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‘आपरेशन सिंदूर’ पर संसद  में 16 घंटे की बहस

जयप्रकाश नारायण 

28 और 29 जुलाई को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और उसके बाद घटित घटनाओं  को लेकर संसद में 16 घंटे की बहस पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार चली। मानसून सत्र शुरू होते ही एकजुट विपक्ष ने स्पीकर से ऑपरेशन सिंदूर, पहलगाम में आतंकी हमला और युद्ध विराम को लेकर संसद में चर्चा कराये जाने की मांग की। एकजुट विपक्ष के अड़ जाने के कारण अध्यक्ष को विपक्ष की मांग  स्वीकार करनी पड़ी।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार की तरफ से बहस की शुरुआत की और ऑपरेशन सिंदूर, पहलगाम और युद्ध विराम पर सरकार का पक्ष रखा। अंत में प्रधानमंत्री‌ ने विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों और लगाए गए आरोपों पर  सफाई दी। इसके बाद दो दिवसीय बहस का समापन हुआ।

सवाल यह है कि विपक्ष और सरकार के बीच में चली इस मैराथन बहस के बाद क्या उन सवालों का जबाव मिल गया है, जिसको लेकर देश, विपक्ष और जनता  चिंतित रही है।

वे सवाल इस प्रकार हैं-
एक- पहलगांव  के आतंकियों का क्या हुआ? वे क्यों पकड़े नहीं जा सके?
दो- पाकिस्तान की सीमा से चलकर आतंकी भारत के अंदर 200 किलोमीटर तक कैसे घुस आए? हमारी सुरक्षा एजेंसियों से चूक कहा हुई? इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
तीन -पहलगाम  एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। वहां सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं थे?
चार -क्या सरकार की तरफ से सुरक्षा में चूक हुई थी?
पांच -भारत सरकार के गृह मंत्री अमित शाह ने थोड़े ही दिन पहले कहा था कि कश्मीर में आतंकवाद की जड़ें खोद दी गई है। क्या पहलगाम की घटना ने सरकार के दावे गलत नहीं साबित हुए? या यह दावा अपुष्ट आधार पर क्यों किया गया था?
छ-  धारा 370 हटाने के बाद सरकार द्वारा किए जा रहे दावे कितना सही हैं?  सरकार अपने लक्ष्य में कितना आगे बढ़ी है?
सात-पुलवामा की घटना से सरकार ने क्या सबक लिया है और आतंकी घटनाओं को रोकने के लिए क्या क्या ठोस कदम उठाए गये थे?
आठ-भारत के 26 नागरिकों की मौत की  जवाबदेही लेते हुए क्या गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को त्यागपत्र नहीं दे देना चाहिए?
नौ-कुछ दिन पहले गृहमंत्री  3 दिन की कश्मीर की यात्रा पर गए थे, तो उस समय‌ आतंकवाद से निपटने और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित क्या-क्या फैसले लिए गए थे?
ये कुछ सवाल थे, जो पहलगाम की घटना के बाद विपक्ष,  भारत के नागरिकों के द्वारा उठाए जा रहे थे। जिनका जवाब सरकार न बाहर दे रही थी और न संसद में देना चाहती है। इसके बदले प्रधानमंत्री मोदी जनसभाओं में बड़े-बड़े दावे करते  घूम रहे थे।

ऑपरेशन सिंदूर और उसकी उपलब्धियां   पहलगाम की घटना के 14 वें दिन  सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर के नाम से पाकिस्तान स्थित नौ आतंकी ठिकानों पर हवाई हमला किया। सरकार के अनुसार यह टारगेटेड हमला था। आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया गया और सेना द्वारा निर्धारित लक्ष्य हासिल कर लिया गया है।

इस बीच एक खबर आयी कि ऑपरेशन शुरू होने के आधे घंटे बाद पाकिस्तान को भारत का उद्देश्य और लक्ष्य बता दिया था, कि हम सिर्फ आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई करेगें। सैनिक ठिकानों पर  नहीं। हमारा पूर्ण युद्ध का इरादा नहीं है। अब तो यह भी खबर आ रही है कि मोदी सरकार ने बालाकोट में सर्जिकल स्ट्राइक के पहले पाकिस्तान  सरकार को सूचित कर दिया  था। इस विरोधाभास को समझने के लिए बड़े-बड़े सैन्य विशेषज्ञों को इतिहास, वर्तमान और मोदी सरकार के वास्तविक चरित्र का गहराई से अध्ययन  करना पड़ेगा।

युद्ध विराम

जब युद्ध विस्तारित होकर  फैलने लगा तो अचानक 10 तारीख को 5 बजे युद्ध विराम की खबर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा दी गई । ट्रंप ने कहा कि हमने दोनों देशों को युद्ध विराम के लिए राजी कर लिया है।  भारत और पाकिस्तान के नेता समझदारी दिखाते हुए युद्ध विराम पर सहमत हो गए हैं और शाम 6 बजे से युद्ध विराम लागू हो जाएगा । जैसा ट्रंप ने कहा वैसा ही शब्दश:  हुआ भी।
देश और दुनिया भौचक थी। इसके बाद भी ट्रंप कई बार अपनी बात दोहरा चुके हैं। उनका कहना है कि हमने दोनों देशों को व्यापार करने के  नाम पर युद्ध विराम के लिए राजी किया है।
भारत सरकार का 6 बजे बयान आया कि हमारे ऑपरेशन सिंदूर की सफलता से घबराकर पाकिस्तानी समकक्ष डीजीएमओ ने भारत के डीजीएमओ से बात की। गुहार लगाई और युद्ध रोकने की अपील की। हमारे डीजीएमओ ने सकारात्मक जवाब देते हुए युद्ध  विराम पर सहमति दी है।  6 बजे सायं से युद्धविराम लागू हो जायेगा।
आशंका,   ऊहापोह के बीच अंततः युद्ध विराम हो ही गया।

दो बयान एक उद्देश्य

ट्रंप और भारत के बयानों में अंतर था । जिसको लेकर बवाल खड़ा हो गया । ट्रंप  के बयान पर  विपक्ष और नागरिक समाज ने नाराजगी व्यक्त की। यहां तक कहा गया कि ट्रंप के दबाव पर भारत सरकार ने घुटने टेक दिए और  जीती हुई बाजी हारनी पड़ी।

विवाद यही से गहरा गया । ऑपरेशन सिंदूर पर विपक्ष और देश ने एक स्वर में सरकार के निर्णय का समर्थन किया था । जनता चाह रही थी कि पहलगाम के आतंकियों को सबक सिखाया जाए। जिससे आने वाले समयों में पाक संरक्षित आतंकियों की फिर कभी हिम्मत न हो कि वे भारत में घुस कर नागरिकों की हत्या कर सके। चूंकि पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भारत के लिए लम्बे समय से बड़ी समस्या बना हुआ है। इसलिए भारत का हर नागरिक चाहता है कि देश आतंकी नेटवर्क को खत्म करने के लिए कड़ा कदम उठाए। जिससे शांति का वातावरण कायम हो।

ट्रंप के बार-बार युद्ध विराम का श्रेय लेने के चलते मोदी सरकार के प्रवक्ताओं की जुबान लड़खड़ाने लगी है । इसलिए यह आशंका पैदा हो रही है कि  भारत किसी दबाव में आकर युद्ध विराम के लिए राजी हुआ है।

युद्ध और भारत की सैन्य रणनीति

8 तारीख को ही विश्व मीडिया में  ऑपरेशन सिंदूर को लेकर तरह-तरह की खबरें आने लगी थी। यूके में  टेलीग्राफ ने खबर छापी की भारत के जेट विमान मार गिराए गए हैं । इस खबर को वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स के साथ इकोनॉमिक्स टाइम्स ने भी प्रकाशित किया ।फ्रांस के समाचार पत्रों में भी खबरें आ रही थी कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत को क्षति उठानी पड़ी है।

भारतीय अखबार और मीडिया कुछ और ही खबरें दे रहे थे। युद्ध विराम और युद्ध में हुए नुकसान को लेकर भारत सरकार की  युद्ध नीति पर सवाल उठने लगे। कई नेताओं ने भारत सरकार से पूछा यह कौन सी नीति है कि पाकिस्तान को पहले से ही सूचित कर दिया गया था।

भारत सरकार के प्रवक्ता बार-बार कह रहे थे कि हमारा उद्देश्य युद्ध करना नहीं था ।पाकिस्तान के सैन्य ठिकाने और डिफेंस सिस्टम पर आक्रमण करना नहीं था। हमारा लक्ष्य टारगेटेड हमला करके आतंकी नेटवर्क को ध्वस्त करना था। इसे हमने हासिल कर लिया है।हमारे बहादुर सैनिकों ने आतंकी नेटवर्क को तबाह कर दिया  है। इसके बाद हमने युद्ध विराम  पर सहमति दी। लेकिन सरकार के ये सारे तर्क   दिशाहीन से लगे।

चीन पाक गठजोड़

पहलगाम के बाद यह तय था कि भारत सरकार कोई न कोई कार्रवाई करेगी । क्योंकि प्रधानमंत्री की इमेज का सवाल था। भारत के कई सैन्य विशेषज्ञ उस समय चेतावनी दे रहे थे कि भारत को कूटनीतिक रास्ता अख्तियार करना चाहिए। हमला या युद्ध कोई समाधान नहीं है।

दूसरा तर्क था कि  समय आगे बढ़ गया है। यह 2019  नहीं है। इस बार हमें दो मोर्चे पर लड़ना होगा।  बालाकोट के शो के बाद  चीन ने पाक सेना को आधुनिक अस्त्र-शस्त्र और तकनीकी  दक्षता बढ़ाने में मदद दी है।

तीसरी बात थी कि यह सूचना, डाटा, सैटेलाइट और एआई का युग है । जिससे  सैन्य रणनीति और सैन्य तकनीक में गुणात्मक बदलाव आ चुका है । इस तथ्य को अवश्य संज्ञान में लेते हुए सरकार को कोई कदम उठाना चाहिए। पाकिस्तान की सैन्य क्षमता में चीनी सहयोग से भारी बदलाव हुआ है।

फिर भी भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। क्या  सैनिक उद्देश्य हासिल करने के लिए से उठाया गया कदम था या तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए ?

युद्ध विराम के बाद उठे गम्भीर सवाल

युद्ध शुरू होने के बाद माहौल एकदम बदल गया।भारतीय सैन्य अधिकारियों, सीडीएस,  वायुसेना अध्यक्ष और इंडोनेशिया में मौजूद सेना के अफसर के बयानों ने स्थित की जटिलता को और बढ़ा दिया था । वायु सेवा अध्यक्ष ने तो यहां तक कह दिया कि 20वीं सदी के तकनीक के बल पर युद्ध नहीं लड़ा जा सकता। सरकार और गोदी मीडिया सिर्फ गुणगान करने में व्यस्त थी जमीनी हकीकत कुछ और थी। सैन्य अधिकारियों में बेचैनी थी। सरकार के दबाव के बावजूद कुछ न कुछ सच्चाई उनके मुंह से लीक हो जा रही थी। भारत के पुंछ और राजौरी इलाके में जन-धन की हानि हुई थी। लगभग डेढ़ दर्जन नागरिक जिसमें बच्चे, महिलाएं थीं, मारे गए थे ।  कहीं-कहीं से सैन्य कैजुअल्टी की भी खबरें आ रही थी। श्रीनगर से  एक जर्नलिस्ट ने खबर दी थी कि श्रीनगर से साढ़े तीन किलोमीटर की दूरी पर एक भारतीय जेट गिरा हुआ है। इसकी  राफेल के बतौर पुष्टि हुई।

मतलब कुछ बड़ा घटित हो चुका था। रफैल का अंतरराष्ट्रीय बाजार में शेयर गिरने लगा। चीनी जेट विमानों के शेयर में उछाल आ गया। यह सब 8और9 तारीख में ही अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ गया  और 10 तारीख ट्रंप ने यह कह कर महा विस्फोट कर दिया कि हमने दोनों देशों को युद्ध विराम के लिए राजी कर लिया है। जो 10 तारीख की शाम को 6बजे से लागू होगा।
यहां से दो बिल्लियों के झगड़े में बंदर का प्रवेश होता है। फिल्म का हीरो बीजिंग में बैठा मुस्कुरा रहा था।

मोदी और हिंदुत्व का सैन्य राष्ट्रवाद का मैजिक ढह चुका है । सरकारी प्रवक्ता सदमे थे। वे कोई जवाब देने की स्थिति में नहीं थे । अंत में 12 तारीख को मोदी टेलीविजन पर आये और 22 मिनट के अपने भाषण में ऑपरेशन सिंदूर की सफलता और लक्ष्य  को हासिल कर लेने की जानकारी दी। लेकिन भारत की किसी भी प्रकार की क्षति और  ट्रंप की भूमिका का कोई जिक्र नहीं किया। यहीं से ऑपरेशन सिंदूर की अंतर्कथा ने नया रूप ले लिया।

युद्ध विराम के बाद उठे सवाल और विपक्ष

ऑपरेशन सिंदूर के चार दिन के घटनाक्रम से कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठे हैं ।
एक – क्या भारत को पाकिस्तान चीन संयुक्त गठबंधन से लड़ना पड़ा था। तो सरकार चीन की भूमिका को कैसे देख रही है?
दो -ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना को क्या क्षति उठानी पड़ी है? अगर हां तो कितनी और उसके कारण क्या है?
तीन -युद्ध विराम कराने में अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप की क्या भूमिका थी? क्या भारत पर कोई अतिरिक्त दबाव डाला गया? अगर हां तो वह कौन सी ताकत थी?
चार-हमारी विदेश नीति में क्या कोई कमजोरी  थी? अगर हां तो उसके क्या कारण है? ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया का कोई भी देश हमारे पक्ष में क्यों  नहीं खड़ा हुआ?
पांच -अमेरिका सहित यूरोपीय यूनियन जी -7 एससीओ और ब्रिक्स सहित सभी मंचों पर  पाकिस्तान को खुला समर्थन मिल रहा है ।आईएमएफ विश्व बैंक द्वारा पाकिस्तान को  आर्थिक मदद मिलने के क्या कारण है? इतने बड़े नरसंहार के बाद भी पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में कटघरे में क्यों नहीं खड़ा किया जा सका? जबकि पहलगाम की आतंकी घटना के बाद विश्व जनमत की सहानुभूति भारत के साथ थी। ऑपरेशन सिंदूर लांच होते ही विश्वजनमत की सहानुभूति पाकिस्तान के   पक्ष में क्यों चली गई? इस तरह से कुछ ठोस मुद्दे ऑपरेशन सिंदूर और युद्ध विराम के बाद उभर कर सामने आए हैं ।

इस पृष्ठभूमि में संसद में 16 घंटे की ऑपरेशन सिंदूर पर बहस चली।  जिसमें इन सवालों के जवाब विपक्ष द्वारा सरकार से मांगे गए थे।आश्चर्य है कि  राहुल गांधी सहित पूरा विपक्ष अपने मुद्दों पर टिका रहा । एलओपी राहुल गांधी सहित संपूर्ण विपक्ष ने इन सवालों के जवाब प्रधानमंत्री और सरकार से जानना चाहा। राहुल गांधी ने सीधे प्रधानमंत्री से एक सवाल पूछा कि ट्रंप के दबाव पर युद्ध विराम के लिए  भारत मजबूर नहीं हुआ है तो आप ट्रंप का नाम लेकर कहेंगे कि वे झूठ बोल रहे हैं।
दूसरा, सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू होने के 25 मिनट बाद पाकिस्तान को बता कर यह प्रमाणित कर दिया कि उसके पास युद्ध लड़ने की इच्छा शक्ति नहीं है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है। एक सार्वभौम देश में आप टारगेटेड  हमला करते हैं, तो आप यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा! यह कैसी समझ है!

सीधा आरोप।  क्या प्रधानमंत्री अपनी छवि चमकाने के लिए सेना का दुरुपयोग कर रहे हैं? वे पहले भी ऐसा कर चुके हैं।
तीन- चीन के बारे में आपकी जुबान क्यों बंद है?ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय विदेश मंत्री चीन किस सवाल को हल करने के लिए गए थे। जबकि चीन ने पाकिस्तान का खुला समर्थन किया था। अगर हम अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पर यकीन  न भी करें तो भी चीन की पक्षधरता पाकिस्तान के तरफ है।
चार – अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान सेना अध्यक्ष जनरल मुनीर को अमेरिका बुलाया और ट्रंप ने डिनर पार्टी दी और सीधे बातचीत हुई। अंतरराष्ट्रीय जगत में पाकिस्तान की प्रोफाइल भारत के बराबर कैसे पहुंच गई।
इस क्रूसियल समय में पाकिस्तान ने सुरक्षा काउंसिल में भारत के 18 वोट के मुकाबले 38 वोट पाकर उपाध्यक्ष का पद जीत लिया। इससे कौन सा संदेश निकलता है?
पांच -ऑपरेशन सिंदूर के समय  हुई सैनिक और नागरिक क्षति की सही-सही जानकारी क्या सरकार देगी?

विपक्ष का पूरा जोर इन्हीं सब सवालों पर केंद्रित था। भारत के वैश्विक मंच पर अलगाव में चले जाने की चिंता संसद की बहस में केंद्रीय सवाल बना रहा। दूसरा मोदी सरकार की नीतिगत विफलता, राजनीतिक इच्छाशक्ति व रणनीति की कमजोरी और लक्ष्य के प्रति अस्पष्टता ने स्थितियों को जटिल बना दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के ऐलान ने कोढ़ में खाज का काम किया है। इससे भारत सरकार की साख जमीन पर आ गई है।

सरकार का पक्ष

सरकार की तरफ से  रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मोर्चा संभाला। संघ की शाखाओं में वीर रस की सुनी हुई कथाओं की तर्ज पर  उन्होंने सरकार का बचाव किया। उनके अनुसार  सरकार बहादुर मध्यकालीन शूरवीरों की तरह लड़ी। जैसे राजा घोड़े पर सवार हो दांतों में घोड़े की लगाम मुंह में दबाए दोनों हाथों से एक-एक कुंतल की तलवार चलाते थे । वैसे ही  हमारे प्रधानमंत्री आतंकवादियों के सर कलम कर रहे थे।  उनका कहना था कि शेर मेंढक पर हमला क्यों करेगा। लगभग 50 मिनट के भाषण में उन्होंने वीरगाथा काल को मात कर देने वाले रण कौशल की व्याख्या की और भारत के विजय का ऐलान किया। लेकिन एक भी सवाल का जवाब उनके भाषण से नहीं मिला।ऐसा लगता था कि वह किसी दबाव में बोल रहे हैं।

भाजपा के जितने भी सांसद बोलने आए। सब की राजनीतिक समझ और दिशा एक थी। आतंकवाद और पाकिस्तान को सबक सिखा दिया गया है । आतंकवाद कांग्रेस की देन है और नेहरू की ऐतिहासिक गलतियों को मोदी जी के नेतृत्व में देश दुरुस्त कर रहा है । सरकारी पक्ष का प्रत्येक वक्ता  इन्हीं तर्कों के द्वारा  अपनी बात रख रहा था।

गृह मंत्री अमित शाह आते ही फार्म में आ गए।दबंग अंदाज में  ललकारते हुए विपक्ष और कांग्रेस को कटघरे‌ में खड़ा करने लगे। धमकाने डराने और घमंड के चरम तक पहुंच कर मोदी की प्रशंसा करने में जुट गए। लेकिन  गृह मंत्री की जिम्मेदारियों पर उन्होंने एक शब्द नहीं कहा। सरकार से किसी प्रकार की चूक हुई है, इसे सिरे से खारिज कर दिया। इसी के साथ धारा 370 हटाने के बाद कश्मीर में अमन चैन कायम हुआ है। आतंकवाद की जड़ों को उखाड़ फेंकने और कानून व्यवस्था के दुरुस्त होने का उन्होंने ऐलान किया। पहलगाम से लेकर ऑपरेशन सिंदूर और युद्ध विराम तक  भारत की उपलब्धियों  का तफसील से वर्णन करते हुए  वह डराने धमकाने तक  चले गए। आधुनिक भारत के चाणक्य की यह खोखली विश्व दृष्टि  आने वाले भारत के लिए और बड़ा गहरा संकट खड़ा कर सकती है। क्योंकि मोदी सरकार अपनी गलतियों से कुछ भी सीखने के लिए तैयार नहीं है।

बहस के दूसरे दिन ही ऑपरेशन महादेव के तहत तीन आतंकवादियों के मार गिराए जाने की खबर आई। अमित शाह ने कहा की ये वही आतंकवादी हैं, जिन्होंने पहलगाम में निर्दोष पर्यटकों की हत्या की थी। ऐन संसद की बहस के दौरान इस तरह के नकली इवेंट अमित शाह और उनके कार्य शैली की बुनियादी विशेषता है। जबकि ऑपरेशन महादेव की सफलता पर न मीडिया, न आम लोगों में कहीं भी कोई उत्साह और जश्न का माहौल है। अब सामान्य नागरिक भी इस सरकार की हकीकत मन ही मन समझने लगा है। अमित शाह ने आतंकवादियों की एक फोरेंसिक रिपोर्ट सदन में पेश की है ।उसके नकली होने की खबरें आ रही हैं। लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक अमित शाह की बड़ी-बड़ी बातें न यथार्थ से मेल खाती है, न वर्तमान में भारत की जरूरतों को पूरा करती है।

मोदी जी लोकसभा में आए

2 दिन के बहस में मोदी जी आखिरी वक्त में लोकसभा में बोलने के पहले आए। उसके पहले या तो वह विदेश में थे या  इधर-उधर घूम रहे थे। अब तो खबरें आ रही है कि राज्यसभा में वह नहीं जाएंगे। उनके एक घंटा 44 मिनट के भाषण में क्या था, यह उनके भक्त ही बता सकते हैं! हां अपनी चिर-परिचित शैली में वर्तमान से लेकर अतीत तक की गलत व्याख्या करते रहे। वह अपने बचाव में हर बार की तरह इस बार भी नेहरू तथा कांग्रेस को किसी न किसी बहाने से कोसने लगे।  जबकि विपक्ष ने ठोस सवाल रखा दिया था। ट्रंप द्वारा युद्ध विराम कराए जाने और चीन के प्रति भारत की नीति जैसे सवाल‌ थे।

मोदी जी इन दोनों सवालो से भाग खड़े हुए ।इसकी जगह पर वह सामान्यीकरण कर बच कर निकलने का रास्ता ढूंढ रहे थे। परिणाम यह हुआ कि देश जो मोदी जी के मुख से सुनना चाहता था। वह छुपा लिया गया ।

यही भारतीय लोकतंत्र की त्रासदी है । संसद में भी सच अलग-अलग होगा । पहलगाम में पर्यटकों की हत्या, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाक गोलीबारी में राजौरी, पुंछ में मारे गए लोग, जेट के पायलट सहित सैनिकों की शहादत, जेट विमानों के गिरने की सच्चाई कभी भी बाहर नहीं आ सकेगी । विश्व समुदाय में भारत के अलग-थलग पड़ जाने से भारत की विदेश नीति पर उठे सवाल हवा में उड़ा दिए गए। मोदी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को उनके अंतर्वस्तु से काटकर उन्हें अपनी तस्वीर को चमकाने के मंच में बदल दिया है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो सका। नींबू की तरह निचुड़ चुके हैं मोदी। समय ने उन्हें अप्रसांगिक बना दिया है।

मोदी जी ट्रंप और चीन का नाम क्यों नहीं लेते। इसको समझने के लिए हमें 1925 में बने संघ के इतिहास में जाना होगा। भारत जब स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा था, तो संघ के किसी विचारक और सरसंचालक ने कभी भी ब्रिटिश हुक्मरानों के विरोध की कोई नीति नहीं ली। उनका नाम तक नहीं लिया और कभी भी स्वतंत्रता आंदोलन के किसी भी कार्यक्रम में भागीदारी नहीं की। या आजादी के आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कोई स्वतंत्र  कार्यक्रम कभी नहीं लिया। ये लोग अंग्रेजों का नाम तक नहीं लेते थे। बल्कि उनके सम्मान में कसीदे पढ़ा करते थे।  ब्रिटिश महारानी के भारत आगमन पर सलामी परेड में शामिल हुए थे । यही संघ का बुनियादी व असली देश प्रेम है।

मोदी जी संघ के स्वयंसेवक हैं। उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी होने का गर्व है। भला वे संघ द्वारा निर्धारित लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन कैसे कर सकते हैं। इसलिए वह वर्तमान दौर के दुनिया की सुपर पावर अमेरिका और उसके राष्ट्रपति तथा भविष्य में  सुपर पावर बनने वाले चीन का नाम लेने से परहेज़ करते हैं। यह अपने गुरुओं के योग्य और आज्ञाकारी शिष्य और स्वयंसेवक हैं और उन्हीं के दिखाये रास्ते पर चल रहे हैं । इसलिए किसी विश्लेषक को इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उन्होंने ट्रंप को बुलाकर गुजरात में ‘नमस्ते ट्रंप’ नामक इवेंट खड़ा करके संघ की पुरानी परंपरा को नया स्वरूप पहले ही दे दिया था।

संघ के सरसंचालक गुलाम भारत में भी मुगलों के खिलाफ लड़ रहे थे और आज जब अमेरिका भारत सहित विश्व अन्य देशों को धौंस धमकी दे रहा है। तो मोदी जी ने कान पूंछ बंद कर ली‌ है। यही इनकी  प्राचीन संस्कृति परंपरा की रक्षा का बेहतरीन उदाहरण है।

लेकिन इसके उलट आज भी भाजपा और संघ भारत के पड़ोसी पाकिस्तान और देश के अंदर मुसलमान से लड़ने में ही अपनी पूरी ऊर्जा  खर्च कर रहे हैं ।  श्रीनगर के नेशनल कांफ्रेंस के सांसद की संसद में कही बात निश्चय ही सुनना चाहिए । उनका भाषण सुन सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उन्होंने पहलगाम के बाद दो हजार कश्मीरी नवजवानों की बिना सबूत गिरफ्तारी और 10 घरों को बम से उड़ा देने की तरफ संकेत करते हुए पूछा! क्या यही लोकतंत्र है?

भाजपा की मोदी सरकार इस देश के लिए बोझ बन गई है। यही आज की असलियत है। 16 घंटे तक संसद में हुई चर्चा से यह बात खुलकर सामने आ गई है और इनके मजबूत नेतृत्व का भांडा फूट गया है।

इसलिए आज मोदी की बातों को देश के अंदर और देश के बाहर कोई भी  गम्भीरता से नहीं लेता है। यह सच्चाई संघ भी समझ चुका है।इसलिए वह उनसे जल्दी से जल्दी  मुक्ति चाहता है।

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार 

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