पीयूष कुमार
संभावनाओं से भरी अपूर्वा की कविताएँ..
समकालीन कविता जहाँ साहित्यिक लोकतंत्र के विस्तार से सम्पन्न हुई है, वहीं विचारहीन युवाओं के इस स्वर्णकाल में बेहतर कविता और कवियों की कमी से जूझ भी रही है। ज़ाहिर है, ऐसे में किसी नई कलम से कोई कविता निकलती है तो उस पर सहज ही ध्यान जाता है। इसी क्रम में एक नाम है, अपूर्वा दीक्षित का जो रहती हैं, अम्बिकापुर, छत्तीसगढ़ में और अभी बीएससी कर रही हैं।
अपूर्वा की कुछ कविताएँ आई हैं और यहाँ हम उन कविताओं को पहली बार देख रहे हैं। उनकी इन कविताओं में उनका भावपक्ष उनकी उम्र की संगति करता दीखता है। उनका मन अन्तस् और बाह्य के बीच किसी पतंग-सा आवाजाही करता रहता है जिसकी डोर उसके हाथों में है। इस दृश्य में बाह्य जगत में विचरकर भी उसे संसार की हवा से अपेक्षा नहीं है बल्कि ख़ुद से है। मन के डोर को थामे रहने की यह समझ अपूर्वा के कवि को परिवक्व बनाती है। अपने मन पर केंद्रित रहने के बावजूद यहाँ प्रस्तुत एक कविता ‘मूर्तिकार’ अपने कहन में जहाँ प्रतीकात्मकता का उम्दा उदाहरण है वहीं इसके कई अर्थ भी खुलते हैं। इसमें पाठक या कहें, हर इंसान से सवाल है। सवाल जिससे वह बचना चाहता है। एक दूसरे अर्थ में मुझे यह कविता समकालीन सेल्फ़ीछाप और फोटोजीवी व्यक्तित्वों के लिए अधिक मारक लगी। अपूर्वा के मन के यह भाव का निज जब अन्य के सुख-दुख से और भी ज़्यादा जुड़ेंगे, अपने कविता होने के अर्थ और विस्तार को पा लेंगी।
अपूर्वा अपने कहन में स्पष्ट हैं, ईमानदारी से लबरेज़। चित्रात्मकता उनकी कविताओं का अच्छा गुण है। उनकी इन कविताओं में स्वतःस्फूर्तता है जिसके कारण यह कविताएँ कविता बनाने का उद्यम नहीं लगती। अभी अपूर्वा को शिल्प पर और काम करना बाकी है, यह स्पष्ट दिखता है। बहरहाल, कविता उत्पादन के इस चरम दौर में इन ताजी और स्वतःस्फूर्त कविताओं को देखना सुखद है। इस नई कलम की नई स्याही से हिंदी कविता को एक संभावनाशील कवि मिल रहा है, जिसका स्वागत है। पेश हैं अपूर्वा की छह कविताएँ –
अपूर्वा दीक्षित की कविताएँ
1. मूर्तिकार
बड़ा ही कमाल का एक मूर्तिकार देखा
न छैनी है, न हथौड़ा है, न माटी है न कला है
गढ़ रहा है अपने मन की ईर्ष्या को, द्वेष को,
अपने अंदर की घृणा को!
उसकी कोई भी कलाकृति सही नहीं है
न सिर है, न पैर है, न अथ का पता है न इति का
वह भर रहा है उसमें
अपनी गलतियों के सभी आरोप
वह अकार दे रहा है उसको ऐसा
जब कोई अंगुली उठाए उसपर
वह मोड़ दे उसे इस मूर्ति की तरफ!
भर रहा रंग लेकिन बेरंग उसे बना रहा है
वह है कोई कुछ और लेकिन दिखा रहा है
उद्देश्य क्या है, क्या है उसका ध्येय!
ये कौन सा अदृश्य संसार सजा रहा है?
वह गढ़ रहा है एक ऐसी कलाकृति
जो स्वयं है लेकिन
खुद को स्वीकार करने के बजाय
वह बना रहा है एक मूर्ति
ताकि भिन्न कर सके उस ‘मैं’ को जो अस्वीकार्य है!
2. मेरा यह चंचल सा मन
मेरा यह चंचल सा मन
रुकता नहीं थकता नहीं
बैठ भी जाऊं जो मैं शांत हो एकांत में
मेरे पास तनिक भी देर ठहरता नहीं
विचरता है किन्ही जंगलों में
नीलगिरी के पेड़ों से ऊंचा
बरगद की लटकती अनगिन जड़ों में झूलता
अरुणाचल के सदाबहार वनों की
घनी शाखाओं के बीच में
किसी पुराने पीपल की नीड़ में!
हिमालय की चोटियों तक
कश्मीर की घाटियों तक!
थार मरूथल की रेत सा जलता
अरावली की पहाड़ियों से फिसलता!
पहुंच जाता है हिंद महासागर के किनारों पर
गंगा, नर्मदा और सिंधु की लहरों संग बहता
प्रशांत की गहराई में
बागों की तरुणाई में
दौड़ता भागता कस्तूरी की खोज में
एक अबोध मृग के समान!
सूरज से पहले जाग कर
दोपहर भर धूप में भाग कर
शाम ढलते भी थकता नहीं है
चांद के उतरने तक भी सोता नहीं है!
हवा से बातें करता मन
कभी व्यग्र, कभी खुद में मगन
उड़ता ही जाता निरंकुश हो आकाश में
जैसे डोर से कटी पतंग
न माने संसार के कोई नियम
न मानता किसी सीमा की बंधन
लगाता रहता अपनी ही उधेड़ बुन
मेरा यह चंचल सा मन!
3. सरल नहीं होते
मैं भेजती हूं पत्र कई
कभी वो अपने पते पर पहुंचते नहीं हैं
लिखती हूँ कहानियां
पात्र जिनके काल्पनिक होते नहीं हैं
मैं लगाती हूं कई पौधे
पेड़ बनने तक वे जीते नहीं हैं
जी भी गए कभी तो फल उनपर आते नहीं हैं
उड़ा देती हूं पक्षियों को खुले आसमान में
पिंजरे से निकाल कर
वे लौटकर फिर कभी मेरे पास आते नहीं हैं!
लिख कर व्यक्त कर देती हूं सबकुछ ही
बात अलग है ये लोग पढ़े लिखे, समझते नहीं हैं!
जवाब मैं उन बातों के खुद ही दे देती हूं
सवाल जो मुझसे वो पूछते नहीं हैं!
लिखी मैंने कई कविताएं
उनके लिए भी जो कभी मुझे पढ़ते नहीं हैं
और जरूरी नहीं हर परिणाम वही हो जो हम चाहते हैं,
हो जाता है वह भी जो हम चाहते नहीं हैं!
निराशा कहां है मेरी कविताओं में
व्यंग्य हो सकता है
हो सकती है जटिलता
जो दिखते हैं सरल अक्सर वे सरल होते नहीं हैं!
4. कमरे की ये चार दीवारें
इस कमरे की ये चार दीवारें
मेरे राज सारे लिए बैठी हैं
मेरे सारे ख्वाब सजते देखती हैं
देखती हैं मुझे नाचते झूमते
और टूट कर रोते देखती हैं
इस कमरे की ये चार दीवारें!
देखा है मुझे हिम्मत समेट कर उठते हुए
और मुझे सहमते डरते देखा है
देखा है इन्होंने मेरी शरारतों को
मेरी ख्वाहिशों की इमारतों को
मुझे उम्मीदों की ईंट जोड़ते देखा है
और खुद का दिल तोड़ते देखा है
इस कमरे की ये चार दीवारें!
जब थक कर घर आती हूँ तो
अपनेपन का एहसास कराती हैं
और हाँ जब डर जाती हूँ अकेलेपन से
तो मेरी दुनिया बन जाती है
मैं क्यूँ तवज्जों हूँ किसी को ?
क्यूँ मानूँ मौजूदगी किसी की
जब मेरे लड़खड़ाने पर सम्भालती हैं
बिखरने पर गले से लगाती हैं
इस कमरे की ये चार दीवारें…!
5. पतझड़ के पत्ते
मैंने देखा —
वो पीले पत्ते धीरे-धीरे
शाखों से सरकते
जैसे कोई विदा ले रहा हो
बिना कुछ कहे
वे जो शाख से बिछुड़े थे —
क्या उन्हें पता था कि लौट कर नहीं आएँगे?
जो बिछड़े, क्या वे सचमुच खो गए?
या किसी स्मृति-रेखा में बस गए चुपचाप?
वे पत्ते…
जो धरती पर गिरे थे
क्या मिट्टी ने उन्हें निगल लिया?
क्या वे मिट्टी में मिलकर
ख़ुद को भुला बैठे?
या किसी बीज के स्वप्न में
फिर से जन्म लेने की आशा लिए सो गए?
या वे किसी और वृक्ष की जड़ बन गए
बिना नाम, बिना पहचान?
या फिर
किसी क्षण हवा की गोद में चढ़
आकाश में उड़ते-उड़ते
कहीं तारे बन गए हैं क्या?
जो उड़ते रहे
क्या वे अब भी भटक रहे हैं
किसी टहनी की तलाश में?
या आसमान के मौन में
खो गए जैसे कभी थे ही नहीं?
अब जो हरियाली मुस्कुरा रही है
क्या वह उन्हीं का पुनर्जन्म है?
या यह केवल परिवर्तन का छल है
जिसमें खो जाता है अस्तित्व
और रह जाती है बस गति?
इन शाखों पर जो
नए पत्ते हरे हैं, चहकते हैं
मैं उन्हें देख कर पूछती हूँ
क्या उन्होंने पुराने पत्तों को जाना था?
या बस उनकी जगह ले ली
बिना एक क्षण ठहर कर?
क्या हर पतझड़
किसी नेपथ्य की विदाई है?
या मात्र अगली हरियाली की तैयारी?
और फिर
क्या यही जीवन है?
एक अनदेखा अदला-बदली का क्रम
जहाँ कोई जाता है,
कोई आता है,
और हम केवल दृश्य देखते हैं
कुछ पूछते हैं…
पर उत्तर कभी नहीं मिलता ?
6. भूरी आंखें
और सहसा देखा मैंने
वो भूरी आँखें — छोटी, मगर बेहिसाब गहरी,
मानो सारी दुनिया की गहराई
बस उनमें ही समा गई हो
सागर से भी गहरी थीं वो,
भूरी…जैसे शाम उतरती हो धीरे-धीरे
अलसाई हुई नि: शब्द।
न जाने कितने ख्वाब तैरते थे उनमें,
कुछ अधूरे, कुछ पूरे
और कुछ तो बस पलकें झुका लेने जितने ही थे
वे पलकें
हर बार जब झपकतीं
ऐसा लगता मानो कोई रहस्य
अपनी गहराई में छिपा रही हों
जब वो हंसते,
तो आँखें थोड़ी और छोटी हो जातीं,
शायद इस डर से
कि कहीं कोई पढ़ न ले
उनमें छिपी कहानी
शायद छुपाना चाहती थी वो
अपनी खुशी की वजह
या शायद…
वह पीड़ा
जो अधरों की मुस्कान के पीछे
मौन बैठी थी
कवयित्री अपूर्वा दीक्षित की कलम नई है। जन्म:27 जनवरी सन् 2004, अंबिकापुर, छत्तीसगढ़। शैक्षणिक योग्यता – स्नातक (B.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी) – हॉली क्रॉस वूमेन्स कॉलेज, अंबिकापुर से। अभिरुचि – कविता लेखन, समीक्षा एवं साहित्य में विशेष रुचि।
निवास स्थान – अंबिकापुर, खैरबार, बाकिडेम रोड, जिला सरगुजा, छत्तीसगढ़
सम्पर्क: apurvaxdixit@gmail.com
टिप्पणीकार पीयूष कुमार, जन्म – 03 अगस्त 1974, महासमुंद, छत्तीसगढ़।
लेखन – कविता, समीक्षा, सिनेमा, अनुवाद और डायरी आदि विधाओं में लेखन। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं और ऑनलाइन मंचों, पोर्टल्स आदि पर नियमित प्रकाशन। आकाशवाणी और दूरदर्शन से आलेखों का प्रसारण और वार्ता। ‘चैनल इंडिया’ अखबार रायपुर में छत्तीसगढ़ी गीतों पर ‘पुनर्पाठ’ नाम से साप्ताहिक आलेख। प्रकाशन – सेमरसोत में सांझ (कविता संग्रह) 2021 में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित। अन्य – लोकसंस्कृति अध्येता, फोटोग्राफी (पुस्तकों और पत्रिकाओं के आवरण पृष्ठ के लिए छायांकन)
संप्रति – उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन में सहायक प्राध्यापक (हिंदी)
सम्पर्क : मोबाइल – 8839072306
ईमेल – piyush3874@gmail.com

