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ज़ेर-ए-बहस

मानने वाले समाज में जानने वालों का हस्तक्षेप और सरकार का डर

हम अपने देश भारत की महानता की गाथा सुनकर बड़े हुए हैं. हमें बताया गया कि भारत आदि-अनादि काल से ही एक महान देश रहा है. बचपन से ही हमें चिड़ियों में सोना खोजना सिखाया जाता रहा है. हमें बताया गया कि इस देश में ऋषि-मुनियों ने तपस्या करके ज्ञान और सिद्धि प्राप्त की तथा हम उन्हीं के वंशज हैं.

हम यह मानते हुए बड़े हुए कि ब्रह्मांडीय ज्ञान के तमाम सार हमारे धर्मग्रंथ में ही छिपे हुए हैं. ईश्वर सर्व शक्तिशाली है और धर्म सबसे ऊपर. सारा जोर हमारे मानने पर दिया गया, जानने पर एक अनंत साजिश के तहत पाबंदी लगी रही. हमारे जीवन के सबसे सूक्ष्मतम परतों को सिर्फ मानने के आधार पर विकसित करने का प्रयास किया गया. जानने को एक अपराध की तरह हमारे अंतर्मन में बिठा दिया गया.

इन जटिल धार्मिक-सामाजिक संरचना के मानने वाले आधार से बाहर निकलने पर जानने का महत्व ज्ञात हुआ. मानने और जानने का फर्क पता चलना ऐसे देश के युवाओं के जीवन की एक बेहद महत्वपूर्ण घटना है. और इस देश के युवा/नागरिक जितना जानेंगे, समाज को मानने के आधार पर गुलाम बनाकर सदियों से राज करने वाली ताकतें उतना ही बौखलाएंगी.

इस देश में(जिसे लोकतांत्रिक देश माना जाता है) सत्ता भी मानने वाले लोगों का है. ऐसे में जानने वाले लोगों के प्रति मानने वाले लोगों का नफरत, इनकी घबराहट-बौखलाहट और साजिश चरम पर होगी ही. जानने वाले लोगों को इन मानने वाले लोगों ने अपने साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा घोषित कर रखा है.

मानकर जीवन जीने वाले समाज को जानने वाले समाज बनने की ओर अग्रसर करने में बहुत बड़ा योगदान प्रगतिशील विचारधारा और साहित्य का रहा है. भारत जैसे सिर्फ मानकर चलने वाले समाज को विकसित करने में वामपंथी-प्रगतिशील विचारधारा और साहित्य-संस्कृति का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है. वर्तमान में यह समाज रूढ़िवादिता और मानने वाले सिस्टम से इस कदर घिरा हुआ है कि यहाँ प्रगतिशील विचारधारा और इनके साहित्य-संस्कृति के व्यापक विस्तार से ही इस समाज को नष्ट होने से बचाया जा सकता है.

भारत की सत्ताधारी ताकतें इस बात से भलीभांति अवगत हैं. उन्हें आभाष है कि प्रगतिशील विचारधारा, प्रगतिशील साहित्य-संस्कृति और प्रगतिशील लोग उनकी हजारों सालों से जमे-जमाए(मनुवाद और रूढ़िवादिता के मानने वाले आधार पर) साम्राज्य को जड़ से उखाड़ कर फेंकने में सक्षम हैं. वर्तमान सत्ता को एक बड़ा डर वामपंथी-प्रगतिशील विचारधारा का भी है. उन्हें डर है इनके प्रगतिशील साहित्य-संस्कृति और जानने वाले सिद्धांत का.

इस दौर में इस हिंदूवादी-दक्षिणपंथी विचारधारा के शासकों द्वारा इस डर से कई हत्याएं की गई. पत्रकारों से लेकर जज तक ही हत्या की गई. सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी की गई. जानने वाले लोगों की हत्याएं की गई, उन्हें गिरफ्तार कर जेल में बंद किया गया. शिक्षा और ज्ञान पर लगातार हमला इन शासकों के डर को साफ़-साफ़ दर्शाता है. ये चाहते हैं कि इस देश में जानने वाले तमाम लोग खामोश रहें. ये देश को जानने वाली संस्कृति से निकालकर मानने वाली संस्कृति में ही सिकुड़ कर रखना चाहते हैं.

हिटलर ने 15 साल के एक बच्चे को वामपंथी साहित्य रखने के कारण जेल में बंद कर दिया था. वर्तमान सरकार भी इस तरह के साहित्य रखने/पढने वाले लोगों से भयभीत है. उन्हें पता है कि ये वे लोग हैं जिन्होंने डरना छोड़ दिया है. ये लोग उनके लिए डर बन गए हैं.

भारत जैसे देश में हजारों सालों से चली आ रही सामाजिक संरचना और व्यवस्था सड़ चुकी है और नागरिकों को मानसिक पतन की ओर तेजी से अग्रसर कर चुकी है. इस पूंजीवादी दौर ने इस समाज में मनुष्यता और मानवीय संवेदना का संकट खड़ा कर दिया है. इसने इस समाज को तमाम दृष्टिकोण से विनाश की ओर धकेल दिया है. और पूंजी के फलने-फूलने में सशक्त भूमिका निभाने वाली सरकार इस विनाश में तमाम तरह से योगदान कर रही है. ऐसे में सरकार जानने वाले लोगों को खामोश करने में कानून और तमाम मशीनरी का इस्तेमाल करने में लगी है.

मगर प्रगतिशीलता और वैज्ञानिक ज्ञान किसी सरकार या कानून से बहुत ऊपर हैं. यह सीधे मनुष्य और सभ्यता के विकास से जुड़ा हुआ है. मानवीय मस्तिष्क और मानवीय ज्ञान से जुड़ा हुआ है. इनका मानव मस्तिष्क के विकास में बड़ा योगदान रहा है. और यही विचारधारा तथा वैज्ञानिक ज्ञान/दृष्टिकोण इस पूंजीवादी युग के खात्मे और समाजवाद की स्थापना का आधार है.

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