत बनने जा रहा है !
आज जीवन गीत बनने जा रहा है !

3.
मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूंगा !

सिकुड़ती परछाइयाँ, धूमिल-मलिन गोधूलि-बेला !
डगर पर भयभीत पग धर चल रहा हूँ मैं अकेला !
ज़िंदगी की साँझ में मधु-दिवस का यह गान कैसा ?
मोह-बंधन-मुक्त मन पर स्नेह-तंतु-वितान कैसा ?

मरण-बेला में मिलन-संगीत लेकर क्या करूँगा ?
मैं किसी आकुल-ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा !

सुखद सपनों से विनिर्मित, है न ये संसार मेरा !
प्रबल झंझा झकोरों में, पला है यह प्यार मेरा !
मैं जगत की वँचना के बोल कितने सह चुका हूँ !
छल प्रपँचों की तरणि की धार में मैं बह चुका हूँ !

पुनः मन का वह प्रवंचक मीत लेकर क्या करूँगा !
मैं किसी आकुल ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा !

आज टूटे हैं युगों की, शृँखला के बंध मेरे !
गगन में गतिमान होकर, गा रहे हैं छंद मेरे !
फिर भला यह बंधनों का भार लेकर क्या करूँ मैं !
प्यार की यह मदभरी मनुहार लेकर क्या करूँ मैं !

हार हो जिसमें निहित, वह जीत लेकर क्या करूँगा !
मैं किसी आकुल-ह्रदय की प्रीत लेकर क्या करूँगा !

4.
शोषक रे अविचल !

शोषक रे अविचल !
अजेय! गर्वोन्नत प्रतिपल !
लख तेरा आतंक त्रसित हो रहा धरातल !

भार-वाहिनी धरा ,
किन्तु तुमको ले लज्जित !
अरे नरक के कीट!, वासना-पंक-निमज्जित!

मृत मानवता के अधरों पर ,
मृत्यु-झाग से !
वसुंधरा पर कौन पड़े, तुम शेष नाग से !

वसुधा के वपु पर रे !
कलुष दाग तुम निश्चल !
शोषक रे ! दुर्दांत-दस्यु !, गर्वोन्नत प्रतिपल !

5.
तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं, वह मेरा जीवन अवलंबन !

जहाँ श्वास की हर सिहरन में, आहों के अम्बार सुलगते !
जहाँ प्राण की प्रति धड़कन में, उमस भरे अरमान बिलखते !
जहाँ लुटी हसरतें ह्रदय की, जीवन के मध्यान्ह प्रहार में !
जहाँ विकल मिट्टी का मानव, बिक जाता है पुतलीघर में !
भटक चले भावों के पंछी, भव रौरव में पाठ बिसार कर !
जहाँ ज़िंदगी साँस ल़े रही महामृत्यु के विकट द्वार पर !
वहाँ प्राण विद्रोही बनकर, विप्लव की झंकार करेंगे !
और सभ्यता के शोषण के सत्यानाशी ढूह गिरेंगे !
मुक्त बनेगा मन का पंछी तोड़ काट कारा के बंधन !
तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं, वह मेरा जीवन अवलंबन !

तुम कहते संतोष शांति का, महा-मूल-मन्त्र अपना लूँ !
जीवन को निस्सार समझकर, ईश्वर को आधार बना लूँ !
पर शोषण का बोझ संभाले आज देख वह कौन रो रहा !
धर्म कर्म की खा अफ़ीम वह प्रभु मंदिर में पड़ा सो रहा !
कायर रूढ़िवाद का क़ैदी, क्या उसको इंसान समझ लूँ !
परिवर्तन -पथ का वह पत्थर, क्या उसको भगवान् समझ लूँ !
मानव खुद अपना ईश्वर है, साहस उसका भाग्य विधाता!
प्राणों में प्रतिशोध जगाकर, वह परिवर्तन का युग लाता !
हम विप्लव का शंख फूँकते, शत-सहस्त्र भूखे नंगे तन !
तुम कहते संघर्ष कुछ नहीं, वह मेरा जीवन अवलंबन !

6.
मैं विप्लव का कवि हूँ ! मेरे गीत चिरंतन ।

मेरी छंदबद्ध वाणी में नहीं किसी कृष्णाभिसारिका के आकुल अंतर की धड़कन;
अरे, किसी जनपद कल्याणी के नूपुर के रुनझुन स्वर पर मुग्ध नहीं है मेरा गायन !

मैं विप्लव का कवि हूँ ! मेरे गीत चिरंतन ।

मैं न कभी नीरव रजनी के अँचल में छुपकर रोता हूँ;
आँसू के जल से अतीत के धुँधले चित्र नहीं धोता हूँ;
चित्रित करता हूँ समाज के शोषण का वह शोणित प्लावन ।

मैं विप्लव का कवि हूँ ! मेरे गीत चिरंतन ।

आज विकट कापालिक बनकर !
महाप्रलय के शंखनाद से मरघट के सोए मुर्दों को जगा रहा हूँ !
जगा रहा हूँ अभिनव की वह ज्वाल निरंतर,
जलकर जिसमें स्वयं भस्म हो जाय पुरातन !

मैं विप्लव का कवि हूँ ! मेरे गीत चिरंतन ।

7.
लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो

अम्बर के नीलम प्याले में ढली रात मानिक मदिरा-सी
कर जग को बेहोश चाँदनी बिखर गई मदमस्त सुरा-सी
तुमने उस मादक मस्ती के मधुमय गीत बहुत लिख डाले
किन्तु कभी क्या देखे तुमने वसुंधरा के उर के छाले
तुम इन पीप भरे छालों में रस का अनुसन्धान कर रहे
मौत यहाँ पर नाच रही तुम परियों का आव्हान कर रहे
तुम निज सपनों की साकी से फेनिल मधु का पान माँगते
माँग रही बलिदान धरित्री तुम जीवन वरदान माँगते
तुम वसुधा के रिक्त पात्र में मत विष तिक्त हलाहल डालो

लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो

नीरद के निर्मल पंखो पर सपनों का संसार बसाते
तुम सतरंगी इन्द्रधनुष पर निज भावों के सुमन सजाते
सिसक रही है धरती नीचे तुम तारों का हास लिख रहे
तुम पतझड़ की साँय-साँय में फूलों का मधुमास लिख रहे
किन्तु लेखनी काँप उठेगी जब नर की चीत्कार सुनोगे
नारी के बुझते अंतर की जब तुम करुण पुकार सुनोगे
देखो वह शैशव पिसता है शोषण के तीखे आरों में
देखो वह यौवन बिकता है गली-गली में बाज़ारों में
अतः कल्पना मेघ परी को तुम धरती के पास बुला लो

लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो

जीर्ण पुरातन के विध्वंसक तुम नवीन युग के सृष्टा हो
सदियों के पथ विचलित मानव के अपूर्व तुम पथ द्रष्टा हो
तुम विलासिता के इस गायक कवि को थपकी मार सुला दो
चिर निद्रित मन के मानव को कवि तुम कोड़े मार जगा दो
जिससे वह नव जाग्रत मानव अन्यायों की नींव हिला दे ,
भू लुंठित इन खंडहरों पर मानवता के भवन बना दे
जीवन का अभिशाप एक हो जीवन का वरदान एक हो
धर्म एक ईमान एक हो मानव का वरदान एक हो
तुम समता के सुमधुर स्वर पर विप्लव का आव्हान बुला लो

लोहित मसि में कलम डुबाकर कवि तुम प्रलय छंद लिख डालो

8.
राज्य -लिप्सा के नशे में, विहँसता है आज दानव !
दासता के पात में जो, पिस रहा है आज मानव !
आज उसकी आह से धन की हवेली हिल रही है !
आज होली जल रही है !

स्वर्ण सत्ता के सहारे , नग्न होकर नाचता नर !
शक्तिशाली दीन-शोणित पी रहा है पेट भर भर !
आज पृथ्वी पर पिशाचों की ठिठोली चल रही है !
आज होली जल रही है !

आज अबला नारियों की, लाज लुटती जा रही है !
चक्षु में चिंगारियों की ज्वाल जुटती जा रही है !
दलित-जीवन-पात्र में अब हिंस्र होली ढल रही है !
आज होली जल रही है !

सृष्टि में शीतल सुमन भी खिल सकेंगे आज कैसे !
स्वार्थ से उन्मत्त मानव, मिल सकेंगे आज कैसे !
रक्त शोषण की भयंकर भावना जो पल रही है !
आज होली जल रही है !

 

 

(टिप्पणीकार सतीश छिम्पा

जन्म- 14 नवंबर 1988 ई. (मम्मड़ खेड़ा, जिला सिरसा, हरियाणा)

प्रकाशन – विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में कहानी, कविता और आलेख, समीक्षा और साक्षात्कार प्रकाशित

मोबाइल 7378338065
Email :- [email protected]

संपर्क
सतीश छिम्पा
त्रिमूर्ति मंदिर के पीछे
सूरतगढ़ (राज.)
पिन- 335804)

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