Sunday, January 16, 2022
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बृजराज सिंह की कविता आधे के इनकार की कविता है

यूँ तो कविता का काम बहुधा व्यंजना से चलता है पर कविता को अभिधा से भी बहुत परहेज नहीं रहा है.

आधुनिक कविता के लिए तो सपाटबयानी को मूल्य की तरह ही बरता गया है. जैसे-जैसे समाज में राजनीतिक चेतना का विस्तार होता गया है उसी अनुपात में कथन और कथन की भंगिमा का महत्त्व कविता में बढ़ता गया है.

एक और बात जो हुई है वह यह कि समाज के भीतर छल-छद्म का व्यापार लगातार बढ़ता गया है, तब झूठ और प्रपंच के इस खेल का भंडाफोड़ करने के लिए कविता में व्यंजना से काम चल नहीं सकता.

यह समय आँख में आँख डालकर सच कहने का समय है.पाश की कविता ने मनुष्य की सपने देखने की ताकत को कभी पहचान कर कहा था कि सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना. देखे हुए सपने को पूरा करने का एक रास्ता भी था कि बीच का कोई रास्ता नहीं होता. हमने सपने देखना तो बंद नहीं किया पर बीच का रास्ता हमे लगातार आकर्षित करता रहा.

आजादी के बाद जिस लोकतांत्रिक चेतना और तार्किकता के विस्तार की पुरजोर कोशिश की जानी थी हमने उसके बदले आधे-अधूरे से संतोष करना जारी रखा. तब फासीवाद की पूर्व संध्या पर क्या हमें अपने ही देखे सपने और तय किए गए लक्ष्यों की फिर से समीक्षा नहीं करनी चाहिए?

युवा कवि बृजराज सिंह की कविताए इस बिंदु पर आत्मालोचना और ज़रूरी कार्यभारों को पूरा करने के लिए नई रणनीति की चिंता की कवितायेँ बन जाती है.
बृजराज सिंह का पहला संग्रह ‘सपने पूरे तो हो’ नाम से 2018 में प्रकाशित हुआ है.

मनुष्यता ने सपने देखना जारी ही रखा हुआ है पर थोड़ा ठहर कर यह देखने की भी तो जरूरत कभी हो सकती है कि जो सपने पहले देखे गए उनका हुआ क्या? ऐसे कितने सपने सिर्फ सपने रह गए और कितने हकीकत में भी रूपाकार ले सकें.

एक बेचैनी अपने ही देखे सपने को लेकर कि सपने सिर्फ खामखयाली ही बन कर तो नहीं रह गए? और एक जिद भी बृजराज की कविता में एक तरफ सपने हैं, इतिहास है, नदी, बारिश, सिगरेट पीती हुई लड़की, किसान, स्टेशन पर बच्चे और आजदी की चिंता है तो दूसरी तरह मानवीय सुख के सारे मंसूबों पर डाका डालने के लिए बैठा नाटकबाज अधिनायक है.

कविता में नायक और खलनायक की जो बायनरी साथ-साथ चलती है उसे अपने समय के बीच रखकर हम देखें तो पता चलेगा कि कई जगह कवि किसी बाहरी को कम स्वयं को ज्यादा संबोधित कर रहा होता है इसलिए कि उसे आधा-आधा कुछ नहीं चाहिए.

बृजराज सिंह की कविताएँ 

1. अधिनायक -एक

मेरे समय के लोगों का दावा है
कि वे वर्तमान के लोग हैं
क्योंकि उन्हें प्याज पसंद है

लेकिन उन्हें इसका ज़रा भी इल्म नहीं है
कि एक बहरूपिया कैसे
भविष्य के ख्वाब दिखाकर उन्हें
अतीत में धकेल देता है
और सभी कन्दमूल खोजने लगते हैं।

अधिनायक – दो

उसे इतिहास और उपहास में अन्तर नहीं पता
वह इतिहास का उपहास उड़ाता है
और उपहास को इतिहास समझ बैठता है

लेकिन उसे इस बात का इल्म ज़रूर है
कि आने वाली पीढियाँ उसका जिक्र
इतिहास में नहीं उपहास में करेंगी।

2. तानाशाह का डर ऐतिहासिक है

अधर्म को
सत्य का भय स्वाभाविक है
अनीति को
सत्य-मार्ग का डर अवश्यंभावी है
अंधकार को
ज्योति से ख़तरा निश्चित है
अन्याय को
विद्रोह का ख़ौफ़ लाज़िम है
जैसे
हिंसा को
शान्ति से
धर्म को
ज्ञान से
सत्ता को
विचार से
ख़तरा
नियत है

और
सत्य का भय
अनीति-प्रेरक है।

3. इतिहास
1
इतिहास में ईश्वर की स्थापना
मनुष्य के खिलाफ
धर्म का सबसे बड़ा षड़यंत्र है
2
कभी कभी इतिहास
अपने आपको
इस तरह भी दुहराता है कि
कोई अत्याचारी फिर फिर
फतह करता है दिल्ली
और कहता है
चलो दौलताबाद
3
इतिहास उनका भी होता है
जिनका वर्तमान है ही नहीं
भविष्य उनका भी होता है
जिनका इतिहास में कोई जिक्र नहीं
कभी कभी हाल पर वे हावी हो जाते हैं
जिनका न तो कोई इतिहास है, न भविष्य होगा।
4
इतिहास में रणछोड़ होना
जरासंध होने से बेहतर है
5
दुनिया की बर्बर और अत्याचारी शक्तियाँ
इतिहास के पन्नों में अपनी जगह रखनी चाहती हैं
लेकिन
नफरत का कोई इतिहास नहीं होता
कट्टरता इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होती
वर्तमान को रौंदने वाली शक्तियाँ
इतिहास में खो जाती हैं

जिनका इतिहास नहीं होता
उनका भविष्य भी नहीं होता
6
इतिहास में हमारा समय
झूठ और बेशर्म समय के रूप में जाना जाएगा
पूर्वजों की अदालत में मुजरिम बन
हम हाथ बांधे खड़े होंगे
हमसे पूछा जाएगा कि
हम इतिहास को नष्ट होता क्यों देखते रहे

4. नाटकबाज़
“वह इस सदी का सबसे बड़ा नाटककार है”
माफ़ कीजिएगा!
मुझसे थोड़ी भूल हो गयी
मैं नाटककार की जगह नाटकबाज़ शब्द का प्रयोग करना चाहूँगा
अब यह वाक्य कुछ इस तरह से पढ़ा जाना चाहिए
“वह इस सदी का सबसे बड़ा नाटकबाज़ है”

वह अपनी नित्य क्रियाएँ नाटक में ही करता है और
बहुत सारी क्रियाओं का सिर्फ नाटक करता है
यह बात सिर्फ उसे मालूम होती है कि
वह कब नाटक के भीतर रहता है,कब बाहर

जब भी बोलता है
अपने लिखे नाटकों के ही संवाद बोलता है
और उसकी सफलता इसी बात में है
कि लोग उसकी बातों को सही मान लेते हैं

सामूहिक हत्याएँ करना उसका पसंदीदा शगल है
और लोग हैं कि उसे नाटक समझ तालियाँ पीटते हैं
वह हाथ की सफाई भी जानता है
अपने खून से सने हाथों को लोगों के सामने कर देता है
और लोग हैं कि उसे चूमने लगते हैं
वह बड़ी ही सफाई से लोगों की हलख में हाथ डाल देता है
और लोग मुस्कराने लगते हैं
वह एक रस्सी फेंकता है आसमान में
और लोगों से मनवा लेता है कि वह स्वर्ग की सीढ़ी बना सकता है
उसने इन्हीं नाटकों के जरिए अपने लिए सफलता के मुकाम तय किए हैं

वह सभाओं में लोगों से गाँधी और अंबेडकर की बातें करता है
और कमरे में जाकर पेट पकड़ कर हँसता है
वह हर दिन नए तरीके से खुश होता है
जैसे कि आज उसने एक नाटककार को अपना कायल बना लिया
या जब उसके जमूरे उसके नाटकों का अभ्यास करते हैं
और उसे सदी का सबसे बड़ा नाटकबाज कहते हैं
यह सब उसके नाटक की कलाबाजियाँ हैं

आज हर तरफ उसकी नाटकबाजी के ही चर्चे हैं
दुनिया भर के तानाशाहों का वह मुरीद है
और देखिये उसकी नाटकबाजी
कि लोग उसे लोकतन्त्र का सिपाही कहने लगे हैं

5. ओ मेरे साथियों

दुनिया को सुन्दर बनाने वालों
मेहनत करने वालों
ओ मेरे साथियों
हिरनी के आँसुओ में नहाये तुम्हारे सारे गीत
बोझिल और रसहीन हो गए हैं

अपनी इन हथेलियों को बचा लो
घिस रही हैं इनकी रेखाएं
अपने इन हाथों को मुझे दे दो
ताकि मैं छुपा दूँ इन्हें
गमछे में बांधकर
भूसौल में
जहाँ रखता हूँ सपने
दूसरी और सुन्दर दुनिया के

6. मुझे आधा-आधा कुछ नहीं चाहिए

मुझे आधा-आधा कुछ नहीं चाहिए
आधे से मेरा काम नहीं चलता
आधी नींद, आधा स्वप्न
आधी दुनिया, आधा प्यार

जब सोता हूँ
पेट भर सो लेना चाहता हूँ
जब रोता हूँ
रो लेना चाहता हूँ पेट भर
आधा नहीं
जब-जब प्यार करता हूँ
मन भर कर लेता हूँ
आधा अधूरा नहीं

मुझे स्वप्न चाहिए पूरी पृथ्वी के
आधी दुनिया से मेरा काम नही चलता
मुझे चाहिए सम्पूर्ण जीवन
सभी रंगों का, श्याह के साथ सफ़ेद भी

इसीलिए कहता हूँ
जब मिलो
पूरा-पूरा मिलो मुझसे
अपने कोनों-अतरों के साथ
आधे से मेरा काम नही चलता
मुझे चाहिए पूरी की पूरी प्रकृति
पलास के साथ-साथ कपास भी
नदियाँ, पहाड़, झरने,रेत और कैक्टस भी

वसंत मैं लूँगा तो ग्रीष्म लेगा कौन?

7. आजादी

अब हमारी आजादी बूढ़ी हो चली है
इसने अपने साठ साल पूरे कर लिए
यह सठिया गयी है
इसके गाल पिचक गए
और बाल पक गए हैं
कितने तो सपने पूरे करने थे
पर इसने अपने हाथ खड़े कर दिये
इसकी सांस फूल रही है
इसके होने का कुछ मतलब था
अपने इस्तेमाल होने के बारे में यह कुछ नहीं कर सकी
गलत हाथों में पड़ने से इसे हमें ही रोकना था
हम नहीं कर पाये
इसके जन्म से ही
इसके होने का मतलब खोजते रहे
और यह बूढ़ी हो गयी

अब इसे बदलना होगा।

8. सपने पूरे तो हों…

कहो तो जेठ की नाचती दोपहरी में
चला जाऊँ खेत कोड़ने
कोड़ता रहूँ अनवरत
और कहो तो
कोड़ते-कोड़ते पहुँच जाऊँ
उसकी जड़ तक
जैसा सपने में देखता हूँ

यह मेरे लिए नया नहीं है
पर तुम कहो तो
पूस की अन्तहीन काली रात में
चला जाऊँ पानी बराने एक बार और
और बराते बराते ले आऊँ घर तक
जैसा सपने में देखता हूँ

कहो तो चला जाऊँ पहाड़ी के नीचे
ले आऊँ लाल फूलो के बिरवे
और रोप दूँ गांव शहर
जैसा सपने में देखता हूँ
देश को लाल चादर ओढ़े

तुम कहो तो
आज के बाद
मैं कोर्इ सपना नहीं देखूँगा
पर
जिन्हें देखा है
वे पूरे तो हों अभी

9. कविता की ताक़त

इतिहास में दर्ज है
कि आज से लगभग ढाई हज़ार साल पहले
एक राजनीतिज्ञ-दार्शनिक ने
अतिशय उत्साह में
राजा से
जनता को भावुक और संवेदनशील
शक्तिहीन और डरपोक
बनाने के जुर्म में
कवियों और लेखकों को
देश निकाला देने की माँग की

आज इतने सालों के बाद भी
फिर से
सत्ता का एक उत्साही प्रतिनिधि
जनता को निडर और शक्ति
देने के जुर्म में
अपने आका से इस आशय की
माँग करता है
कि उसे बुद्धिजीवियों-लेखकों
के संहार की छूट दे दी जाय
और इस पर
उसके आका की मौन सहमति है

ऐसा इसलिए नहीं कि
कविता प्रतिकार रचती है
इसलिए भी नहीं कि
कविता केवल सत्य कहती है
बल्कि इसलिए कि
कविता शक्ति देती है
साहस देती है
मनुष्यता के पक्ष में
लड़ने की ताक़त देती है

इसी से वे डरते हैं।

(कवि बृजराज सिंह, (उत्तर प्रदेश) जिले के एक छोटे से गाँव ख्यालगढ़ में 1983 में जन्म। इण्टरमीडिएट तक की पढ़ाई बाल्मीकि इंटर कॉलेज, बलुआ चंदौली से। बी0ए0, एम0ए0(हिन्दी) और पी.एच-डी (2009) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी से। 2012 से आगरा के दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट के हिन्दी विभाग में अध्यापन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायेँ एवं लेख प्रकाशित। हिन्दी के साथ साथ भोजपुरी में भी लेखन जारी।
कविता संग्रह- ‘सपने पूरे तो हो’ 2017 में प्रकाशित 2009 से शोध पत्रिका ‘वीक्षा’ का संपादन-प्रकाशन। कविता पुस्तिका ‘यही हैं मेरे लोग’ साखी पत्रिका से प्रकाशित (2010)।
संपर्क- वीक्षा, एच 2/3 वी.डी.ए, फ़्लैट, नरिया, बी.एच.यू. वाराणसी-221005
मो.9838709090
E-mail-brizbhu@gmail.com 

टिप्पणीकार प्रेम शंकर सिंह जन संस्कृति मंच के सदस्य और आगरा के एक कॉलेज में प्राध्यापक हैं)

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