समकालीन जनमत
जनमत

नेपाल : जेन-ज़ी आंदोलन क्या कोई राजनीतिक दिशा तय कर पाएगा

ज़ेन-ज़ी आंदोलन के दौरान व्यापक हिंसा, तोड़फोड़, लूट-पाट और केपी ओली सरकार के पतन के बाद नेपाल के हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं। पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की की अगुवाई में अंतरिम सरकार का गठन हो चुका है। मंत्रीपरिषद में तीन मंत्री बन चुके हैं और कुछ और मंत्रियों को मंत्रिपरिषद में शामिल होने पर विचार-विमर्श चल रहा है। ज़ेन-ज़ी आंदोलन आंदोलन से मची उथल-पुथल और और नेपाल के आगे की दिशा को लेकर विश्लेषण का सिलसिला जारी है। तमाम सवाल उठ रहे हैं और उनका जवाब ढूंढने की कोशिश हो रही है।
सबसे अहम सवाल अभी सर्वाधिक चर्चा व मंथन का बना हुआ है कि आखिर ज़ेन-ज़ी आंदोलन कैसे फूट पड़ा और इसके पीछे कौन-कौन ताकतें थीं ? अंतरिम सरकार क्या छह महीने में चुनाव करा पाएगी ? आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर हुए विध्वंस से नेपाल कैसे उबरेगा ? आंदोलन के निशाने पर रहे स्थापित राजनीतिक दल और उनके शीर्ष नेता क्या फिर से जनता में पैठ बना पाएंगे या हाशिए पर चले जाएंगे ?ज़ेन-ज़ी आंदोलन से निकल रहे चेहरे क्या कोई राजनीतिक दिशा तय कर पाएंगे ?
ओली सरकार ने चार सितंबर को राजस्व, साइबर सुरक्षा, कंटेंट मॉडरेशन का हवाला देते हुए फेसबुक, एक्स सहित 26 सोशल मीडिया प्लेटफार्म को बंद करने का आदेश दिया था। सरकार के निर्णय पर तुरंत सवाल उठने लगे। इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ रही आवाजों को रोकने का प्रयास माना गया। सोशल मीडिया प्लेटफार्म टिक टॉक पर युवाओं के कई समूहों द्वारा इंडोनेशिया और फिलीपींस से प्रेरित होकर नेताओं सहित कुछ धनाढ्य लोगों की संतानों के ऐशोआराम और आम नेपालियों की अभावग्रस्त जिंदगी पर रील-वीडियो बनाते हुए सरकारी भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए जा रहे थे। ‘ नेपो बेबी ’ नाम से यह ट्रेंड कर रहा था। यह अभियान बाद में टिक टॉक से रेडिट और फिर डिस्कार्ड पर चलने लगा। एकाएक सोशल मीडिया को प्रतिबंधित किए जाने से युवाओं को लगा कि उनके द्वारा छेड़ी जा रही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को विफल करने के लिए ही सरकार द्वारा यह कार्यवाही की गई है। बड़ी संख्या में विदेश रह रहे नेपाली और उनके परिजन भी सोशल मीडिया के जरिए होने वाले संपर्क-संवाद दूट जाने से नाराज हुए।
युवाओं के कई समूहों द्वारा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के खिलाफ आठ सितंबर को माइती मंडला घर पर प्रदर्शन का ऐलान किया गया।
प्रदर्शन का ऐलान ज़ेन-ज़ी आंदोलन में सबसे अधिक चर्चा में आए सुदन गुरुंग के एनजीओ ‘ हामी नेपाल ’ द्वारा भी किया गया। ‘ हामी नेपाल ’ द्वारा सात सितंबर को प्रदर्शन की घोषणा करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफार्म डिस्कार्ड पर युवाओं से कहा गया-‘ बहुत लंबे समय से भ्रष्टाचार ने हमारा भविष्य, हमारे सपने और हमारे राष्ट्र की गरिमा को छीन लिया है। हम नेताओं को अमीर बनते देखते हैं जबकि आम लोग जिंदा रहने के लिए संघर्ष करते हैं। हम अन्याय को आम होते हुए देखते हैं लेकिन अब यह और स्वीकार्य नहीं। ’
‘ हमाी नेपाल ’ एक दशक पहले भूकंप की त्रासदी के समय अस्तित्व में आया था। आठ सितंबर के पहले यह एनजीओ ‘ मानवता, करूणा और सेवा ’ को अपना ध्येय मानते हुए भूकंप, बाढ़ के प्रभावितों के बीच देशी-विदेशी अनुदान के जरिए सेवा कार्य कर रहा था। राहत वितरण के कई कार्य उसने सेना के साथ किया। ज़ेन-ज़ी प्रदर्शन के पहले उसका राजनीतिक मुद्दों पर कभी बोलते या हस्तक्षेप करते नहीं सुना गया था। ओडीसा आईआईटी में नेपाली छात्रा प्रकृति लम्साल की मौत पर हामी नेपाल ने जरूर सक्रियता दिखायी थी और तत्कालीन विदेश मंत्री आरजू राना देउबा को ज्ञापन दिया था।
आरजू राना देउबा पांच बार प्रधानमंत्री रहे और वर्तमान में नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेरबहादुर देउबा की पत्नी हैं। जेनजी आंदोलन के दूसरे दिन नौ सितंबंर को उग्र भीड़ ने शेरबहादुर देउबा और आरजू देउबा के साथ मारपीट की थी और उनके घर को जला दिया था। सेना के जवानों ने उन्हें किसी तरह बचाया और सुरक्षित स्थान पर ले गए थे।
‘ हामी नेपाल  के साथ-साथ ज़ेन-ज़ी के कई और समूह आठ सितंबर को प्रदर्शन का आह्वान किया था जिसमें रक्षा बम, युजन राज भंडारी, अर्जुन शाही, टंका धामी, सिराज धुंगाना, तनुजा पांडेय आदि के नाम उभर कर सामने आए हैं। कुछ युवाओं ने सात सितंबर की शाम माइतीघर के पास बैठक भी की।
ये समूह देश में भ्रष्टाचार, पलायन, राजनीतिक दलों की विफलता, सरकार की निरंकुशता पर एक राय रखते हैं लेकिन आंदोलन के बाद राष्ट्रपति व सेनाध्यक्ष के साथ बातचीत में संसद के विघटन, लोकतंत्र, संविधान में संशोधन, अंतरिम सरकार को लेकर अलग-अलग राय सामने आयी।
रक्षा बम, युजन राज भंडारी सहित कई युवाओं ने सेनाध्यक्ष द्वारा राजशाही की वापसी और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए अभियान चलाने वाले विवादास्पद व्यवसायी दुर्गा प्रसाई, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को बातचीत में शामिल होने का विरोध किया था।
दुर्गा प्रसाई ने 10 सितंबर को नेपाली सेनाध्यक्ष के साथ वार्ता की तस्वीर साझा करते हुए लिखा था कि ‘ उन्हें पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की, काठमांडू के मेयर बालेन शाह का नेतृत्व स्वीकार है। यदि कोई आगे नहीं आता है तो मैं भी तैयार हूँ। ’
ज़ेन-ज़ी आंदोलन का समर्थन दुर्गा प्रसाई ने भी किया था। उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट पर सात सितम्बर की शाम ज़ेन-ज़ी आंदोलन के एक समूह के युवाओं के साथ तस्वीर साझा की थी।
दुर्गा प्रसाई पर अवैध हथियार रखने, बैंकों का पैसा गबन करने सहित कई आरोप हैं। इसी साल के शुरुआत में राजशाही की वापसी के लिए शुरू किये गए प्रयास के तहत ‘ राज संस्था पुनर्स्थापना के लिए संयुक्त जन आंदोलन समिति ‘  का गठन हुआ था और दुर्गा प्रसाई इसके कमांडर बने। राजशाही के समर्थन में 28 मार्च को काठमांडू के तिनकुने में हुए हिंसक प्रदर्शन का इन्होंने नेतृत्व किया था जिसमें एक टीवी पत्रकार सहित दो लोगों की जान चली गयी और 100 से अधिक पुलिसकर्मी व प्रदर्शनकारी घायल हो गए थे। उस समय भी निजी सम्पत्ति, अस्पताल, व्यापारिक केन्द्र और तीन मीडिया केन्द्रों पर आगजनी, तोड़फोड़ व लूटपाट की गई थी। नेपाल समाजवादी पार्टी के कार्यालय को आग लगाया गया था। एक पखवारे बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया।
अगस्त महीने के पहले सप्ताह जेल से बाहर आए हैं। जेल से बाहर आने के बाद  राज संस्था के प्रति भावुक उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था- “ राजा राष्ट्र का सर्वोच्च प्रतीक होता है। वह केवल एक दल, जाति या समूह नहीं, बल्कि सभी नागरिकों का एक साझा आधार है। राजा में कोई विवाद नहीं होता, क्योंकि उसका स्थान राजनीति या स्वार्थ से ऊपर होता है। राजा सभी को समान दृष्टि से देखता है, सभी के हितों और एकता की रक्षा करता है। इसलिए, राजा को संप्रभु राष्ट्र के साझे गौरव, परंपरा और एकता का प्रतीक माना जाता है। उसके वचन और कर्म सभी लोगों की पहचान को जोड़ने का काम करते हैं। ‘’
नेपाली समाचार पत्रों पर ज़ेन-ज़ी आंदोलन में शामिल युवा समूहों के नेतृत्वकर्ताओं के साक्षात्कार को देखने से स्पष्ट होता है कि आठ सितंबर को प्रदर्शन में जिस तरह सैकड़ो युवा जुटे उसका उन्हें कत्तई अनुमान नहीं था। युवाओं की भीड़ देख वे चकित भी हुए और उत्साहित भी। माइतीघर मंडाला पर प्रदर्शन के लिए नेपाली पुलिस व प्रशासन से अनुमति भी ली गई थी। बात काबू से तब होने लगी जब प्रदर्शन करते हुए युवा माईतीघर से नया बानेश्वर स्थित संसद की तरफ बढ़े। नेपाल प्रहरी द्वारा युवाओं को रोकने का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं था। शायद नेपाली पुलिस को भी इसका अनुमान न रहा हो कि हजारों की संख्या में लोग प्रदर्शन में जमा होंगे। प्रदर्शन में शामिल तमाम लोग संसद की तरफ बढने लगे तो नेपाली प्रहरी से टकराव शुरू हो गया। यहां पर ज़ेन-ज़ी समूह अपने लोगों को नियंत्रित करने और वापस लाने की कोशिश किए लेकिन वह असफल हो गए। नेपाली प्रहरी ने आंसू गैस छोड़े और फिर फायरिंग शुरू कर दी। पहले दिन ही आंदोलन में 19 युवाओं की मौत हो गयी और 400 से अधिक लोग घायल हो गए।
आंदोलन के बर्बर दमन से पूरे देश में आक्रोश उत्पन्न हुआ। गृहमंत्री और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग होने लगी। गृहमंत्री रमेश लेखक ने रात में इस्तीफा दे दिया और ओली सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर प्रतिबंध भी हटा लिया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
 नौ सितंबर की सुबह से हजारों की उग्र भीड़ काठामंडू की सड़कों पर उतर गयी। संसद, सुप्रीम कोर्ट, महान्यायवादी कार्यालय, सिंह दरबार, राष्ट्रीय वाणिज्य बैंक सहित दर्जनों सरकारी संरचनाएं, नेकपा एमाले, नेपाली कांग्रेस, नेकपा माओवादी केन्द्र सहित कई दलों के कार्यालय , इन दलों के शीर्ष नेताओं के घर जला दिए गए। काठमांडू में आलीशान हिल्टन होटल, भाट भेटनी सुपर मार्केट, चंद्रगिरी केबल कार, कार शोरूम, बैंक शाखा कार्यालय, सीजी डिजिटल,एनसेल, हयात रीजेंसी होटल सहित देश के कई हिस्सों में व्यापारिक प्रतिष्ठान, सरकारी कार्यालय, जिला न्यायालय, प्रांतीय सरकारों के कार्यालय जला दिए गए।
थापाथली स्थित कांतिपुर डेली,  तिनकुने स्थित कांतिपुर टीवी और रेडियो कांतिपुर के कार्यालयों में आगजनी की गई।  अन्नपूर्णा पोस्ट को भी निशाना बनाया गया।
नेपाल बीमा प्राधिकरण का कहना है कि अब तक निजी संपत्ति के नुकसान के दावों की राशि 30 अरब तक पहुंच गई है।
राष्ट्रीय वाणिज्य बैंक के नया बानेश्वर शाखा से 18 किलो सोना और पांच करोड़ नगदी लूट लिए गए। नेपाल बैंकर्स एसोसिएशन के अनुसार देश भर में 61 बैंक कार्यालयों को नुकसान पहुंचा है। होटल सेक्टर 25 अरब के नुकसान का अनुमान लगा रहा है।
इस हिंसा में अब तक 74 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है। आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट का मुल्यांकन होना शेष है।  विशालकाय सुपर मार्केट की श्रृंखला भाट भेटनी की 30 में से 21 शाखाएं जलकर कर खाक हो चुके हैं। भैरहवां सहित कई स्थानों पर नेपाली कस्टम आफिस जला दिए गए। मालपोत कार्यालय , जिला न्यायालय भी जलाए गए। दर्जनों जेल से 14 हजार से अधिक कैदी भाग गए। अब भी करीब दस हजार कैदी गायब हैं। धोखाधड़ी और मनी लाॅडरिंग के केस में जेल में बंद राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने भी काठमांडू के नक्खू जेल से निकल कर घर आ गए जहां सैकड़ों लोगों ने उनका स्वागत किया। उनका कहना था कि सरकारी आदेश पर वह छूट कर आए है लेकिन चार दिन बाद वह खुद जेल वापस चले गए।
इस बात पर भी हैरत जताई जा रही है कि आखिर नौ सितंबर को रात दस बजे तक हिंसा, आगजनी, लूटपाट को रोकने के लिए सेना ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया ? सेनाध्यक्ष रात दस बजे देश के नाम संदेश देते हैं और इसके बाद सेना की गाड़ियां सड़क पर आती हैं और आगजनी, तोड़फोड़ रूकने लगती है। नौ सितंबर को पूरे दिन और रात भर जलते सरकारी भवनों की आग बुझाने के लिए भी कोई प्रयास नहीं हुआ।
नौ सितंबर को हिंसा, आगजनी और लूटपाट के पैटर्न को देखें तो यह लोगों को आक्रोश की अभिव्यक्ति से कहीं बहुत अधिक नजर आता है। चुन-चुन कर नेपाल में स्थापित दलों के नेताओं के घरों, कार्यालयों को तो निशाना बनाया ही गया है।  उन प्रतिष्ठानों को भी आग के हवाले किया गया जिसके बारे में आम तौर पर चर्चा रहती है कि इसमें कुछ शीर्ष नेताओं की अवैध कमाई लगी है। हिल्टन होटल के बारे में ऐसी ही चर्चा है। भाट भेटनी सुपरमार्केट चेन के बारे में भी कहा जाता है कि इसमें नेताओं की कमाई लगी है। भाटभटेनी सुपर मार्केट के संचालक मान बहादुर गुरुंग और राजा समर्थक दुर्गा प्रसाई के बीच सार्वजनिक रूप से आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं।
भंसार (कस्टम), मालपोत कार्यालय, अदालतों, बैंकों को निशाना बनाए जाने के निहित स्वार्थ साफ तौर पर दिख रहे हैं। मालपोत कार्यालय में जमीन की खरीद-फरोख्त का पंजीकरण, स्वामित्व हस्तांतरण, जमीन बंटवारा आदि का कार्य होता है। भंसार कार्यालय सीमा शुल्क से राजस्व एकत्र कर नेपाली अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। देश भर में 40 बड़ा भंसार कार्यालय हैं। स्पष्ट है कि पहली बार आंदोलन में शामिल हो रहे जेनजी समूहों के लिए इतने बड़े पैमाने पर सरकारी संरचनाओं को पूरी तरह बेकाम करने की कार्यवाही कर पाना संभव नहीं है। यह कार्य नियोजित ओर संगठित रूप से किया गया है ताकि नेपाल सरकार व प्रशासन पूरी तरह पंगु हो जाए। यह साजिश एक हद तक सफल होते भी दिख रही है।
जलाए गए और लूट लिए गए सरकारी कार्यालय अपने को कामकाज शुरू करने पर अक्षम बता रहे हैं। इन कार्यालयों द्वारा अब अपील जारी की जा रही है कि उनके यहां से लूटे गए सामान वापस कर दिए जाएं। मंत्रियों का शपथ टेंट में हो रहा है। नागरिकों ने कुछ कार्यालयों को कम्प्यूटर व अन्य जरूरी सामान भेंट किए जाने की तस्वीरें भी आ रही हैं।
नौ सितंबर को पोखरा के मुख्य चौक पर घटी घटना भी व्यापक हिंसा, तोड़फोड़ व लूटपाट को समझने की तरफ संकेत देती है। नौ सितंबर को दोपहर में कुछ लोगों ने मुख्य चौक पर स्थापित शहीद लखन थापा की प्रतिमा को तोड़कर गोरखा राजशाही की स्थापना करने वाले पृथ्वीनारायण शाह की प्रतिमा स्थापित कर दी। शहीद लखन थापा नेपाल में राणाशाही के खिलाफ जन विद्रोह की अगुवाई करते हुए शहीद हुए थे। उनकी प्रतिमा तोड़े जाने पर आदिवासी जनजाति महासंघ ने तीव्र आक्रोश प्रकट किया और पांच दिन बाद फिर शहीद लखन थापा की मूर्ति स्थापित कर दी। इस स्थान पर पांच दशक में कई बार शहीद लखन थापा की प्रतिमा हटायी गयी। तीन वर्ष पहले राजा समर्थक दल राप्रपा की ओर से यहां पर पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा स्थापित की गयी थी जिसे एक वर्ष वाद ही आदिवासी संगठनों ने हटा कर फिर शहीद लखन थापा की प्रतिमा स्थापित की थी।
पोखरा का यह घटनाक्रम पूरे देश में राजवादी समर्थकों और संविधान-लोकतंत्र-गणराज्य समर्थकों के बीच चल रहे निरतंर संघर्ष का प्रतीक है। एक वर्ष से अधिक समय से राजावादी ताकतें फिर से संगठित हुई हैं। नेपाल में स्थापित राजनीतिक दलों के खिलाफ बढ़ रहे असंतोष को उन्होंने ठीक से पढ़ा और अपनी सक्रियता बढाई। नौ मार्च को पोखरा से काठमांडू लौटने पर राजा के जबर्दस्त स्वागत और फिर 28 मार्च को काठमांडू के तिनकुने में हिसंक प्रदर्शन के जरिए उन्होंने अपनी बढ़ती शक्ति की नुमाइश भी की थी। नेपाल में लगातार पांव पसार रहे हिन्दू संगठनों-हिन्दू स्वंयसेवक संघ  आदि का भी उनका परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन भी मिल रहा था। ज़ेन-ज़ी आंदोलन में इन ताकतों ने भी घुसपैठ की और अवसर को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश भी की गई। नेपाली सेनाध्यक्ष के साथ बातचीत में दुर्गा प्रसाई, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का शामिल होना और उनके द्वारा संविधान, लोकतंत्र, संघवाद के प्रति सवाल उठान इसी प्रयास को दर्शाता है।
यहां यह भी उल्लेख कर देना जरूरी होगा कि एक तरफ राजा और उनके समर्थक राजतंत्र की वापसी, देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए शक्ति प्रदर्शन की भूमिका बना रहे थे तो दूसरी तरफ पूर्व राजा ज्ञानेन्द्र शाह के पौत्र  23 वर्षीय हृदयेन्द्र विक्रम शाह के लिए सोशल मीडिया अभियान भी चलाया जा रहा था। राजावादी उन्हें नेपाल के ‘ नए भविष्य ’ को तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं। एक समय बेहद बदनाम हुए ज्ञानेन्द्र शाह के पुत्र पारस शाह ने अंतरिम सरकार के गठन के लिए हो रही वार्ता के दौरान अपने फेसबुक पर 10 सितम्बर को एक पोस्ट लिख कर वार्ता के अनिवार्य शर्तों का उल्लेख किया। इन शर्तों में ‘ प्रतिनिधि सभा, राष्ट्रीय सभा सहित प्रादेशिक सभाओं के विघटन, नई संसद द्वारा संविधान संशोधन, कार्यकारी प्रमुख का प्रत्यक्ष निर्वाचन, सभी तरह के आरक्षणों का खात्मा, सांसदों, मंत्रियों के लिए योग्यता निर्धारण आदि बताते हुए आखिर में राष्ट्र प्रमुख के रूप में राजा या बेबी किंग को स्वीकार करने की बात कही। ‘
ज़ेन-ज़ी आंदोलन में शामिल समूह के साथ लेखक-पत्रकार भी कह रहे हैं कि इस आंदोलन में दूसरे दिन तमाम हित समूहों ने घुसपैठ बना ली थी। इस बारे में कान्तिपुर समाचार पत्र ने एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की है।
इन हित समूहों में कुछ का उद्देश्य सरकार को अपदस्थ करने के साथ-साथ नेपाल को राजनीतिक शून्य की तरफ धकेल देने की योजना थी ताकि वे आगे अपने को इस अवसर का लाभार्थी बन सकें।
अब आगे क्या होगा ? यह सबसे बड़ा प्रश्न है जिसका जवाब ढूंढा जा रहा है। दस वर्ष के माओवादी आंदोलन और उसके बाद सात राजनीतिक दलों के गठबंधन के साथ माओवादियों के जनआंदोलन-दो ने मई 2008 में नेपाल में 240 वर्ष के राजतंत्र का खात्मा कर नेपाल विश्व का सबसे नया गणराज्य बना दिया। उसके बाद 17 वर्ष में संविधान सभा और आम चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। संविधान निर्माण की प्रक्रिया लम्बी चली। संविधान बनाने में काफी समय लगने से ही लोगों की उम्मीदें टूटने लगी थी। जब 20 सितम्बर 2015 को संविधान लागू हुआ तब तराई और मधेश के लोग असंतुष्ट होकर आंदोलन पर उतर आए। भारत ने इस आंदोलन की आड़ में नेपाल में ‘ नियंत्रित नाकाबंदी ’ कर दी। नाकाबंदी के दौरान नेपाली नागरिकों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। इन चुनौतियों से नेपाल सामना कर ही रहा था कि उसे बड़े भूकम्प की त्रासदी का सामना करना पड़ा। फिर कोरोना महामारी ने अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया।
राजशाही की समाप्ति, नया संविधान बनने के बाद नेपाल में स्थिरता, विकास की जबर्दस्त जन आकांक्षा बनी थी। नेपाल में बदलाव की उम्मीदों के पंख लग गए थे। ‘ नया नेपाल ’ का नारा गूंजने लगा था। यह सबसे ज्यादा सुना जाने वाला शब्द था। लोगों को उम्मीद थी नए संविधान के अनुरूप संघीय ढांचा अस्तित्व में आएगा, सभी क्षेत्रों, वर्गों और वंचितों को लोकतंत्र में हिस्सेदारी होगी। नेपाल से बड़े पैमाने पर होने वाला पलायन रूकेगा, विेदेश जाने की मजबूरी खत्म होगी और लोगों को अपने देश में रोजगार मिलेगा। शिक्षा-स्वास्थ्य सबके पहुंच में होगा। बुनियादी ढांचे का विकास होगा।
लेकिन यह उम्मीदें धराशायी हो गईं। राजशाही की समाप्ति के बाद पिछले 17 वर्षों में 14 सरकारें अस्तित्व में आयीं। सभी सरकारें अल्पजीवी रहीं। इस दौरान केपी ओली चार बार, पुष्प कमल दहल प्रचंड तीन बार, शेर बहादुर देउबा दो बार, माधव नेपाल, झलनाथ खनाल, बाबूराम भट्टराई और सुशील कोईराला प्रधानमंत्री बने। पूर्व न्यायाधीश खिलराज रेग्मी 14 मार्च 2013 से 11 फरवरी 2014 तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे।
भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता, भाई-भतीजावाद, सत्ता का केन्द्रीकरण सभी सरकारों की केन्द्रीय प्रवृत्ति रही। सिद्धांतहीन अवसरवादी गठजोड़ों ने सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिए। भ्रष्टाचार के नए-नए प्रकरण सामने आ रहे थे लेकिन प्रभावी कार्यवाही नहीं हो रही थी बल्कि उसे छुपाने, दबाने की कोशिश होती रहीं। भ्रष्टाचार, मनमानी के खिलाफ खड़े हुए अफसरो, शिक्षाविदों, न्यायविदों, पेशेवरों को किनारे लगाने का प्रयास हुआ। संविधान की भावना के अनुरूप प्रांतीय ढांचे को मजबूत करने में कोई रूचि नहीं ली गई।
इन कारणों से जनता में पैदा हुई निराशा आक्रोश में बदलने लगी। जनता की निराशा और आक्रोश की अभिव्यक्ति बार-बार कई रूपों में होती रही है। पिछले आम चुनाव में नए दलों के समर्थन और बड़े राजनीतिक दलों के लोकप्रिय मतों में आयी गिरावट में इसे देखा जा सकता है। निकाय चुनाव में राजनीतिक दलों से हटकर सोशल मीडिया में लोकप्रिय चेहरों को समर्थन दिया जाना भी इसी का संकेत था लेकिन सत्ता के लिए जोड़-तोड़ में जुटे राजनीतिक दलों ने इससे कोई सबक नहीं लिया।
एक तरफ जनता का आक्रोश जमा हो रहा था तो दूसरी तरफ स्थापित दलों और उनका नेतृत्व बेपरवाह बना रहा। जेनजी आंदोलन के कुछ समय पहले ही दस वर्ष से पार्टी का नेतृत्व  कर रहे केपी ओली ने दूसरे नेताओं के लिए रास्ता खाली करने से इंकार कर दिया और विधान अधिवेशन में दो टर्म और 70 वर्ष की आयु सीमा का प्रतिबंध हटाकर उन्हें फिर से नेकपा अध्यक्ष बनाने की राह बना दी गई। पार्टी के भीतर से उठी आवाजों को अनसुना कर दिया गया। नेपाली कांग्रेस, माओवादी केन्द्र में भी नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठीं लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ।
आखिरकार जब ज़ेन-ज़ी आंदोलन के जरिए जन असंतोष फूट पड़ा तो अब एमाले, माओवादी केन्द्र, नेपाली कांग्रेस सहित कई दलों में पुनर्गठन, अपनी रीत-नीति बदलने, पार्टी प्रमुख की पाद पूजा बंद करने और युवाओं को आगे लाने की बात होने लगी है। पूर्व शिक्षा मंत्री और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की नेता सुमना श्रेष्ठ ने अपनी पार्टी से इस्तीफा देते कहा कि ” अपने नेताओं को पूजना बंद कर करो। या तो उन्हें हटा दो या उन्हें छोड़ दो। “
ज़ेन-ज़ी आंदोलन के बाद नेपाल की राजनीति में बना लम्बे समय से ठहराव अब टूटता दिख रहा है। नेपाल के इतिहास में यह पहला ऐसा आंदोलन था जिसमें कोई राजनीतिक दल या संगठन नेतृत्व में नहीं था। यह आंदोलन भी कोई संगठन या नेतृत्व देता हुए नहीं दिख रहा है।
राजनीतिक दलों ने संसद के विघटन से असहमति जताते हुए हुए सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार को मान लिया है और चुनाव की तैयारी में जाते दिख रहे हैं। वे अपने जले हुए कार्यालयों का निरीक्षण कर रहे हैं और फिर से खड़े होने की बात कर रहे हैं। राजावादियों को एक बार फिर झटका लगा है। मौजूदा संकट में अपने लिए अवसर तलाश रहे राजवादी शक्तियों को ज़ेन-ज़ी समूहों से बहुत ज्यादा समर्थन नहीं मिला। दुर्गा प्रसाई पार्टी बनाने की बात कह रहे हैं। अभी तक पर्दे के पीछे रह रहे बालेन शाह और उनके जैसे अन्य नेता भी अपनी नई भूमिकाओं की तलाश कर रहे हैं। ज़ेन-ज़ी समूह से भी कुछ राजनीति के मैदान में आयेंगे ही।
इतिहास बताता है कि हर आंदोलन और संघर्ष के बाद नेपाल आगे ही बढा है। भले ही क्रांतियां अधूरी रही लेकिन उनकी उपलब्धिों ने देश-समाज को अग्रगति ही दी। उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा आंदोलन भी तमाम गतिरोध को तोड़ते हुए देश को एक नई राह दिखाएगा।
(यह लेख 19 सितम्बर को द वायर हिंदी में प्रकाशित हुआ है )
Fearlessly expressing peoples opinion