जयप्रकाश नारायण
विपक्ष के नेता (एलओपी) राहुल गांधी ने ऐसा क्यों कहा कि ‘मैं जानता हूं कि मैं आग से खेल रहा हूं’ और इस खेल में क्या-क्या खतरे हैं, उसे भी मैं समझता हूं, लेकिन इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि मैं डरता नहीं हूं। डरे हुए वे लोग हैं, जो षड्यंत्र रचते हैं।
सवाल यह है कि संसद में विपक्ष का नेता (next to prime minister)अगर डरा देने वाले निष्कर्ष तक पहुंच गया है, तो लोकतंत्र, बराबरी और न्याय के लिए आवाज उठाने वाले आम नागरिकों का क्या होगा! राहुल गांधी के इस अनुभूति तक पहुंचने के क्या कारण हो सकते हैं? भारतीय लोकतंत्र के अंदर वह कौन सी अंत:क्रियाएं चल रही हैं, जिसकी गति का अध्ययन करने के बाद राहुल गांधी इस निष्कर्ष तक पहुंचे हैं, कि वे आग से खेल रहे हैं। तो सवाल है कि माचिस की तीली किसके हाथ में है, उसकी पहचान राहुल गांधी को सार्वजनिक करना चाहिए। एलओपी की भूमिका निभाते हुए राहुल गांधी द्वारा सरकार की नीतिगत आलोचना या सरकार के फैसलों की चीर-फाड़ करना उनका संवैधानिक अधिकार और दायित्व है। तो वे इसे आग से खेलना क्यों कह रहे हैं?
पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी सरकार के समक्ष ऐसे प्रश्न खड़ा कर रहे हैं, जिससे सर्व सत्तावादी मोदी सरकार असहज महसूस कर रही है । ये सवाल तात्कालिक घटनाओं से संबंधित होने के साथ-साथ मोदी सरकार के बुनियादी चरित्र से जुड़े हैं। जिससे आम नागरिक की समझ बन रही है कि मोदी सरकार असहमति और विरोध को लोकतांत्रिक भावना के तहत स्वीकार करने की बजाय उसे दबाने के लिए सत्ता का दुरुपयोग कर रही है।
अगर इसके वैचारिक जड़ों की तलाश की जाय तो हम पायेंगे कि हिंदुत्ववादी चिंतन में अंतर्निहित लोकतंत्र के निषेध की मूल विचारधारा और सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि का होना है। चूंकि सामाजिक समानता और नागरिक स्वतन्त्रता के निषेध की आधारशिला पर हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना विकसित हुई है, इसलिए आधुनिक लोकतंत्र हिंदुत्व के लिए परायी विचारधारा है। जिसे, वह संघ प्रायोजित भारतीय संस्कृति और चिंतन परम्परा के विलोम में देखता है। संघ के राजनीतिक चिंतन के मूल में एकात्मक राष्ट्रवाद की विचारधारा है, जहां विविधता, मत-भिन्नता शत्रुता का रुप ले लेती है।इसलिए मोदी के नेतृत्व वाली सरकार सवाल उठाने वालों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से छुटकारा पाने के लिए कानून के शासन से इतर जाकर सत्ता के दुरपयोग व षड्यंत्र के राह का अनुसरण करती है।
वर्तमान समय में हिन्दुत्ववादियों और कॉरपोरेट पूंजी के गठजोड़ के हाथ में राज सत्ता है। दोनों अति केंद्रीयता की धुरी पर टिकी विशिष्ट किस्म की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक संरचना का प्रतिनिधित्व करते हैं। मोदी का तो नारा ही है मजबूत सरकार।
यहां एक तथ्य पर निगाह डाल लेना जरूरी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से ही पूंजी की लूट व वर्चस्व की राजनीतिक संस्कृति को उखाड़ फेंकने वाली विचारधाराएं राज्य के निर्मम दमन का शिकार होती रही हैं। शोषण और लूट की व्यवस्था के निषेध की वैचारिकी विकसित करने वाले मार्क्सवादी दर्शन के अनुयाई उपनिवेशवाद के दौर से आज तक भारतीय राज्य के निशाने पर रहे हैं। शहादते होती रही हैं। हजारों कार्यकर्ता और नेता मारे गए हैं। स्वतंत्रता के आंदोलन और उसके बाद भी बुनियादी परिवर्तन की ताकतों और राजनीतिक संगठनों को राज्य दमन झेलना पड़ता रहा है।
लेकिन ऐसा व्यक्ति जो सत्ता के बीच में ही जन्मा हो। जो राज्य की समस्त विशिष्टताओं और अंतर्निहित क्षमता और संरचना से पूर्णतया वाकिफ हो। सत्ता की संस्कृति के बीच पला-बढ़ा और निर्मित हुआ हो। यानी शासक वर्ग का अभिन्न अंग हो। राज्य के गति विज्ञान और कार्य प्रणाली को समझता हो। इसलिए उसे डर नहीं लगता है । सहूलियत प्राप्त वर्ग से होने के बावजूद विपक्ष का नेता कहे कि वह जानता है, कि आग से खेल रहा है, तो यह चिंतनीय प्रश्न बन जाता है।
ऐसे डरावने समय में सभी लोकतांत्रिक नागरिकों को सोचना होगा कि हमारा लोकतंत्र किस दिशा में जा रहा है । क्या निकट भविष्य में कोई बुनियादी संस्थागत परिवर्तन होने वाला है, जिसको लेकर राहुल गांधी कह रहे हैं कि वह आग से खेल रहे हैं। यानी शासक वर्ग के मध्य कोई ऐसा अघोषित राजनीतिक संघर्ष चल रहा है, जिसकी परिणीति आग, खून और विध्वंस में हो सकती है।
शासक वर्गों के मध्य आपसी टकराव समाज के अंदर मौजूद ढांचा गत संकटों के समाधान न हो पाने के दौर में ही सतह पर आते हैं। अगर 1947 में बने सत्ता संरचना के अंदर मौजूद आंतरिक सहमति के बिखर जाने का संकेत 2014 के बाद से दिखाई दे रहा है, तो निश्चय ही आज का मंजर 1975 से ज्यादा भयानक है।
इससे एक बात स्पष्ट है कि वर्तमान शासक वर्ग का आंतरिक अंतर्विरोध संघ-नीत मोदी सरकार में चरम पर पहुंच गया है । जिसका समाधान संवैधानिक जनतंत्र के आवरण में संभव नहीं दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी पर लगातार थोपे जा रहे मुकदमे से लेकर अरविंद केजरीवाल, सत्येंद्र जैन, हेमंत सोरेन , जिग्नेश मेवानी महाराष्ट्र के अनिल देशमुख सहित दर्जनों मंत्रियों, नेताओं, नौकरशाहों (संजीव भट्ट), उद्योगपतियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ सत्ता प्रायोजित हमला इस बात की पुष्टि कर रहा है कि व्यवस्थागत संकट गहरा हो गया है और उसके गर्भ में लोकतंत्र को ढहा देने वाली अंत:क्रियाएं तेज हो गई हैं। यानी देश हिंदुत्व-कॉर्पोरेट फासीवाद के मुहाने पर खड़ा है।
लोकतंत्र के अंतर्निहित संकट (पूंजीवाद में यह संकट चक्रीय रूप से प्रकट होता है) के कारण स्वतंत्रता आंदोलन से बाहर रहने वाली तथा औपनिवेशिक सत्ता समर्थक फासीवाद की वैचारिकी से प्रेरित हिंदू राष्ट्रवाद का झंडा उठाए और आधुनिक संघात्मक लोकतांत्रिक भारत की सम्पूर्ण अवधारणा की विरोधी ताकतें अब पतनशील लुटेरी कारर्पोरेट पूंजी के साथ घुल-मिल कर राज्य के रूप में संगठित हो चुकी हैं। कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ मूलतः सार्वभौम संघात्मक लोकतांत्रिक गणराज्य की अवधारणा के निषेध पर विकसित हुआ है। इसलिए उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से निकले भारतीय गणराज्य के साथ इसके रिस्ते शत्रुता पूर्ण हैं। वस्तुतः एलओपी राहुल गांधी इसी बुनियादी टकराव की तरफ संकेत करते हुए कह रहे हैं कि वे आग से खेल रहे हैं।
संघ-नीत मोदी सरकार के पास नकारात्मक एजेंडा है। उस एजेंडे का कॉर्पोरेट मीडिया में विलय हो चुका है। प्रचार तंत्र और मीडिया पर उसका नियंत्रण है। इसलिए यह स्थाई चरित्र और टिकाऊ जनाधार पर खड़ा फासीवादी परियोजना से लैस आंतरिक आपातकाल है। 2014 के बाद मोदी सरकार ने 11 वर्षों में एक- एक कर सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं को नियंत्रित कर लिया है। मालेगांव में बम विस्फोट के अभियुक्तों को न्यायालय द्वारा दोषमुक्त हो जाने की घटना ने आने वाले भविष्य का संकेत दे दिया है। इसे आप हेमंत करकरे की दूसरी बार न्यायिक हत्या के बतौर देख सकते हैं।
दूसरा- मोदी-शाह राज की चारित्रिक विशिष्टताओं को गुजरात से लेकर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचने और उसके बाद के काल में स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। 2002 के गुजरात दंगे से संबंधित 40-45 सेकंड का एक वीडियो भाजपा नेता और गुजरात के गृहमंत्री रह चुके हरेंद्र पांड्या का सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। अब यह छिपा तथ्य नहीं है, कि गुजरात के ताकतवर नेता हरेंद्र पण्ड्या के साथ क्या हुआ। दूसरी तरफ अमित शाह का केस देख रहे जस्टिस लोया की मृत्यु का रहस्य आज भी फिजा में गूंजता रहता है। लोया के मित्र पूर्व जस्टिस कोलसे पाटिल से लेकर पत्रकार निरंजन टाकले तक बरसों से जो कुछ कहते चले आ रहे हैं, वह सब डरा देने वाले सच हैं। मोदी राज में पुलवामा, पहलगाम, उरी जैसी घटनाओं पर भाजपा सरकार के पूर्व मंत्रियों (सुब्रमण्यम स्वामी और यशवंत सिन्हा) और नेताओं के विचार आ चुके हैं। पुलवामा के समय भाजपा सरकार के कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जो कुछ कहा है, ‘वह समझदार के लिए इशारा काफी है।’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है।
ये सभी तथ्य मोदी के गुजरात से लेकर दिल्ली तक के सफर में घटित प्रत्येक घटनाओं को संदिग्ध बना देने के लिए काफी है। भाजपा के कई बड़े नेताओं और नौकरशाहों की दुर्घटना में मौत, आत्महत्याएं और आतंकी घटनाएं कई तरह के सवालों को जन्म देती रही हैं, जिनको लेकर गठित जांच कमेटियों या आयोगों की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक होने का इंतजार कर रही हैं।
भ्रष्टाचार से संबंधित फाइलों का गायब होना, न्यायालय में बंद लिफाफे में दी जाने वाली रिपोर्ट और देश की सुरक्षा के नाम पर सरकार द्वारा छुपाई जाने वाले सूचनाएं स्थिति की गंभीरता को व्यक्त करती हैं।
इसलिए अगर राहुल गांधी भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार, वोट की चोरी और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कब्जा करने की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं, तो निश्चय ही वह आग से खेल रहे हैं। राहुल गांधी का यह कहना मोदीराज के पिछले 25 वर्षों के घटनाक्रमों को देखते हुए कई तरह के आशंकाओं को जन्म देता है। इसलिए राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को इस बात का खुलासा करना चाहिए कि वे इस डरावने मूल्यांकन तक कैसे पहुंच गए हैं?
पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी-शाह की जोड़ी भारतीय लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को बदलने की दिशा में काम कर रही है। भाजपा के कई नेता, सांसद, मंत्री संविधान बदलने की बातें करते रहे हैं। संघ उपप्रमुख होसबोले ने कुछ दिन पहले कहा है कि अब संविधान समीक्षा का समय आ गया है। हमें इस दिशा में काम करना चाहिए। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से लेकर अधिकारियों, सचिवों, ईडी, सीबीआई, आईटी जैसी संस्थाओं में नियुक्तियों पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। ईडी के चीफ संजय मिश्रा के कार्यकाल बढ़ोतरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ा था।
इसका मतलब स्पष्ट है कि भारत में पिछले 75 साल के संवैधानिक गणतंत्र पर खतरा वास्तविक है। इसलिए लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंताएं गहरी हो गई हैं। क्या भारत में एक खास तरह की तानाशाही आकार लेने जा रही है? राहुल गांधी द्वारा वोट चोरी के खुलासों के बाद पिछले कुछ घंटों से यह सवाल फिजाओं में तेजी से गूंज रहा है।
वर्तमान साम्राज्यवादी वित्तीय पूंजी नियंत्रित विश्व में राज्य के जितने भी मॉडल हैं, इसमें सबसे क्रूर मॉडल धर्म और राज्य के विलय का माॅडल है। इसलिए जिन देशों में यह मॉडल सत्ता पर काबिज हुआ है। वहां लोकतंत्र खोखला हो जाता है। चुनाव परिणाम पूर्व निर्धारित होते हैं। स्वतंत्र चुनाव मशीनरी की परिकल्पना करना असंभव है। ऐसे राष्ट्र-राज्यों में लंबे समय तक एक पार्टी या एक विचार के लोग सत्ता पर काबिज रहते हैं। सांस्थानिक भ्रष्टाचार, विरोधियों की हत्याएं, लोकतांत्रिक नागरिकों का गायब होना, असहमत आवाजों का दमन राज्य की कार्यप्रणाली का स्वाभाविक चरित्र बन जाता है। राजनीतिक नेतृत्व राज्य मशीनरी और लंपट वाहिनियों के गठजोड़ द्वारा समाज पर नियंत्रण की सूक्ष्य प्रणाली थोप देता है।
हिंसा, षड्यंत्र, नफरती भेदभाव व विभाजनकारी विचार और व्यवहार राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत बन जाते हैं। कानूनों में निहित स्वार्थ के हित में बदलाव किए जाते हैं और उनकी व्याख्या सत्ता के राजनीतिक लाभ को देखकर की जाती है । विधायिका भक्त मंडली में बदल जाती है और न्यायपालिका कार्यपालिका सत्ता शिखर की सेवा में लगा दी जाती है।
सर्वोपरि एक तथाकथित महान रक्षक, उद्धारक, करिश्माई महानायक सत्ता के शिखर पर आरुढ़ हो जाता है, जो प्रश्नातीत होकर राष्ट्र समाज का प्रतीक बन जाता है। उसकी आलोचना राष्ट्र की आलोचना, उसकी नीतियों का विरोध विकास विरोधी घोषित कर दिया जाता है। अंततोगत्वा राष्ट्र-राज्य का एक नेता में विलय हो जाता है।
यहां से आधुनिक फासीवादी तंत्र सक्रिय होता है और वह सब कुछ जो लोकतांत्रिक है, मानवीय है, वैज्ञानिक है – नष्ट हो जाता है।
एक और मॉडल इधर देखने को मिल रहा है।जिसमें एक-दो कॉर्पोरेट घराने राज्य के साथ इस तरह से घुल-मिल जाते हैं, कि पार्टी सरकार और कॉर्पोरेट का अपवित्र गठबंधन ठोस शक्ल ले लेता है । जिसके शिखर पर सर्वशक्तिमान तानाशाह विराजमान हो जाता है।
हालांकि इन राष्ट्र राज्यों में रूप( फार्म)के स्तर पर कई तरह के फर्क दिखाई देते है।
संभवत राहुल गांधी राज्य के अंग होने के कारण भारत गणराज्य के भविष्य को कई संदर्भों से देख रहे हों। लेकिन यह तो निश्चित है कि जब दो दिन पहले कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा में वोटो की चोरी का तथ्यात्मक विवरण दे रहे थे, तो उनकी निगाह देश के 140 करोड़ लोगों की लोकतांत्रिक चेतना के उन्नत होने की तरफ रही होगी। क्योंकि, उन्हें पता है कि मोदी के नेतृत्व में भारत में राज्य की सभी संस्थाएं कॉर्पोरेट-हिंदुत्व गठजोड़ के समक्ष समर्पण कर चुकी हैं। किसी भी संस्था से फासिस्ट हमले के खिलाफ प्रतिरोध की उम्मीद नहीं की जा सकती है।(इसे सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा प्रकरण से समझा जा सकता है ।)
एकमात्र चुनाव आयोग ही है, जिस पर लोकतंत्र का बुनियादी ढांचा टिका होता है। इसे संविधान संशोधन द्वारा मोदी को समर्पित कर दिया गया है । मोदी-शाह द्वारा नियुक्त चुनाव आयुक्त कि यह हैसियत नहीं है कि वह किसी सांस्थानिक चुनावी भ्रष्टाचार व अनियमितता पर रोक लगा सके। राहुल गांधी के खुलासों के बाद चुनाव आयोग जनता में फैली आशंका को दूर करने की जगह कांग्रेस नेता के विरोध में सक्रिय हो गया। अब डराने-धमकाने का सिलसिला शुरू हो चुका है।
देश में चुनावी तानाशाही की अनुगूँज सुनाई देने लगी है। यह नहीं पता कि भारतीय राष्ट्र-राज्य आगे किस दिशा में करवट लेगा। लेकिन यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र के भविष्य के संकेत अच्छे नहीं हैं। वर्तमान दौर में लोकतांत्रिक भारत के भविष्य को लेकर आस्वस्त नहीं हुआ जा सकता है।
लोकतंत्र के भविष्य की बागडोर विपक्षी इंडिया गठबंधन सहित सभी लोकतांत्रिक नागरिकों, संस्थाओं के साथ साथ युवाओं, मजदूरों, किसानों और संविधान के द्वारा आजादी बराबरी और न्याय की उम्मीद लगाए नागरिकों के हाथ में है। उनके साहस, समझ, सक्रियता पर निर्भर करता है कि भविष्य में हमारे देश में लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा या नहीं।
हां, एलओपी राहुल गांधी ने आग से खेलने का संकेत देकर शायद देश को आश्वस्त करना चाहा है कि इस अंधकार के दौर में भी लोकतंत्र के लिए लड़ने वाली ताकतें सचेत हैं, संगठित होने के क्रम में है और लोकतंत्र पर हो रहे हमले का प्रतिरोध करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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